कविता साहित्य कविता ; बिटिया – प्रभुदयाल श्रीवास्तव February 1, 2012 / February 1, 2012 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | 6 Comments on कविता ; बिटिया – प्रभुदयाल श्रीवास्तव इधर रोये बिटिया उधर रोये बिटिया पढ़ पढ़ के पा पा की प्यारी सी चिठिया| भईयों ने अपनी गृहस्थी सजा ली पापा से सबने ही दूरी बना ली अम्मा की तबियत हुई ढीली ढाली उन्हें अब डराती है हर रात काली सुबह शाम हाथों से खाना बनाना धोना है बरतन और झाड़ू लगाना जीने का […] Read more » daughter girls बिटिया
कविता साहित्य कविता ; लेन देन – दीपक खेतरपाल February 1, 2012 / February 1, 2012 by दीपक खेतरपाल | Leave a Comment लगती थी साथ साथ सीमा गांव और शहर की पर दोनों थे अलग अलग हवा शहर की एक दिन कर सीमा पार पंहुच गई गांव में और छोड़ आई वहां आलस्य फरेब मक्कारी आंकाक्षाएं महत्वआंकाक्षाएं बदले में ले आई निश्छलता निष्कपटता निस्वार्थ व्यव्हार पर इस लेन देन के बाद गांव गांव न रहा और ठुकरा […] Read more » city poem village कविता लेन देन
कविता व्यंग्य साहित्य व्यंग्य कविता ; काम वालियां – प्रभुदयाल श्रीवास्तव January 30, 2012 / January 29, 2012 by प्रभुदयाल श्रीवास्तव | Leave a Comment काम वालियां नहीं कामपर बर्तन वाली दो दिन से आई इसी बात पर पति देव पर पत्नि चिल्लाई काम वालियां कभी समय पर अब न आ पातीं न ही ना आने का कारण खुलकर बतलातीं बिना बाइयों के घर तो कूड़ाघर हो जाता बड़ी देर से कठिनाई से सूर्य निकल पाता छोटी बच्ची गिरी फिसल […] Read more » poem vyangya काम वालियां व्यंग्य कविता
कविता विपिन किशोर सिन्हा की कविता : वसन्त January 29, 2012 / January 29, 2012 by विपिन किशोर सिन्हा | 1 Comment on विपिन किशोर सिन्हा की कविता : वसन्त झीने कोहरे की साड़ी का अवगुंठन सूर्य उठाता था, पोर-पोर में मस्ती भर जब पवन जगाने आता था। आम्र-कुन्ज में बौरों पर, भौंरे संगीत सुनाते थे, पंचम स्वर में श्यामल कोयल के गीत उभरते जाते थे। रक्त-पुष्प झूमे पलाश, सम्मोहित करते दृष्टि को, रसभरे फूल महुआ के गिर, मदहोश बनाते सृष्टि को। फूली सरसों ने […] Read more » बसंत
कविता साहित्य कविता : “विद्या बालन के लिए गीतों को गाना चाहती हूँ” – कृष्णमूर्ति January 28, 2012 / January 28, 2012 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment कविता कृष्णमूर्ति की आवाज में ऐसी कशिश है कि उसे सुन कर कोई भी उनकी आवाज का दीवाना बने हुए नही रह सकता. आज कल कविता फिल्मों में न के बराबर ही गा रही हैं. बहुत दिनों के बाद उनकी आवाज फिल्म “रॉक स्टार” के गीत “तुम हो पास मेरे” में सुनाई दी. पिछले दिनों […] Read more » poem Vidya Balan कविता विद्या बालन
कविता कविता : अलविदा– विजय कुमार January 27, 2012 / January 25, 2012 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment सोचता हूँ जिन लम्हों को ; हमने एक दूसरे के नाम किया है शायद वही जिंदगी थी ! भले ही वो ख्यालों में हो , या फिर अनजान ख्वाबो में .. या यूँ ही कभी बातें करते हुए .. या फिर अपने अपने अक्स को ; एक दूजे में देखते हुए हो …. […] Read more » famous poems Hindi Poem poems by Vijay kumar कविता कविताएं विजय कुमार विजय कुमार की कवितायें श्रेष्ठ कविताएं हिन्दी कविता
