पर्यावरण रिहाईशी क्षेत्रों को ज़हरीला बनाते रसायनयुक्त उद्योग May 10, 2013 / May 10, 2013 by निर्मल रानी | Leave a Comment निर्मल रानी भोपाल गैस त्रासदी को अभी देश भूल नहीं पाया है। और उस त्रासदी से पीड़ित परिवारों के लोगों की तो आने वाली नस्लें उसके दुष्प्रभावों का अभी तक सामना कर रही हैं। यूनियन कार्बाईड नामक उस केमिकल फैक्ट्री में हुए हादसे में हज़ारों लोग मारे गए थे और लाखों लोग आज तक प्रभावित […] Read more » ज़हरीला बनाते रसायनयुक्त उद्योग
पर्यावरण वायु प्रदूषण के गंभीर खतरे के बीच हमारा जीवन April 14, 2013 / April 14, 2013 by मिलन सिन्हा | 1 Comment on वायु प्रदूषण के गंभीर खतरे के बीच हमारा जीवन मिलन सिन्हा गाँव छोड़ कर लोग लगातार शहरों में आ रहे हैं।शहरों पर बोझ बढ़ रहा है। शहर में बुनियादी सुविधाएँ पहले ही नाकाफी थी, अतिरिक्त जनसँख्या के दवाब में तो अब हालत और भी खस्ता हो गई है। सुबह हो या शाम, घर से बाहर निकल कर सड़क पर आते ही आपको हर छोटे […] Read more » वायु प्रदूषण के गंभीर खतरे के बीच हमारा जीवन
पर्यावरण कराहती सई April 8, 2013 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार ‘राघव’ ‘सई उतरि गोमती नहाये, चौथे दिवस अवधपुर आये’।। श्रीराम की वनवास यात्रा में उत्तर प्रदेश की जिन पांच प्रमुख नदियों का जिक्र है, उनमें से एक है – सई । पुराणों में इसे आदि गंगा कहा गया है । शेष चार नदियां हैं – गंगा, गोमती, सरयू और मंदाकिनी […] Read more » कराहती सई
पर्यावरण खतरे में है अरावली पर्वत श्रृंखलाएं April 5, 2013 / April 5, 2013 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव ज्यादा से ज्यादा प्राकृतिक संपदाओं का दोहन वर्तमान आधुनिक एवं आर्थिक विकास नीति का आधार है। लेकिन हमारे यहां जिस निर्दयी बेशरमी से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी है,उस परिप्रेक्ष्य में मौजूदा आर्थिक विकास की निरंतरता तो बनी ही नहीं रह सकती,दीर्घकालिक दृष्टि से देंखे तो विकास की यह आवधारणा उस बहुसंख्यक […] Read more » खतरे में है अरावली पर्वत श्रृंखलाएं
पर्यावरण बिगड़ता पर्यावरण संतुलन और यज्ञ March 9, 2013 / March 8, 2013 by राकेश कुमार आर्य | 4 Comments on बिगड़ता पर्यावरण संतुलन और यज्ञ आर्थिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए ही नही अपितु सामाजिक व्यवस्था को भी सही प्रकार से चलाये रखने के लिए ‘ले और दे’ का सिद्घांत बड़ा ही कारगर माना जाता है। भारतीय संस्कृति में तो इसे और भी अधिक श्रद्घा और आस्था का प्रतीक बनाकर धार्मिक व्यवस्था के साथ जोड़ दिया गया। […] Read more » बिगड़ता पर्यावरण संतुलन यज्ञ
पर्यावरण घटता पर्यावरण और अस्त्र-निर्माण में व्यस्त विज्ञान October 19, 2012 / October 19, 2012 by पियूष द्विवेदी 'भारत' | Leave a Comment पियुष द्विवेदी ‘भारत’ मानव के भौतिकवादी जीवन के प्रति बढ़ते अपनत्व और उसकी प्राप्ति के लिए किए जा रहे अनियंत्रित प्राकृतिक-दोहन के साथ-साथ औद्योगिक, यातायातिक, संचारिक एवं सामरिक संसाधनों आदि के द्वारा अग्राह्य गैसों के अबाध उत्सर्जन से बढ़ रहा प्रदूषण, आज ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के रूप में मानव ही के लिए एक विकट समस्या बन […] Read more » अस्त्र-निर्माण में व्यस्त विज्ञान
