राजनीति जब गांधी और उनकी कांग्रेस को सरदार भगत सिंह और उनके साथियों ने कहा था कायर, भाग – 2

जब गांधी और उनकी कांग्रेस को सरदार भगत सिंह और उनके साथियों ने कहा था कायर, भाग – 2

कांग्रेस की निंदनीय कार्यशैली इस बीच कांग्रेस क्या कर रही थी ? उसने अपना ध्येय स्वराज्य से बदलकर पूर्ण स्वतन्त्रता घोषित किया। इस घोषणा से…

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राजनीति प्रवासी मजदूर: समस्या भोजन, आवास किराये व मोबाइल रिचार्ज की है

प्रवासी मजदूर: समस्या भोजन, आवास किराये व मोबाइल रिचार्ज की है

प्रवासी श्रमिकों का प्रश्न देश की व्यवस्था के लिये मात्र सिरदर्द ही नहीं है, संभवतः शीघ्र ही यह समस्या समूची व्यवस्था का नासूर भी बनने जा…

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दोहे माँ की ममता माणिक-मुक्ता

माँ की ममता माणिक-मुक्ता

*मन-मंजूषा में मधुरिम सी, माँ की ममता माणिक-मुक्ता।मंज़िल तक मुझको पहुँचाती,अक्षय-निधि सी उसकी शिक्षा।।*माँ प्रभात की ज्योति-किरण थी,किया तमस को हमसे दूर।त्यागीं अपनी सुख-सुविधाएँ, मुझको…

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आर्थिकी अपने मूल्य उद्देश्यो से भटकती मनरेगा योजना

अपने मूल्य उद्देश्यो से भटकती मनरेगा योजना

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा ) 2005 मे एक विधान के रूप मे लागू किया गया इस योजना के अन्तर्गत ग्रामीण परिवार…

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लेख बुद्ध धर्मक्रांति के साथ व्यक्तिक्रांति के प्रेरक

बुद्ध धर्मक्रांति के साथ व्यक्तिक्रांति के प्रेरक

बुद्ध पूर्णिमा 7 मई 2020-ललित गर्ग- बुद्ध पूर्णिमा न केवल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिये एक महत्वपूर्ण दिन…

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धर्म-अध्यात्म कलियुग में दैहिक नहीं, चारित्रिक रूप में करें श्रीकृष्ण की पहचान

कलियुग में दैहिक नहीं, चारित्रिक रूप में करें श्रीकृष्ण की पहचान

   केवल कृष्ण पनगोत्रा यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥(गीता: अध्याय 4, श्लोक…

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लेख गांधी के चरखे से आत्मनिर्भर होंगे गांव

गांधी के चरखे से आत्मनिर्भर होंगे गांव

प्रमोद भार्गव वैश्विक कोरोना महामारी के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सरपंचों को संबोधित करते हुए इच्छा जताई है कि गांधी…

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टॉप स्टोरी प्रवासी श्रमिक संबंधित तीनों निर्णय काल विरुद्ध : मानवीय-वित्तीय विजन का अभाव

प्रवासी श्रमिक संबंधित तीनों निर्णय काल विरुद्ध : मानवीय-वित्तीय विजन का अभाव

लॉक डाउन आवश्यक था। किंतु 24 मार्च को 4 घंटे की पूर्व सूचना पर अर्ध रात्री से लागू किया जाने वाले यकायक लॉक डाउन की…

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मीडिया लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता बेहद जरूरी

लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रेस की स्वतंत्रता व निष्पक्षता बेहद जरूरी

3 मई अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेषदीपक कुमार त्यागी देश के मशहूर शायर “अकबर इलाहाबादी” जी ने प्रेस की ताकत के बारे में एक…

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राजनीति ऐ हिन्द के मुसलमानों

ऐ हिन्द के मुसलमानों

तनवीर जाफ़री  इस समय भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कोरोना महामारी को लेकर स्थितियां असामान्य बनी हुई हैं। परन्तु हमारे देश में कोरोना…

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व्यंग्य मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला

मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला

“मंदिर मस्जिद बैर कराती मेल कराती मधुशाला’’| जी हाँ ! यह बात श्री हरिवंश राय बच्चन जी ने बहुत समय पहले ही अपनी मधुशाला मे लिख…

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विश्ववार्ता वर्ण व्यवस्था, योग साधना व विश्व प्रबंधन!

वर्ण व्यवस्था, योग साधना व विश्व प्रबंधन!

