धर्म-अध्यात्म सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment ओ. पी. उनियाल मित्रता एवं सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक मजार एवं गुरुध्दारा। जिनका धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व अपने आप में एक उदाहरण हैं। दर्शनार्थी टेकते हैं मत्था और मांगते हैं मन्नतें इन दोनों स्थलों पर। दोस्ती की सालों पुरानी परंपरा को आज भी निभा रहे हैं श्रध्दालु। एक तरफ उत्तराखंड की सीमा तो दूसरी तरफ […] Read more » communal harmony सांप्रदायिक सद्भाव
विविधा साम्यवाद एवं पूंजीवाद का विकल्प है एकात्म मानवतावाद December 10, 2010 / December 19, 2011 | 3 Comments on साम्यवाद एवं पूंजीवाद का विकल्प है एकात्म मानवतावाद -राजीव मिश्र स्वतंत्रता के उपरांत के अपने आर्थिक इतिहास के खतरनाक दौर में हम पहूंच गए हैं जबकि सारी व्यवस्था ही टूटती हुई दिखायी पड़ रही है। आज भारत एवं संपूर्ण विश्व एक चौराहे पर किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा है उसे मार्ग नहीं दिख रहा है। उसके सामने यह यक्ष प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि वास्तविक […] Read more » communism एकात्म मानववाद पूंजीवाद साम्यवाद
विज्ञान महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment -मृत्युंजय दीक्षित भारतीय मान्यता के अनुसार वनस्पति को भी चेतन और प्राणमय बताने वाले तथा अपने अरुसंधान कार्यों द्वारा संसार को आश्चर्यचकित कर देने वाले महान वैज्ञानिक सर जगदीश चंद बसु का जन्म 20 नवम्बर, 1858 को ढाका के विक्रमपुर कस्बे के राढीखाल नाम के गांव में हुआ था। उनके पिता भगवान चन्द बसु फरीदपुर […] Read more » Scientist जगदीश चन्द्र बसु
धर्म-अध्यात्म आस्था निर्माण की कार्यवाही December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment -हृदयनारायण दीक्षित प्रत्यक्ष स्वयं प्रमाण होता है। इसे सिध्द करने की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन सारा प्रत्यक्ष देखा और जाना नहीं जा सकता। सृष्टि विराट है। इंद्रियबोध की सीमा है। यों प्रत्यक्ष का सीधा अर्थ प्रति-अक्ष यानी आंख के सामने होता है। भारतीय विवेक में ‘अक्ष’ का अर्थ इंद्रियां है। इंद्रियबोध की समझ ही यहां […] Read more » Faith आस्था
साहित्य साहित्य में लोकमंगल की आराधना December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment -हृदयनारायण दीक्षित शब्द ब्रह्म है। ब्रह्म संपूर्णता है। संपूर्ण और ब्रह्म पर्यायवाची हैं लेकिन संपूर्ण शब्द में ब्रह्म का विराट वर्णन करने की सामर्थ्य नहीं है। उपनिषद् के ऋषि ने इसीलिए ‘पूर्णमिदं पूर्णमदः’ शब्द प्रयोग किये। उपनिषद् में कहा गया कि यह पूर्ण है, वह पूर्ण है। यह पूर्ण उस पूर्ण से निकला है। यहां […] Read more » Sahitya साहित्य
विविधा उल्लासधर्मा है भारत का मन December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment हृदयनारायण दीक्षित भारत का मन उल्लासधर्मा है। व्यक्ति की तरह राष्ट्र का भी अंतर्मन होता है। भारत का मन हजारों वर्ष प्राचीन संस्कृति के अविरल प्रवाह का सुफल है। संस्कृति के निर्माण में वेद, उपनिषद्, पुराण, महाकाव्य और सतत् जिज्ञासा वाले वैज्ञानिक दृष्टिकोण की खास भूमिका है। वेदों में भरा पूरा समाज है। ‘ऋग्वेद’ विश्व […] Read more » India भारत
