व्यंग्य क्या गोबर दोबारा मानव जाति का अन्न और प्राणदाता बन सकेगा ? March 11, 2024 / March 11, 2024 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव मैं गोबर हॅू, आज अपनी आत्मकथा सुनाना चाहता हॅॅू। मुझ गोबर के पिता का नाम जठरानलानन्द है और श्रीमती सुरभी अर्थात गाय मेरी माता हैं। मेरे जन्मस्थान का नाम लेने से दिन-भर अन्न-जल के दर्शन न होंगे, इसलिए नहीं बताऊँगा। हाँ, मैं इस बात से पूर्णतः आश्वस्त हॅू कि मेरे जन्म स्थान […] Read more » Will cow dung be able to become the food and life giver of mankind again?
धर्म-अध्यात्म लेख वर्त-त्यौहार शिव भस्म धारण से मिलता है कल्याण March 11, 2024 / March 11, 2024 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव शिव ही सर्वज्ञ, परिपूर्ण और अनंत शक्तियों को धारण किए हैं। जो मन, वचन, शरीर और धन से शिव भावना करके उनकी पूजा करते हैं, उन पर शिवजी की कृपा अवश्य होती है। शिवलिंग में शिव की प्रतिमा ने शिव भक्तजनों में शिव की भावना करके उनकी प्रसन्नता के लिए पूजा का विधान है जो […] Read more » One gets welfare by wearing Shiva Bhasma
कविता कठपुतली March 11, 2024 / March 11, 2024 by श्लोक कुमार | Leave a Comment ये डोर मेरी खलासी को इख्तियार कर लिएमेरे कर, पद बंदिश में हैंओ! नटवर मुझे छोड़ दो ,मेरे अनुरागी को दो टेकहै एक डोर हमाराशुष्क दरख़्त की भांति मेरा हयात हैंप्रशाखा की भांति कर मेरेखुश्क दरख़्त की भांति मैं खड़ीविवश मैं , बिन तुम्हारे वियोग में पड़ीमेरे अश्क है बेशकीमतगिरते ही बन जाते मोतीइन्हे रोक […] Read more » puppet
कविता कुछ कर्म भलाई का कर ले March 10, 2024 / March 12, 2024 by राकेश कुमार सिंह | Leave a Comment जीवन में आशाओं कामोल कहाँ मिल पाएगाइस मतलब की दुनिया मेंकौन साथ निभाएगा। सोना चाँदी हीरे मोतीमिट्टी तक बिक जाती हैबाजारों में गिरवी है जोइज्जत तक बिक जाती है। पहने धरम करम का चोलापाप कमाई करता मानवईश्वर तक को भूल गयाईश्वर से कब डरता मानव। शापित है हर शख्स यहाँहैरान भी है परेशान है मानवअपनों […] Read more » By doing some good deeds with dreams in your eyes
कविता तो समझो प्यार है March 9, 2024 / March 12, 2024 by राकेश कुमार सिंह | Leave a Comment कोई आपकीहर अदा का दीवाना हो,किसी की नजरों मेंआपके लिए चाहत हो,आपको देखकर किसी केहोठों पर मुस्कुराहट आ जाए..तो समझो प्यार है। आपकी एक आवाज परदौड़ कर आये,आपकी कहने से पहलेहर एक चीज ले आये,आपकी आगे पीछेनिरंतर मंडराये,महकते मौसम महकती फिजामहकती अमराई मेंआप को लेकर जाये,तो समझो प्यार है। जो तुम्हें अच्छा लगेवही बातें करेंप्यार […] Read more »
कविता आँखों में सपने सजाकर March 9, 2024 / March 12, 2024 by राकेश कुमार सिंह | Leave a Comment संग मेरे तुम चलोआँखों में सपने सजाकर।जिंदगी हो जाने जाँतुम चलो मुस्करा कर। मुझको है विश्वास यहतुम हमारे ही रहोगेदुनिया बदल जाए मगरतुम नजारों में रहोगेतुम सितारों की रोशनी होचाँदनी से याराना तुम्हाराइंद्रधनुषी छटा तुम्हारीगुलों का रंग भी है तुम्हारासंग मेरे तुम चलोआँखों में सपने सजाकर। श्वेत क्रान्ति से सुसज्जितऐसी नजर आती हो तुमसरस्वती साक्षात […] Read more » आँखों में सपने सजाकर