यदि हम अष्टांग या राजाधिराज योग का पालनकरें और आध्यात्मिक साधना करें तो कर्म काण्ड कीआवश्यकता नहीं पड़ेगी। जो जीवन गुण-धर्म तब हम अपनाएँगे वह सहज, सामयिक, ज्ञान विज्ञान युक्त वतर्क संगत होंगे। कुछ नया होने लगेगा या जो सही हो रहा था वह युक्ति पूर्ण लगने लगेगा!  तब हम वर्ण व्यवस्था के व्यूह से निकल ध्यान कर ‘द्विज’(द्वितीय या पुन: जन्मे) अवस्था में आजाएँगे। समाधिसे परे जाकर हम ‘सद्विप्र’ (सद्+विप्र = सच्चे विशुद्ध प्रिय= आध्यात्मिक व्यक्ति) बन जाएँगे।  तब ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय व शूद्र एवं समस्त विश्व वासी मानव, जीव जन्तु व वनस्पति ही नहीं पंचभूत भी हमेंअनायास गद् गद् हो विशुद्ध स्नेह करने लगेंगे और हम उन्हें!  उस मनःस्थिति में पहुँच हम अपनी तथा-कथित स्वनिर्मित सीमाओं से परे जाकर समस्त मानव व भूमा समाजको अन्त: करण से प्रेम करपाएँगे और तत्क्षण उनका भी भरपूर सहयोग व समर्पण हम अपने इन्हीं चक्षुओं सेदेख व चख सकेंगे! ज़रूरत है अपने चित्त को साध दृष्टि भाव ब्रहत्, महत व ब्रह्म-भाव वत कर लेने की!  वर्ण व्यवस्था से प्रत्येक वर्ण पीड़ित व शोषित है। पर यह सब संघर्ष हमारे अपने मन की जड़ताया मोहावस्थाके कारण ही है। यदि हम योग, तंत्र व समाधि से ऊपर की अपनी ईश्वरीय अवस्थाओं में पहुँच जाएँगे तो हमेंसृष्टि प्रबंधन का अधिकार व उत्तरदायित्व मिल जाएगा। तब हमारी सारी सोच, झेंप, झिझक, शिकायत यादोषारोपण की प्रवृत्ति अथवा अकड़, अहंकार व पर-पीड़न की वृत्ति  हमारे मन में में ठहर नहीं पाएगी।  तब सब व्यक्ति, वर्ण व व्यवस्थाएँ और उनकी अवस्थाएँ व सीमाएँ हमें व्यथित व आहत नहीं करेंगी! हम उनकीसेवा व सहभागिता करने दौड़ पड़ेंगे। तब उनके लड़खड़ाते चरण हम कृष्ण बन उन्हें सुदामा-सरिस मित्र समझचूमना चाहेंगे!  मानव व जीव समाज के विकसित, व्यवस्थित व तरंगित होने में लाखों वर्ष लग गए हैं! उनके इतिहास का एकएक पल यद्यपि उल्लेखनीय, गौरवपूर्ण व संग्रहण योग्य है पर उस इतिहास की पीड़ा, क्रीड़ा व संवेदना मेंसबको सब समय उलझना उचित नहीं होगा! उससे सीख समझ कर आगे बढ़ हमें अपना इतिहास बनाना उचितव उपयोगी होगा!  हमारे साथ जो अच्छा हुआ उसे याद रखें। जो कोई अज्ञान वश या संकुचित भाव वश कुछ समुचित नहीं करपाए, उन्हें अपने ईश्वरीय भाव सेक्षमा करते हुए आगे बढ़ जाएँ। सम्भव है अब वभी वैसे नहीं रहे जैसे पहले थे! हम भी तो प्रति पल बदल रहे हैं। अब हम अपने उत्क्रष्ट भाव से उन्हें आध्यात्मिक भाव तरंग दे बदल भी सकतेहैं! आवश्यक हो तो परम पुरुष से ध्यान में शिकवे शिकायत भी कर सकते हैं!  जब हम सद्विप्र होगए तो उनके भी वरेण्य  होगएऔर वे भी हमें पूज्य भाव से देखने लगे! तब द्वैतव द्वेष कहाँरहा!  वस्तुतः यह परिवर्तन, परिमार्जन व परिष्कार हमारे अन्त:करण में हुआ या होना है और जगत (जोहमारे आसपास चल रहा है या परिलक्षित है) हमारी छाया मात्र है! जैसे हम होंगे वैसा ही जग हमारे इर्द गिर्द निर्मितहोगा। हम बदल जाएँ तो वह भी वैसा नहीं रहेगा!  हमारा मन छोटा है तो हमारा सोच, विचार, परिकल्पना, धारणा, योजना, कार्य प्रणाली, व्यवहार, आकाँक्षा, अभिलाषा, अपेक्षा, आदि सब क्षत विक्षत, दीन हीन, संकीर्ण व सीमित हैं!  यदि आत्म ईश्वरीय स्वरूप इख़्तियार कर ले तोसारा विश्व उसके आधीन हो कार्य करने लगता है! पर तब हमअपने ब्रह्माण्ड के हर पिण्ड व अण्ड की सेवा करने, सृष्टि प्रबंधन करने व सब कुछ अर्पण समर्पण कर अपनेपूरे मनोयोग व आत्म- योग से युक्त जहाँ कहीं हैं वहीं से ओत प्रोत योग में समाहित हुए व्यस्त हो जाते हैं!  यह मात्र सिद्धान्त या दर्शन की बात नहीं है। प्रयोगात्मक सार्वभौमिक सत्य है। अनन्त ईश्वरीयसत्ता से संभूतप्राण हर काल, हर देश में, हर पात्र के साथ विश्व रंगमंच पर लीला करते रहे हैं, कर रहे हैं व करते रहेंगे! आवश्यकता है उन्हें समझने की, उनके जैसे बनने व उनसे भी बेहतर कार्य करने की!  बस छोटा सा काम करना है, योग साधना  व ध्यान सीख उसका अभ्यास करना है! इसके लिए मात्र मानव देहहोना पर्याप्त है और कुछ नहीं चाहिए! वैसे अन्य प्राणी भी साधना करते हैं पर मनुज रूप में यह करना ज़्यादाआसान है। हम अपना मन बनायें तो दीक्षा देने वाले स्वयं आ जाएँगे! तो बात बस अपना मन बनाने की है। शेषसब हो जाएगा!  वे हर घड़ी अपनी विश्व व्यवस्था हमारे हाथ में थमा हमें निदेशक,  व्यवस्थापक, प्रबंधक, परिचालक, इत्यादिपदों पर प्रतिष्ठित व सुशोभित करना चाहते हैं! हम सबका सदा स्वागत है!  ✍? गोपाल बघेल ‘मधु’ 

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