भारत में राज्य सरकारों के ऋणों में भारी वृद्धि इन राज्यों की अर्थव्यवस्था को ले डूबेगी
Updated: November 6, 2025
किसी भी नागरिक, वाणिज्यिक संस्थान, राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार द्वारा उत्पादक कार्यों के लिए बाजार से ऋण लेना केवल तब तक ही सही हैं जब तक बाजार से लिए गए ऋण से कम से कम उस स्तर तक आय का अर्जन हो कि इस ऋण के ब्याज एवं किश्त का भुगतान इस आय से आसानी से किया जा सके। परंतु, किसी भी व्यक्ति अथवा संस्थान द्वारा बाजार से ऋण यदि अनुत्पादक कार्य के लिए लिया जा रहा है तो इस ऋण के ब्याज एवं किश्त का भुगतान करना निश्चित ही मुश्किल कार्य हो सकता है। आज भारत के कुछ राज्यों की बजटीय स्थिति पर भारी दबाव पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है क्योंकि इन राज्यों ने बाजार से भारी मात्रा में ऋण लिया हैं एवं इस ऋण का उपयोग अनुत्पादक कार्यों यथा बिजली के बिल माफ करना, नागरिकों के खातों में सीधे राशि जमा करना, मुफ्त पानी उपलब्ध कराना, कुछ पदार्थों पर सब्सिडी उपलब्ध कराना, आदि के लिए किया जा रहा है। इन राज्यों की स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि इन्हें ऋणों पर अदा किए जाने वाले ब्याज एवं किश्तों के भुगतान हेतु भी ऋण लेना पड़ रहा हैं। यदि कुछ और वर्षों तक इन राज्यों की यही स्थिति बनी रही तो निश्चित ही यह राज्य दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच जाने वाले हैं। हाल ही के कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा भी बाजार से ऋण लेने की राशि में वृद्धि देखी जा रही है। वर्ष 2019 में केंद्र सरकार पर 1.74 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का ऋण बक़ाया था जो वर्ष 2025 में, लगभग दुगना होते हुए, बढ़कर 3.42 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया है और वर्ष 2029 तक इसके 4.89 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर तक हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद आज 4.19 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। इस प्रकार, भारत सरकार का ऋण, भारत के सकल घरेलू उत्पाद के 80 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया है। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों की निर्भरता ऋण पर लगातार बढ़ती हुई दिखाई दे रही है जिसे देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है। आज केंद्र सरकार पर 200 लाख करोड़ रुपए की राशि का ऋण बक़ाया है एवं समस्त राज्य सरकारों पर 82 लाख करोड़ रूपए का ऋण बकाया है, इस प्रकार केंद्र एवं राज्य सरकारों पर संयुक्त रूप से 282 लाख करोड़ रुपए का ऋण बक़ाया है जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का 81 प्रतिशत है। एक तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था ऋण के ऊपर विकसित की जा रही है। जबकि, भारतीय आर्थिक दर्शन ऋण पर निर्भरता को प्रोत्साहन नहीं देता है। चाणक्य के अर्थशास्त्र में, राजा के पास कोष में आधिक्य होने का वर्णन मिलता है। राजा के पास यदि ऋण के स्थान पर कोष का आधिक्य होगा तब वह राज्य अपने नागरिकों के कल्याण पर अधिक राशि खर्च करने की स्थिति में रहेगा। अर्थात, प्राचीन भारत में राज्यों का आधिक्य का बजट रहता था, उसी स्थिति में वे राज्य अपने नागरिकों के कल्याण के कार्यों को तेज गति से चलाने की स्थिति में रहते थे। राज्य का खजाना ही यदि खाली हो तो वे किस प्रकार से राज्य के नागरिकों के लिए भलाई के कार्य कर सकते हैं। आज की स्थिति, बिलकुल विपरीत दिखाई देती है और आज कुछ राज्य बाजार से ऋण लेकर भी नागरिकों को मुफ्त में सुविधाएं उपलब्ध करा रहें हैं बगैर यह सोचे समझे कि आगे आने वाले समय में बाजार से लिए गए ऋण का भुगतान किस प्रकार किया जाएगा। आज भारत में कुछ राज्यों की स्थिति यह है कि वे अपनी कुल आय का 55 प्रतिशत भाग कर्मचारियों को वेतन, पेन्शन एवं उधार ली गई राशि पर ब्याज के भुगतान करने जैसी मदों पर खर्च कर रहे हैं। जबकि, विभिन्न राज्य अपनी आय को बढ़ा सकने की स्थिति में नहीं है। कुछ राज्य तो वर्ष भर में जिस आय की राशि का आंकलन करते हैं उसे प्राप्त ही नहीं कर पाते हैं और बजटीय आय की राशि एवं वास्तविक आय की राशि में 11 प्रतिशत तक की कमी रहती है, जबकि इन राज्यों के खर्च नियमित रूप से बढ़ते जा रहे हैं और इस प्रकार इन राज्यों का बजटीय घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है और अब यह असहनीय स्थिति में पहुंच गया है। आज राज्यों की कुल आय का 84 प्रतिशत भाग स्थिर मदों पर खर्च हो रहा है। प्रदेश को आगे बढ़ाने एवं आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने के लिए कुछ राशि इन राज्यों के पास उपलब्ध ही नहीं हो पा रही है। पूंजीगत खर्चों में लगातार हो रही कमी के चलते इन राज्यों में नए अस्पतालों का निर्माण, नए रोड का निर्माण नए स्कूल हेतु भवनों का निर्माण नहीं हो पा रहा हैं, जिससे रोजगार के नए अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे हैं। पंजाब में कुल आय का 76 प्रतिशत भाग कर्मचारियों के वेतन, पेन्शन एवं ऋण पर ब्याज अदा करने जैसी मदों पर खर्च हो रहा है इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश में 79 प्रतिशत एवं केरल में 71 प्रतिशत भाग उक्त मदों पर खर्च किया जा रहा है। साथ ही, कुछ राज्यों द्वारा अपनी कुल आय का भारी भरकम हिस्सा सब्सिडी जैसी मदों पर खर्च किया जा रहा है। जैसे, पंजाब द्वारा अपने बजटीय आय का 24 प्रतिशत भाग सब्सिडी पर खर्च किया जा रहा है। इसी प्रकार, हिमाचल प्रदेश द्वारा 5 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश द्वारा 15 प्रतिशत, तमिलनाडु द्वारा 12 प्रतिशत एवं राजस्थान द्वारा 13 प्रतिशत राशि सब्सिडी पर खर्च की जा रही है। पंजाब द्वारा तो अपने बजट की 100 प्रतिशत राशि (24 प्रतिशत सब्सिडी पर एवं 76 प्रतिशत राशि वेतन, पेन्शन एवं ब्याज पर खर्च की जा रही है) सामान्य मदों पर खर्च की जा रही है और पूंजीगत खर्चों के लिए शून्य राशि बचती है। विभिन्न राज्यों द्वारा पेन्शन की मद पर वर्ष 1980-81 में अपने राज्य की कुल आय का केवल 3.4 प्रतिशत की राशि का खर्च किया जा रहा था जो वर्ष 2021-22 में बढ़कर 24.3 प्रतिशत हो गया। इसी कारण से भारत सरकार ने पेन्शन अदा करने के नियमों में परिवर्तन किया था। आज यदि पेन्शन की नीति को नहीं बदला गया होता तो इस मद पर होने वाला खर्च बढ़कर 30 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाता। पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के कई राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च को घटाया है। वर्ष 2015-16 से वर्ष 2022-23 के बीच राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च में 51 प्रतिशत तक की कमी की है। दिल्ली में 38 प्रतिशत, पंजाब में 40 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 41 प्रतिशत पश्चिम बंगाल में 33 प्रतिशत से पूंजीगत खर्चों में कमी दर्ज हुई है। आज कई राज्य सरकारें सब्सिडी प्रदान करने की मद पर अपने खर्चों को लगातार बढ़ा रहीं हैं एवं पूंजीगत खर्चों को लगातार घटा रही हैं, जो उचित नीति नहीं कही जा सकती है। इस प्रकार तो इन राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं शीघ्र ही डूबने के कगार पर पहुंच जाने वाली हैं। इन राज्यों में हिमाचल प्रदेश, केरल, पश्चिमी बंगाल जैसे राज्य शामिल हैं। सब्सिडी, वेतन, पेन्शन एवं ब्याज जैसी मदों पर लगातार बढ़ रहे खर्चों के कारण आज 15 राज्यों का बजटीय घाटा कानूनी रूप से निर्धारित 3 प्रतिशत की सीमा से ऊपर हो गया है। हिमाचल प्रदेश में बजटीय घाटा बढ़कर 4.7 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.1 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 4.2 प्रतिशत एवं पंजाब में 3.8 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। इसी क्रम में ध्यान में आता है कि मध्य प्रदेश सरकार ने 5200 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने का निर्णय लिया है। यह फैसला इसलिए चर्चा में है क्योंकि भाईदूज के अवसर पर ‘लाड़ली बहना योजना’ के अंतर्गत 1.27 करोड़ महिलाओं के खातों में राशि समय पर नहीं पहुंच पाई थी। इसके बाद सरकार ने प्रदेश स्थापना दिवस पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए ऋण लेने का रास्ता चुना है। जब किसी राज्य को सामाजिक योजनाओं पर खर्च के लिए ऋण लेना पड़े तो यह स्थिति उस प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं कही जा सकती है। मध्यप्रदेश द्वारा ऋण लेने की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में कुछ तेज हुई है। मार्च 2024 तक मध्यप्रदेश राज्य पर 3.7 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो अब बढ़कर 4.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। जबकि, मध्यप्रदेश की आय में इस रफ्तार से वृद्धि नहीं देखी जा रही है। वित्तीय अनुशासन की दृष्टि से यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि ब्याज भुगतान का बोझ हर साल बढ़ता जा रहा है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, केरल एवं पश्चिम बंगाल की राह पर कहीं मध्यप्रदेश राज्य भी तो नहीं चल पड़ा है। प्रहलाद सबनानी
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