भारतीय संज्ञा प्रज्ञा विज्ञा का परिचय
Updated: September 15, 2025
संदर्भ – 11 सितंबर, शिकागो संभाषण कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था – “यदि आप भारत को समझना चाहते हैं तो स्वामी विवेकानंद को संपूर्णतः…
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प्रधानमंत्री मोदी की बीजिंग यात्रा के निहितार्थ
Updated: September 10, 2025
बीते मई के महीने में जब भारत-पाक संघर्ष के समय प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की उनके समर्थकों ने प्रशंसा की थी तो देश के विपक्ष…
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अपनी मौत का सामान इकट्ठा करता आदमी
Updated: September 10, 2025
भ्रष्टाचार इस समय देश में ही नहीं, सारी दुनिया में अपने चरम पर है। इस भ्रष्टाचार के कारण लोगों में अविश्वास का भाव पैदा हुआ…
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अनिश्चित भविष्य एवं आभासी दुनिया से दुःखी युवापीढ़ी
Updated: September 10, 2025
– ललित गर्ग – पूरी दुनिया की सरकारें युवा के मुद्दों, उनमें बढ़ रहे तनाव एवं दुःखों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। न…
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मणिपुर में शांति की पहल
Updated: September 10, 2025
संदर्भ: मणिपुर शांति समझौता। प्रमोद भार्गव फरवरी 2023 में मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच दंगों की शुरुआत हुई थी। अब जाकर…
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जनजातीय बंधुओं को हिंदू से काटने की कांग्रेसी छटपटाहट
Updated: September 10, 2025
कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यही है! कांग्रेस पर सदैव ही कोई न कोई वेताल सवार रहता है!! कभी कम्युनिस्ट, कभी टेररिस्ट, कभी नक्सलाइट, कभी…
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भजन : ब्रजवासियों की पुकार
Updated: September 10, 2025
तर्ज: लोक गीत दोहा : कृष्णा याद में, ब्रजवासी करते करुण पुकार।फिरसे आ जाओ श्याम रे, संग राधाजू सरकार।। मु: साँवरे साँवरे अब तू आना…
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संकर्षण ठाकुर की पत्रकारिता महज़ पेशा नहीं बल्कि लोकतंत्र की आत्मा
Updated: September 10, 2025
कुमार कृष्णन सुप्रसिद्ध पत्रकार संकर्षण ठाकुर से मेरी पहली मुलाकात 1989 में भागलपुर दंगे के दौरान हुई,जब वे द टेलीग्राफ की ओर से रिपोर्टिग भागलपुर…
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आखिरकार जाना पड़ा भ्रष्ट एवं काहिल सरकार को
Updated: September 10, 2025
नेपाल: एक बार फिर लोक की सर्वोच्चता सिद्ध डॉ घनश्याम बादल आखिरकार वही हुआ जिसकी आशंका थी। जेन जी के कार्यकर्ताओं के आगे लाठी, गोली,प्रतिबंध…
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धार्मिक ‘कट्टरता’ के नाम पर राष्ट्रीय चिन्ह का ‘अपमान’ चिंताजनक
Updated: September 10, 2025
संतोष कुमार तिवारी देश में जिस तरह आज धर्म और जाति को लेकर लोगों में कट्टर बनने का प्रचलन बढ़ता जा रहा हैं, यह बेशक़…
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केला : खाएं भी और फैशन भी चमकाएं
Updated: September 10, 2025
चंद्र मोहन केले का कई तरह से इस्तेमाल होते देखा या सुना है. केले या केले के तने का इस्तेमाल अलग-अलग तरह से किया जाता है…
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प्रकृति ने हमें चेताया है, उसे सुनें और अपनी दिशा बदलें
Updated: September 10, 2025
राजेश जैन उत्तर भारत इन दिनों एक गहरी त्रासदी से गुजर रहा है। यहां हो रही भीषण बारिश के कारण आम जनजीवन अस्त-व्यस्त है। मौसम विभाग के अनुसार 22 अगस्त से 4 सितंबर के बीच क्षेत्र में सामान्य से तीन गुना अधिक बारिश दर्ज हुई है। यह पिछले 14 वर्षों में सबसे अधिक और 1988 के बाद सबसे बरसात वाला मानसून है। भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं ने कई राज्यों को बुरी तरह प्रभावित किया है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और दिल्ली बाढ़ और भूस्खलन से जूझ रहे हैं। अब तक सौ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। अकेले पंजाब में इस दशक की सबसे भीषण बाढ़ ने 50 से अधिक लोगों की जान ले ली है और लाखों लोग बेघर हो गए हैं। गांव डूब गए, सड़कें और पुल बह गए, खेत बर्बाद हो गए और शहरों का जीवन ठप हो गया है। त्रासदी का गहरा असर जब बाढ़ का पानी उतर जाएगा तो कैमरे और प्रशासन वहां से लौट आएंगे लेकिन प्रभावित लोगों की पीड़ा बरसों तक बनी रहेगी। गिरे हुए मकान, डूबे खेत, कर्ज में दबे किसान और पढ़ाई से वंचित बच्चे हमें लगातार याद दिलाएंगे कि यह महज मौसम की सामान्य घटना नहीं बल्कि एक चेतावनी है। