कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म विश्वप्रसिद्ध-मथुरा और वृंदावन की होली March 1, 2026 / March 1, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment विश्वप्रसिद्ध-मथुरा और वृंदावन की होली Read more » World Famous Holi of Mathura and Vrindavan
कला-संस्कृति लेख कटुता भुलाकर गले मिलें March 1, 2026 / March 1, 2026 by ब्रह्मानंद राजपूत | Leave a Comment फाल्गुन की उजली पूर्णिमा, जब नभ में मुस्काती है, होलिका की पावन ज्वाला बुराई को जलाती है। सत्य की राह दिखाकर हमको, नव विश्वास जगाती है, अंधियारे मन के कोनों में भी उजियारा भर जाती है। सुबह धुलेंडी रंग लिए जब आँगन में आ जाती है, अबीर-गुलाल की खुशबू से हर गली महक जाती है। […] Read more » कटुता भुलाकर गले मिलें
कला-संस्कृति लेख झारखंड में होली की वैविध्यपूर्ण परंपराएं March 1, 2026 / March 1, 2026 by अशोक “प्रवृद्ध” | Leave a Comment झारखंड में होली की अत्यंत प्राचीन, वृहत व वैविध्यपूर्ण परंपराएं हैं। यहां इसे मुख्य रूप से फगुआ के नाम से जाना जाता है, जिसमें आदिवासी और गैर आदिवासी सदान संस्कृति Read more » झारखंड में होली होली की वैविध्यपूर्ण परंपराएं
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म लोकगीतों की रंगभरी होली February 25, 2026 / February 25, 2026 by शम्भू शरण सत्यार्थी | Leave a Comment शम्भू शरण सत्यार्थी होली केवल एक त्योहार नहीं है। यह भारतीय लोकजीवन का जीवंत महाकाव्य है। यह रंगों का उत्सव अवश्य है पर उससे कहीं अधिक यह सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक निरंतरता और मानवीय संबंधों का पुनर्जागरण है। शहरों में होली एक दिन का आयोजन हो सकती है, पर गाँवों में यह पूरे फागुन का स्पंदन […] Read more » Holi full of folk songs होली
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म वसंत पंचमी : सरस्वती तत्व के जागरण का पर्व January 23, 2026 / January 23, 2026 by संदीप सृजन | Leave a Comment संदीप सृजन वसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का वह महापर्व है जो केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि मानव अंतःकरण में सरस्वती तत्व के जागरण का गहन आध्यात्मिक संदेश देता है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर मनाया जाने वाला यह त्योहार प्रकृति की बहार के साथ-साथ आत्मा की प्रज्ञा, बुद्धि और सृजनात्मक ऊर्जा के उदय का प्रतीक है। जब सर्दी की सुस्ती टूटती है और चारों ओर पीले सरसों के फूल खिल उठते हैं, तब यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अज्ञान के अंधकार के बाद ज्ञान की किरणें कैसे फूटती हैं। यह पर्व सरस्वती तत्व के जागरण का उत्सव है, वह तत्व जो हमें मूक से वाग्मी, अंधेरे से प्रकाशित और स्थिर से सृजनशील बनाता है। सरस्वती तत्व केवल विद्या या ज्ञान तक सीमित नहीं है। यह वह दिव्य शक्ति है जो वाणी, बुद्धि, प्रज्ञा, स्मृति, संगीत, कला और सृजन की मूल ऊर्जा है। यह वह चेतना हैं जो सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट हुईं। देवी भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रची तो उन्हें वाणी की आवश्यकता महसूस हुई। उनकी इच्छा से सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ। वे सफेद वस्त्रों में, वीणा लिए, हंस पर सवार होकर प्रकट हुईं। उनका यह रूप बताता है कि सरस्वती तत्व शुद्धता, सरलता और गहन अंतर्दृष्टि का प्रतीक है। हंस उनका वाहन इसलिए है क्योंकि हंस दूध और पानी को अलग कर सकता है, ठीक वैसे ही सरस्वती तत्व सत्य और असत्य, ज्ञान और अज्ञान को अलग करता है। सरस्वती तत्व का जागरण अर्थात् व्यक्ति के भीतर वह क्षमता जागृत होना जब वह केवल जानकारी इकट्ठा करने से आगे बढ़कर समझने, विश्लेषण करने, सृजन करने और अभिव्यक्त करने में सक्षम हो जाता है। यह तत्व जागृत होने पर व्यक्ति की वाणी में मधुरता आती है, बुद्धि में स्पष्टता, हृदय में करुणा और जीवन में सृजनात्मकता। वसंत