कविता ज्ञान गुनने से बहु गुणित हो जाता है January 7, 2021 / January 7, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकज्ञान गुनने से,जीव गुणसूत्र ही बहुगुणित हो जाता हैस्व अंतर्मन में!करो सद्गुणों का विकास अंतःकरण मेंकि ज्ञान जीव के अंदर है! ज्ञान धुनने से,रुई की तरह ही आच्छादित हो जाता हैअपने रुह में!करो ज्ञान का विस्तारण स्व आत्मन मेंकि आत्मा ज्ञान का मंदिर है! ज्ञान रुंधने से,मिट्टी की तरह मूर्तिमान होने लगता हैअंतर […] Read more » ज्ञान गुनने से बहु गुणित हो जाता है
कविता विचारों का अंत नहीं,अवतार प्रतिस्थापित होते अवतार से January 6, 2021 / January 6, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment आज भाईयों को मरने मारने की,जो बात करे उसे भाईचारा कहते! क्या भाई कभी भी ऐसे हो सकते,जो भाई को मौत के मुंह ढकेलते? जो सबके अमन में खलल डालते,उनको अमन पसंद बिरादर कहते! क्या कभी ऐसे जाति-बिरादर होते,जो मासूम बच्चों में जहर घोलते? आज विश्व के मानवीय मजहबों में,मानवता नहीं मजहबी उन्माद होते! काश […] Read more » अवतार प्रतिस्थापित होते अवतार से
कविता नारी तुम वामांगी January 5, 2021 / January 5, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —–विनय कुमार विनायकनारी तुम वामांगी!कदम-कदम की सहचरी नर कीन पीछे,न आगे,बायीं ओर चलोसुदिन-दुर्दिन में भी बनी रहो तुम तारामती! हमें बनने दो चाण्डाल सेवक हरिश्चंद्रईमानदारी पूर्वक मृत्यु कर वसूलने दोअपने आत्मज और आत्मीय जन से भी! बचा लेने दो बदनाम होती हमारी जाति कोभाई-भतीजावाद/घूस-तरफदारी के आरोप सेइस कफनचोर श्मशान में,पास हो लेने दो मुझे सत्य […] Read more » नारी तुम वामांगी
कविता आदमी नहीं वक्त सिकंदर होता है January 4, 2021 / January 4, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायककुर्सी मिली है तो अच्छा काम करना,कुर्सी मिली है तो मनुष्य बनके रहना,कुर्सी का कर्म नहीं है अहं पालने का,ठीक नहीं कुर्सी की अकड़ दिखलाना! ये जो जनता तेरे सामने में खड़ी है,उससे तेरे कुर्सी की साईज नहीं बड़ी,कुर्सी का धर्म नहीं धौंस जमाने का,खेलो नहीं खेल हाथी चढ़के इतराना! कुर्सी विरासत नहीं,मिली […] Read more » Time is Alexander not man वक्त सिकंदर होता है
कविता हिन्दू ऐसे होते जो शत्रु को पूर्वजन्म के स्वजन समझते January 3, 2021 / January 3, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकहिन्दू ऐसे होतेजो सबको शुभकामना देते! हिन्दू मन का ताना-बाना,हिन्दू का संपूर्ण आशियाना,हिन्दुत्व से ही बना! हिन्दू वेद पढ़ें ना पढ़ें,हिन्दू वेदांत में जीते!हिन्दू वेदांत में सोचते!हिन्दू वेदांत में सांस लेते!हिन्दू वेदांत में ही मरते!हिन्दू मरके भी नहीं मरते! हिन्दू ऐसे होते जोसबको अमर आत्मा समझते! हिन्दू ऐसे होतेजो हिंसा को दूषित कहते! […] Read more » poem on hindu हिन्दू
कविता क्या कहें सन दो हजार बीस का हाल January 2, 2021 / January 2, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकक्या कहें सन दो हजार बीस का हाल,कम हंसाया,खूब रुलाया, जीना मुहाल! नव वर्ष कर रहा हमसे पुराना सवाल,मानवीय मूल्यों को अब रखो संभाल! वन पर्यावरण, जन जीवन का रखना,अच्छा ख्याल वर्णा रोते बीतेगा साल! अब दुबारा चलना मत चीन सी चाल,नहीं तो दुनिया होगी फिर से कंगाल! बच्चों की पढ़ाई गई, मजदूर […] Read more » What to say about the situation of 2012 क्या कहें सन दो हजार बीस का हाल