कविता कविता : देह – विजय कुमार January 26, 2012 / January 25, 2012 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment देह के परिभाषा को सोचता हूँ ; मैं झुठला दूं ! देह की एक गंध , मन के ऊपर छायी हुई है !! मन के ऊपर परत दर परत जमती जा रही है ; देह …. एक देह , फिर एक देह ; और फिर एक और देह !!! देह की भाषा […] Read more » famous poems Hindi Poem poems by Vijay kumar कविता कविताएं विजय कुमार विजय कुमार की कवितायें श्रेष्ठ कविताएं हिन्दी कविता
कविता कविता : मेरा होना और न होना – विजय कुमार January 25, 2012 / January 23, 2012 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment मेरा होना और न होना …. उन्मादित एकांत के विराट क्षण ; जब बिना रुके दस्तक देते है .. आत्मा के निर्मोही द्वार पर … तो भीतर बैठा हुआ वह परमपूज्य परमेश्वर अपने खोलता है नेत्र !!! तब धरा के विषाद और वैराग्य से ही जन्मता है समाधि का पतितपावन सूत्र […] Read more » famous poems Hindi Poem poems by Vijay kumar कविता कविताएं विजय कुमार विजय कुमार की कवितायें श्रेष्ठ कविताएं हिन्दी कविता
कविता कविता:जोगन-विजय कुमार January 24, 2012 / January 23, 2012 by विजय कुमार सप्पाती | 1 Comment on कविता:जोगन-विजय कुमार मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे ! तेरे बिन कोई नहीं मेरा रे ; हे श्याम मेरे !! मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे ! तेरी बंसुरिया की तान बुलाये मोहे सब द्वारे छोड़कर चाहूं सिर्फ तोहे तू ही तो है सब कुछ रे , हे श्याम मेरे […] Read more » famous poems Hindi Poem poems by Vijay kumar कविता कविताएं विजय कुमार विजय कुमार की कवितायें श्रेष्ठ कविताएं हिन्दी कविता
कविता कविता:एक स्त्री जो हूँ-विजय कुमार January 23, 2012 / January 23, 2012 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment स्त्री – एक अपरिचिता मैं हर रात ; तुम्हारे कमरे में आने से पहले सिहरती हूँ कि तुम्हारा वही डरावना प्रश्न ; मुझे अपनी सम्पूर्ण दुष्टता से निहारेंगा और पूछेंगा मेरे शरीर से , “ आज नया क्या है ? ” कई युगों से पुरुष के लिए स्त्री सिर्फ भोग्या ही रही मैं […] Read more » famous poems Hindi Poem poems by Vijay kumar कविता कविताएं विजय कुमार विजय कुमार की कवितायें श्रेष्ठ कविताएं हिन्दी कविता
कविता ममता त्रिपाठी की कविता : सृष्टि January 22, 2012 / January 22, 2012 by ममता त्रिपाठी | 4 Comments on ममता त्रिपाठी की कविता : सृष्टि धन्य है तिमिर का अस्तित्व दीपशिखा अमर कर गया । धन्य है करुणाकलित मन हर हृदय में घर कर गया । ज्योति ज्तोतिर्मय तभी तक जब तक तिमिर तिरोहित नहीं । जगति का लावण्य तब तक जब तक नियन्ता मोहित नहीं । पंच कंचुक विस्तीर्ण जब तक तब तक सृष्टि प्रपञ्च साकार । बालुकाभित्ति […] Read more »
कविता कविता:तुम्हारा आना-विजय कुमार January 22, 2012 / January 21, 2012 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment कल खलाओं से एक सदा आई कि , तुम आ रही हो… सुबह उस समय , जब जहांवाले , नींद की आगोश में हो; और सिर्फ़ मोहब्बत जाग रही हो.. मुझे बड़ी खुशी हुई … कई सदियाँ बीत चुकी थी ,तुम्हे देखे हुए !!! मैंने आज सुबह जब घर से बाहर कदम रखा, तो […] Read more » famous poems Hindi Poem poems by Vijay kumar कविता कविताएं विजय कुमार विजय कुमार की कवितायें श्रेष्ठ कविताएं हिन्दी कविता