पंचमी का नामकरण दो भागों से हुआ, वसंत (ऋतु का राजा) और पंचमी (पांचवीं तिथि)। यह वह दिन है जब प्रकृति में नवजीवन का संचार होता है। सर्दी की जड़ता के बाद कोपलें फूटती हैं, फूल खिलते हैं, पक्षी गाते हैं और हवा में मादक सुगंध फैलती है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन अंतःकरण में सरस्वती तत्व के जागरण का प्रतीक है। जब सर्दियों की ठंडक में सब कुछ स्थिर और निष्क्रिय हो जाता है, तब वसंत की पहली किरण अज्ञान की उस ठंडक को पिघलाती है। पीला रंग, जो सरसों के फूलों, सूर्य की किरणों और सरस्वती के वस्त्रों का रंग है, प्रकाश, उल्लास और प्रज्ञा का प्रतीक है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करना, पीले व्यंजन बनाना और पीले फूल चढ़ाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि सरस्वती तत्व को आमंत्रित करने का सूक्ष्म संदेश है। आध्यात्मिक व्याख्या में वसंत पंचमी को विद्या जयंती भी कहा जाता है। यह वह दिन है जब देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ और उन्होंने संसार को अज्ञान के अंधकार से मुक्ति दी। कई विद्वान इसे गुप्त नवरात्रि के पांचवें दिन से जोड़ते हैं, जहां साधना के दौरान प्रज्ञा का अवतरण होता है। पौराणिक कथाओं में वसंत पंचमी का उल्लेख विविध रूपों में मिलता है, जिनमें ब्रह्मा और सरस्वती की कथा के अनुसार सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी को वाणी की आवश्यकता पड़ी। उनकी इच्छा से सरस्वती प्रकट हुईं। उन्होंने वेदों का उच्चारण किया और संसार को ज्ञान दिया। इसीलिए इस दिन को उनका जन्मदिन माना जाता है। एक और पौराणिक कथा कामदेव की पुनर्जीवन कथा है, जब शिव जी ने क्रोध में कामदेव को भस्म कर दिया था। रति की प्रार्थना पर वसंत पंचमी को कामदेव पुनर्जीवित हुए। यह कथा बताती है कि सरस्वती तत्व केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि प्रेम और सृजन की ऊर्जा को भी जागृत करता है। ये कथाएं दर्शाती हैं कि सरस्वती तत्व सृष्टि का आधार है, बिना इसके न रचना संभव है, न अभिव्यक्ति। इस दिन की पूजा विधि स्वयं सरस्वती तत्व के जागरण को प्रेरित करती है, जैसे पीले वस्त्र और फूल, प्रज्ञा के प्रकाश का प्रतीक है। वीणा, पुस्तक और कलम की पूजा, सृजनात्मक अभिव्यक्ति के साधनों का सम्मान है। ज्ञान के प्रति समर्पण का भाव बनाए रखने को प्रेरित करता है। सरस्वती वंदना, भजन, वाणी को शुद्ध और प्रभावशाली बनाने की साधना है। वहीं संगीत, नृत्य और कला कार्यक्रम सरस्वती के विभिन्न रूपों का उत्सव है। बच्चे इस दिन पहली बार अक्षर लिखते हैं (विद्या आरंभ संस्कार), जो उनके भीतर सरस्वती तत्व के प्रथम जागरण का क्षण होता है। वसंत पंचमी हमें याद दिलाती है कि सच्चा विकास बाहरी नहीं, भीतरी है। जब सरस्वती तत्व जागृत होता है, तब व्यक्ति केवल जीवित नहीं रहता, जीवन को सार्थक और सुंदर बनाता है। वसंत पंचमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सरस्वती तत्व के जागरण का महोत्सव है। यह हमें सिखाता है कि हर सर्दी के बाद वसंत आता है, हर अज्ञान के बाद ज्ञान की किरण फूटती है। आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने भीतर की उस दिव्य शक्ति को जागृत करें जो हमें अंधकार से प्रकाश, मौन से वाणी और स्थिरता से सृजन की ओर ले जाती है। संदीप सृजन Read more » वसंत पंचमी
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म श्रीराम मंदिर: युवाओं की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का नया सूर्योदय January 23, 2026 / January 23, 2026 by लोकेन्द्र सिंह राजपूत | Leave a Comment – डॉ. लोकेन्द्र सिंह भारत के युवाओं को लेकर देश में अलग-अलग ढंग से विमर्श चल रहे हैं। कुछ ताकतें चाहती हैं कि भारत का युवा अपनी ही संस्कृति एवं जीवन मूल्यों के विरुद्ध खड़ा हो जाए। धर्म-संस्कृति क्रियाकलापों से युवाओं को दूर करने के लिए यहाँ तक कहा गया कि “जो लोग मंदिर जाते हैं, वही लोग महिलाओं […] Read more »
