कविता प्रवक्ता न्यूज़ विविधा ||| आओ सजन ||| August 14, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन ! तेरे दर्शन को तरसे है ; मेरे भीगे नयन ! घर , दर सहित सजाया है ; अपने मन का आँगन !! आओ सजन , अब तो मेरे घर आओ सजन !!! तू नहीं तो जग , क्यों सूना सूना सा लगता है ! तू […] Read more » आओ सजन
कविता विविधा जोगन August 5, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे ! तेरे बिन कोई नहीं मेरा रे ; हे श्याम मेरे !! मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे ! तेरी बंसुरिया की तान बुलाये मोहे सब द्वारे छोड़कर चाहूं सिर्फ तोहे तू ही तो है सब कुछ रे , हे श्याम मेरे ! […] Read more »
कविता ||| एक नज़्म : सूफी फकीरों के नाम || August 3, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on ||| एक नज़्म : सूफी फकीरों के नाम || कोई पूछे की मैं हूँ कौन लोग कहते है की बावरा हूँ तेरी मोहब्बत में लोग कहते है की आवारा फिरता हूँ तेरी मोहब्बत में लोग कहते है की जुनूने साये में रहता हूँ तेरी मोहब्बत में ;सच कहता हूँ की क़यामत आये और मैं तुझसे मिल जाऊं तुझमे मिल जाऊं एक बार एक पर्वत […] Read more » सूफी फकीरों के नाम
कविता विविधा ||| आहट ईश्वर की ……!!! ||| August 3, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment ये कैसी अजनबी आहट है .. कौन है यहाँ , किसकी आहट है ये … जो मन में नए भाव जगा रही है . ये तो तुम हो मेरे प्रभु…. हे मेरे मनमंदिर के देवता कबसे तुझसे मिलने की प्यास थी मन में . आज एक पहचानी सी आहट आई तो देखा की तुम थे […] Read more » ||| आहट ईश्वर की ......!!! |||
कविता गन्दी बस्ती July 31, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार अन्त:विचारों में उलझा न जाने कब मैं एक अजीब सी बस्ती में आ गया । बस्ती बड़ी ही खुशनुमा और रंगीन थी । किन्तु वहां की हवा में अनजान सी उदासी थी । खुशबुएं वहां की मदहोश कर रहीं थीं । पर एहसास होता था घोर बेचारगी का टूटती सांसे जैसे फ़साने बना […] Read more » गन्दी बस्ती
कविता आने दो दुनिया में July 13, 2015 / July 13, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो प्रतिमा शुक्ला बन रहा हैं एक जीवन आने को तैयार है एक जीवन सोच रहीं है उस पल को जब लेगी मां हाथों में जाग्रत होगा उसका मातृत्व बन जायेगी वह ममता की मूरत अचानक हुई कुछ हलचल शायद थी मशीनों की ध्वनि सहम गयी वह टूट गया उसका सपना पूछ रही है वह मां […] Read more »
कविता योग की महिमा July 1, 2015 by विमलेश बंसल 'आर्या' | Leave a Comment -विमलेश बंसल ‘आर्या’ योग ऋत है , सत् है, अमृत है। योग बिना जीवन मृत है।। 1. योग जोड़ है, वेदों का निचोड़ है। योग में ही व्याप्त सूर्य नमस्कार बेजोड़ है।। 2. योग से मिटती हैं आधियाँ व्याधियाँ। योग से मिटती हैं त्वचा की कोढ़ आदि विकृतियां।। 3. योग जीवन को जीने की जडी […] Read more » योग की महिमा
कविता विविधा उड़ान June 19, 2015 / June 19, 2015 by श्रद्धा सुमन | Leave a Comment कोई बता दे मुझे मेरी पहचान क्या है हूँ दीया कि बाती, या फिर उसकी पेंदी का अंधकार, हूँ तिलक उनकी ललाट पर या बस म्यान में औंधी तलवार… है आज द्वंद उठी, आंधी सवालों की एक हूक थी दबी जो अब मार रही चित्कार… हूँ कलश पल्लव से ढ़की, या बस चरणोदक या फिर […] Read more » Featured उड़ान
कविता आज भी न बरसे कारे कारे बदरा June 13, 2015 by श्रीराम तिवारी | Leave a Comment -श्रीराम तिवारी- आज भी न बरसे कारे कारे बदरा, आषाढ़ के दिन सब सूखे बीते जावे हैं । अरब की खाड़ी से न आगे बढ़ा मानसून , बनिया बक्काल दाम दुगने बढ़ावे है। वक्त पै बरस जाएँ कारे–कारे बदरा , दादुरों की धुनि पै धरनि हरषावे है।। कारी घटा घिर आये ,खेतों में बरस जाए , सारंग की धुनि संग सारंग भी गावै है। बोनी की बेला में जो देर करे […] Read more » Featured आज भी न बरसे कारे कारे बदरा कविता बारिश कविता
कविता परिंदे June 10, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -मनोज चौहान- 1) कविता / परिंदे मैं करता रहा, हर बार वफा, दिल के कहने पर, मुद्रतों के बाद, ये हुआ महसूस कि नादां था मैं भी, और मेरा दिल भी, परखता रहा, हर बार जमाना, हम दोनों को, दिमाग की कसौटी पर । ता उम्र जो चलते रहे, थाम कर उंगली, वो ही […] Read more » Featured कविता परिंदे
कविता मौत एक गरीब की June 10, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 3 Comments on मौत एक गरीब की -मीना गोयल ‘प्रकाश’- कुछ वर्ष पहले हुई थी एक मौत… नसीब में थी धरती माँ की गोद … माँ का आँचल हुआ था रक्त-रंजित… मिली थी आत्मा को मुक्ति… सुना है आज अदालत में भी… हुई हैं कुछ मौतें… है हैरत की बात… नहीं हुई कोई भी आत्मा मुक्त… होती है मुक्त आत्मा… मर […] Read more » Featured कविता मौत एक गरीब की
कविता मां June 8, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment -विजय कुमार सप्पाती- “माँ / तलाश” माँ को मुझे कभी तलाशना नहीं पड़ा; वो हमेशा ही मेरे पास थी और है अब भी .. ! लेकिन अपने गाँव/छोटे शहर की गलियों में , मैं अक्सर छुप जाया करता था ; और माँ ही हमेशा मुझे ढूंढ़ती थी ..! और मैं छुपता भी इसलिए था […] Read more » Featured कविता मां मां कविता मां पर कविता