महिला-जगत लेख महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी से लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं March 8, 2024 / March 11, 2024 by ब्रह्मानंद राजपूत | Leave a Comment (अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 08 मार्च पर विशेष आलेख) हम विश्व में लगातार कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते आ रहे हैं, महिलाओं के सम्मान के लिए घोषित इस दिन का उद्देश्य सिर्फ महिलाओं के प्रति श्रद्धा और सम्मान बताना है। इसलिए इस दिन को महिलाओं के आध्यात्मिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। नारी मानव जाति के लिए जननी का रूप है। कहा जाए तो जननी ही नारी है और नारी ही जननी है। नारी शक्ति या मातृशक्ति का इस संसार को आगे बढ़ाने में अहम् योगदान है। बिना नारी के इस दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती। अगर नारी नहीं होगी तो इस संसार का विकास नहीं हो पायेगा। नारी ही एक पुरुष को जन्म देती है, तभी नारी की सहन करने की शक्ति यानी सहनशक्ति का अहसास होता है कि वह इस संसार में कितनी मजबूत शक्ति है। आज उसी ही मजबूत नारी शक्ति पर कुछ मानसिक रूप से विक्षिप्त पुरुषों (ऐसे पुरुष जो नारी शक्ति को अपने उपभोग की वस्तु समझते हैं) द्वारा बलात्कार जैसी घटनाएं होती हैं। ऐसे पुरुषों द्वारा नारी को शारीरिक शोषण द्वारा हमेशा लज्जित किया जाता है, यह चीज समस्त मानवजाति को शर्मसार करती है। कुछ पुरुषों के ऐसे कृत्यों द्वारा बाकी के साफ-सुथरी छवि के पुरुषों को भी शर्मसार होना पड़ता है। आज जरूरत है महिलाओं और छोटी छोटी बच्चियों के खिलाफ बलात्कार जैसी होनी वाली घटनाओं पर लगाम लगाई जाए। ये तभी हो सकता है जब बलात्कार जैसे कृत्यों के खिलाफ मानव जाति एकजुट होकर फैंसला ले और जो लोग दोषी पुरुषों का साथ देते हैं ऐसे लोगों का भी समाज पूर्ण रूप से बहिष्कार करे। इसके साथ ही आज जरूरत है कि बलात्कार जैसे कृत्यों के खिलाफ सरकारें एक कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान करें और बलात्कार जैसे मामलों की फास्टट्रैक कोर्ट द्वारा त्वरित कार्यवाही हो। जिससे कि दूसरे लोग भी ऐसे कृत्य करने से पहले सौ बार सोचें। तभी मानव जाति और समाज के स्तर को उठाया जा सकता है। आज अपने समाज में नारी के स्तर को उठाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरत है महिला सशक्तिकरण की। महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं की आध्यात्मिक, शैक्षिक, सामजिक, राजनैतिक और आर्थिक शक्ति में वृध्दि करना, बिना इसके महिला सशक्तिकरण असंभव है। आज हर महिला समाज में धार्मिक रूढ़ियों, पुराने नियम कानून में अपने आप को बंधा पाती है। पर अब वक्त है कि हर महिला तमाम रूढ़ियों से खुद को मुक्त करे। प्रकृति ने औरतों को खूबसूरती ही नहीं, दृढ़ता भी दी है। प्रजनन क्षमता भी सिर्फ उसी को हासिल है। भारतीय समाज में आज भी कन्या भ्रूण हत्या जैसे कृत्य दिन-रात किए जा रहे हैं। पर हर कन्या में एक मां दुर्गा छिपी होती है। यह हैरत की बात है कि दुर्गा की पूजा करने वाला इंसान दुर्गा की प्रतिरूप नवजात कन्या का गर्भ में वध कर देता है। इसमें बाप, परिवार के साथ समाज भी सहयोग देता हैं। आज जरूरत है कि देश में बच्चियों को हम वही आत्मविश्वास और हिम्मत दें जो लड़कों को देते हैं। इससे प्रकृति का संतुलन बना रहे। इसलिए जरूरी है कि इस धरती पर कन्या को भी बराबर का