कविता सच हमेशा परेशान रहता April 17, 2021 / April 17, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकसच हमेशा परेशान रहता,सच हमेशा इम्तहान देता! कहने को तो कहा गया हैकि झूठ के पांव नहीं होते! पर झूठ की पहुंच लम्बी होती,झूठ की जाल बेमिसाल होती! एक सत्य के खिलाफ अनेकबार,झूठ बोले जाते बार-बार,लगातारकि झूठ मानता नहीं कभी हार! कहने को तो झूठ को पर नहीं होते,किन्तु झूठ बिना पर के […] Read more » सच हमेशा परेशान रहता
कविता धुएँ से धुआँ हुई है अब जिंदगी April 17, 2021 / April 17, 2021 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment धुएँ से धुआँ हुई है,अब जिंदगी ,तम्बाकू से बर्बाद हुई है जिंदगी |बचना चाहते हो अगर तुम इससे ,तम्बाकू छोड़ो बचा लो ये जिंदगी || धुआँ राख़ कर रहा है ये जिंदगी ,मिला रहा है ये ख़ाक में जिंदगी |बंद करो उड़ाना तुम इस धुएँ को ,वरना ख़त्म हो जायेगी ये जिंदगी || धुएँ से […] Read more » life has become smoky धुएँ से धुआँ हुई है अब जिंदगी
कविता कोरोना की दूसरी दस्तक…!!* April 17, 2021 / April 17, 2021 by संध्या शर्मा | Leave a Comment कोरोना की गतिफिर से तेज हैबुलेट ट्रेन की स्पीड लिए है।। बिना मास्क के पहने लोगइसे हरी झंडी दिखाएकोरोना दिन पे दिनबढ़ता जाए।। कोरोना की दूसरी लहर काखौफ बढ़ता जाएदिन दोगुनी उन्नति करता जाए।। रक्त बीज की तरहमुंह फैलाए,काल का ग्रास बनाए।। वैक्सिंग,मास्क ,शोशल डीस्टेंसिंग है असरदारीअव्यवस्था है इन पर भारी।। बढ़ती जाए अस्पतालों में […] Read more » कोरोना की दूसरी दस्तक
कविता बच्चों का पन्ना मै हूं एक मिट्टी का घड़ा April 15, 2021 / April 15, 2021 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मै हूं एक मिट्टी का घड़ा,सड़क के किनारे मै पड़ा।बुझाता हूं मै सबकी प्यास,कुम्हार मुझे लिए है खड़ा।। खुदाने से खोदकर मिट्टी लाता है,तब कहीं कुम्हार मुझे बनाता है।बड़ी मेहनत से सुखा तपा कर,तब कहीं वह मुझे बाजार लाता है।। बुझाता हूं प्यासे की प्यास मै ही,कुम्हार के बच्चो का पेट पालता हूं।कहता नहीं मै […] Read more » मै हूं एक मिट्टी का घड़ा
कविता तुम राम हो और रावण भी April 15, 2021 / April 15, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | 2 Comments on तुम राम हो और रावण भी —विनय कुमार विनायकमैं कहता हूंतुम राम हो और रावण भी,कि गलतियां करने के पहलेडर जाते हो पिता को यादकरखबरदार की तरह सामने देखकरकि तुम हो राम होने की ओर अग्रसर! कोई झूठ बोलने के पहले होंठोंऔर गाल पर टिक जाती तर्जनी अंगुलीअपनी प्यारी सी भोली मां की तरहऔर याद आ जाती मां की हर सीखकि […] Read more » तुम राम हो और रावण भी
कविता अजब की शक्ति है तुलसी की राम भक्ति में April 14, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकहरि कीर्तन करने,भजन गाने,रब का सिमरन करनेया नमाज पढ़ने जैसा नहीं है कविताओं का लेखन!क्योंकि बंधी-बंधाई कोई विचार होती नहीं कविता! एक प्रेमिका के होने/नहीं होने सेया एक रात पत्नी का साथ, रहने/नही रहने से,जब बदल जाती अनायास मानवीय विचारधारा,तब तत्क्षण जन्म होता है रामाश्रयी शाखा का;एक मर्यादावादी भक्त महाकवि तुलसीदास का,पन्द्रह सौ […] Read more » तुलसी की राम भक्ति
