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समस्याएं अनेक, हल एक

अशोक गुप्त

हमारे देश में बहुत ही समस्याएं हैं जिनकी संख्या और आकार बढ़ता ही जा रहा है. अधिकतर बढ़ती समस्याओं का कारण हमारी बढ़ती जनसंख्या और गरीबी है. गरीबी और कार्य के साधन सीमित होने के कारण गाँवों से महानगरों की ओर पलायन जारी है जिसके कारण शहरों में बिजली और पानी की कमी और बढ़ते प्रदूषण के साथ सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे और बढ़ती झुग्गियों  की समस्याएं हो रही है. एक अनुमान के अनुसार दिल्ली में 1000 से अधिक झुग्गी कालोनियां हैं जिनमें कई लाख लोग अमानवीय परिस्थितियों में रहते हैं. ये कालोनियां कहीं-कहीं तो नालों के किनारे या नालों के अंदर भी बसी हुई है. कई स्थानों पर तो नालों को पाट  दिया गया है जिससे बरसाती पानी का भाव रुक जाता है और बारिश होने पर बाढ़ की समस्या पैदा हो जाती है और पानी का निकास नहीं हो पाता .

 इन समस्याओं को देखते हुए दिल्ली सरकार ने बहुत सी सरकारी जमीनों से अवैध कब्जे वाली झुग्गियां  हटाई हैं पर इससे ये समस्याएं हल होने वाली नहीं हैं. ये  समस्याएं तभी हल हो सकती हैं यदि ये लोग दिल्ली या ऐसे महानगरों में न रहकर अपने मूल स्थान पर रहें. पलायन रोकने हेतु जनसंख्या वृद्धि पर रोक बहुत आवश्यक है क्योंकि परिवार में बच्चों की अधिक संख्या गरीबी बढ़ाती है पर यह गरीब लोग यह समझ नहीं पाते और उनके प्राय तीन-चार बच्चे होते हैं.

 इसके लिए आवश्यक है कि सरकारी योजनाओं जैसे फ्री राशन आदि का लाभ उन्हीं गरीबों को मिले जिनका एक ही बच्चा हो और जो अपने मूल स्थान पर रहते हों. दूसरा बच्चा होते ही यह सुविधा वापस ले ली जानी चाहिए.

 यदि हम अपने आसपास देखें तो पाएंगे कि हमारे संपर्क में आने वाले अधिकतर निम्नवर्गीय लोगों के प्राय तीन-चार बच्चे होते हैं. यह वर्ग परिवार नियोजन हेतु गंभीर नहीं होता जबकि अधिकतर पढ़े लिखे मध्यवर्गीय परिवारों में एक से अधिक बच्चा नहीं होता क्योंकि एक बच्चे को ही अच्छे स्कूल में पढ़ाना बहुत महंगा हो चुका है. ऐसे परिवार मजबूरी में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा कर अमानवीय परिस्थितियों में रहते हैं पर कम बच्चे पैदा कर अपना जीवन स्तर ऊपर उठाने को तैयार नहीं हैं. केवल लालच ही इन्हें के लिए प्रेरित कर सकता है 

 इन्हें परिवार नियोजन हेतु प्रेरित करने के लिए सरकार यह नियम बना सकती है कि फ्री राशन जैसी सुविधा केवल उन्हीं गरीब परिवारों को मिले जिन परिवारों में केवल एक बच्चा हो. सरकार उन्हें प्रोत्साहन राशि के रूप में  ₹1000 प्रति मास से ₹12000 प्रति वर्ष की राशि दे सकती है यदि यह अपने मूल स्थान पर रहते हैं. दूसरा बच्चा पैदा होने पर उनकी यह सुविधा छीन ली जानी चाहिए. इसके अतिरिक्त फ्री राशन जैसी सुविधा भी केवल उन्हें परिवारों को दी जानी चाहिए जो अपने मूल स्थान पर रहते हैं और जिनका एक ही बच्चा हो . 

यदि यह योजना ठीक से लागू हो पाए तो अगले कुछ वर्षों में जहां गांव से महानगरों में पलायन की समस्या पर लगाम लगेगी, वहीं गरीब जनता के जीवन स्तर में सुधार होगा, उनके बच्चे अच्छा पोषण और अच्छी शिक्षा पा सकेंगे और देश के संसाधनों पर दबाव कम होगा. इसके अतिरिक्त दिल्ली जैसे महानगरों की तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर भी लगाम लगेगी और बिजली पानी की समस्याओं व अवैध कब्जे की समस्याओं से धीरे-धीरे मुक्ति मिल पाएगी . इसके अतिरिक्त अवैध कब्ज़ों पर सरकार  को नो टॉलरेंस  नीति अपनानी चाहिए। हटाई गई झुग्गियों के स्थान पर पुनः झुग्गियां बनने या नई  झुग्गी बनने पर पुलिस अधिकारियों  पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि अवैध बसने वालों को प्रोत्साहन न मिले.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: शताब्दी वर्ष की यात्रा और समाज में सार्थक योगदान

“समर्पण, अनुशासन और समावेशिता के माध्यम से विविधता में एकता: संघ की शताब्दी यात्रा”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य केवल संगठन तक सीमित नहीं है। यह समाज में नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों को मजबूत करने, प्रत्येक व्यक्ति में अनुशासन और समर्पण विकसित करने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का कार्य करता है। संघ का दृष्टिकोण समावेशी है; यह किसी धर्म, जाति या समूह के विरोध में नहीं है। हिन्दू शब्द का अर्थ केवल धर्म नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, भक्ति और समाज के प्रति प्रतिबद्धता है। संघ समाज को गुटबंदी से मुक्त कर, विविधता में एकता स्थापित करने का कार्य करता है। शताब्दी यात्रा इस समर्पण और संगठन की पुष्टि है।

-डॉ. सत्यवान सौरभ

संगठन प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के अवसर पर दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया। यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि संघ की विचारधारा, उसकी कार्यपद्धति और समाज-निर्माण यात्रा का जीवंत प्रदर्शन था। संघ का निर्माण भारत को केंद्र में रखकर हुआ और इसका उद्देश्य देश को विश्वगुरु बनाने में योगदान देना है। संघ की प्रार्थना “भारत माता की जय” केवल शब्द नहीं, बल्कि कार्य और समर्पण की प्रेरणा है। संघ का निर्माण धीमी और सतत प्रक्रिया का परिणाम है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा।

संघ भले ही ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग करता है, लेकिन इसका मर्म केवल धर्म तक सीमित नहीं है। इसमें समावेश, मानवता और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना निहित है। संघ का उद्देश्य किसी विरोध या प्रतिस्पर्धा के लिए खड़ा होना नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को संगठित करके देश की एकता बनाए रखना है। संघ का कार्य स्वयंसेवकों के माध्यम से संचालित होता है, और यह कार्य नए स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देने, उनमें नेतृत्व और जिम्मेदारी विकसित करने का अवसर प्रदान करता है।

राष्ट्र की अवधारणा सत्ता या सरकार से परिभाषित नहीं होती। भारतीय परंपरा में राष्ट्र का अर्थ संस्कृति, आत्मचिंतन और सामाजिक चेतना से जुड़ा है। इतिहास की ओर देखने पर यह स्पष्ट होता है कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम असफल रहा, लेकिन इसने भारतीय समाज में नई चेतना और आत्म-जागरूकता को जन्म दिया। इसके बाद कांग्रेस का उदय हुआ, जिसने राजनीतिक समझ और सामाजिक सुधार का मार्ग प्रशस्त किया। स्वतंत्रता के बाद समाज में उपजी असमानताओं और कुरीतियों को दूर करने की चुनौती बनी रही। इसी आवश्यकता ने संघ की स्थापना और उसकी भूमिका को जन्म दिया।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और अन्य महापुरुषों ने समाज के दुर्गुणों को दूर करने और संपूर्ण समाज के संगठन की आवश्यकता को पहचाना। 1925 में संघ की स्थापना इस दृष्टि से हुई कि समाज के नैतिक और सांस्कृतिक मूल्य मजबूत हों और राष्ट्र निर्माण में योगदान सुनिश्चित हो। ‘हिन्दू’ शब्द केवल धर्म नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, समर्पण और समावेश का प्रतीक है। इसमें किसी को अलग करने या विरोध करने का भाव नहीं, बल्कि सबको जोड़ने और समाज को संगठित करने का उद्देश्य निहित है।

भारत का स्वभाव सहयोग और समन्वय का है, संघर्ष का नहीं। उसकी एकता भूगोल, संसाधनों और आत्मचिंतन परंपरा में निहित है। बाहर की ओर देखने के बजाय भीतर झाँकने पर यह स्पष्ट होता है कि सभी में एक ही तत्व है, चाहे वह अलग-अलग रूपों में क्यों न प्रकट हो। यही कारण है कि भारत माता और पूर्वज हमारे लिए पूजनीय हैं। जो व्यक्ति भारत माता और अपने पूर्वजों का सम्मान करता है, वही सच्चा हिन्दू है। शब्द बदल सकते हैं, लेकिन भक्ति और श्रद्धा की भावना समाज के प्रत्येक व्यक्ति को जोड़ती है।

समाज में धीरे-धीरे लोग संघ और हिन्दू शब्द के अर्थ को समझने लगे हैं। जीवन की गुणवत्ता बेहतर होने से लोग अपने मूल परंपराओं की ओर लौटते हैं। संघ किसी को हिन्दू होने के लिए बाध्य नहीं करता; उसका उद्देश्य समाज के समग्र संगठन और राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है। संघ किसी धर्म, जाति या समूह के खिलाफ नहीं है, बल्कि समावेशी दृष्टि से सभी को जोड़कर समाज को संगठित करता है।

संघ कार्य केवल संगठन तक सीमित नहीं है। उसका लक्ष्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति के भीतर नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का विकास करना है। समाज में जागरूकता और अनुशासन लाना संघ का प्रमुख उद्देश्य है। संघ की कार्यपद्धति में व्यक्तिगत समर्पण और अनुशासन का विशेष महत्व है। प्रत्येक स्वयंसेवक संघ की मूल भावना और कार्य शैली को आत्मसात करता है और समाज में इसे लागू करता है। संघ का लक्ष्य यह है कि समाज में गुटबंदी न हो, बल्कि सभी को संगठित किया जाए और देश में एकता कायम रहे।

भारत की विविधता में एकता उसकी असली पहचान है। विभिन्न भाषा, धर्म, संस्कृति और परंपराओं के बावजूद भारत की पहचान उसकी आत्मा, संस्कृति और पूर्वजों के प्रति सम्मान में निहित है। संघ का उद्देश्य इस एकता को बनाए रखना और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इसमें सहभागी बनाना है। संघ का कार्य व्यक्ति निर्माण, समाज उत्थान और राष्ट्र निर्माण तीनों स्तरों पर कार्य करता है।