सम्मान मिले। साथ ही उसकी गरिमा भी बनी रहे। इसलिए अपने अंदर की शक्ति को जागृत करें और हर स्त्री में यह शक्ति जगाएं ताकि वह हर विकृत मानसिकता का सामना पूरे साहस और धीरज के साथ कर सके। एक नारी के बिना किसी भी व्यक्ति जीवन सृजित नहीं हो सकता है। जिस परिवार में महिला नहीं होती, वहां पुरुष न तो अच्छी तरह से जिम्मेदारी निभा पाते हैं और ना ही लंबे समय तक जीते हैं। वहीं जिन परिवारों में महिलाओं पर परिवार की जिम्मेदारी होती है, वहां महिलाएं हर चुनौती, हर जिम्मेदारी को बेहतर तरीके से निभाती है और परिवार खुशहाल रहता है। अगर मजबूती की बात की जाए तो महिलाएं पुरुषों से ज्यादा मजबूत होती हैं क्योंकि वो पुरुषों को जन्म देती हैं। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त भारत के मौलिक के मौलिक अधिकारों के अंतर्गत सभी को अनुच्छेद 14-18 के अंतर्गत समानता का अधिकार दिया गया है। जो कि महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का अधिकार देता है। इसके अन्तर्गत यह भी सुनिश्चित किया गया है कि राज्य के तहत होने वाली नियुक्तियों और रोजगार के संबंध में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा। और संविधान द्वारा मौलिक अधिकारों के अन्तर्गत दिये गया समानता का अधिकार भारतीय राज्य को किसी के भी खिलाफ लिंग के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। देष में महिलाओं के उत्थान और सशक्तीकरण को देखते हुए हमारे संविधान को 1993 में संशोधित किया गया। 73वें संशोधन के जरिये संविधान में अनुच्छेद 243ए से 243ओ तक जोड़ा गया। इस संशोधन में इस बात की व्यवस्था की गई कि पंचायतों और नगरपालिकाओं में कुल सीटों की एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित होंगी। इस संशोधन में इसकी भी व्यवस्था की गई कि पंचायतों और नगरपालिकाओं में कम से कम एक तिहाई चेयरपर्सन की सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित हों। पंचायती राज संस्थानों द्वारा महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने में सकारात्मक कार्यवाही से महिलाओं के प्रतिनिधित्व में तेजी से वृद्धि हुई है। वास्तव में देखा जाए तो देशभर में पंचायतों में चुनी गई महिलाओं का प्रतिनिधित्व 40 प्रतिशत हो गया है। कुछ राज्यों में पंचायतों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। बिना प्रतिनिधित्व के महिलाओं का सशक्तिकरण असंभव है। जब तक महिलाओं को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा तब तक हम महिलाओं के सशक्तिकरण की कल्पना नहीं कर सकते। नए संसद भवन में 20 सितंबर 2023 को नारी शक्ति वंदन विधेयक लोकसभा में पास हुआ था। लोकसभा में पास होने के बाद 21 सितंबर 2023 को यह नारी शक्ति वंदन विधेयक राज्यसभा से भी पारित होने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस विधेयक को अपनी मंजूरी दे दी है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है। आने वाले सालों में कानून के अमल में आने बाद लोकसभा और विधानसभा में बहुत कुछ बदल जाएगा। लेकिन नारी शक्ति वंदन अधिनियम की सबसे बडी कमी है कि इसके अन्तर्गत पिछडे और आदिवासी वर्ग की महिलाओं को अलग से कोटा नही दिया गया है। अगर इसके अन्तर्गत पिछड़े और आदिवासी वर्ग की महिलाओं को अलग से कोटा दिया जाता तो पिछडे और दबे कुचले वर्ग की महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी आने वाले सालों में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में बढ पाता। इसके लिये सरकार को नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसके अन्तर्गत पिछड़े और आदिवासी वर्ग की महिलाओं के लिये कोटे की व्यवस्था आने वाले समय में करनी चाहिये। कोई भी राष्ट्र महिलाओं के बिना शक्तिहीन है। क्योंकि राष्ट्र को हमेशा से महिलाओं से ही शक्ति मिलती है। किसी भी जीवंत और मजबूत राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण है। महिलाओं की राजनैतिक भागीदारी से लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती है। आज जरूरत है कि समाज में महिलाओं को अज्ञानता, अशिक्षा, कूपमंडूकता, संकुचित विचारों और रूढ़िवादी भावनाओं के गर्त से निकालकर प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए उसे आधुनिक घटनाओं, ऐतिहासिक गरिमामयी जानकारी और जातीय क्रियाकलापों से अवगत कराने के लिए उसमे आर्थिक ,सामाजिक, शैक्षिक, राजनैतिक चेतना पैदा करने की। जिससे की नारी पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर समाज को आगे बढ़ाने में सहयोग कर सके। साथ-साथ आज जरूरत है कि समाज की जितनी भी रूढ़िवादी समस्याएं हैं हमें उनका समाधान खोजते हुए हठधर्मिता त्याग कर शैक्षिक, सामाजिक, सोहद पूर्ण, व्यावसायिक और राजनैतिक चेतना का मार्ग प्रशस्त करते हुए महिलाओं के सामाजिक उत्थान का संकल्प लेना चाहिये। क्योंकि हजारों मील की यात्रा भी एक पहले कदम से शुरू होती है। सही मायने में महिला दिवस तब सार्थक होगा जब असलियत में महिलाओं को वह सम्मान मिलेगा जिसकी वे हकदार हैं। इसके साथ ही समाज को संकल्प लेना चाहिए कि भारत में समरसता की बयार बहे, भारत के किसी घर में कन्या भ्रूण हत्या न हो और भारत की किसा भी बेटी को दहेज के नाम पर न जलाया जाये। विश्व के मानस पटल पर एक अखंड और प्रखर भारत की तस्वीर तभी प्रकट होगी जब हमारी मातृशक्ति अपने अधिकारों और शक्ति को पहचान कर अपनी गरिमा और गौरव का परिचय देगी और राष्ट्र निर्माण में अपनी प्रमुख भूमिका निभाएंगी। Read more » अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 08 मार्च
धर्म-अध्यात्म लेख वर्त-त्यौहार शिव भस्म धारण से मिलता है कल्याण March 7, 2024 / March 7, 2024 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव शिव ही सर्वज्ञ, परिपूर्ण और अनंत शक्तियों को धारण किए हैं। जो मन, वचन, शरीर और धन से शिव भावना करके उनकी पूजा करते हैं, उन पर शिवजी की कृपा अवश्य होती है। शिवलिंग में शिव की प्रतिमा ने शिव भक्तजनों में शिव की भावना करके उनकी प्रसन्नता के लिए पूजा का विधान है जो […] Read more » शिव भस्म
लेख लाभार्थियों तक क्यों नहीं पहुंचती योजनाएं? March 7, 2024 / March 7, 2024 by चरखा फिचर्स | Leave a Comment मुकेश मेघवालउदयपुर, राजस्थान देश में केंद्र हो या फिर राज्य सरकार, सभी नागरिकों के हितों में कई योजनाएं चला रही है. कुछ योजनाएं केंद्र द्वारा संचालित होती हैं तो कुछ योजनाएं राज्य सरकार भी अपने स्तर पर लागू करती हैं. लेकिन सभी का अंतिम उद्देश्य समाज में गरीब, पिछड़े, आर्थिक रूप से कमज़ोर और हाशिये […] Read more »
