कविता ब्रह्मनाद और स्मृतियाँ March 8, 2013 / March 8, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment एक शिरा दो धमनियां तीन स्पंदन इन सभी का एक छोटा सा बुलबुला और तुम्हारें मेरें प्यार के बड़े होते संसार में बची कुछ अनुभूतियाँ. जिजीविषा के साथ जीवन को जी लेती स्मृतियां और इन सभी के सान्निध्य को लिए कहीं दूर से होते, आते, पुकारतें आकाश गंगा के जैसे अनवरत, अक्षुण्ण, अनाकार, अनंत ब्रह्मनाद. […] Read more » ब्रह्मनाद और स्मृतियाँ
कविता मेरी जीवन रामायण में March 6, 2013 / March 8, 2013 by मनोज नौटियाल | 1 Comment on मेरी जीवन रामायण में मनोज नौटियाल मेरी जीवन रामायण में एक अकेला मै वनवासी मै ही रावण मै ही राघव द्वन्द भरी लंका का वासी कभी अयोध्या निर्मित करने की मन में अभिलाषा आये डूब गयी वह विषय सिन्धु में ,जब तक निर्मित हुयी ज़रा सी || सुख -दुःख की आपाधापी में जीवन की परिभाषा डोले मन की […] Read more »
कविता मैं March 5, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment मैं चुप रहता हूँ कुछ भी काम नहीं करता सिर्फ सपने बुनता हूँ अकेला दौड़ता रहता हूँ धूल भरी मेड़ों पर । मैं खो जाता हूँ देर तक कविताओं में और डूबता-उबरता हूँ उन कविताओं के स्पंदन में । मैं नहीं चाहता हूँ विष बोना आदमियत की मिट्टी में । मैं यही […] Read more » मैं
कविता चाय March 5, 2013 / March 5, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on चाय नींद खुलते ही चाय जो मिल जाय, पूरा दिन अच्छा ही अच्छा जाय। नाश्ते के साथ भी चाय ज़रूरी है, चाय के बिना कहानी ही अधूरी है। महमान आ जाय,फिर चाय हो जाय, महमान चाय पिये बिन जाने न पाय। चाय भी कौन अकेली ही पी जाय, नमकीन और कुकी हों तो मज़ा आ जाय। […] Read more » चाय
कविता तूम और तेरा साथ March 5, 2013 / March 5, 2013 by ऋषभ कुमार सारण | Leave a Comment ऋषभ कुमार सारण कर जातें है, कतल वो, नजराने तेरी आँखों के, अफसाने तेरे उन लफ्जातों के, आ जाती हो जब तुम, दरमियां मेरे उन सपनों के, कर अहसास तेरे दामन का, एक लम्हा सा जी जाता हूँ ! मेरी इस तन्हाई में भी, यूँ बस जन्नत सी पा जाता हूँ !! सुनता हूँ […] Read more » तूम और तेरा साथ
कविता “आँखे, झरोखें और उष्मा” March 3, 2013 by प्रवीण गुगनानी | Leave a Comment कुछ आँखें थी सपनों को भरे अपने आगोश में. कुछ झरोखें थे जो पलकों के साथ हो लेते थे यहाँ वहां. आँखें झरोखों से आती किरणों में अक्सर तलाशती थी उष्मा को. बर्फ हो गए सपनों के संसार में उष्मा की छड़ी लिए चल पड़ती थी आँखें और बर्फ से करनें लगती थी वो संघर्ष […] Read more » “आँखे झरोखें और उष्मा”
कविता पाषाण-मूर्ति February 24, 2013 / February 24, 2013 by विजय निकोर | 4 Comments on पाषाण-मूर्ति मैं पाषाण-मूर्ति-सी खड़ी रही, तुम असीम नम्रता के प्रतीक पेड़ की शाख़ा-से झुके रहे, और हर बार और भी झुकते गए। तुम्हारी स्नेह-दृष्टि अनुकंपा-सरोवर, तुम्हारे बोल संवेदना से भरपूर , शब्द मख़मली, मैं अनजाने में कभी बे-मुरव्वत कभी जाने में बेलिहाज़ , तुम अकृत्रिम, अप्रभावित सदैव विनम्र रहे, निरहंकार रहे , और इसीलिए अब […] Read more »
कविता ‘वो हिन्दू थे ‘ February 23, 2013 / February 23, 2013 by सुधीर मौर्य 'सुधीर' | 3 Comments on ‘वो हिन्दू थे ‘ सुधीर मौर्य ‘सुधीर’ उन्होंने विपत्ति को आभूषण की तरह धारण किया उनके ही घरों में आये लोगों ने उन्हें काफ़िर कहा क्योंकि वो हिन्दू थे। उन्होंने यूनान से आये घोड़ो का अभिमान चूर – चूर कर दिया सभ्यता ने जिनकी वजह से संसार में जन्म लिया वो हिन्दू थे। जिन्होंने तराइन के […] Read more » 'वो हिन्दू थे '
कविता एहसास ‘आधुनिकता’ का February 20, 2013 / February 20, 2013 by ऋषभ कुमार सारण | 1 Comment on एहसास ‘आधुनिकता’ का ऋषभ कुमार सारण थके हारे काम से आकर, एक कोरे कागज को तख्ती पे लगाया, मन किया कागज की सफेदी को अपने ख्वाबों से रंगने को, उंगिलया मन की सुन के चुपचाप लिखने लगी, और लेखनी भी कदम से कदम लाने लगी, पर दिमाग “डिक्शनरी” में लफ़्ज ढूंढ़ रहा था ! और मेरा “जिया” […] Read more » एहसास ‘आधुनिकता’ का
कविता कविता – अस्तित्व February 20, 2013 / February 20, 2013 by मोतीलाल | Leave a Comment घुप्प अंधेरे में टिमटिमाता है एक दीया मेरे कमरे में । जानता हूँ अच्छी तरह नहीं मिटा सकती अंधेरे को उसकी रोशनी । उधर चाँद झांकता है और कतरा-दर-कतरा घुसता है उसकी रोशनी मेरे अंधेरे कमरे में । फिरभी नहीं मिटता अंधेरा और मैं टटोलता हूँ दो दिन की पड़ी बासी रोटी […] Read more » कविता - अस्तित्व
कविता दूरियों की दूरी February 18, 2013 / February 18, 2013 by विजय निकोर | Leave a Comment विजय निकोर मंज़िल की ओर बढ़ने से सदैव दूरियों की दूरी … कम नहीं होती। बात जब कमज़ोर कुम्हलाय रिश्तों की हो तो किसी “एक” के पास आने से, नम्रता से, मित्रता का हाथ बढ़ाने से, या फिर भीतर ही भीतर चुप-चाप अश्रुओं से दामन भिगो लेने से रिश्ते भीग नहीं जाते, उनमें पड़ी […] Read more » दूरियों की दूरी
कविता मैने कहाँ मांगा था… February 10, 2013 by बीनू भटनागर | 2 Comments on मैने कहाँ मांगा था… मैने कहाँ मांगा था सारा आसमा, दो चार तारे बहुत थे मेरे लियें, दो चार तारे भी नहीं मिले तो क्या.. चाँद की चाँदनी तो मेरे साथ है। मैने नहीं माँगा था कभी इन्द्रधनुष, जीवन मे कुछ रंग होते बहुत था, दो रंग भी नहीं मिला तो क्या.. श्वेत-श्याम ही बहुत हैं मेरे लियें। […] Read more » मैने कहाँ मांगा था...