संघ के माध्यम से समाज में नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत किया जा रहा है। संघ कार्यकर्ताओं के माध्यम से समाज में अनुशासन, समर्पण और सेवा भाव का संचार करता है। संघ का उद्देश्य केवल स्वयंसेवकों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग तक इसका प्रभाव पहुँचना है। संघ की कार्यशैली में व्यक्तिगत प्रयास और संगठनात्मक दृष्टि का संतुलन बना रहता है। संघ का लक्ष्य यह है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझे और राष्ट्र निर्माण में योगदान करे।

व्याख्यानमाला ने संघ की स्थापना, हिन्दू शब्द के अर्थ, संगठनात्मक दृष्टि, समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया पर स्पष्ट प्रकाश डाला। संघ का उद्देश्य किसी के विरोध में नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के उत्थान में योगदान देना है। संघ की कार्यशैली, व्यक्तिगत समर्पण और संगठनात्मक दृष्टि समाज के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।

इस प्रकार, संघ शताब्दी वर्ष की यह व्याख्यानमाला समाज में संघ की भूमिका, उसकी कार्यप्रणाली और उद्देश्य को समझने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है। यह स्पष्ट करती है कि संघ का उद्देश्य केवल संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के समग्र उत्थान और राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है। संघ का कार्य व्यक्तिगत समर्पण, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से समाज को संगठित करना है।

पर्यावरण कानून और उत्तर प्रदेश राज्य: एक समग्र दृष्टिकोण

 पवन शुक्ला

“प्रकृति स्वयं धर्म है, उसका संरक्षण ही हमारा कर्तव्य है।” यह कथन आधुनिक समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ विकास की परिभाषा केवल आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और संसाधनों के सतत उपयोग के साथ जुड़ गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत की लगभग 77% जनसंख्या ऐसी वायु में सांस ले रही है जो स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित नहीं मानी जाती। प्रदूषण के कारण भारत में हर वर्ष करीब 16.7 लाख लोगों की समयपूर्व मृत्यु हो जाती है। उत्तर प्रदेश जैसे घनी आबादी वाले राज्य में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। लखनऊ, कानपुर, आगरा जैसे शहरों का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) अक्सर 180 से 250 के बीच रहता है, जो ‘खराब’ से ‘अत्यंत खराब’ श्रेणी में आता है। भारत में पर्यावरण की रक्षा एक संवैधानिक कर्तव्य है। संविधान के अनुच्छेद 48A के अनुसार राज्य का दायित्व है कि वह पर्यावरण और वनस्पतियों की रक्षा करे। वहीं अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक को यह कर्तव्य सौंपता है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार के लिए कार्य करे। इस संवैधानिक भावना को मूर्त रूप देने के लिए भारत सरकार ने अनेक कानून लागू किए हैं, जैसे — पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986), जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम (1974), वायु अधिनियम (1981), और जैव विविधता अधिनियम (2002)। इन कानूनों के तहत राज्यों को प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA), और सतत विकास की निगरानी के दायित्व सौंपे गए हैं। उत्तर प्रदेश में प्रदूषण नियंत्रण का कार्य मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) के अधीन है, जिसके कार्यालय अब राज्य के हर जिले में सक्रिय हैं। बोर्ड ने ठोस, तरल, जैव-चिकित्सा और खतरनाक अपशिष्टों के प्रबंधन के लिए अलग-अलग इकाइयाँ स्थापित की हैं। 2024 तक लगभग 10,000 औद्योगिक इकाइयों की नियमित निगरानी की जा रही है, जिससे पर्यावरणीय अनुपालन में सुधार आया है। राज्य सरकार ने जल प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए ‘नमामि गंगे’, ‘स्वच्छ भारत अभियान’ और ‘एक जिला, एक नदी’ जैसी योजनाएं चलाई हैं। इन योजनाओं के अंतर्गत 37,000 से अधिक तालाबों का निर्माण और 12,000 से अधिक गांवों में जल संरक्षण परियोजनाओं का क्रियान्वयन हुआ है। भूजल संरक्षण हेतु 2019 से लागू भूजल अधिनियम के तहत जिलेवार परिषदें बनाई गई हैं। वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए ‘ग्रैप’ (Graded Response Action Plan) लागू किया गया है, जो सर्दियों में प्रदूषण स्तर के अनुसार कड़े कदम उठाने की योजना है, जैसे निर्माण कार्य पर रोक, वाहन प्रतिबंध, और सड़क धूल नियंत्रण। राज्य में 1,500 से अधिक इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन लगाए गए हैं और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे अभियानों के माध्यम से 210 करोड़ से अधिक पौधे लगाए गए हैं। कचरा प्रबंधन भी राज्य की बड़ी चुनौती रही है। उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन 13,000 टन से अधिक ठोस कचरा उत्पन्न होता है। इसके निपटारे के लिए 1,200 नगर निकायों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन योजनाएं लागू की गई हैं और आधुनिक कचरा प्रबंधन संयंत्र स्थापित किए गए हैं। अवैध डंपिंग पर रोक लगाने के लिए राज्य सरकार ने ₹5,000 से ₹50,000 तक के जुर्माने का प्रावधान किया है। सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने 2022 में नई नीति लागू की है, जिसका लक्ष्य 2027 तक 22 गीगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन करना है। इसके साथ ही पिछले पाँच वर्षों में पर्यावरण विभाग का बजट 150% तक बढ़ाया गया है, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन को बल मिला है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी जिम्मेदारी न मानते हुए इसे सामूहिक भागीदारी का कार्य बताया है। उन्होंने ‘राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस-2025’ पर कहा कि प्रकृति की रक्षा हमारी सांस्कृतिक विरासत है और हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपनी भूमिका निभाए। नागरिक जल की बचत, कचरे का पृथक्करण, वृक्षारोपण और स्वच्छता अभियानों में भाग लेकर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकते हैं। ‘वेस्ट टू वंडर’ और ‘हरित नगर’ जैसे अभियानों में जनता की सक्रिय भागीदारी इसका प्रमाण है। निष्कर्षतः, उत्तर प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की योजनाओं पर निर्भर नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता, सहभागिता और कर्तव्यनिष्ठा पर भी आधारित है। यदि राज्य और जनता मिलकर कार्य करें, तो उत्तर प्रदेश को स्वच्छ, हरित और सतत विकास की ओर अग्रसर करना पूरी तरह संभव है।

चक्र और चरखा की स्वदेशी महिमा से प्रेरणा की जरूरत

संदर्भः- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की मजबूती के लिए श्रीकृष्ण और गांधी से प्रेरणा की जरूरत जताई


