आलोचना अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा May 4, 2013 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment जगदीश्वर चतुर्वेदी रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की […] Read more »
आलोचना विरोध और स्त्री May 4, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment आदित्य कुमार गिरि आमतौर पर यह धारणा है कि स्त्री विमर्श के अन्तर्गत स्त्री लेखिकाएँ पुरुषों के प्रति घृणा का भाव रखती हैं।उन्हें मानो पुरुष चाहिए ही नहीं।वे पुरुषवादी दृष्टिकोण से नफरत करने के क्रम में पुरुष से ही नफरत करने लगी हैं।पुरुष का हर रवैया उसे नापसंद है कुलमिलाकर वह स्त्रीवादी समाज में पुरुष […] Read more »
आलोचना महत्वपूर्ण लेख हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचक औैर बुद्धिजीवी January 13, 2013 / January 13, 2013 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 2 Comments on हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचक औैर बुद्धिजीवी पाण्डेय शशिभूषण ‘शीतांशु’ हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचकों ने पिछले पचास वर्षों में साहित्य की भावनक्षमता और पाठकीय संवेदनशीलता को कुंठित-अवरोधित ही किया है। इन सब ने साहित्य को वाद-विवाद और संवाद के नाम पर बहस का विषय तो बना दिया है, पर साहित्य में डूबकर, गहरे पैठकर प्राप्त की जाने वाली पाठकीय सर्जनात्मकता और उसके […] Read more » आलोचक बुद्धिजीवी मार्क्सवादी आलोचना
आलोचना दान : उपकार या पाखण्ड December 1, 2012 / December 1, 2012 by निर्मल रानी | Leave a Comment निर्मल रानी विश्वस्तर पर गरीबों, असहायों तथा शारीरिक व मानसिक रूप से असहाय लोगों की सेवा करने हेतु तरह-तरह के निजी व स्वयंसेवी संगठन कार्य कर रहे हैं। दुनिया में बड़े से बड़े दानी सज्जनों का भी एक ऐसा वर्ग है जो इस प्रकार के बेसहारा व कमज़ोर वर्ग के लोगों के कल्याण के लिए […] Read more » charity
आलोचना मैत्रेयी पुष्पा के बहाने स्त्री आत्मकथा के पद्धतिशास्त्र की तलाश November 29, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment जगदीश्वर चतुर्वेदी आत्मकथा में सब कुछ सत्य नहीं होता बल्कि इसमें कल्पना की भी भूमिका होती है। आत्मकथा या साहित्य में लेखक का ‘मैं’ बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह ‘बहुआयामी होता है। उसी तरह लेखिका की आत्मकथा में ‘मैं’ का एक ही रूप नहीं होता। बल्कि बहुआयामी ‘मैं’ होता है। मैत्रेयी पुष्पा के […] Read more » गुडि़या भीतर गुडि़या मैत्रेयी पुष्पा
आलोचना समाज राम बनाम राम जेठामलानी November 24, 2012 / November 24, 2012 by वीरेंदर परिहार | 7 Comments on राम बनाम राम जेठामलानी वीरेन्द्र सिंह परिहार देश के ख्याति-लब्ध अधिवक्ता और भाजपा के राज्यसभा सासंद रामजेठामलानी का गत दिनों का यह कथन काफी तूल पकड़ चुका है कि राम एक बुरे पति थें। गीता में कृष्ण ने कहा है-बड़े लोग जैसा आचरण करते है,आम लोग उसका अनुकरण करते है। अब जहां तक राम के सीता-निष्कासन का प्रश्न है,वह […] Read more » राम राम जेठामलानी
