कविता वो उतना ही पढ़ना जानती थी? April 12, 2021 / April 12, 2021 by मंजुल सिंह | Leave a Comment वो उतना ही पढ़ना जानती थी?जितना अपना नाम लिख सकेस्कूल उसको मजदूरो के कामकरने की जगह लगती थी!जहां वे माचिस की डिब्बियोंकी तरह बनाते थे कमरे,तीलियों से उतनी ही बड़ी खिड़कियांजितनी जहां से कोईजरुरत से ज्यादा साँस न ले सके!पता नहीं क्यों?एक खाली जगह और छोड़ी गयी थी!जिसका कोई उद्देश्य नहीं,इसलिए उसका उपयोगहम अंदर बहार […] Read more » वो उतना ही पढ़ना जानती थी?
कविता कलाइयों पर ज़ोर देकर ? April 11, 2021 / April 11, 2021 by मंजुल सिंह | Leave a Comment लोगइतने सारे लोगजैसे लगा होलोगो का बाजारजहां ख़रीदे और बेचेजाते है लोगकुछ बेबस,कुछ लाचारलेकिन सब हैहिंसक, जो चीखना चाहते हैज़ोर से, लेकिनभींच लेते है अपनीमुट्ठियां कलाइयों पर ज़ोर देकरताकि कोईदेख न सकेबस मेहसूस कर सकेहिंसा कोजो चल रही हैलोगो कीलोगो के बीच, मेंलोगो से? एक हिंसा तय हैलोगो के बीचजो खत्म कर रही हैकिसी तंत्र […] Read more » कलाइयों पर ज़ोर देकर ?
कविता हे राम… April 11, 2021 / April 11, 2021 by मंजुल सिंह | Leave a Comment राम तुम वन में रहो!राम तुम कौशल्या की कोख़ में रहो!राम तुम पिता के स्वभिमान में रहो!राम तुम सीता के तन-मन में रहो!राम तुम लक्ष्मण के अभिमान में रहो!राम तुम हनुमान के हृदय में रहो!राम तुम रावण के प्रतिशोध में रहो!राम तुम वानरो के दल में रहो!हे राम तुम “रामायण” में रहो!हे राम तुम “राम […] Read more » हे राम
कविता डॉक्टर और साहित्यकार April 9, 2021 / April 9, 2021 by मंजुल सिंह | 1 Comment on डॉक्टर और साहित्यकार सब बीमारियांअलसा कर बूढी हो गयी हैसब दवाईयाँ स्वर्ग चली गयी हैऔरकुछ डॉक्टरसाहित्यकार बन गए हैवो बीमारियों की किताब से चुराते हैअलंकारिक शब्दऔरमरी हुई कविता का करते हैपोस्टमार्टमऔर अपने शब्दों का भूसाभर कर के रिपोर्ट बना देते है औरकुछ साहित्यकारडॉक्टर बन गए हैजो अपनी प्रेम कविताओं से करते हैमौत का इलाजजरुरत के हिसाब से शरीर […] Read more » Doctor and litterateur डॉक्टर और साहित्यकार
कविता मानव सभ्यताएं April 9, 2021 / April 9, 2021 by मंजुल सिंह | Leave a Comment उसकी आँखे खुली थी या बंदये कह पाना मुश्किल सा ही थाक्योकि उसकी आँखो के बाहरबड़ी बड़ी तख्तियां लटक रही थीजिस पर लिखा था मानव सभ्यताएंउसकी नाक के नथुने इतने बड़े थेकी पूरी पृथ्वी समां जायेउसका मुँह ऐसा थाजैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सभ्यताओंको यही से निगला गया होआप उसकी गर्दन को लम्बा कहेंगेतो आपको नर्क […] Read more » मानव सभ्यताएं
कविता जिन्दगी क्या है April 8, 2021 / April 8, 2021 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment हर रात सुलझा कर सिरहाने रखते है जिंदगी।सुबह उठते ही उलझी पड़ी मिलती है जिंदगी।। सुलझा सुलझा कर थक जाते हैं हम ये जिंदगी।थकती नहीं ये जिंदगी,सुला देती हमें ये जिंदगी।। बेवफ़ा हम नहीं,बेवफ़ा हो जाती है ये जिंदगी।भरोसा इस पर कैसे करे,बे भरोसे है ये जिंदगी।। रंक से राजा बनाए राजा से रंक बनाती […] Read more » जिन्दगी क्या है