प्रमोद भार्गव

बदलती स्थितियों में परिवर्तन के मानदंड भी बदल देते हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वदेशी प्रेरणा से आत्मनिर्भरता की बात हमेशा ही करते रहे हैं, परंतु इस बार उन्होंने लाल किले की प्राचीर से भारत को मजबूत बनाने के लिए कहा कि ‘हमें इस हेतु चक्रधारी मोहन अर्थात भगवान श्रीकृष्ण से प्रेरणा लेनी चाहिए और भारत को आत्मनिर्भर बनाने के नजरिए से चरखाधारी मोहन यानी महात्मा गांधी के मार्ग पर चलना चाहिए।‘ इन प्रतीकों के माध्यम से भारत की समृद्धि के रास्ते खुलते हैं। दुनिया में भू-राजनीतिक स्थितियां बदल रही हैं। ऐसे में भारत को अपने हितों को साधने के लिए नए मित्रों का साथ जरूरी है। हम देख रहे हैं कि अमेरिका, रूस, चीन, भारत और पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में तेजी से नए समीकरण बनते-बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में कृश्ण के सुदर्शन चक्र से प्रेरणा लेने की जरूरत है। यह चक्र काल और जीवन दोनों की ही गतिशीलता का प्रतीक है। यह नाम सत्य की रक्षा और असत्य के संहार का प्रतीक भारतीय परंपरा में रहा है। इसी चक्र की निरंतर गतिशीलता को देखते हुए वैदिक ऋषियों ने ‘चरैवेति-चरैवेति‘ सिद्धांत स्थापित किया था। अंग्रेजों ने जब भारत में यांत्रिकीकरण लागू किया, तब गांधी ने इस समस्या से निपटने के लिए चरखा को स्वावलंबन के मंत्र का आधार बनाया। गांधी ने कहा कि ‘भारत के सभी नागरिक स्वदेशी उत्पादों पर भरोसा रखें, क्योंकि अगर आप भारतीय हैं तो भारत में बनी चीजें ही खरीदें। इन्हें ही उपहार में दें। दुकानदार स्वदेशी सामान ही बेचें। यदि हम ऐसा करते हैं तो इस एक कदम से भारतीय मजदूर और गरीब नागरिक को लाभ होगा।‘  
गांधीजी ने केंद्रीय उद्योग समूहों के विरुद्ध चरखे को बीच में रखकर लोगों के लिए यांत्रिक उत्पादन की जगह, उत्पादन लोगो द्वारा हो का आंदोलन चलाया था। जिससे एक बढ़ी आबादी वाले देश में बहुसंख्यक लोग रोजगार से जुडें़ और बढ़े उद्योगां का विस्तार सीमित रहे। इस दृष्टिकोण के पीछे महात्मा का उद्देश्य यांत्रिकीकरण से मानव मात्र को छुटकारा दिलाकर उसे सीधे स्वरोजगार से जोड़ना था। क्योंकि दूरदृष्टा गांधी की अंर्तदृष्टि ने तभी अनुमान लगा लिया था कि औद्योगिक उत्पादन  और प्रौद्योगिकी विस्तार में सृष्टि के विनाश के कारण अंतनिर्हित हैं। आज दुनिया के वैज्ञानिक अपने प्रयोगों से जल, थल और नभ को एक साथ दूषित कर रहे हैं।
गांधी गरीब की गरीबी से कटु यर्थाथ के रूप में परिचित थे। इस निवर्सन गरीबी से उनका साक्षात्कार ओड़ीसा के एक गांव में हुआ था। यहां एक बूढ़़ी औरत ने गांधी से मुलाकात की थी। जिसके पैबंद लगे वस्त्र बेहद मैले-कुचेले थे। गांधी ने शायद साफ-सफाई के प्रति लापरवाही बरतना महिला की आदत समझी। इसलिए उसे हिदायत देते हुए बोले, ‘अम्मां क्यों नहीं कपड़ों को धो लेती हो ?’ बुढ़िया बेवाकी से बोली, ‘बेटा जब बदलने को दूसरे कपड़े हों, तब न धो-पहनूं।’ महात्मा आपादमस्तक सन्न व निरुत्तर रह गए। इस घटना से उनके अंर्तमन में गरीब की दिगंबर देह को वस्त्र से ढकने के उपाय के रूप में ‘चरखा’ का विचार कौंधा। साथ ही उन्होंने स्वयं एक वस्त्र पहनने व ओढ़ने का संकल्प लिया। देखते-देखते उन्होंने ‘वस्त्र के स्वावलंबन’ का एक पूरा आंदोलन ही खड़ा कर दिया। लोगों को तकली-चरखे से सूत कातने को उत्प्रेरित किया। सुखद परिणामों के चलते चरखा स्वनिर्मित वस्त्रों से देह ढकने का एक कारगर अस्त्र ही बन गया।
पिछले तीन दशक के भीतर उद्योगों की स्थापना के सिलसिले में हमारी जो नीतियां सामने आयी हैं उनमें अकुशल मानव श्रम की उपेक्षा उसी तर्ज पर है, जिस तर्ज पर अठारहवीं सदी में अंग्रेजों ने ब्रिटेन में मशीनों से निर्मित कपड़ों को बेचने के लिए ढाका (बांगलादेश) के मलमल बुनकरों के हस्त उद्योग को हुकूमत के बूते नेस्तनाबूद ही नहीं किया था, उनके अंगूठे भी काट दिए थे। उन्हें भूखों मरने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया था। आज पूंजीवादी अभियानों और कथित डिजीटल विस्तार के लिए व्यापार से मानवश्रम को लगातार बेदखल किया जा रहा है। जबकि होना यह चाहिए था कि हम अपने देश के समग्र कुशल-अकुशल मानव समुदायों के हित साधन के दृष्टिकोण सामने लाते ? गांधी की सोच वाली आर्थिक प्रक्रिया की स्थापना और विस्तार में न मनुष्य के हितों पर कुठाराघात होता है और न ही प्राकृतिक संपदा के दोहन पर टिकी अर्थव्यवस्था का ? जबकि मौजूदा आर्थिक हितों के सरोकार केवल  पूंजीवादियों के हित साधते हैं और इसके विपरीत मानवश्रम से जुड़े हितों को तिरष्कृत करते हैं। मानव समुदायों के बीच असमानता की खाई ऐसे ही उपायों से उत्तरोतर बढ़ती चली जा रही है।
चरखा और खादी परस्पर एक दूसरे के पर्याय हैं। गांधी की शिष्या निर्मला देशपाण्डे ने अपने एक संस्मरण का उद्घाटन करते हुए कहा था, नेहरू ने पहली पंचवर्षीय योजना का स्वरूप तैयार करने से पहले आचार्य विनोबा भावे को मार्गदर्शन हेतु आमंत्रित किया था। राजघाट पर योजना आयोग के सदस्यों के साथ हुई बातचीत के दौरान आचार्य ने कहा था, ‘ऐसी योजनाएं बननी चाहिएं, जिनसे हर भारतीय को रोटी और रोजगार मिले। क्योंकि गरीब इंतजार नहीं कर सकता। उसे अविलंब काम और रोटी चाहिए। आप गरीब को काम नहीं दे सकते, लेकिन मेरा चरखा ऐसा कर सकता है।‘ वाकई यदि पहली पंचवर्षीय योजना को अमल में लाने के प्रावधानों में चरखा और खादी को रखा जाता तो मौसम की मार और कर्ज का संकट झेल रहा किसान आत्महत्या करने को विवश नहीं होता ?
दरअसल आर्थिक उन्नति का अर्थ हम प्रकृति के दोहन से मालामाल हुए अरबपतियों-खरबपतियों की फोर्ब्स पत्रिका में छप रही सूचियों से निकालने लगे हैं। आर्थिक उन्नति का यह पैमाना पूंजीवादी मानसिकता की उपज है, जिसका सीधा संबंध भोगवादी लोग और उपभोगवादी संस्कृति से जुड़ा है। जबकि हमारे परंपरावादी आदर्श किसी भी प्रकार के भोग में अतिवादिता को अस्वीकार तो करते ही हैं, भोग की दुष्परिणति पतन में भी देखते हैं। अनेक प्राचीन संस्कृतियां जब उच्चता के चरम पर पहुंचकर विलासिता में लिप्त हो गईं तो उनके पतन का सिलसिला शुरू हो गया। रक्ष, मिश्र, रोमन, नंद और मुगल संस्कृतियों का यही हश्र हुआ। कृष्ण के सगे-संबंधी जब दुराचार और भोग-विलास में संलग्न हो गए तो स्वयं कृष्ण ने उनका अंत किया। इतिहास दृष्टि से सबक लेते हुए गांधी ने कहा था, ‘किसी भी सुव्यवस्थित समाज में रोजी कमाना सबसे सुगम बात होनी चाहिए और हुआ करती है। बेशक किसी देश की अच्छी अर्थव्यवस्था की पहचान यह नहीं है कि उसमें कितने लखपति लोग रहते हैं, बल्कि जनसाधारण का कोई भी व्यक्ति भूखों तो नहीं मर रहा है, यह होनी चाहिए।’
गांधी के स्वरोजगार और स्वावलंबन के चिंतन और समाधन की जो धाराएं चरखे की गतिशीलता से फूटती थीं, उस गांधी के अनुआयी वैश्विक बाजार में समस्त बेरोजगारों के रोजगार का हल ढूढ़ रहे हैं। यह मृग-मारीचिका नहीं तो और क्या है ? अब तो वैश्विक अर्थव्यवस्था के चलते रोजगार और औद्योगिक उत्पादन दोनों के ही घटने के आंकड़े सामने आने लगे हैं। रुपए का डॉलर की तुलना में निरंतर अवमूल्यन हो रहा है। इन नतीजों से साफ हो गया है कि भू-मण्डलीकरण ने रोजगार के अवसर बढ़ाने की बजाय घटाए हैं। ऐसे में चरखे से खादी का निर्माण एक बढ़ी आबादी को रोजगार से जोड़ने का काम कर सकता है। भारत की विशाल आबादी पूंजीवादी मुक्त अर्थव्यवस्था से समृद्धशाली नहीं हो सकती ? अलबत्ता वैश्विक आर्थिकी से मुक्ति दिलाकर, विकास को समतामूलक कारकों से जोड़कर इसे सुखी और संपन्न बनाया जा सकता है। इस दृष्टि से चरखा और खादी सार्थक औजार के रूप में ग्रामीण परिवेश में ग्रामीणों के लिए एक नया अर्थशास्त्र रच सकते हैं।

प्रमोद भार्गव

आत्मनिर्भरता व स्वदेशी के मूल मंत्र से ही भारत होगा मजबूत व सुरक्षित  

मृत्युंजय दीक्षित 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कई कीर्तिमान एक साथ रच डाले । लाल किले की प्राचीर से 103 मिनट तक बोलते हुए अपने राजनैतिक जीवन का सबसे लंबा भाषण दिया । अपने संबोधन में हर क्षेत्र में स्वदेशी को अपनाने के साथ ही आत्मनिर्भरता को मजबूती प्रदान करने संदेश  दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जीएसटी सुधार से लेकर राष्ट्रीय एवं धार्मिक महत्व की सभी संस्थाओं  व केंद्रो की व्यापक स्तर पर सुरक्षा के लिए वर्ष 2035 तक ऑपरेशन सुदर्शन चक्र जैसी अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना की  घोषणा की । साथ ही, देश के विभिन्न स्थानों में बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठ के कारण हो रहे जनसांख्यकी परिवर्तन की रोकथाम के लिए व्यापक स्तर पर मिशन मोड में अभियान प्रारंभ करने की घोषणा की है जो राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि लाल किले से उन्होंने विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रशंसा की और उसे सबसे बड़ा एनजीओ बताया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस बार अपनी स्थापना के 100 वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश वा समाज हित में किए गए संघ के कार्यों की चर्चा व प्रशंसा संघ के स्वयंसेवकों का उत्साहवर्द्धन करनेवाला तो रहा ही साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि भाजपा और संघ के बीच कोई वैचारिक मतभेद हो ही नहीं सकता । 

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में स्वदेशी हथियारों के बल पर आपरेशन सिंदूर की सफलता की कहानी को देशवासियों के समक्ष एक बार पुन: रेखांकित किया और साथ ही पाकिस्तान को फिर से अत्यंत कड़ा संदेश देते हुए कहा कि सिंधु नदी का जल और खून मतलब आतंकवाद एक साथ नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि अगर हम हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर ना होते तो क्या आप सोच सकते हैं कि इतना सफल ऑपरेशन सिंदूर संभव हो पाता । अमेरिका की शह पर अनर्गल प्रलाप करने वाले पाक सेना प्रमुख आसिम मुनीर को स्पष्ट संदेश दे दिया गया है कि अब भारत के साथ परमाणु हमले की ब्लैकमेलिंग नहीं चलने वाली। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि भारत की नीति अभी तक पहले हमला नहीं करने की रही है। 

प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना  – प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त के दिन से ही युवाओं  के लिए एक लाख करोड़ रूपये की योजना लागू करने की घोषणा कर दी। इस योजना के तहत निजी क्षेत्र में पहली नौकरी पाने वाले युवकों को सरकार की ओर से प्रोत्साहन राशि  के रूप में 15 हजार रूपए दिये जायेंगे। यह योजना करीब- करीब साढे़ तीन करोड़ नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर बनाएगी। 

नेक्स्ट जेनरेशन जीएसटी सुधार – पीएम मोदी ने इस दीपावली से जीएसटी सुधार के माध्यम से बड़ी राहत देने की घोषणा की है जिससे आम नागरिकों व छोटे व्यापारियों को बड़ी राहत मिलने जा रही है।

हाई  पावर डेमोग्रॉफी मिशन– प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि आज देश के सामने सबसे बड़ी चिंता व चुनौती यह है कि सोची समझी साजिश के तहत देश की डेमोग्राफी को बदला जा रहा है एक नये व गंभीर संकट के बीज बोए जा रहे हैं। ये घुसपैठिए देश के नौजवानों की रोजी रोटी छीन रहे हैं। झूठ बोलकर बहन बेटियों को अपना निशाना बना रहे हैं।ये घुसपैठिए भेाले -भाले आदिवासियों  को भ्रमित करके उनकी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं। देश यह सहन नहीं करेगा जब-जब सीमावर्ती क्षेत्रों में डेमोग्राफी परिवर्तन होता है तब-तब  राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा होता है। उन्होंने कहा कि दुनिया का कोई भी देश अपने देश को घुसपैठियों के हवाले नहीं कर सकता। हमारे पूर्वजों व महापुरूषों ने त्याग और बलिदान से हमें स्वतंत्र भारत दिया है। हमने एक हाई पावर डेमोग्राफी मिशन शुरू करने का निर्णय लिया है जोकि इस भीषण संकट से निपटने के लिए कार्य करेगा। ज्ञातव्य है कि बांग्लादेशी  व रोहिंग्या घुसपैठ के कारण असम सहित अनेक सीमावर्ती  राज्यों के जिलों की डेमोग्राफी तेजी से बदल गई है व बदल रही है। कई राज्यों में घुसपैठियों के खिलाफ व्यापक अभियान भी चलाया जा रहा है। झारखंड जैसे छोटे राज्यों में यह समस्या बहुत विकराल रूप ले चुकी है और गत चुनावों में यह एक प्रमुख चुनावी मुद्दा भी बना था। 