महत्वपूर्ण लेख महिला-जगत लेख डिजिटल कौशल से सशक्त बनती महिलाएं March 7, 2024 / March 7, 2024 by चरखा फिचर्स | Leave a Comment अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष लेख सैयद तैय्यबा कौसरपुंछ, जम्मू वर्तमान युग यदि महिलाओं का युग कहा जाए तो गलत नहीं होगा. इस युग में महिलाओं ने हर क्षेत्र में खुद को साबित किया है. उन्होंने जीवन के सभी पहलुओं में हर संभव तरीके से अपनी योग्यता साबित की है. डिजिटल विकास ने महिला सशक्तिकरण […] Read more » Women empowered with digital skills अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सशक्त बनती महिलाएं
लेख खुद की हत्या करना जैसा है धूम्रपान का आदी होना March 7, 2024 / March 7, 2024 by ललित गर्ग | Leave a Comment धूम्रपान निषेध दिवस -13 मार्च, 2024– ललित गर्ग – हर साल मार्च महीने के दूसरे बुधवार को धूम्रपान निषेध दिवस यानी नो स्मोकिंग डे मनाया जाता है। धूम्रपान के दुष्प्रभावों के बारे में लोगों को बताने और धूम्रपान छोड़ने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। इस साल धूम्रपान […] Read more » धूम्रपान का आदी
लेख समाज कितनी स्वतंत्र हैं आधुनिक महिलाएं? March 6, 2024 / March 6, 2024 by लक्ष्मी अग्रवाल | Leave a Comment आज चारों तरफ शोर मचा हुआ है कि आज की महिला किसी भी मामले में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। जीवन व समाज के हर क्षेत्र में वह पुरुषों में भी बढ़कर प्रदर्शन कर रही हैं। आज उन्हें सब ओर से स्वतंत्रता मिली हुई है। उन पर किसी तरह की रोक-टोक पाबंदी नहीं है, वह पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या जिस आजादी का ढिंढोरा हम पीट रहे हैं, वह सच में महिलाओं को मिली हुई है। महिलाओं के विकास की ओर बढ़ते कदम तथा बदले रूप-रंग को देखकर ऊपर से सबको भ्रम हो रहा है कि आधुनिक महिलाएं पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। वो जैसा चाहती हैं, वैसा ही करती हैं। उन्होंने अपने जीवनशैली अपनी इच्छानुसार बनाई हुई है। जीवन के हर क्षेत्र में मिल रही कामयाबी इस बात की गवाह है कि अब हमारा समाज पुरुष प्रधान नहीं रहा। आधी आबादी को उसके हिस्से के अधिकार मिल रहे हैं। पर क्या सच में आधी आबादी को वह मिला है, जिसकी वह हकदार है या फिर सागर में से कुछ बूंदें उन्हें देकर बहला दिया गया है कि ताकि वे आगे अपने किसी अधिकार की लड़ाई न लड़ सकें। आज हमारा समाज बहुत आगे बढ़ चुका है, काफी विकसित हो चुका है, इसमें दो राय नहीं है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आधुनिक महिलाएं आज भी अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं। हम यदि अपनी समाज व्यवस्था पर एक विहंगम दृष्टि डालें तो हम पाएंगे कि आज भी उनकी आजादी अधूरी ही है। सामाजिक व्यवस्था- कहने को तो हमारा समाज काफी उन्नत और जागरूक हुआ है और आधी आबादी भी अपना जीवन अपने ढंग से जी रही है। लेकिन फिर भी आज भी शादी के बाद एक बेटी को ही अपना घर छोड़कर जाना पड़ता है, पुरुष आज भी उसी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। जब हम आजाद हैं तथा स्त्री और पुरुष दोनों को बराबरी का अधिकार दिया गया है तो फिर क्यों हमेशा एक लड़की या एक औरत को ही अपना सब कुछ छोडऩा पड़ता है? फिर वह शिक्षित हो या अशिक्षित इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे ही अपना सब कुछ छोडऩा पड़ता है। शादी के बाद एक लड़की अपना