विविधा भारतीय चिंतन में रसानुभूति December 10, 2010 / December 19, 2011 | 1 Comment on भारतीय चिंतन में रसानुभूति हृदयनारायण दीक्षित मनुष्य आनंद अभीप्सु है। भक्तों के अनुसार प्रभु का भजन ही आनंद का स्रोत है। भक्त मुक्ति या मोक्ष नहीं मांगते। प्रभु प्रीति में ही आनंद सागर देखते हैं। महात्मा बुध्द संसार को दुखमय देखते थे। उन्होंने दुखों का कारण ‘अविद्या’ बताया और विद्या को मुक्ति का उपाय। मुक्ति ही आनंद है। बाकी […] Read more » Indian रसानुभूति
विविधा स्वार्थ अप्रतिम, मूल्यवान, अनिन्दनीय December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment हृदयनारायण दीक्षित अपना सुख सबकी कामना है। अपनों का सुख इसी अपने का हिस्सा है। तुलसीदास की आत्मानुभूति प्रगाढ़ थी। उन्होंने इसी अपनेपन के लिए एक प्रीतिकर शब्द दिया-‘स्वान्तः सुखाय’। रामकथा उन्होंने ‘स्वान्तः सुखाय’ ही गायी। सभी प्राणी अपने सुख के लिए ही कर्म करते हैं। दूसरों के सुख की बात करने वाले राजनीति करते […] Read more » Precious मूल्यवान
राजनीति केंद्रीय नेतृत्व को ठेंगा दिखाता प्रदेश नेतृत्व December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment गोविन्द भाई चौधरी भारत को आजाद हुए पूरे 64 वर्ष हो चुके हैंऔर इस 64 वर्षों के लंबे अंतराल में हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था इतनी मजबूत हुई है कि देश के प्रत्येक प्रदेश में एक क्षेत्रिय पार्टी का बोलबाला है। इन बातों को छोड़कर हम जरा मुद्दे की बात करे। आज हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था इतनी सुदृढ़ […] Read more » State प्रदेश
प्रवक्ता न्यूज़ दुराग्रहों की प्रकृति में एक और मोड़! December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment हरिकृष्ण निगम ‘राजनीतिक पत्रकारिता’ पर हाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल की शोध-परियोजना के अंतर्गत श्री राकेश सिंहा के एक प्रकाशित ग्रंथ में जब यह पढ़ा कि देश के कुछ प्रमुख अंग्रेजी दैनिक पत्रों की राजनैतिक व वैचारिक प्रतिबध्दता में दृष्टिकोण की खोट हो सकती है तब अनेक बुध्दिजीवियों की तरह […] Read more » Journalism राजनीतिक पत्रकारिता
विश्ववार्ता म्यांमार में चुनाव का छलावा December 10, 2010 / December 19, 2011 | Leave a Comment डॉ. बचन सिंह सिकरवार पड़ोसी देश म्यांमार में कोई दो दशक बाद हाल में हुए तथाकथित संसदीय आम चुनाव के वैसे ही नतीजे अब गए हैं जैसा कि इनके होने से पहले दुनिया भर के लोगों ने सोच रखा था। कारण ये चुनाव-चुनाव नहीं ,बल्कि चुनाव के नाम पर इस देश की जुण्टा(सैन्य) सरकार को […] Read more » Myanmar म्यांमार
विविधा खुलेआम भ्रष्टाचार… मौन तोड़ो! December 9, 2010 / December 19, 2011 | 5 Comments on खुलेआम भ्रष्टाचार… मौन तोड़ो! -सुनील अम्बेकर एक बालक ने बड़ी उत्सुकता से किसी से पूछा- ‘यह 2जी क्या होता है?’ उसने भी सारी तकनीकी जानकारी तथा इससे होने वाले फायदे गिनाने शुरू किये। तभी बालक ने कहा- ‘मैंने तो सुना है कि यह पैसे कमाने की कोई नयी तकनीक आयी है जिसमें राजा नाम का कोई व्यक्ति काफी कुशल […] Read more » Corruption भ्रष्टाचार यूपीए