समुद्र मंथन – प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में समुद्र मंथन योजना की ऐतिहासिक घोषणा करते हुए कहा कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए भारत नेशनल डीप वाटर एक्सप्लोरेशन मिशन शुरू करने जा रहा है। हम समुद्र से भारत के लिए तेल और गैस खोजने का अभियान प्रारंभ करने जा रहे हैं जिससे हम इस क्षेत्र में भी आत्मनिभर्र हो सकें ।इस अभियान को समुद्र मंथन नाम दिया गया है।  

सुदर्शन चक्र मिशन – प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में 2035 तक देश के सभी सामरिक व सेना के साथ ही आस्था के सभी महत्वपूर्ण केंद्रो को स्वदेशी तकनीक आधारित व्यापक सुरक्षा कवच देने की महत्वपूर्ण घोषणा की है और इस कवच का लगातार विस्तार होता जाएगा ताकि देश का हर नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस करे। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण से प्रेरणा लेकर हमने सुदर्शन चक्र की राह को चुना है। ये एक पावरफुल वैपन सिस्टम होगा जो दुश्मन के हमले को नष्ट तो करेगा ही करेगा साथ ही, कई गुना अधिक शक्ति से दुश्मन पर हिटबैक करेगा।  

परमाणु ऊर्जा क्षमता–  2047 तक 10 गुना बढ़ाने का लक्ष्य भी रखा गया है। इसके लिए परमाणु  ऊर्जा क्षेत्र में 10 नए परमाणु रिएक्टर का निर्माण कार्य तीव्र गति से चल रहा है। हम परमाणु ऊर्जा क्षमता 10 गुना से भी अधिक बढ़ाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं। 

मेड इन इंडिया जेट इंजन– प्रधानमंत्री मोदी ने देश के युवा वैज्ञानिकों एवं तकनीकिशियनों से पूछा कि हमारे देश का अपना पूरी तरह से स्वदेशी जेट इंजन होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए। आगे कहा हमें स्वदेशी जेट इंजन का निर्माण करना है तभी हम पूरी तरह आत्मनिर्भर होंगे। 

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में एक मंत्र दिया है और वह है “दाम कमलेकिन दम ज्यादा।“ अर्थात उन्होंने उद्यमियों और उद्योगों से उचित मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बनाने पर अधिक ध्यान देन का आह्वान किया ताकि हम वैश्विक  बाजार में अपने उत्पादों की धूम मचा सकें। अगर हमें वैश्विक बाजार में अपने उत्पादों की क्षमता प्रदर्शित करनी है तो हमें गुणवत्ता के मोर्चे पर निरंतर नई ऊचाईयों को छूना होगा। 

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया के प्रभावशाली लोगों के साथ -साथ राजनीतिक दलों से भी घरेलू स्तर पर निर्मित उत्पादों  को अपनाने और बढ़ावा देने का आग्रह किया। 

अपने संबोधन के माध्म से प्रधानमंत्री मोदी ने एकमात्र यही संदेश  दिया है कि अब आत्मनिर्भरता ही सुरक्षित भारत का मूल मंत्र है। फिर वह चाहे जो भी क्षेत्र हो। 

उर्वरकों में आत्मनिर्भरता का संकल्प– प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन में  उर्वरकों के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता का संकल्प दिखा। उन्होंने बताया कि खाद्य सुरक्षा के लिए उर्वरक में भी आत्मनिर्भर होना जरूरी है ताकि विदेशी दबाव से किसानों को मुक्त किया जा सके। उन्होंने यह भी साफ किया कि खेती की लागत घटना ही सिर्फ लक्ष्य नहीं है अपितु किसानों की आय बढ़ाने के लिए  सस्ती खाद भी उपलब्ध कराना आवश्यक है। 

इस प्रकार प्रधानंमत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में देश की सुरक्षा से लेकर आर्थिक विकास एवं आमजन की सुख-समृद्धि में बढ़ोत्तरी के लिए एक व्यापक कार्य योजना प्रस्तुत की है।बच्चों,युवाओें, उद्यमियों से लेकर किसानों तक समाज के सभी वर्गो को संबोधित किया और 2047 तक भारत को विकसित एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का विज़न वा कार्ययोजना देश्वसियों के समक्ष रखी । 

लड़की की मौत और हमारी घातक धारणाएँ

“हर लापता बेटी के साथ हमारी सोच की परीक्षा होती है — अफ़वाह नहीं, संवेदनशीलता ज़रूरी है”

हर लापता लड़की के साथ हमारी संवेदनशीलता और सिस्टम की परीक्षा होती है। अफ़वाहें, ताने और लापरवाह पुलिस जाँच अपराधियों के लिए सबसे बड़ी मददगार बन जाती हैं। जब तक पुलिस हर गुमशुदगी को गंभीर अपराध मानकर तुरंत कार्रवाई नहीं करेगी और समाज हर बेटी को सहानुभूति की नज़र से नहीं देखेगा, तब तक ऐसी त्रासदियाँ दोहराई जाती रहेंगी। सरकार को दिखावटी सुरक्षा छोड़कर थानों की मजबूती पर ध्यान देना होगा। लड़की की मौत एक चेतावनी है—अब धारणाएँ बदलनी ही होंगी।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

“लड़की अगर घर से लापता हुई है तो वह भागी ही होगी” — यह सोच केवल पुलिस की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। यही सोच एक लड़की की जान ले गई। जिस पुलिस को तुरंत उसकी तलाश करनी चाहिए थी, उसने मान लिया कि वह कहीं प्रेम प्रसंग के चलते भाग गई होगी। परिणाम यह हुआ कि अपराधियों को मौका मिल गया और एक मासूम ज़िंदगी समाप्त कर दी गई।

आज सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि बेटियों के लापता होने की शिकायत पर पुलिस की पहली प्रतिक्रिया “भाग गई होगी” और समाज की पहली प्रतिक्रिया “किसके साथ भागी होगी” होती है। दोनों ही स्थितियाँ अपराधियों के लिए ढाल बन जाती हैं। पुलिस थानों में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाने वाले परिवारों को अक्सर यही सुनने को मिलता है कि “थोड़ा इंतज़ार कीजिए, लड़की खुद लौट आएगी।” यानी शुरुआत से ही मामले को हल्का समझा जाता है। जब तक पुलिस सक्रिय होती है, तब तक कई बार अपराधी अपने मंसूबे पूरे कर चुके होते हैं। यह रवैया केवल लापरवाही नहीं, बल्कि जीवन के साथ खिलवाड़ है।

यह मान लेना कि हर लापता लड़की प्रेम-प्रसंग में भागी है, पुलिस की सोच का सबसे खतरनाक पहलू है। इससे अपराधियों को समय मिल जाता है और पीड़ित परिवार अपने ही समाज की तानों और शक की निगाहों का शिकार बनता है। हमारे गाँव, कस्बों और शहरों में जब भी कोई लड़की लापता होती है, तो अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो जाता है। लोग यह सोचने की बजाय कि वह कहीं अपराध की शिकार न हो गई हो, यह अनुमान लगाने लगते हैं कि वह किसके साथ भागी होगी। इस सोच से दोहरी चोट लगती है। एक ओर लड़की की इज़्ज़त को बेवजह बदनाम किया जाता है और दूसरी ओर परिवार सामाजिक कलंक से टूटने लगता है।

समाज को यह समझना होगा कि हर लड़की की सुरक्षा पूरे समुदाय की ज़िम्मेदारी है। किसी की अनुपस्थिति पर अफ़वाह फैलाना या दोषारोपण करना न केवल अमानवीय है, बल्कि अपराध को बढ़ावा देने वाला भी है। एक लड़की की मौत केवल एक परिवार का दुख नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का आईना है। पुलिस ने समय रहते खोजबीन की होती तो शायद वह आज ज़िंदा होती। समाज ने अफ़वाहों की बजाय संवेदनशीलता दिखाई होती तो परिवार को न्याय की लड़ाई में अकेला न रहना पड़ता। अब वह लड़की वापस नहीं आ सकती। लेकिन यह ज़रूरी है कि उसके हत्यारों को सख़्त सज़ा मिले और आने वाले समय में ऐसी त्रासदियाँ दोहराई न जाएँ।

आज पुलिस बल की सबसे बड़ी समस्या संसाधनों की कमी और प्राथमिकताओं की गड़बड़ी है। नेताओं की सुरक्षा में सैकड़ों जवान तैनात रहते हैं, जबकि थानों और चौकियों में फोर्स की कमी है। नतीजा यह होता है कि आम जनता की शिकायतों पर या तो देर से कार्रवाई होती है या बिल्कुल ही उपेक्षा कर दी जाती है। ज़रूरत है कि सरकार नेताओं को दिखावटी सुरक्षा देना बंद करे और हर थाने को पर्याप्त पुलिस बल मुहैया कराए। बेटियों से जुड़े मामलों में फास्ट रिस्पॉन्स सिस्टम लागू हो और जिलों के एसपी से मुख्यमंत्री रोज़ाना सुरक्षा व्यवस्था का फ़ीडबैक लें। जब तक सरकार प्राथमिकताओं में बदलाव नहीं लाएगी, तब तक बेटियाँ असुरक्षित रहेंगी और अपराधियों के हौसले बुलंद रहेंगे।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताज़ा रिपोर्ट इस संकट की गम्भीरता को और भी स्पष्ट करती है। वर्ष 2023 के आँकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिदिन लगभग 90 महिलाएँ और लड़कियाँ लापता होती हैं। इनमें से कई कभी वापस नहीं लौट पातीं। वहीं हर साल हज़ारों मामले ऐसे दर्ज होते हैं जिनमें लापता लड़की हत्या, तस्करी या यौन शोषण का शिकार पाई जाती है। इसके बावजूद पुलिस थानों में पहला रवैया यही रहता है कि “भाग गई होगी।” यदि गुमशुदगी को शुरुआती चरण में ही गंभीर अपराध मानकर खोजबीन की जाए, तो इनमें से कई जानें बचाई जा सकती हैं। लेकिन हमारी सोच और व्यवस्था दोनों इस दिशा में बेहद ढीली और उदासीन हैं।

धारणा बदलना आसान काम नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं। जिस दिन पुलिस हर लापता लड़की को संभावित पीड़िता मानेगी, उसी दिन अपराधों पर लगाम लगेगी। जिस दिन समाज लड़की के गायब होने पर तानों और गॉसिप की बजाय सहानुभूति दिखाएगा, उसी दिन परिवारों का बोझ हल्का होगा। जिस दिन सरकार सुरक्षा को पॉलिटिकल शो-ऑफ़ की बजाय पब्लिक राइट मानेगी, उसी दिन व्यवस्था सुधरेगी।

