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    इंतज़ार

    waitingहै मुझे

    इंतजार

    कब होगी नयी सुबह

    जब

    फूलों के बीच

    बच्चे

    हंसते- कूदते- खेलते दौड़ते दिखेंगे

    उनकी पीठों पर

    नहीं होगा भारी बोझ,

    निरर्थक शब्दों का गठ्ठर।

    शब्द-

    वाकई

    असमर्थ

    नहीं बदल पाते हैं

    भाव-समाज-दुनिया।

    अंधेरा छाया है

    घना

    मन व रिश्तों में

    दिखती नहीं है राह

    जिस पर

    उल्लास से फुदकता है

    बालक

    कोई एक।

    सच

    आज नहीं दिखता

    कहीं कोई बालक ?

    पीठ पर शब्दों का गठ्ठर ढ़ोता कुली

    कब तब्दील हो जाता है

    हममें

    नहीं मालूम ?

    मेटामारफोसिस

    की प्रक्रिया

    निरंतर जारी है।

    कभी

    वनैले सूअर, कभी घड़ियाल- भेड़िये

    का रूप धर

    हम सब शब्दों को अब सिर्फ

    बोते- खाते- चबाते हैं।

    निरीह छटपटाता है

    हमारे मन के कोने में

    छिपा बालक एक

    पुकारता है

    बचाओ,

    निकालो-

    सभ्यता के इस दलदल से

    निरर्थक शब्दों के भार से।

    उल्लसित

    खेलना चाहता है

    वह सार्थक शब्दों से

    उसने चुन रखे हैं

    अपने लिए

    शब्द

    प्यार- खुशी- उछाह- मित्रता- संवेदना।

    क्या आप

    अपने गठ्ठर से

    दे सकते हैं

    ये शब्द

    उधार ?

    थोड़ी देर के लिए सही

    बाकी जीवन के लिए सही।

    -०-

    कमलेश पांडेय

    अश्वनी कुमार
    अश्वनी कुमारhttps://www.pravakta.com/author/akp-ashwani
    स्वतंत्र लेखक, कहानीकार व् टिप्पणीकार
    1. बहुत् सुन्दर क्रति सच‌ मॆ दिल सॆ दिमाग‌ तक कॆ तार झनझना दॆनॆ वाली रचना. बधाई

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