कविता नया साल आया है, नया सवेरा लाया है January 2, 2021 / January 2, 2021 by ब्रह्मानंद राजपूत | Leave a Comment नया साल आया है, नया सवेरा लाया है, हर घर में खुशियों का मौसम छाया है। पड़ रही है कड़ाके की ठंड फिर भी जोश है नए साल का, आओ सब नए साल का जश्न मनाएं, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों को न भूल जाएँ, नया साल है नयी जिम्मेदारी, नया लक्ष्य हमको बनाना है, लक्ष्य को […] Read more » नया सवेरा लाया है नया साल आया है
कविता ये अपना नववर्ष नहीं है January 2, 2021 / January 2, 2021 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायक ये अपना नववर्ष नहीं है, अबतक कोई हर्ष नहीं है! कोविड19 से उबरे नहीं है, जीवन में उत्कर्ष नहीं है! सूर्य उत्तरायण में नहीं है, कमी ठिठुरन में नहीं है! जबके बसंती बयार नहीं, तब तक हम तैयार नहीं! जब चैत्र प्रतिपदा आएगा, तब ही बसंतऋतु छाएगा! अमुवां की डाली महकेगी, तबके […] Read more » ये अपना नववर्ष नहीं है
कविता नव उल्लास लिए नववर्ष के रंग.. January 2, 2021 / January 2, 2021 by सुशील कुमार नवीन | Leave a Comment भावनाओं का समुंद्र आकांक्षाओं की नाव, मस्ती के हिचकोले प्रेम की पाठशाला। उम्मीदों के लहराते पंख, बिजली की चमक, विश्वास का समर्पण, चाहत का उजियारा। फूलों की डगर, भंवरों की हंसी ठिठोली, खिलखिलाती कलियां, सूदूर जगमगाता अंबर| हंसती गाती रहे यारों की टोली, भरी रहे खुशियों की झोली, नव उल्लास लिए नववर्ष के रंग, नाचें […] Read more » नव उल्लास लिए नववर्ष के रंग
कविता मैं भगतसिंह बोल रहा हूं, मैं नास्तिक क्यों हूं? December 31, 2020 / December 31, 2020 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकमैं भगतसिंह बोल रहा हूंमैं नास्तिक क्यों हूं?मुझे नास्तिक कहनेवालेतुम आस्तिक कितने हो?किसी खास किस्म की लिबास पहने,किसी खास दिशा के ईश में आस्था,यदि आस्तिकता की परिभाषा हैतब तो मेरा नास्तिक है बसंती चोला!मेरा ईश्वर मेरे अंदर, सबके अंदरमेरा ईश्वर सभी दिशा में, सभी वेश में,मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद, गिरजाघर में,धरती के जर्रा-जर्रा, हर […] Read more » I am speaking Bhagat Singh why bhagat singh an atheist मैं भगतसिंह बोल रहा हूं
कविता बुरे समय की आंधियां ! December 30, 2020 / December 30, 2020 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment तेज प्रभाकर का ढले, जब आती है शाम !रहा सिकन्दर का कहाँ, सदा एक सा नाम !! उगते सूरज को करे, दुनिया सदा सलाम !नया कलेंडर साल का, लगता जैसे राम !! तिनका-तिनका उड़ चले, छप्पर का अभिमान !बुरे समय की आंधियां, तोड़े सभी गुमान !! तिथियां बदले पल बदले, बदलेंगे सब ढंग !खो जायेगा […] Read more » बुरे समय की आंधियां
कविता नारी नहीं बंटेगी December 30, 2020 / December 30, 2020 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकसृष्टिकर्ता ब्रह्मा या खुदाबिना पचड़े में पड़े नारीगीता-बाइबल-कुरान मेंपढ़ती रही एक ही बात संतान की सुरक्षा, करुणा,दया, ममता प्रेम, अहिंसाऔर सृष्टि की हिफाजत! जल प्रलय से पहलेऔर जल प्रलय के बादनारी रही सिर्फ नारी! एक सी कथा-व्यथाएक सा उभार-धसांन-सिकनएक ही नारी जाति! किन्तु बदलता रहा नरसर्वदा मुखौटा लगा करकभी वक्ष पर रखकर पत्थरबना […] Read more »