आज हम नारे लगाते हैं— “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।” लेकिन जब कोई बेटी लापता होती है, तो हमारी सोच नारे से उलट साबित होती है। “बेटी बचाओ” का असली अर्थ तभी पूरा होगा जब हर शिकायत पर पुलिस त्वरित और गंभीर कार्रवाई करेगी। लड़की जैसी घटनाएँ हमें झकझोरती हैं कि सिर्फ़ भाषण और नारे काफ़ी नहीं हैं। हमें अपनी सोच और व्यवस्था दोनों बदलनी होंगी।

लड़की की मौत केवल एक त्रासदी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह चेतावनी है कि हमारी पुलिस की जाँच शैली बदलनी होगी, समाज को अपने पूर्वाग्रह छोड़ने होंगे और सरकार को अपनी प्राथमिकताएँ सुधारनी होंगी। वह लड़की लौट नहीं सकती, लेकिन अगर उसके हत्यारों को सज़ा मिले और उसकी मौत से सबक लेकर सिस्टम बदले, तो उसकी शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। अब समय आ गया है कि हम सब मिलकर यह तय करें कि हर बेटी सुरक्षित है और उसकी गुमशुदगी को हल्के में लेने की कोई गुंजाइश नहीं है।

पंख और उड़ान – भारत की स्वतंत्रता और आत्मविकास

बोधार्थी रौनक़

भारत की आज़ादी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक चेतना है — वह चेतना जिसने सदियों की पराधीनता के अंधेरे को चीरकर इस राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा होने का साहस दिया। 15 अगस्त 1947 का वह प्रभात केवल एक राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि स्वतंत्र आत्मा का जागरण था। यह दिन हमें याद दिलाता है कि बाहरी बंधनों को तोड़ना केवल पहला चरण है; असली चुनौती है भीतर की जंजीरों को तोड़ना — अज्ञान, भय, आलस्य और संकीर्ण सोच को।

स्वतंत्रता सेनानियों ने केवल एक झंडा फहराने का सपना नहीं देखा था; उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की थी जहाँ हर नागरिक आत्मनिर्भर, जागरूक, अनुशासित और सशक्त हो। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के मार्ग से यह सिखाया कि असली ताकत भीतर की दृढ़ता और नैतिक बल में होती है। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के सपनों को आकार दिया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने संगठन और एकता की शक्ति से देश को एक सूत्र में पिरोया।

क्रांतिकारियों ने अपने बलिदान से दिखाया कि स्वतंत्रता केवल याचना से नहीं मिलती। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह संदेश दिया कि अन्याय के सामने चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” के आह्वान से लाखों युवाओं में जोश भर दिया।

महिलाओं का योगदान भी उतना ही प्रेरक है। रानी लक्ष्मीबाई ने वीरता से अंग्रेज़ी सेनाओं का सामना किया और “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” के संकल्प से इतिहास में अमर हो गईं। सरोजिनी नायडू ने अपनी कविताओं और नेतृत्व से स्वतंत्रता आंदोलन को नई आवाज़ दी। कस्तूरबा गांधी ने सत्याग्रह और सेवा की भावना से देशभर की महिलाओं को जागरूक किया।

इन सभी महापुरुषों और महिलाओं के जीवन में एक बात समान थी — आत्मविकास। वे केवल स्वतंत्र भारत का सपना नहीं देख रहे थे; वे ऐसा भारत चाहते थे जहाँ हर व्यक्ति अपने विचारों, चरित्र और कर्म में श्रेष्ठ हो।

आज भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है, लेकिन आत्मविकास की यात्रा अभी अधूरी है। हमें अपने भीतर झाँककर देखना होगा — क्या हम सचमुच मानसिक और नैतिक रूप से स्वतंत्र हैं? क्या हम सत्य, परिश्रम, अनुशासन और सेवा जैसे मूल्यों को अपनाए हुए हैं?

स्वतंत्रता और आत्मविकास एक-दूसरे के पूरक हैं। स्वतंत्रता हमें अवसर देती है, और आत्मविकास उसे उपलब्धि में बदलता है। जब हर भारतीय अपने गुणों और क्षमताओं को निखारने की दिशा में कदम बढ़ाएगा, तभी यह देश न केवल स्वतंत्र, बल्कि समृद्ध, शक्तिशाली और प्रेरणादायी राष्ट्र बनेगा।

स्वतंत्रता हमें पंख देती है, आत्मविकास उड़ान। और जब पंख और उड़ान दोनों मिल जाते हैं, तब आसमान भी हमारी मंज़िल को रोक नहीं सकता।

संसद के नियमों में हो परिवर्तन

देश के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक प्रतिष्ठान अर्थात देश की संसद की अवमानना करना अब एक प्रचलन बन चुका है। संसद के मानसून सत्र को लेकर सरकार का इरादा था कि इसमें 120 घंटे की चर्चा की जाएगी। जिससे देश का विधायी कार्य निपटाने में सहायता मिलेगी। परंतु विपक्ष के अड़ियल दृष्टिकोण के चलते 120 घंटे के स्थान पर मात्र 37 घंटे ही चर्चा हो पाई। जिसका परिणाम यह हुआ कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा संसद की कार्यवाही पर व्यर्थ ही खर्च हो गया । मानसून सत्र में लोकसभा में 12 और राज्यसभा में 14 विधेयक पास हुए।
जिस बात को देश का आम आदमी भी जानता है कि संसद की कार्यवाही पर प्रति मिनट ढाई लाख रुपए खर्च होते हैं। हमारे देश की जनसंख्या का अधिकांश भाग ऐसा है, जिसके पास वर्ष भर में अपने ऊपर खर्च करने के लिए ढाई लाख रुपए नहीं होते । 2012 के आंकड़े के अनुसार 1 घंटे में डेढ़ करोड़ से अधिक रुपया संसद की कार्यवाही पर खर्च हो जाता है। इसके अतिरिक्त हमारे जनप्रतिनिधियों के वेतन, भत्ते और उनकी दूसरी सुविधाएं उनके आवासों का खर्च, उनके लिए मिले कर्मचारियों के खर्च अलग हैं।
इसके उपरांत भी संसद के सदस्य जब अपने वेतन भत्ते बढ़ाते हैं तो उस पर सभी की सहमति बड़े आराम से बन जाती है और तत्संबंधी विधेयक को यथाशीघ्र पारित करा लेते हैं। देश के शिक्षित वर्ग में इन प्रतिनिधियों के इस प्रकार के आचरण को लेकर अब चर्चा होने लगी है। लोग अपने अनेक जनप्रतिनिधियों की भूमिका को राष्ट्रहित में उचित नहीं मान रहे हैं। विपक्ष की भूमिका निश्चित रूप से विशेष पक्ष की होती है, उसे सरकार पर अंकुश लगाना चाहिए- यह भी उसका वैधानिक अधिकार है, परंतु वह देश की संसद को ही नहीं चलने देगा और लोकतंत्र की मर्यादाओं का हनन करेगा, इसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। सत्तापक्ष के लिए भी यह बात उतनी ही लागू होती है जितनी विपक्ष के लिए।
समय आ गया है जब देश की संसद को चलाने के नियमों में व्यापक परिवर्तन होने चाहिए। यह बात तब और भी अधिक आवश्यक हो जाती है जब देश के सरकारी कर्मचारियों की कार्य के प्रति थोड़ी सी लापरवाही भी अक्षम्य मानी जाती है तो देश को चलाने वाले लोगों का यह आचरण भी अक्षम्य ही माना जाना चाहिए कि वह देश की संसद को ही चलने नहीं देंगे। इन्हें देश के लिए काम करने के लिए जनता चुनकर भेजती है, देश को रोकने के लिए नहीं भेजा जाता।
अब समय आ गया है जब काम के बदले ही दाम मिलने की नीति देश के सांसदों, विधायकों अथवा जनप्रतिनिधियों के प्रति भी अपनाई जानी चाहिए। काम नहीं तो वेतन नहीं, काम नहीं तो सुविधा भी नहीं – ऐसा नियम बनाकर अब कड़ाई से लागू करना चाहिए। जो भी सांसद अमर्यादित और असंसदीय भाषा का प्रयोग करता हुआ पाया जाए, उसके विरुद्ध भी कठोर कानूनी कार्यवाही अमल में लाई जानी चाहिए। जो कोई सांसद, विधायक या जनप्रतिनिधि विधानमंडलों में बैठकर किसी आतंकवादी संगठन की वकालत करेगा या कोई भी ऐसा आचरण करेगा जिससे देशद्रोही और समाजद्रोही लोगों को प्रोत्साहन मिलता हो या देश के शत्रु देश की भारत के प्रति शत्रुता पूर्ण नीतियों या सोच को बल मिलता हो, ऐसे सांसद / विधायक/ जनप्रतिनिधि या राजनीतिक दल के विरुद्ध भी कठोर कानून बनाए जाने अपेक्षित हैं। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को असीमित स्थिति तक प्रयोग में लाने की स्वतंत्रता दिया जाना देश के लिए अच्छा नहीं है।
देश के जनप्रतिनिधियों की गिरफ्तारी की मर्यादा पर भी विचार करने की आवश्यकता है। यदि देश के सम्मान को अथवा देश की सेना के सम्मान को कोई भी सांसद या चुना हुआ जनप्रतिनिधि अपने शब्दों से या अपने आचरण से चोट पहुंचाता है तो उसे विशेष शर्तों के अंतर्गत संसद के चलते हुए सत्र से भी गिरफ्तार किया जा सकता है।
हमारा चुना हुआ कोई भी जनप्रतिनिधि जब देश की संसद की मर्यादाओं को तार-तार करे अथवा संसद की गरिमा का उल्लंघन करता हो अथवा किसी भी प्रकार के अलोकतांत्रिक आचरण को एक से अधिक बार आचरण में लाने का दोषी पाया जाता रहा हो तो उसे मतदाताओं को वापस बुलाने का अधिकार दिया जाना चाहिए। ऐसे किसी भी संसद को संसद में जनप्रतिनिधि के रूप में बैठने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ऐसी स्थिति में या तो उसे संसद की सदस्यता से स्वयं ही त्यागपत्र दे देना चाहिए या फिर उसके विरुद्ध लोकसभा अध्यक्ष को कार्यवाही करने के अधिकार दिए जाने चाहिए। जिसमें उसे संसद के वर्तमान सत्र की अवधि से लेकर लोकसभा के पूरे कार्यकाल तक के लिए निलंबित करने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष के पास होना चाहिए। उसके स्थान पर कोई नया चुनाव न करवाकर चुनाव के समय दूसरे स्थान पर रहे, व्यक्ति को उसके स्थान पर बैठने की अनुमति दी जानी चाहिए।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि देश पर कोई व्यक्ति विशेष शासन नहीं करता है, बल्कि दंड शासन करता है। दंड का भय शासन करता है। यदि दंड का भय संसद के सदस्यों के भीतर से निकल गया तो वह भयमुक्त समाज नहीं बना पाएंगे। भयमुक्त समाज तभी बनता है जब दंड का शासन होता है। जब संसद सदस्य ही स्वेच्छाचारी और उच्छृंखल व्यवहार संसद में करेंगे तो वैसा ही व्यवहार करने वाले लोग सड़कों पर उत्पात मचाएंगे। जैसी अराजकता संसद के भीतर होगी, वैसी ही अराजकता समाज में भी फैल जाएगी। क्योंकि जनसाधारण अपने राजा का या कानून बनाने वालों का अनुकरण करता है। इलाज किसी व्यक्ति का नहीं किया जाता है, इलाज होता है – अराजक मानसिकता का, उन्मादी सोच का, व्यवस्था विरोधी आचरण का। सोच को ठीक करने के लिए ही नियमों में कठोरता आवश्यक होती है। यदि यह कठोरता जनसाधारण के लिए आवश्यक है तो इस कठोरता को जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध भी लागू किया जाना समय की आवश्यकता है। मनु महाराज के चिंतन को लेकर जो लोग चिंता व्यक्त करते रहते हैं, उन्हें नहीं पता कि मनु महाराज अराजक राजनीतिक लोगों के प्रति कितने कठोर थे ? अमर्यादित , अनीतिपरक और देशद्रोही सोच के कीटाणुओं से युक्त लोगों के राजनीति में प्रवेश करने के विरोधी थे – मनु महाराज । अब यदि भारत की राजनीति में इस प्रकार के लोग प्रवेश करने में सफल हो ही गए हैं तो उनका इलाज मनुवादी व्यवस्था के अंतर्गत ही खोजा जा सकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