कला-संस्कृति स्वास्थ्य-योग आयुर्वेद: प्राचीन चिकित्सा पद्धति का वैश्विक उत्थान January 21, 2026 / January 21, 2026 by डॉ नीलम महेन्द्रा | Leave a Comment एलोपैथिक दवाओं के साइड इफेक्ट इतने पर ही सीमित नहीं हैं। अब धीरे धीरे यह बात सामने आने लगी है कि लगभग हर अंग्रेजी दवा का कोई न कोई साइड इफेक्ट होता ही है। Read more » आयुर्वेद
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म प्रकृति, चेतना और आत्म जागरण का उत्सव January 21, 2026 / January 21, 2026 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment बसंत पंचमी विशेष : डॉ घनश्याम बादल भारतीय परंपरा और श्रीमद् भागवत गीता में वसंत को ऋतुराज कहा गया है,’ऋतूनां कुसुमाकरः अर्थात् ऋतुओं में मैं वसंत हूँ, जहाँ सृजन, सौंदर्य और चेतना अपने चरम पर होती है। बसंत का सौंदर्य एवं महत्व देखकर ही इसे ऋतुराज की संज्ञा दी गई है। वसंत पंचमी भारतीय जीवन-दर्शन का सजीव प्रतीक है- जहाँ धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही चेतना के विविध रूप हैं। तिथि मात्र नहीं बसंत वसंत पंचमी केवल पंचांग में अंकित एक तिथि मात्र नहीं, अपितु भारतीय चेतना का वह क्षण है जब जड़ता के लंबे शीतकाल के बाद जीवन पुनः मुस्कुराने लगता है। यह ऋतु परिवर्तन का संकेत भर नहीं, बल्कि आत्मा, प्रकृति और समाज तीनों के नवजागरण का पर्व है। श्वेत शीत के बाद पीत वसंत का आगमन जैसे कहता है-अब भीतर और बाहर, दोनों ही स्तरों पर ऊर्जा को जगाने एवं सृजन का समय है। धार्मिक और आध्यात्मिक संदर्भ वसंत पंचमी को माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस माना जाता है। सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि चेतना की धारा हैं। वह चेतना जो अज्ञान के तम को चीरकर विवेक का प्रकाश फैलाती है। इसीलिए इस दिन पुस्तकों, वाद्ययंत्रों और लेखन-कार्य का पूजन होता है। या कुन्देन्दु तुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना श्लोक हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का स्वरूप शुद्ध, शांत और उज्ज्वल होता है, ठीक उसी तरह जैसे वसंत का प्रकाश। आध्यात्मिक दृष्टि से वसंत पंचमी आंतरिक ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। जैसे धरती के भीतर बीज फूटते हैं, वैसे ही साधक के भीतर सुप्त चेतना जागती है। योग और तंत्र परंपरा में इस काल को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है । प्रकृति और विज्ञान का संगम वैज्ञानिक दृष्टि से वसंत पंचमी के आसपास पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में दिनों की अवधि बढ़ने लगती है, सूर्य की किरणें अधिक सीधी और ऊर्जा-समृद्ध हो जाती हैं। इसका प्रभाव सीधे मानव शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है। मौसम विज्ञान के अनुसार भी वसंत ऋतु में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे “प्रसन्नता दायक हार्मोन” का स्तर बढ़ता है अवसाद, जड़ता और आलस्य में कमी आती है। सृजनात्मकता और सीखने की क्षमता तीव्र होती है । इसीलिए प्राचीन भारत में गुरुकुलों में नए अध्ययन सत्र, संगीत-नाट्य अभ्यास और शास्त्रार्थ इसी काल में प्रारंभ होते थे। मनोविज्ञान और आत्मिक चेतना मनोवैज्ञानिक रूप से वसंत पंचमी आशा का पर्व है। शीतकाल मानव मन में एक प्रकार की संकुचनशीलता ले आता है। कम प्रकाश, कम ऊर्जा, अधिक अंतर्मुखता। वसंत इस संकुचन को तोड़ता है। पीला रंग, जो वसंत पंचमी का प्रतीक है, ऊर्जा, ऊष्मा,आशावाद, बौद्धिक स्पष्टता और आत्मविश्वास का रंग माना जाता है। इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले पकवान (केसरिया खीर, बेसन के लड्डू) परंपरा में शामिल हैं। यह रंग मन को संदेश देता है- संकुचन एवं आलस का समय यानी शीतकाल अब चला गया इसलिए आगे बढ़ो,सीखो और रचो।” भौगोलिक परिवर्तन और जीवन भौगोलिक दृष्टि से वसंत पंचमी कृषि चक्र का महत्वपूर्ण पड़ाव है। रबी की फसलें पकने लगती हैं, सरसों के खेत पीले फूलों से भर जाते हैं। यह