कविता मॉब लिंचिंग में मारी गयी पहली औरत April 8, 2021 / April 8, 2021 by मंजुल सिंह | 2 Comments on मॉब लिंचिंग में मारी गयी पहली औरत वो तो बस यू ही खड़ी थीवो न हिन्दू थी न मुसलमानऔर न ही किसी और समाज सेवो तो बस एक औरत थीजो खड़ी थीवो न तो कुछ चुरा कर भाग रही थीऔर न ही कुछ छिपा करवो तो बस अपने सपनों कोजगा कर भाग रही थीवो न तो अपने पसंद केमर्द के साथ भाग […] Read more » First woman killed in mob lynching मॉब लिंचिंग में मारी गयी पहली औरत
कविता वीवो आईपीएल 2021 April 7, 2021 / April 7, 2021 by प्रभात पाण्डेय | Leave a Comment सिक्सर कौन लगायेगाकौन नाम बनायेगाकिसके सिर पर सजेगा ताजयह अब तय हो जायेगासही गिरेगी गुगली या स्विच हिट लग जायेगाबाउंसर गुजरेगी कानों सेया हुक शॉट खेला जायेगाक्या गेंद रहेगी नीची या सिर से टकरायेगीक्या पिच लेगी स्पिन या ओस साथ निभायेगीकौन लक्ष्य को भेदेगा ,कौन जश्न मनायेगायह तो,वीवो आईपीएल ही बतायेगा ||क्या दिखेगी हिट मैन […] Read more » वीवो आईपीएल 2021
कविता तुम्हारा साथ April 6, 2021 / April 6, 2021 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मिला है जब से साथ तुम्हारा,मन के तार झंकृत होने लगे है।जो शब्द थे अंदर दिल में मेरे,वो अब सब बाहर आने लगे हैं।। सातों स्वर अब गूंजने लगे हैं,वीणा के तार बजने लगे हैं।छोड़ दो अब कोई सुरीली तान,जो मन के झरने बहने लगे।। मायूस थी बहुत दिनों से मै,सभी वाद्य यन्त्र जंग खाएं […] Read more » tumhara saath तुम्हारा साथ
कविता मै मन के भाव लिखता हूं April 3, 2021 / April 3, 2021 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment मन में भाव आते हैं तो लिखता हूं।दिल में दर्द होता है तो लिखता हूं।।किसी का कुछ न लेता हूं न बिगाड़ता हूं।केवल अपने उदगारो तो मैं लिखता हूं।। दीवार के सहारे खड़ा हूं तेरा क्या लेता हूं।केवल अपने दिल की तपिश बुझा लेता हूं।।तू प्यार का पानी पिला न पिला मुझको।अपने प्यार की प्यास […] Read more »
कविता बीत गई है होली, लोग रंगो को छुड़ाने लगे हैं। March 31, 2021 / March 31, 2021 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment बीत गई है होली,लोग रंगो को छुड़ाने लगे हैं।अपने चाहने वाले,फिर से याद आने लगे हैं।। पी थी जिन्होंने भंग,उनका नशा उतरने लगा है।क्यों किया था ऐसा काम,उनको अखरने लगा है।। मेहमान जो आए थे,अपने घर को लौटने लगे हैं।उड़ रहे थे जो पक्षी घौसलो में लौटने लगे है।। हो गई है गर्मी तेज,पुरवा हवा […] Read more » Holi has passed
कविता प्यार भरे कुछ मुक्तक March 31, 2021 / March 31, 2021 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment दिल लेकर पूछती हो कौन हो तुम।जान कर भी अनजान बनती हो तुम।।दिल के बदले दिल दिया था मैंने।पूछता हूं इनका ज़बाब क्यों मौन हो तुम।। भली भांति जानती हो कौन हूं मै तुम्हारा।मेरे पास वह दिल है जो कभी था तुम्हारा।।ये सच है मै परछाई हूं तेरी तू परछाई है मेरी।।झांक कर देखो तुम […] Read more » Some love filled with love प्यार भरे कुछ मुक्तक