एक महान क्रांतिकारी के साथ कर रही है कोलकाता नगर निगम अत्याचार

कृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि 30 अगस्त 1888 को कलकत्ता के समीप चंद्रनगर में एक बालक का जन्म हुआ। बालक का जन्म चूंकि कृष्ण जन्माष्टमी के दिन हुआ था, इसलिए माता-पिता ने इस नवजात शिशु का नाम ” कन्हाई लाल “नाम रखा था । पिता का स्थानांतरण बॉम्बे में होने के कारण 5 वर्ष की आयु में ही वे परिवार के साथ बॉम्बे आ गए । कन्हाई लाल ने अपनी शुरूआती पढ़ाई बॉम्बे के आर्य शिक्षा सोसाइटी स्कूल में पूरी की । इसके बाद ये वापस चंद्रनगर आ गए । यहां उन्होंने हुगली कॉलेज में प्रवेश ले लिया। नियति इसे कुछ और ही करना चाहती थी यही कारण था कि शिक्षा के साथ-साथ वह देश की स्वाधीनता की क्रांतिकारी विचारधारा के साथ भी जुड़ गए।
उन दिनों ब्रिटिश सरकार भी ऐसे क्रांतिकारी युवाओं पर विशेष नजर रखती थी। जैसे ही ब्रिटिश सरकार को उनकी गतिविधियों के बारे में जानकारी मिली तो उसने इनकी डिग्री रोक ली। कन्हाई लाल दत्त को चेतावनी भी दी गई, परंतु इसके बावजूद ये अंग्रेजों के खिलाफ अपनी मुहिम चलाते रहे । इनके लिए डिग्री लेना महत्वपूर्ण नहीं था, देश को आजाद करना महत्वपूर्णथा। स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात प्रोफ़ेसर चारुचंद्र राय से हुई । ये उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुए. प्रोफ़ेसर ने चंद्रनगर में ही ‘युगांतर पार्टी’ नामक एक संगठन बनाया था । उन्होंने ही कन्हाई लाल को भारतीय क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल होने के लिए प्रेरित किया ।
यह वही समय था, जब बंगाल के विभाजन को लेकर देश में संघर्ष का वातावरण बना हुआ था । बंगाल विभाजन के खिलाफ कई आंदोलन खड़े हो चुके थे । ऐसी परिस्थितियों में उन्होंने भी बंगाल विभाजन के विरुद्ध बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया । इसी के साथ ही कई स्थानों पर सबसे आगे भी रहे । उस दौरान उनकी मुलाकात देश के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों से होती है । इसी बीच कन्हाई लाल दत्त ने बन्दूक व अन्य हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी लिया । साथ ही उन्होंने भारत की स्वतंत्रता संग्राम के लिए युवाओं का एक दल तैयार कर उनको लाठी व अन्य हथियारों के गुप्त प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की । कन्हाई लाल दत्त ने हथियार बनाने की कला भी सीख ली थी । बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद कन्हाई लाल कलकत्ता चले गए । यहीं उनकी मुलाकात मशहूर क्रांतिकारी अरविन्द घोष के भाई बारीन्द्र घोष से हुई । बारीन्द्र क्रांतिकारी होने के साथ ही एक सिविल सर्जन भी थे ।
कन्हाई लाल उनके संगठन अनुशीलन समिति से जुड़ गए और वहीं उन्हीं के घर में रहने लगे । दिलचस्प बात यह है कि उस घर में क्रांतिकारियों के लिए हथियार व गोलाबारूद आदि भी रखे जाते थे । कन्हाई लाल दत्त यहां रहकर अंग्रेजों के विरुद्ध सक्रिय भूमिका में रहे, मानिकतुल्ला बाग के बम बनाने के कारखाने में बम बनाना सीखा तथा क्रांतिकारियों को बमों की आपूर्ति करने लगे । मुजफ्फरनगर बम अनुष्ठान (1908) के बाद से ही अंग्रेज़ों ने क्रांतिकारियों के विरुद्ध सघन अभियान छेड़ दिया था । कई दिनों की जाँच पड़ताल के बाद अंग्रेजों को क्रांतिकारियों के उस अड्डे के बारे में पता चला, जहां कन्हाई लाल दत्त रहते हुए क्रांतिकारियों की मदद कर रहे थे । इसके बाद अंग्रेजों ने अरविन्द घोष के भाई बरिन्द्र घोष व कन्हाई लाल समेत 35 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया । इन सभी को अलीपुर जेल में डालकर, अभियोग चलाया गया, जिसे इतिहास में अलीपुर षड़यंत्र का भी नाम दिया गया है । उनमें से एक नरेंद्र गोस्वामी (नरेन गोसाईं) नामक व्यक्ति को भी जेल में डाल दिया गया था, वह अंग्रेजों के कहने पर सरकारी गवाह बन गया । ऐसे में सभी क्रांतिकारियों को अपनी हर उस योजना पर पानी फिरने का डर सताने लगा, जो उन्होंने साथ मिलकर देश की स्वतंत्रता की खातिर बनायी थी । नरेंद्र के द्वारा देश से गद्दारी करने की वजह से सभी देशभक्तों में बहुत नाराजगी थी । एक बार तो मुकदमे के दौरान किसी क्रांतिकारी ने नरेंद्र को अदालत में गुप्त तरीके से एक लात मार दी थी । इसके बाद तो सरकार ने उसकी सुरक्षा के लिए दो सिपाही दे दिए थे । ऐंसी परिस्थिति में कन्हाई लाल अपने साथी महारथी सत्येन्द्र बसु के साथ मिलकर उस देशद्रोही को मारने की एक विस्मयकारी योजना बना डाली । उन्होंने निश्चय किया कि उसकी गवाही से पहले ही उसको जान से मार देंगे । अपनी योजना के तहत उन्होंने जेल के वार्डर के साथ घुलना – मिलना प्रारंभ कर दिया । इसके बाद कन्हाई लाल, जेल में ही गुप्त तरीके ( मछली और कटहल के अंदर छुपाकर लाई गई थीं ) से दो पिस्तौल पाने में सफल रहे । इन दोनों महारथियों ने जेल के अंदर ही नरेंद्र को मार गिराने की योजना रची । योजना को अंजाम देने के लिए सबसे पहले सत्येन्द्र ने बीमार पड़ने का नाटक किया और अस्पताल में भर्ती हो गए, इसके बाद कन्हाई लाल ने भी ऐसा ही किया ।
दोनों महारथियों ने किसी तरह से नरेंद्र (नरेन) को मिलने के लिए राजी कर लिया । जब नरेंद्र गोस्वामी 31 अगस्त 1908 को सत्येन्द्र से मिलने के लिए जेल की अस्पताल पहुंचा, तो दोनों ने उसको गोलियों से छलनी कर मौत के घाट उतार दिया । इन दोनों महारथियों ने बड़ी दिलेरी के साथ पुलिस बल के सामने इस घटना को अंजाम दिया था । इसके बाद इनको दोबारा सलाखों के पीछे धकेल दिया गया और मुकदमा प्रारंभ हुआ । 21 अक्टूबर 1908 को मुकद्दमे के दौरान इन दोनों को फांसी की सजा सुनाई गई । फैसले में ये भी फरमान जारी हुआ कि कन्हाई लाल को अपील करने की भी अनुमति नहीं होगी ।
10 नवंबर 1908 को इस महान् योद्धा को फाँसी के दिन, अंग्रेज अधिकारी और पुलिस कर्मी लेने पहुंचे तो वो गहरी नींद में सोये हुए थे । इसीलिए यह सर्वश्रुत है कि जिनके सीने में स्व का भाव जाग्रत होता है, उनमें कभी मौत का भय नहीं होता है । ऐसे में जेल कर्मचारियों ने उनको नींद से उठाया । निद्रा से उठने के बाद स्वाधीनता के महायोद्धा ने कर्मचारी से निडरता के साथ कहा कि “चलो कहां फाँसी चढ़ना है” । तदुपरांत 10 नवंबर को केवल 20 वर्षीय युवा क्रांतिकारी ने फाँसी का फंदा चूम लिया ।
अंततः महारथी श्रीयुत कन्हाई लाल दत्त को फाँसी की सजा सुनाई गई तो वो मुस्कुराने लगे अंग्रेज जेलर ने उस दिन इस महारथी से पूँछा – “तुम इतने प्रसन्न क्यों हो ?” महारथी ने जवाब दिया कि “मैं अगले जन्म की तैयारी में व्यस्त हूँ और यही मेरी प्रसन्नता का कारण है ताकि पुनः मातृभूमि की सेवा के लिए आ सकूँ । जिस दिन फाँसी हुई थी उस दिन अंग्रेज जेलर की आँखों में आँसू थे, उसने प्रोफेसर चारुचंद्र राय से कहा था कि ” इस जैसे 100 क्रांतिकारी मिल जायें तो हमें ये देश छोड़ना पड़ सकता है ” । विश्व में ऐंसा बहुत कम ही देखा गया है कि जब फाँसी के बाद भी मृत शरीर के चेहरे पर मुस्कुराहट हो ।
हम सभी जानते हैं कि कांग्रेसी मानसिकता की सरकारों ने हमारे क्रांतिकारियों के साथ कितनी बदसलूकी की है ? उनके साथ पूरी तरह अन्याय किया गया है और उन्हें कभी स्वाधीनता सेनानी की सुविधा नहीं दी गई हैं ।हमारा यह महान क्रांतिकारी भी कांग्रेसी और धर्मनिरपेक्ष सरकारों की इसी प्रकार की नीति का शिकार हुए हैं।
हमारे इस महान देशभक्त अमर क्रांतिकारी वीर श्री कन्हाई लाल दत्त जी के 137 वीं जयंती आगामी 30 अगस्त को मनाई जा रही है। तब सभी राष्ट्रवादियों के लिए बुरी खबर है कि उनके पैतृक घर पर स्थानीय नगर निगम के द्वारा सूचना लगाई गई है कि यह भवन जीर्ण शीर्ण अवस्था में आ गया है, इसलिए इसे तोड़कर यहां पर बहुमंजिला इमारत तैयार की जाए । जिस स्थान पर हमारे इस क्रांतिकारी की स्मृति में कोई बलिदानी स्मारक तैयार किया जाना चाहिए , वहां पर उनकी स्मृतियों के साथ अत्याचार करते हुए नगर निगम बहुमंजिला इमारत बनाने की तैयारी में है। देश के सभी राष्ट्रवादियों के लिए यह चिंता का विषय है इस पर सभी को एक मत होकर कार्य करना चाहिए। हम सबका यह राष्ट्रीय दायित्व बनता है कि प्रदेश की सरकार के द्वारा इस महान क्रांतिकारी की स्मृतियों के साथ इस प्रकार की ज्यादती न होने दें। यह इसलिए भी आवश्यक है कि इसी मकान में हमारे सामान क्रांतिकारी के वंशज आज भी निवास कर रहे हैं।
यदि नगर निगम या प्रदेश सरकार हमारे इस महान क्रांतिकारी की स्मृतियों के साथ अत्याचार करते हुए उनके इस पैतृक मकान को समाप्त करती है तो यह हम सबके लिए बहुत ही अपमानजनक स्थिति होगी। इसलिए चारों ओर से यह आवाज उठनी चाहिए कि हम अपने क्रांतिकारी के परिवार के साथ खड़े हैं। जिन लोगों ने देश की अस्मिता सम्मान और स्वाभिमान के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, उनके प्रति हमारे भी कुछ कर्तव्य हैं। यदि सरकार अपने पवित्र दायित्व का निर्वाह करने में असफल हो रही है तो हमें उसे उसका पवित्र कर्तव्य स्मरण कराना होगा । केंद्र सरकार से भी इस प्रकार की मांग उठाई जा सकती है कि वह कोलकाता नगर निगम को ऐसी कोई भी कार्यवाही करने से रोके जो हमारे इस क्रांतिकारी की स्मृतियों के साथ अन्य कारित कर रही हो।