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चिंता नहीं बल्कि वर्तमान की कठोर सच्चाई है। सवाल यह है कि क्या हम इसे गंभीरता से लेकर रोकथाम की राह पकड़ेंगे या हर साल राहत और मुआवजे की रस्म अदायगी दोहराते रहेंगे। क्यों बदल रहा है मानसून का पैटर्न दरअसल, मानसून अब पहले जैसा नहीं रहा। कहीं बेहद कम बारिश होती है तो कहीं अचानक बादल फट जाते हैं और कुछ घंटों में महीनों का पानी बरस जाता है। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों में जलप्रवाह अचानक बढ़ जाता है। वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे चुके हैं कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा शिकार बनेगा और वर्तमान घटनाएं आने वाले भयावह समय की झलक मात्र हैं। मानवीय त्रासदी और प्रशासनिक विफलता इस आपदा का असर केवल भूगोल तक सीमित नहीं है बल्कि लाखों लोगों के जीवन पर पड़ा है। अपनों को खो चुके परिवारों के लिए यह आंकड़े नहीं बल्कि अधूरी कहानियां हैं। लाखों लोग राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों के किसानों की खड़ी फसलें डूब गईं। स्कूल बंद हैं, अस्पतालों में दवाओं की कमी है और महामारी का खतरा मंडरा रहा है। लेकिन यह त्रासदी जितनी भीषण है, उससे भी बड़ा सवाल है कि हमारी नीति और तैयारी बार-बार क्यों विफल हो जाती है। हर साल बाढ़ आती है और हर साल वही दृश्य दोहराए जाते हैं। दिल्ली में यमुना बार-बार खतरे के निशान से ऊपर चली जाती है क्योंकि नालों और जलनिकासी तंत्र पर अतिक्रमण हो चुका है। हिमालयी राज्यों में अंधाधुंध सड़कें, होटल और बांध बनने से पहाड़ और असुरक्षित हो गए हैं। सरकारें राहत और मुआवजे पर तो जोर देती हैं लेकिन दीर्घकालिक रोकथाम और जल प्रबंधन पर कम ध्यान देती हैं। सही है कि यह समस्या केवल भारत की नहीं है। जलवायु संकट वैश्विक है लेकिन भारत जैसे देशों पर इसका असर कहीं ज्यादा है। हम वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तीसरे स्थान पर हैं। उद्योग और शहरी उपभोग मॉडल प्रदूषण और उत्सर्जन को बढ़ा रहे हैं लेकिन सबसे अधिक पीड़ा गरीब और कमजोर वर्ग झेल रहा है। पहाड़ी इलाकों के छोटे किसान, मजदूर और आदिवासी इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। समाधान की राह समाधान असंभव नहीं है पर इसके लिए दृष्टिकोण बदलना होगा। हिमालयी राज्यों में संवेदनशील इलाकों की पहचान कर निर्माण पर रोक लगानी होगी। नदियों के किनारे फ्लड ज़ोन मैपिंग जरूरी है ताकि वहां नई आबादी बसाने से बचा जा सके। शहरी क्षेत्रों में ड्रेनेज और वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अनिवार्य करना होगा। मौसम पूर्वानुमान को और सटीक बनाने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग जरूरी है। आपदा प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी ताकि राहत और बचाव केवल सरकारी मशीनरी पर निर्भर न रहे। साथ ही विकसित देशों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण वही हैं। अब समय है कि वे कार्बन उत्सर्जन में कटौती करें और विकासशील देशों को जलवायु फंडिंग उपलब्ध कराएं। भारत को भी नवीकरणीय ऊर्जा की ओर और तेजी से बढ़ना होगा और विकास मॉडल को प्रकृति के अनुकूल बनाना होगा। उत्तर भारत की यह बाढ़ हमें आईना दिखाती है कि यदि हमने अब भी सबक नहीं सीखा तो आने वाले वर्षों में आपदाओं का यह सिलसिला और विकराल रूप लेगा। जब तक नीतियों और विकास की दिशा को बदलकर प्रकृति के साथ संतुलन नहीं साधा जाएगा, तब तक त्रासदियां हमारे जीवन का हिस्सा बनी रहेंगी। प्रकृति ने हमें चेताया है, अब जिम्मेदारी हमारी है कि हम उसे सुनें और अपनी दिशा बदलें। राजेश जैन
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