कविता आओ अपना नववर्ष मनाएं April 12, 2021 / April 12, 2021 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment आओ हम सब मिलकर अपना नववर्ष मनाएं।घर घर हम सब मिलकर नई बंदनवार लगाए। करे संचारित नई उमंग घर घर सब हम,फहराए धर्म पताका अपने घर घर हम।करे बहिष्कार पाश्चातय सभ्यता का हम,अपनी सभ्यता को आज से अपनाए हम।आओ सब मिलकर नववर्ष का दीप जलाएआओ हम सब मिलकर अपना नववर्ष मनाए,घर घर हम सब मिलकर […] Read more » आओ अपना नववर्ष मनाएं
कविता पागल लड़की April 12, 2021 / April 12, 2021 by मंजुल सिंह | Leave a Comment तुम चीजों कोढूंढ़ने के लिए रोशनी काइस्तेमाल करती होऔर वो गाँव की पागल लड़कीचिट्ठी कावो लिपती हैनीले आसमान कोऔर बिछा लेती हैधूप को जमीन पर वो अक्सर चाँद को सजा देती हैरात भर जागने कीवो बनावटी मुस्कान लिए,नाचती हैजब धानुक बजा रहे होते है मृदंग वो निकालती है कुतिया का दूधइतनी शांति से की बुद्ध […] Read more » पागल लड़की
कविता वो उतना ही पढ़ना जानती थी? April 12, 2021 / April 12, 2021 by मंजुल सिंह | Leave a Comment वो उतना ही पढ़ना जानती थी?जितना अपना नाम लिख सकेस्कूल उसको मजदूरो के कामकरने की जगह लगती थी!जहां वे माचिस की डिब्बियोंकी तरह बनाते थे कमरे,तीलियों से उतनी ही बड़ी खिड़कियांजितनी जहां से कोईजरुरत से ज्यादा साँस न ले सके!पता नहीं क्यों?एक खाली जगह और छोड़ी गयी थी!जिसका कोई उद्देश्य नहीं,इसलिए उसका उपयोगहम अंदर बहार […] Read more » वो उतना ही पढ़ना जानती थी?
कविता कलाइयों पर ज़ोर देकर ? April 11, 2021 / April 11, 2021 by मंजुल सिंह | Leave a Comment लोगइतने सारे लोगजैसे लगा होलोगो का बाजारजहां ख़रीदे और बेचेजाते है लोगकुछ बेबस,कुछ लाचारलेकिन सब हैहिंसक, जो चीखना चाहते हैज़ोर से, लेकिनभींच लेते है अपनीमुट्ठियां कलाइयों पर ज़ोर देकरताकि कोईदेख न सकेबस मेहसूस कर सकेहिंसा कोजो चल रही हैलोगो कीलोगो के बीच, मेंलोगो से? एक हिंसा तय हैलोगो के बीचजो खत्म कर रही हैकिसी तंत्र […] Read more » कलाइयों पर ज़ोर देकर ?
कविता हे राम… April 11, 2021 / April 11, 2021 by मंजुल सिंह | Leave a Comment राम तुम वन में रहो!राम तुम कौशल्या की कोख़ में रहो!राम तुम पिता के स्वभिमान में रहो!राम तुम सीता के तन-मन में रहो!राम तुम लक्ष्मण के अभिमान में रहो!राम तुम हनुमान के हृदय में रहो!राम तुम रावण के प्रतिशोध में रहो!राम तुम वानरो के दल में रहो!हे राम तुम “रामायण” में रहो!हे राम तुम “राम […] Read more » हे राम
कविता डॉक्टर और साहित्यकार April 9, 2021 / April 9, 2021 by मंजुल सिंह | 1 Comment on डॉक्टर और साहित्यकार सब बीमारियांअलसा कर बूढी हो गयी हैसब दवाईयाँ स्वर्ग चली गयी हैऔरकुछ डॉक्टरसाहित्यकार बन गए हैवो बीमारियों की किताब से चुराते हैअलंकारिक शब्दऔरमरी हुई कविता का करते हैपोस्टमार्टमऔर अपने शब्दों का भूसाभर कर के रिपोर्ट बना देते है औरकुछ साहित्यकारडॉक्टर बन गए हैजो अपनी प्रेम कविताओं से करते हैमौत का इलाजजरुरत के हिसाब से शरीर […] Read more » Doctor and litterateur डॉक्टर और साहित्यकार