दृश्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि अन्न, समृद्धि और जीवन की निरंतरता का संकेत है। उत्तर भारत से लेकर पूर्वी भारत तक लोकजीवन में वसंत का स्वागत गीतों के माध्यम से होता है- फागुन आयो रे, रंग बरसाओ रे, सरसों फूली,धरती बोली,जीवन गुनगुनाओ रे जैसे लोकगीतों में किसान की आशा, प्रकृति से उसका संवाद और जीवन के प्रति उसका उल्लास समाहित होता है। वसंत और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा वसंत पंचमी के साथ ही फाग, होली, रास और प्रेम-उत्सवों की श्रृंखला आरंभ होती है। कालिदास ने ‘ऋतुसंहार’ में वसंत को प्रेम और सृजन की ऋतु कहा है। यह प्रेम केवल दैहिक नहीं, बल्कि आत्मा का प्रकृति से, मनुष्य का मनुष्य से और साधक का ब्रह्म से प्रेम है। आधुनिक संदर्भ में वसंत पंचमी आज के यांत्रिक और तनावग्रस्त जीवन में वसंत पंचमी हमें रुककर देखने, महसूस करने और स्वयं से जुड़ने का अवसर देती है। यह पर्व याद दिलाता है कि ज्ञान केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संतुलन और प्रकृति-संगति में भी निहित है। यदि हम वसंत पंचमी को केवल रस्म न बनाकर, आत्मचिंतन का दिन नई सीख शुरू करने का संकल्प, भीतर की नकारात्मकता त्यागने का अवसर बना लें, तो यह पर्व वास्तव में आत्मिक पुनर्जन्म का उत्सव बन सकता है। यह पर्व संदेश देता है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नया करती है, वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर नवीनता, विवेक और करुणा का वसंत ला सकता है। वसंत पंचमी शाश्वत संदेश है- तम से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतना की ओर, और अस्तित्व से आत्मबोध की ओर बढ़ना , दुखों के पुराने पत्तों को त्याग कर प्रसन्नता एवं नवीनता के नए अंकुरण को धारण करना। डॉ घनश्याम बादल Read more » बसंत पंचमी
कला-संस्कृति खान-पान सृष्टि में ऊर्जा का नवसंचार करने वाला पर्व – मकर संक्रांति January 14, 2026 / January 14, 2026 by मृत्युंजय दीक्षित | Leave a Comment शीत ऋतु के मध्य जब सूर्यदेव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उनकी उत्तरायण गति प्रारम्भ होती है, तब मकर संक्रांति होती है। यह पर्व सृष्टि में उर्जा का नवसंचार करने वाला पर्व है। मकर संक्रांति के दिन जप, तप, दान, स्नान, श्रद्धा, तर्पण आदि धार्मिक विधि विधान व कर्मों का विशेष महत्व है Read more » मकर संक्रांति
कला-संस्कृति खान-पान मकर संक्रांति: पतंगबाजी, आनंद, संस्कृति और चेतना January 14, 2026 / January 14, 2026 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment भारत में पतंग उड़ाने को एक बहुत पुरानी परंपरा माना जाता है। इसका ज़िक्र इतिहास और लोककथाओं में मिलता है। यह शाही महलों में पराक्रम और चतुराई का प्रतीक हुआ करता था, Read more » Culture and Consciousness Joy Makar Sankranti: Kite Flying मकर संक्रांति
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म कालचक्र के नये पड़ाव के स्वागत की बेला December 27, 2025 / December 27, 2025 by डा. विनोद बब्बर | Leave a Comment यह परम्परा प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। दुनिया भर के तमाम समाजों, जातियों और समुदायों, सम्प्रदायों में अलग-अलग ढंग से, अलग-अलग तिथियों, महीनों में नववर्ष मनाने की परम्परा है। Read more » Time to welcome a new phase of the cycle of time नववर्ष
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म विश्व में शांति स्थापित करने हेतु भारतीय संस्कृति का उत्थान आवश्यक है December 22, 2025 / December 22, 2025 by प्रह्लाद सबनानी | Leave a Comment कहा जाता है कि सतयुग में समाज पूर्णत: एकरस था और उस समय के समाज में भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्टत: दिखाई देती थी। एक कहानी के माध्यम से इस बात को बहुत आसानी से समझा जा सकता है। सतयुग के खंडकाल में एक किसान ने अपनी जमीन बेची। जिस व्यक्ति ने वह जमीन खरीदी थी Read more » भारतीय संस्कृति का उत्थान