त्योहार और बाजार…!!

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तारकेश कुमार ओझा कहते हैं बाजार में वो ताकत हैं जिसकी दूरदर्शी आंखे हर अवसर को भुना कर मोटा मुनाफा कमाने में सक्षम हैं। महंगे प्राइवेट स्कूल, क्रिकेट , शीतल पेयजल व मॉल से लेकर फ्लैट संस्कृति तक इसी बाजार की उपज है। बाजार ने इनकी उपयोगिता व संभावनाओं को बहुत पहले पहचान लिया और… Read more »

जल परम्परा और बाजार

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मनोज कुमार एक समय था जब आप सफर पर हैं तो पांच-दस गज की दूरी पर लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा आपकी खातिरदारी के लिए तैयार मिलेगा. पानी के घड़े के पास जाते हुए मन को वैसी ही शीतलता मिलती थी, जैसे उस घड़े का पानी लेकिन इस पाऊच की दुनिया में मन… Read more »

मंदिरों के सोने पर सरकार की नजर

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भारत प्राचीन समय से सोने के भंडारण में अग्रणी देश रहा है। इसलिए भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है। इस समय भारतीय रिर्जब बैंक के पास करीब 18 हजार टन सोना है। इसके अलावा एक अनुमान के मुताबिक देश के मंदिरों में कुल मिलाकर करीब 3 हजार टन और भारतीय घरों में लगभग… Read more »

बाजार, तकनीकी और नैतिक पतन

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राजीव गुप्ता जयप्रकाश नारायण ने अपनी एक पुस्तक “समाजवाद से सर्वोदय की ओर” में लिखा है कि “विज्ञानं ने अखिल विश्व को सिकोड़कर एक पड़ोस बना दिया है !” इस बात की सत्यता एवं प्रामाणिकता वर्तमान परिदृश्य की भौतिकता के आधुनिक दौर में हुए तकनीकी विकास को देखकर लगाया जा सकता है ! मसलन देश… Read more »

संस्कार और बाज़ार

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राजीव गुप्‍ता  अवधपुरी अति रुचिर बनाई ! देवन्ह सुमन बृष्टि झरी लाई !! प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा ! तुरत दिब्य सिंघासन माँगा !! (उत्तरकाण्ड, रामचरितमानस)  बाय वन गेट टू फ्री….वॉव….देख-देख-उधर-देख….चल यार उधर ही चलते है….आज शॉपिंग करने में मज़ा आ जाएगा….कहते हुए गीतू ने अपनी तीन सहेलियों मीतू,नीतू और रीतू को इमोशनल ब्लैकमेल करते… Read more »

बाजार में औरत और औरत का बाजार

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संजय द्विवेदी हिंदुस्तानी औरत इस समय बाजार के निशाने पर है। एक वह बाजार है जो परंपरा से सजा हुआ है और दूसरा वह बाजार है जिसने औरतों के लिए एक नया बाजार पैदा किया है। औरत की देह इस समय मीडिया के चौबीसों घंटे चलने वाले माध्यमों का सबसे लोकप्रिय विमर्श है। लेकिन परंपरा… Read more »

धर्म का बाजार या बाजार का धर्म

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श्‍यामल सुमन कई वर्षों का अभ्यास है कि रोज सबेरे सबेरे उठकर कुछ पढ़ा लिखा जाय क्योंकि यह समय मुझे सबसे शांत और महफूज लगता है। लेकिन जब कुछ पढ़ने लिखने के लिए तत्पर होता हूँ तो अक्सर मुझे दो अलग अलग स्थितियों का सामना अनिवार्य रूप से करना पड़ता हैं। पहला – टी०वी० के… Read more »

अखबार बेचने का तरीका

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लक्ष्मण प्रसाद ‘नक्सलियों ने किया विस्फोट!’ ये आवाज चार बजे भोर की गहरी नींद को तोड़ने के लिए पर्याप्त थी। हम में से कुछ यात्री जबलपुर रेलवे स्टेशन के कुछ उन इक्के-दुक्के अखबार बेचने वाले हाकरों को ढूढ़ने ट्रेन से बाहर निकल पड़े। बाहर आया तो देखा कि सिकन्दराबाद से पटना आने वाले मेरे जैसे… Read more »

बाजार के हवाले ‘हम भारत के लोग’

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बढ़ती कीमतों ने जाहिर किया आम आदमी की चिंता किसी को नहीं – संजय द्विवेदी एक लोककल्याणकारी राज्य जब खुद को बाजार के हवाले कर दे तो कहने के लिए क्या बचता है। इसके मायने यही हैं कि राज्य ने बाजार की ताकतों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया है और जनता को महंगाई की ऐसी… Read more »

बाजार की चुनौतियों से बेजार हिन्दी पत्रकारिता

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आज भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी पत्रकारिता की चुनौतियां न सिर्फ बढ़ गई हैं वरन उनके संदर्भ भी बदल गए हैं। पत्रकारिता के सामाजिक उत्तरदायित्व जैसी बातों पर सवालिया निशान हैं तो उसकी नैसर्गिक सैद्धांतिकता भी कठघरे में है। वैश्वीकरण और नई प्रौद्योगिकी के घालमेल से एक ऐसा वातावरण बना है जिससे कई सवाल पैदा… Read more »