चीन

भारत बनाम चीन

। लेकिन सबसे बड़ा सच यह है कि यह पं. जवाहरलाल नेहरु के वक्त का भारत नहीं है, यह नरेन्द्र मोदी के वक्त का भारत है। चीन के ज्यादा शक्तिशाली होने और ज्यादा संख्याबल होने के बाबजूद भारत बखूवी चीन का मुकाबला कर सकता है। लोगों को यह पता होना चाहिए कि संख्याबल से ही युद्ध नहीं जीते जाते। चाहे वह फौजों की संख्या हो या हथियारों की संख्या हो। दुनिया में इसका सबसे बड़ा उदाहरण इजरायल है, जो संख्या में बहुत कम होने के बाबजूद कई बार अरब देशों की विशाल सेनाओं को बुरी तरह पराजित कर चुका है।

भारतीय राजनीति का घटिया स्तर

हमारे विपक्ष को प्रधानमंत्री मोदी इसलिए अप्रिय लग रहे हैं कि वे अगले लोकसभा चुनावों में भी उसे सत्ता में आते हुए दिखायी दे रहे हैं। जनता आज भी उन्हें उतना ही चाह रही है, जितना 2014 में चाह रही थी। राहुल गांधी ना तो विपक्ष को साथ लगा पा रहे हैं और ना ही कांग्रेस को साथ लेकर चल पा रहे हैं। वह विपक्ष के साथ लगते हैं ना कि विपक्ष को साथ लगाते हैं, इसी प्रकार वह कांग्रेस पर थोपे जा रहे हैं-ना कि कांग्रेस उन्हें चाहती है।

ट्रंप-मोदी मुलाकात ने चीन की बढ़ाई कुंठा

  चीन की यह दोगली कूटनीति तमाम राजनीतिक मुद्दों पर साफ दिखाई देती है। चीन बार-बार जो आक्रामकता दिखा रहा है, इसकी पृष्ठभूमि में उसकी बढ़ती ताकत और बेलगाम महत्वाकांक्षा है। यह भारत के लिए ही नहीं दुनिया के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। दुनिया जनती है कि भारत-चीन की सीमा विवादित है। सीमा विवाद सुलझाने में चीन की कोई रुचि नहीं हैं। वह केवल घुसपैठ करके अपनी सीमाओं के विस्तार की मंशा पाले हुए है। चीन भारत से इसलिए नाराज है, क्योंकि उसने जब तिब्बत पर कब्जा किया था, तब भारत ने तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बतियों को भारत में शरण दी थी। जबकि चीन की इच्छा है कि भारत दलाई लामा और तिब्बतियों द्वारा तिब्बत की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई की खिलाफत करे ? दरअसल भारत ने तिब्बत को लेकर शिथिल व असंमजस की नीति अपनाई है। जब हमने तिब्बतियों को शरणर्थियों के रूप में जगह दे ही दी थी, तो तिब्बत को स्व तंत्र देश मानते हुए अंतराष्ट्रीय मंच पर समर्थन की घोषणा करने की जरुरत भी थी ? डाॅ राममनोहर लोहिया ने संसद में इस आशय का बयान भी दिया था। लेकिन ढुलमुल नीति के कारण नेहरु  ऐसा नहीं कर पाए ? इसके दुष्परिणाम भारत आज भी झेल रहा है?