डॉ राकेश कुमार आर्य

दक्षिणा रहस्य

अम्बर रक्तिम वर्ण हो चला रथ रवि का अस्ताचल को
लौट रहा हलधर का टोला, पुष्ट स्कंध पर धरि हल को
गोखुर से उड़ती रज रम्या, खग-मृग सब चले नीड़ को
गुरु माता बैठी आंगन में, अभ्यन्तर लिए पीड़ को

तभी द्रोण आये कुटिया में दिखी निस्तब्धता छाई
गुरु माता इतनी तन्मय थी, आहट तक ना सुन पाई
निज नारी देख विषण्णानन द्रोणाचार्य अधीर हुए
मन में कर अनर्थ आशंका उद्वेलित, गंभीर हुए

हस्त धनु इक ओर रख दिया, निकट किया भार्या आसन
अश्रू पूरित कपोल कृपि के,  देखा मन दुख का शासन
तब निज कर ले दारा कर को, कुरु-गुरु ने दो हस्त गहे
“किस संताप संतप्त देवी तुम?”, धीरे से मधुवचन कहे

कर स्पर्श विस्मित, विकंपित कृपि की कृश कोमल काया
ज्यों रमणी पुष्पलता कम्पित, कानन मलयानिल माया
“क्षमा नाथ आगमन आपका कैसे मैं ना जान सकी”
कह इति वचन अर्घ्य अर्पण को, कृपि तत्क्षण हो‌ गई खड़ी

बैठो प्रिय! क्यों विषाद विदिरण आज तुम्हारा मुख मंडल
किस पीड़ा प्रदग्ध हुई तुम, क्यों बहता नयनों में जल
किस पापी की मृत्यु निकट है, किस मानव की मति डोली
“ऐसा कुछ भी नहीं नाथ है” कृपि स्वर मंद-मंद बोली

सोच रही, कैसा एकलव्य गुरु भक्ति का था पायक
गुरु प्रतीमा चरणों में रह साध रहा अपने सायक
कितनी लगन, रत दृढ प्रतीज्ञा, निज साधन पर था निर्भर
सीखा उसने वो भी सब था जो अर्जुन को भी दुष्कर

गुरु श्रद्धा, जिज्ञासा, चेष्टा, विषय त्याग, एकाग्र ध्यान
ब्रह्मचारी, निद्रा निग्रही, कह वेद विद्या विज्ञान
विरंची रचित ये अनुशासन, लगन जहां है ज्ञान वहीं
एकलव्य सर्वगुण विभूषित, ज्ञान पिपासा उर गहरी

दक्षिण हस्त अंगुष्ठ मांग कर कैसी ये दक्षिणा पायी
निर्धन और निर्बोध बाल पर तनिक दया न मन आयी
श्रद्धा सुमन सुसज्जित अनुचर देह काट के दान दिया
उस एकलव्य अनुगामी पर कैसा अनर्थ हे नाथ किया

कोटि धन्य दीक्षा दुर्गम्य, शिष्य अर्जुन-सा धनुर्धर
पर मेरा मन उद्वेलित है, आता स्मृति वह रह रह कर
पिच्छ किरीट, तन वसन विदिरण, सोष्ठव बदन तनय निषाद
दृठ बाहु धनु, वदन विभासित, विवश दृग देते विषाद

इतना कह निर्वचन हो गई कृप स्वशा, शरद्वान सुता
गगन कलश कर अंधकार ले उडेल रही अपार निशा
चमक रहे केवल तारा गण अतिश्याम पटह प्रक्षिप्त
स्तब्ध पवन निःशब्द दिशा दस ज्योति स्त्रोत इक दीप दिप्त

बीती निशा अभी तीन घड़ी लगता जैसे एक अयन
निज नारी सुन‌ वचन करूणमय हुए आचार्य स्तिमित नयन
श्वेत श्मश्रु उद्भासित तुषार, कठोर कवच तन मुक्त केश
भुज दण्ड कठिन, तूणीर स्कंध, धर मंत्र पूत शर विशेष

गई स्मृति समय देशाटन को, अश्वत्थामा छवि छाई
पय गोक्षीर अलभ्य बाल को दुर्धर दीन दशा आई
पीष्टक पानी मिला पिला कर सुरभि दुग्ध बता रहें है
कैसे इस निर्बोध बाल को बाल सखा चिढा रहें हैं

स्त्री सहित सुकुमार स्वयं का पांचाल प्रदेश प्रस्थान
स्मृति पटल पर टहल गया वो द्रुपद द्वारा मर्दन मान
निर्धनता से विवश ज्ञान को मिला जगति में तिरस्कार
कांपी स्मरण से श्वास समीर छाया आनन पर विकार

दिखा कुरु गृह, भीष्मपिता ने सोंप दिये सब सुकुमार
द्रोण रहेगा कुरु कुल कृतज्ञ जागा अन्तर में  विचार
कौंतेय ने ही गुरु प्रतीज्ञा पूर्ण का संकल्प ठाना
श्रद्धा, लगन, सब श्रम साध कर धनुर्ज्ञान को पहचाना

हैं प्रिय मुझे मेरे सब शिष्य, लेकिन धनंजय धनुर्धर
लाघव कौशल धनु पारंगत, ज्ञाता है दीव्य ब्रह्मशर
तनय सुलेखा एकलव्य भी मेरे हृदय जितना पार्थ
मांगी थी जो कठिन दक्षिणा, जग खोज रहा उसमें स्वार्थ?

यह सोच हुए गुरु द्रोण विकल, चंचल होते द्वि स्थिर नयन
एक क्षण उर सव्यसाची है, क्षण द्वितीय सुलेखा रत्न
कहीं दूर तभी तरु शाख पर बोला कोई रजनी खग
प्रज्वलित ज्योति, कम्पित प्रकाश, मंथर मंथर खुले द्रोण दृग

है निशा निस्तब्ध नभ तिमिर तुमुल दीप्त तारागण चलते होले
ले स्मिति अधर, कर वल्लभा कर, आचार्य मंद स्वर बोले
सुनो कृपि! मैं करता हूं इस ममता को शत बार नमन
किन्तु मैंने भी तो किया है निज मर्यादा उचित वहन

मैं नहीं चकित उस विद्या से कि श्वान स्वर संधान किया
मैं अतिद्रवित अन्तर गदगद जैसे उसने सम्मान दिया
जिसके गंगापुत्र पितामह उस अर्जुन को अलभ्य क्या
आचार्य स्वयं शरद्वान सुत सुरपति जिससे था डरता

ब्रह्मशक्ति जिसको वरण करे कठिन नहीं स्वर भेद बाण
एकलव्य की दुर्देय दक्षिणा हेतु थी उसके ही त्राण
जब राजकुँवर वन से लौटे पार्थ ने सब वृतांत कहा
‘वह कहता है मैं शिष्य द्रोण, गुरु चरणों में नित्य रहा’

श्रद्धा उर एकलव्य अतीव मैने जा देखी वन में
गुरु सम्मुख विनित विनम्र और कोई भाव नहीं मन में
ऐसा एकलव्य अनुयायी, उससे छल हो सकता क्या?
शिक्षक क्षेम चाहे शिष्य की, सूर्य रश्मि खो सकता क्या?

