कविता अपना आपा खो दॅू February 3, 2020 / February 3, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment अपने घर -परिवार के लिये, अपने सगे संबंधियों के लिये अपने समाज व देश के लिये मैं जीना चाहता हॅू सभी के लिये इस हद तक, कि अपना आपा खो दॅू। मैं अपने सारे स्वार्थो के बिना मैं अपने सारे हितों के बिना दूसरों के लिये अपना सारा जीवन जीना चाहता हॅू इस हद तक, […] Read more » अपना आपा खो दॅू
कविता आया बसन्त January 29, 2020 / January 29, 2020 by शकुन्तला बहादुर | 1 Comment on आया बसन्त Read more » आया बसन्त
कविता सुभाष चन्द्र बोष जी की जयंती पर January 24, 2020 / January 24, 2020 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment तुम मुझको दो खून अपना , मै तुमको दे दूंगा आजादी | यही सुनकर देश वासियों ने, अपनी जान की बाजी लगा दी || यही सुभाष का नारा था , जिसने धूम मच दी थी | इसी विश्वास के कारण ही उसने हिन्द फ़ौज बना दी थी || याद करो 23 जनवरी 1897 को जब […] Read more » सुभाष चन्द्र बोष जी की जयंती पर
कविता यह खूनी सड़क January 16, 2020 / January 16, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment मेरे शहर की यह शांतचित्त सड़क कभी बहुत खिलखिलाया करती थी बचपन में इसके तन पर हम खेला करते थे गिल्लीडंडा तब कभी कभार दिन में दो-चार बसें और इक्का-दुक्का वाहन भोंपू बजाकर सड़क से गुजर जाते थे। पूरे शहर के हर मोहल्ले के बच्चे इस सड़क पर इकटठा होते और कोई गिल्लीडंडा खेलता तो […] Read more » गिल्लीडंडा
कविता सीख देती चीटियाॅ January 16, 2020 / January 16, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव कभी चीटियों को देखों मुॅह मिलाकर प्रेम करती है अंजान चीटी से पहचानकर नेह का यह मिलाप असीम अपनत्व का इजहार है वे मुॅह मिलाकर एक दूसरे को आभार व्यक्त करने के साथ नमस्कार करती है। कभी चीटी जैसे किसी जीव का ओढ़ना-बिछाना, चैका-चूल्हा थाली बघौनी देखी है किस रंग के होते […] Read more » सीख देती चीटियाॅ
कविता खानावदोश झुग्गिया January 14, 2020 / January 15, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment भारत के हर शहर में होती है अछूत झुग्गियाॅ बसाहट से दूर किसी भी सड़क के किनारे खास मौके पर चार खूटियों और तिरपाल से तन जाती है दर्जनों झुग्गियाॅ। ये वे अछूत झुग्गियाॅ है जिनमें रहने वाले गरीब दो वक्त की रोटी कमाने हर शहर की गली-कूंचे में घरों-महलों की सजावट का सामान बेचते […] Read more » खानावदोश झुग्गिया
कविता बुढ़ापे पर सवार अजगर January 14, 2020 / January 15, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव बड़ी मासूमियत से बुजुर्ग पिता ने कहा- बेटा] बुढ़ापा अजगर सा आकर मेरे बुढ़ापे पर सवार हो गया है जिसने जकड़ रखे है मेरे हाथ पैर न चलने देता है न उठने-बैठने देता है। बेटा, मेरे बाद तेरी माँ को अपने ही पास रखना। पिता के चेहरे पर पॅसरी हुई थी उदासी […] Read more » बुढ़ापे पर सवार अजगर
कविता सोफे का दर्द January 14, 2020 / January 20, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव मैं अपने सोफे पर बैठा मोबाईल में डूबा हुआ था और ढूंढ रहा था पसंद की रिंगटोन चिड़ियों की चहकने-फुदकने कोयल-बुलबुल की बोलियाॅ गिलहरियों सहित अनेक कर्णप्रिय आवाजें मुझे जंगल के खग-मृग का मधुर कलरव सा आनंद दे रही थी। अचानक मेरी तंद्रा टूटी जैसे लगा कि मेरा सोफा मुझसे कुछ बातें […] Read more » सोफे का दर्द
कविता मानव ही मानवता को शर्मसार करता है January 14, 2020 / January 14, 2020 by आलोक कौशिक | Leave a Comment मानव ही मानवता को शर्मसार करता है सांप डसने से क्या कभी इंकार करता है उसको भी सज़ा दो गुनहगार तो वह भी है जो ज़ुबां और आंखों से बलात्कार करता है तू ग़ैर है मत देख मेरी बर्बादी के सपने ऐसा काम सिर्फ़ मेरा रिश्तेदार करता है देखकर जो नज़रें चुराता था कल तलक […] Read more » Only man shames mankind मानवता को शर्मसार
कविता कहाँ गये भवानीप्रसाद मिश्र के ऊँघते अनमने जंगल January 14, 2020 / January 14, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment भवानीप्रसाद मिश्र ने देखे थे सतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे हुये मिले थे वे उॅघते अनमने जंगल। झाड़ ऊॅचे और नीचे जो खड़े थे अपनी आंखे मींचे जंगल का निराला जीवन मिश्रजी ने शब्दो में उलींचें। मिश्र की अमर कविता बनी सतपुड़ा के घने जंगल आज ढूंढे नहीं मिलते सतपुड़ा की गोद में […] Read more » ऊँघते अनमने जंगल
कविता सरस्वती वंदना January 13, 2020 / January 13, 2020 by आलोक कौशिक | Leave a Comment हम मानुष जड़मति तू मां हमारी भारती आशीष से अपने प्रज्ञा संतति का संवारती तिमिर अज्ञान का दूर करो मां वागीश्वरी आत्मा संगीत की निहित तुझमें रागेश्वरी वाणी तू ही तू ही चक्षु मां वीणा-पुस्तक-धारिणी तू ही चित्त बुद्धि तू ही कृपा करो जगतारिणी विराजो जिह्वा पे धात्री हे देवी श्वेतपद्मासना क्षमा करो अपराधों को […] Read more » सरस्वती वंदना
कविता साहित्य काश हर घर आँगन हो January 10, 2020 / January 10, 2020 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment कितना अच्छा था जब हम बच्चे थे तब घर के आँगन में इकट्ठा हो जाता था पूरा परिवार। कैलाश,शंकर, विनिया चन्दा आँगन में खूब मस्ती करते थे तब आँगन किसी खेल के मैदान से कमतर नहीं था जिसमें समा जाता था सारा मोहल्ला घर-द्वार। मकान से जुड़ा हुआ आँगन आँगन से बाहर तक घर का […] Read more »