आलोचना हाँ जी, हाँ जी ही नहीं करते रहें November 13, 2012 / November 12, 2012 by डॉ. दीपक आचार्य | 1 Comment on हाँ जी, हाँ जी ही नहीं करते रहें हाँ जी, हाँ जी ही नहीं करते रहें कभी सच भी कहने का साहस जुटाएँ डॉ. दीपक आचार्य 9413306077 आजकल बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोगों का जमघट लगा हुआ है जो हमेशा हर काम में हाँ जी, हाँ जी करते रहने के आदी हो गए हैं। इन लोगों को इस बात से कोई सरोकार […] Read more »
आलोचना जो लूट सके तो लूट ! July 16, 2012 / July 16, 2012 by जावेद उस्मानी | 1 Comment on जो लूट सके तो लूट ! जावेद उस्मानी भला हो सूचना के अधिकार कार्यकर्ता एस सी अ्रग्रवाल का जिन्होने एक बहुत अहम मुकाम पर ऐसी जानकारी निकाली जिसकी इस समय बहुत जरुरत थी। यह सूचना, इसका संकेत है कि, देश बड़ी तेज़ी से दो वर्गों में बंटता जा रहा है जिसका एक छोर स्वर्ग है तो दूसरा छोर नरक है। जाहिर […] Read more »
आलोचना होने लगी है आशीर्वादों की बारिश July 14, 2012 / July 13, 2012 by डॉ. दीपक आचार्य | Leave a Comment डॉ. दीपक आचार्य होने लगी है आशीर्वादों की बारिश हर कोई पा लेता है आशीर्वाद आजकल आशीर्वाद देना और पाना सबसे सस्ता और सहज काम हो गया है। आशीर्वाद पाने के लिए उतावले लोगों की जितनी भीड़ है उससे कहीं ज्यादा भीड़ आशीर्वाद देने को व्यग्र बैठे लोगों की है। आशीर्वाद देने और पाने वाले […] Read more » आशीर्वादों की बारिश
आलोचना पाखंडी अध्यात्मवादियों’ को बढ़ावा देने की जनता भी ज़िम्मेदार July 13, 2012 / July 12, 2012 by निर्मल रानी | 2 Comments on पाखंडी अध्यात्मवादियों’ को बढ़ावा देने की जनता भी ज़िम्मेदार निर्मल रानी जिस युग में भारतवर्ष को विश्वगुरु कहा जाता था उस समय भी शायद इस देश में इतने तथाकथित ‘गुरु’ नहीं रहे होंगे जितने कि अब देखे जा रहे हैं। टीवी चैनल्स ने इनकी ‘दुकानदारी’ कुछ ज़्यादा ही बढ़ा दी है। जिसे देखो वही अध्यात्म की अपनी अलग दुकान सजाए बैठा है। इस प्रकार […] Read more »
आलोचना साहित्य में घिसापिटापन और अशोक वाजपेयी की नकली चिन्ताएं June 18, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on साहित्य में घिसापिटापन और अशोक वाजपेयी की नकली चिन्ताएं जगदीश्वर चतुर्वेदी आलोचक अशोक वाजपेयी को यह इलहाम हुआ है कि हिन्दी की गोष्ठियों में घिसापिटापन होता है। सवाल यह है कि उस घिसेपिटेपन से बचने के लिए हिन्दी के प्रायोजकों और गुटबाज लेखकों ने क्या किया ?पहले अशोक वाजपेयी की महान खोज पर ध्यान दें। उन्होंने लिखा है- “हम सभी इसके दोषी हैं। हिंदी […] Read more » अशोक वाजपेयी
आलोचना परवर्ती पूंजीवाद और साहित्येतिहास-भाग-2 May 28, 2012 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment जगदीश्वर चतुर्वेदी उत्तर आधुनिकतावादी विकास का प्रधान लक्षण है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार,नेताओं में संपदा संचय की प्रवृत्ति, अबाधित पूंजीवादी विकास,उपभोक्तावाद की लंबी छलांग और संचार क्रांति। इन लक्षणों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी। सोवियत संघ और उसके अनुयायी समाजवादी गुट का पराभव एक ही साथ हुआ। सामान्य तौर इस पराभव को मीडिया में साम्यवाद […] Read more »