मैं कहता ‌हूं सत्य वचन क्यों मांगी दक्षिणा दुर्देय
सुनो प्रिया! हो प्रशमन शायद तुम्हारा यह प्रदग्ध हृदय
निष्कपट नहीं हैं कुरु नंदन अभ्यंतर धृणा अनंत
दुर्योधन राजतिलक चाहे एवम् पांडव पुत्र अंत

दुर्योधन की दुर्बुद्धि यही देख रहा हूं छाएगी
वो दिन दूर नहीं जब कोई विनाश विपत्ति आएगी
एक ओर धनंजय, युधिष्ठिर, बलवान भीम अति शक्तिघन
एक ओर धृतराष्ट्र पुत्र शत कुरु दुश्शासन, दुर्योधन

सबने देखा ही तो था वह रंगभूमि में क्रुद्ध कर्ण  
क्षिप्र हस्त, दुर्योधन मनहर, नित चाहता कौंतेय मरण
आए हैं भू भार हरण हरि, माधव सुदर्शनचक्रधर
पापी का नाश करेंगे ही अद्भुत कोई लीला कर

नियति गति मैं देख रहा हूं महाघोर इक होगा रण
चारों ओर काल का तांडव वीरों का चहु ओर मरण
सहस्त्र सम्मुख शक्ति से शक्ति, उगलेंगी ज्वाला प्रचंड
मुद्गर, मुशल, गदा, शूल, खड़्ग, मल्ल युद्ध प्रबल भुज-दण्ड

रथी, महारथी, अश्व, कुंजर अति विशिष्ट व्युह संरचना
समर भूमि रही रक्त पिपासु नीति, अनीति, छल, वंचना
भीष्म, द्रुपद, कर्ण, शल्य जहां विराट, जयद्रथ जाएंगे
वहां एकलव्य जैसे बालक कहां मान फिर पाएंगे

शब्द भेद विद्या से केवल जीता जा सकता नहीं समर
आग्नेय, ब्रह्मशक्ति, पर्जन्य, वह्नि विच्छुरित करते शर
ऐसे वीर भी हैं धरती पर रखते निषंग तीन बाण
किन्तु चराचर में द्रोही के स्मर्थ हत करने को प्राण

माना बनता वो एकलव्य वीर धनुर्धर अतिभारी
पर माधव से बचा नहीं था कालयवन सा वरधारी
धनुधरों के भार से अब तो धरती ये अकुलाती है
अपने युग में कुछ ही योद्धा संसृति हृदय लगाती है

श्री न वरण करती एकलव्य जान गया था इस रण में
पर मैं चाहता था शिष्य की रहे चमक रज कण कण में
इसीलिए मांगा अंगूठा विचारित दक्षिणा प्रसाद
अमर रहे वह हिरण्यधनु सुत, रहे ज्योति नित निर्विवाद

एकलव्य का अंगुष्ठ दान, प्रसिद्धि वो पा जाएगा
शीश कटा जो महायुद्ध में धनुर्धर नहीं पाएगा‌
ये मत सोचो अहित किया है, कुकृत्य किया है अनय का
देखो गुंजित नाम आज है, निषाद सुलेखा तनय का

डॉ. राजपाल शर्मा ‘राज’

तुम कब रोए

पहला पर्ण‌ जो निकला तन से
जीर्ण-शीर्ण हो गया समय से
किसी पवन के झोंके ने तब
अलग कर दिया तेरे तन से
उस विलगित पर्ण के जाने का
दर्द क्या मन में कुछ नहीं होता
पर देखा तो नहीं किसी ने
कभी भी तुम को आँख भिगोए
पेड़! तुम कब रोए?

शाख पर जन्मीं नन्हीं चिड़िया  
जब उसी शाख पर, किसी झंझा में
मर‌ जाती है।
पावस, पवन – जिनसे जीवन है
कुछ बुरा जब कर जातीं है।
अपने असहाय-सा रह जाने का
तब कुछ दु:ख तो होता होगा।
तुम ने तो हर एक ऋतु में
अपनी शाख के खग हैं खोये
पेड़! तुम कब रोए?

खेल रहे थे तेरी छाँव में
मृग शावक माता से अपनी।
तुमने भी तो देखी थी वह
प्रेम-स्नेह की चढती बेली।
वो तो व्याध से थे अनजाने
तुमने तो पर देख लिया था
अपने उच्च शिखर से उसको
मीलों दूर से आते आते।
उन निर्बोधों के प्राणों पर
कठिन मृत्यु का पाश लगाते।
क्या थी तेरी मौन प्रतीज्ञा
किस निद्रा में थे तुम सोये
पेड़! तुम कब रोए?

ऐ वंशी वट! ऐ महावृक्ष
तुझ तले हुए उपदेश बहु
निश्चय ही, तरु नीचे तेरे
हुआ ज्ञान-रश्मि का प्रस्फुटन
सब चले गये — पर तू तो था
उस अँधकार के नीरव में
फिर कैसे रक्तपिपासु वे
निर्भिक रहे, तेरे होते
निर्दोष ग्रीवा पर फिरी तेग
कुछ छींटे तुम तक भी आये
उनकी तो छोड़ो, क्या थे वो
तुम कैसे सब सह पाये
वो मुंड अभी तक पूछे है
कैसे पल्लव तुमने धोए
पेड़! तुम कब रोए?

डॉ राजपाल शर्मा ‘राज’

छात्र किस दिशा में जा रहे हैं?

“शिक्षा, संस्कार और समाज की जिम्मेदारी : बदलते छात्र-शिक्षक संबंध और सही दिशा की तलाश”

आज शिक्षा केवल अंक और नौकरी तक सीमित हो गई है। नैतिक मूल्य और संस्कार बच्चों की प्राथमिकता से गायब होते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप शिक्षक-छात्र संबंधों में खटास बढ़ रही है और अनुशासनहीनता सामने आ रही है। यदि परिवार, समाज, शिक्षक और प्रशासन मिलकर सही कदम नहीं उठाएँगे तो आने वाली पीढ़ी गलत दिशा में बढ़ सकती है। शिक्षा को केवल ज्ञान का माध्यम नहीं बल्कि चरित्र निर्माण और जीवन-मूल्य का आधार बनाना होगा, तभी हम कह पाएंगे कि हमारे छात्र सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

– प्रियंका सौरभ

समाज का दर्पण कहलाने वाला विद्यालय आज एक गहरी चिंता का विषय बन गया है। जहाँ पहले शिक्षा का अर्थ केवल ज्ञान नहीं बल्कि संस्कार, अनुशासन और नैतिकता था, वहीं अब कुछ घटनाएँ यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि हमारे छात्र आखिर किस दिशा में जा रहे हैं। हाल ही में हरियाणा के भिवानी जिले के ढाणा लाडनपुर गाँव के राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हुई घटना, जहाँ एक छात्र ने अपने ही शिक्षक पर हमला कर दिया, यह सवाल और गंभीर हो जाता है। यह घटना सिर्फ एक शिक्षक और एक छात्र के बीच का विवाद नहीं बल्कि पूरे शिक्षा-तंत्र और समाज के लिए चेतावनी है।

भारतीय परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया गया है – गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः। लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि कई जगहों पर शिक्षक-छात्र संबंधों में खटास बढ़ती जा रही है। पहले शिक्षक की डांट को भी विद्यार्थी प्यार और मार्गदर्शन मानते थे, आज वही डांट अपमान या प्रताड़ना लगती है। मोबाइल और इंटरनेट ने छात्रों को स्वतंत्रता तो दी है, लेकिन साथ ही उनमें अहंकार और अनुशासनहीनता भी बढ़ाई है।

किसी भी बच्चे के व्यक्तित्व की नींव घर पर रखी जाती है। अगर घर में अनुशासन, संस्कार और मर्यादा का माहौल होगा तो बच्चा वही सीखेगा। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता बच्चों को समय नहीं दे पा रहे। टेलीविज़न, मोबाइल और सोशल मीडिया बच्चों के ‘गुरु’ बन गए हैं। नशे और हिंसा जैसी प्रवृत्तियों तक छात्रों की पहुँच आसान हो चुकी है। नतीजा यह कि जब शिक्षक बच्चे को सही राह दिखाने की कोशिश करता है, तो छात्र उसे रोक-टोक या बंधन मानकर विद्रोह कर बैठता है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा संकट यह है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी और अंक तक सीमित रह गया है। नैतिक शिक्षा, जीवन मूल्य और चरित्र निर्माण पर जोर लगभग समाप्त हो गया है। बच्चों को ‘क्या बनना है’ यह तो सिखाया जा रहा है, लेकिन ‘कैसा इंसान बनना है’ यह कहीं खो गया है। प्रतियोगिता की दौड़ में छात्रों पर दबाव इतना बढ़ गया है कि उनमें सहनशीलता और धैर्य की जगह अधीरता और आक्रामकता ने ले ली है।

एक छात्र का अपने शिक्षक पर हमला करना केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि यह पूरी शिक्षा प्रणाली और समाज के लिए शर्मनाक है। इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। शिक्षक छात्रों को अनुशासित करने से कतराएँगे, विद्यालय की गरिमा को आघात पहुँचेगा और समाज में गलत संदेश जाएगा कि यदि छात्र ही शिक्षक का आदर नहीं करेंगे तो समाज में वरिष्ठों और बड़ों के प्रति सम्मान कैसे बना रहेगा।

इस तरह की घटनाएँ केवल विद्यालय स्तर की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह कानून-व्यवस्था से भी जुड़ी हैं। ऐसे मामलों में तुरंत और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि छात्र और अभिभावक दोनों यह समझें कि अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे बच्चों के पुनर्वास और परामर्श की भी व्यवस्था हो।

अगर हमें छात्रों को सही दिशा में ले जाना है तो केवल सजा या डर से यह संभव नहीं होगा। इसके लिए बहुआयामी कदम उठाने होंगे। परिवार को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा और घर में अनुशासन और संस्कार का वातावरण बनाना होगा। शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है, पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा, मूल्य-आधारित शिक्षा और चरित्र निर्माण की गतिविधियाँ अनिवार्य की जानी चाहिए। शिक्षक को भी बच्चों की मानसिकता को समझते हुए संवाद की शैली बदलनी होगी। डांट या डर की बजाय समझाना और विश्वास दिलाना होगा। विद्यालयों में काउंसलिंग कक्ष अनिवार्य होने चाहिए और आक्रामक प्रवृत्ति वाले बच्चों को समय पर मनोवैज्ञानिक सहायता दी जानी चाहिए। समाज और मीडिया को भी अपनी भूमिका निभानी होगी, हिंसक और नकारात्मक सामग्री के प्रभाव को कम करना होगा और सकारात्मक आदर्श प्रस्तुत करने होंगे।

“छात्र किस दिशा में जा रहे हैं?” यह सवाल केवल एक घटना से उपजा हुआ प्रश्न नहीं है, बल्कि पूरे समाज की स्थिति पर एक गहरा चिंतन है। यदि आज ही हम बच्चों को अनुशासन, सम्मान और संस्कार की सही राह नहीं दिखाएंगे तो आने वाली पीढ़ी में शिक्षक-छात्र संबंध और समाज की संरचना दोनों कमजोर हो जाएँगे। समाधान परिवार, विद्यालय, समाज और प्रशासन—सभी के संयुक्त प्रयास में छिपा है। शिक्षा केवल डिग्री दिलाने का माध्यम न होकर चरित्र निर्माण और जीवन मूल्य का संस्कार बने, तभी हम कह पाएंगे कि हमारे छात्र सही दिशा में जा रहे हैं।

 डॉ. प्रियंका सौरभ