पर्यावरण संकट में हैं काजीरंगा के गैंडे October 13, 2012 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment संदर्भ:- काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में 39 गैंडों का शिकार प्रमोद भार्गव विश्वविख्यात काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के एक सींग वाले गैंडों पर बंगलादेश से आए अवैध घुसपैठिए कहर ढा रहे हैं। यहां पिछले 10 महीने के भीतर 39 गैंडों को मार गिराने की घटनाएं सामने आई हैं। जाहिर है इस दुर्लभ वन्य प्राणी पर पहले से […] Read more » काजीरंगा गैंडा
पर्यावरण एक था टाइगर October 6, 2012 by नवनीत कुमार गुप्ता | Leave a Comment नवनीत कुमार गुप्ता पिछले दिनों बाघ संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर काफी चर्चा हुई है। कोर्ट के फैसले पर एक तरफ जहां पशु प्रेमी खुश थे तो वहीं पयर्टन के क्षेत्र से जुड़े लोगों में मायूसी दिखी। कई लोगों ने इसे रोजी रोटी छिनने की संज्ञा दी। असल […] Read more » बाघ
पर्यावरण जलछाजन क्षेत्र में सामुदायिक सहभागिता का परिणाम October 6, 2012 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment शैलेन्द्र सिन्हा परंपरागत रूप से नदियों, पहाड़ों, झरनों एवं जोरिया से पानी पीकर वर्षों से मनुष्य अपना जीवन यापन करता आ रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्र सरकार द्वारा पूरे भारत के गांवों में जलछाजन योजना के तहत सामुदायिक सहभागिता से जल को पीने लायक व कृषि उपयोग हेतु हरियाली नामक योजना चलायी गई है। […] Read more » जलछाजन
पर्यावरण निर्धारित हों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मापदं September 24, 2012 / September 24, 2012 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तनवीर जाफ़री वर्तमान कठिन दौर में जबकि लगभग सारा संसार अपने जीविकोपार्जन हेतु संघर्षरत है,दुनिया में मंहगाई,बेरोज़गारी तथा कुपोषण बढ़ता जा रहा है। उधर प्रकृति भी तथाकथित मानवीय विकास से नाराज़ नज़र आ रही है तथा पृथ्वी पर प्रलयरूपी कोई न कोई तांडव समय-समय पर करती रहती है। दुनिया के मौसम तेज़ी से परिवर्तित हो […] Read more » अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
पर्यावरण हिमालय की दुर्दशा से पर्यावरण संकट में September 21, 2012 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment दिनेश पंत इस वर्ष देश में उम्मीद से कम और अनियमित वर्षा ने ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरे की चिंता को बढ़ा दिया है। विकास और उन्नति के नाम पर औद्योगिकीकरण ने पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। निवेश के बढ़ते अवसर ने गांव को भी तरक्की के नक्षे पर मजबूती से उकेरा है। […] Read more » हिमालय
पर्यावरण तबाही की पूर्व सूचना है नलकूप क्रांति September 21, 2012 / September 21, 2012 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव हमारे देश में बीते चौसठ सालों के भीतर जिस तेजी से कृत्रिम, भौतिक और उपभोक्तावादी संस्कृति को बढावा देने वाली वस्तुओं का उत्पादन बढ़ा है उतनी ही तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का या तो क्षरण हुआ है या उनकी उपलब्धता घटी है। ऐसे प्राकृतिक संसाधनों में से एक है ”पानी। ‘जल ही जीवन […] Read more » नलकूप क्रांति