तीन तलाक

हलाला ‘कानून और ‘तीन तलाक’ जैसे बर्बर कानूनको त्यागने में दिक्कत क्या है ?

जब दुनिया के अधिकांश प्रगतिशील मुस्लिम समाज ने ‘तीन तलाक’ को अस्वीकार
कर दिया है , तब भारतीय मुस्लिम समाज को इस नारी विरोधी ‘हलाला ‘कानून
और ‘तीन तलाक’ जैसे बर्बर कानूनको त्यागने में दिक्कत क्या है ? सदियों
उपरान्त इस आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी ,हम हर गई गुजरी परम्परा को
क्यों ढोते रहें ?

इस्लाम की दुर्गति से शर्मशार मानवता

याद रखें की विपक्षी पार्टियों की मुसलमानपरस्ती भाजपा और मोदी को मई 2014 की ओर ले जा रही है| हिन्दू फिर से गोलबंद हो रहे हैं, ऊपर से सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भाजपा और मोदी की जनता और हिन्दुओं में जो गहरी पैठ बनी है उसका असर 2019 की चुनावों में दिखेगा| राम मंदिर पर हो रहे हल्ले ने यूपी में एक अलग माहौल बनाया है, वहीँ मोदी के विजयादशमी पर लगाए ‘जय श्री राम’ के नारे ने कार्यकर्ताओं और संघ प्रचारकों में नया उत्त्साह फूंक दिया है|

धर्म बनाम राष्ट्रधर्म

दुर्भाग्य का विषय यह कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम लाॅ में व्यक्ति की गरिमा और मानव अधिकारों के हित में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। शहबानों प्रकरण में देश की शीर्ष अदालत यह कह चुकी है कि मुस्लिम समुदाय में निजी कानूनों में सुधार होना चाहिए।

तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार की पराकाष्ठा

आजकल मुस्लिम समाज में तीन तलाक के मुद्दे पर इन दिनों देश में खूब बहस चल रही है और इसे हटा ने की मांग की जा रही है। मु सलमानों में तलाक मुस्लिम पर् सनल लॉ यानी शरिया के जरिए होता है।यह बहुत ही रूढ़िवादी कानून है आज देश का कानून भारतीय संवि धान के अनुसार चलता है फिर भी मु

तीन तलाकः मुस्लिम बनें विश्व गुरु

पता नहीं, भारत के मुसलमान इतने दब्बू क्यों हैं? अरबों की घिसी-पिटी परंपराओं को वे अपनी छाती पर क्यों लादे रहना चाहते हैं? भारत के मुसलमानों को दुनिया के सारे मुसलमानों का विश्व-गुरु बनना चाहिए। क्या उन्हें पता नहीं है कि पाकिस्तान, मिस्र, मोरक्को, सीरिया, जोर्डन, सूडान और बांग्लादेश जैसे करीब दर्जन भर मुस्लिम राष्ट्रों ने तथाकथित शरीयती कानून को खूंटी पर टांग दिया है? उसकी अव्यवहारिक बातों को नकार दिया है।

तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार की पराकाष्ठा

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कानून से मुस्लिम महिलाओं को तमाम अत्याचार झेलने पड़ते हैं। तीन तलाक तो इसकी पराकाष्ठा है। साथ ही साथ मुस्लिम पुरुष समाज को एक पत्नी होते हुए बहुविवाह की आजादी भी मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार है।

तीन तलाक पर प्रगतिशील बने मुस्लिम समाज

हाल ही में जब कोर्ट ने केंद्र से तीन तलाक के विषय में कोर्ट में हलफनामा प्रस्तुत करनें के लिए कहा तब नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछली सरकारों की तरह इस मुद्दें पर कन्नी काटने व चुप बैठे रहनें के स्थान पर संविधान की धारा 44 के मर्म को समझ कर अपनी जिम्मेदारी निभाई व तीन तलाक के मुद्दे पर स्पष्ट असहमति व्यक्त कर दी है. 1840 में यह विवाद प्रथम बार उभरा था और

तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाओं को क्या न्याय मिलेगा ?

डा. राधेश्याम द्विवेदी अवैधानिक और महिलाओं के अधिकार का उल्लंघन:-मुस्लिम समाज में पति-पत्नी के बीच