घर, माता-पिता, भाई-बहन यहां तक कि अपनी पढ़ाई, अपना भविष्य भी वह अपने ससुराल वालों के लिए छोड़ देती है। वह हर सांचे में खुद को ढाल लेती है। वह शादी के बाद अपने ससुराल वालों के रंग-ढंग में रच-बस जाती है और वह ये सब अपने परिवार की खुशी के लिए करती है। आज का समाज इतना आगे निकल चुका है, परंतु फिर भी आधी आबादी के मामले में हमारा समाज क्यों पुराने रिवाजों को ही मानता है? क्यों हमारी सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों के लिए बनाए गए रिवाजों में कोई परिवर्तन नहीं हुए? आज भी अगर किसी स्त्री के साथ कोई शर्मनाक घटना घटती है तो उसमें दोष स्त्री को ही दिया जाता है। उसी के चाल-चलन व चरित्र पर ही उंगली उठती है। हर बात में उनके ऊपर पाबंदी लगाई जाती है। उनकी जीवनशैली में हस्तक्षेप व रोक-टोक की जाती है। क्यों यह सब स्त्री को ही झेलना पड़ता है और फिर भी हम कहते हैं कि हमने औरतों को पूरी आजादी व उनके हक दिए हुए हैं। ऐसे में ऊपर तौर पर स्वतंत्र दिखने वाली इन महिलाओं को कैसे पूर्णत: स्वतंत्र माना जा सकता है। महिलाओं की इस स्वतंत्रता में भी तो आखिरकार उसकी परतंत्रता ही छिपी हुई है। कहने को तो हमारा देश प्रत्येक क्षेत्र में विकास की ओर उन्मुख है तथा कई क्षेत्रों में तो हमने आशातीत कामयाबी हासिल भी कर ली है। विश्व के कई देशों ने इस बात को स्वीकार किया है कि राष्ट्र के विकास से संबंधित कई मुद्दों को महिलाएं बेहतर समझ सकती हैं। हमारे देश की तथा विदेशी राजनीतिज्ञ महिलाओं ने अपनी प्रतिभा से इस बात को सिद्ध भी किया है। लेकिन फिर भी छोटे से लेकर बड़े स्तर पर महिलाओं की योगयता को कम ही आंका जाता है। माना हमारे देश में अन्य देशों के मुकाबले महिलाओं को मतदान का अधिकार काफी पहले ही मिल गया था, लेकिन उसका स्वतंत्र प्रयोग करने की सामथ्र्य उसमें आज भी नहीं है। आज भी वह अपने परिवार, पिता या पति की इच्छानुसार ही मतदान करती है। यदि वह ऐसा न करे तो उनके आपसी रिश्तों में दरार आ जाती है। अपने परिवार में सौहार्द, शांति व प्रेम बनाए रखने के लिए वह खुशी-खुशी अपने इस अधिकार को भी त्याग देती है। इस तरह सभी क्षेत्रों में उन्हें मिली आजादी पर कोई न कोई प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रतिबंध लगा ही हुआ है, उन्हें आगे बढऩे के पर्याप्त अवसर नहीं उपलब्ध कराए जाते, तो ऐसे में किस मुंह से कहें कि आधुनिक महिलाएं पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। किसी भी देश के विकास में वहां की शिक्षित महिला का बहुत बड़ा योगदान होता है। एक शिक्षित महिला न केवल स्वयं को बल्कि अपने पूरे परिवार को शिक्षित करती है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में महिलाओं के शिक्षा स्तर में काफी सुधार हुआ है लेकिन फिर भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। माना दो दशक पहले की तुलना में आज की महिलाएं शिक्षा के प्रति कहीं ज्यादा जागरूक हैं। महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढऩे से उनकी सोचने व समझने की क्षमता का विकास हुआ है लेकिन यह स्थिति शहरी महिलाओं की है। जबकि आज भी हमारे देश का ज्यादातर हिस्सा गांवों में बसता है। इन इलाकों में देश की ६० फीसदी महिलाएं रहती हैं, जिन्हें विकाास की परिभाषा तक मालूम नहीं है। शिक्षा के नाम पर इन महिलाओं में शायद कुछ ही कॉलेज क्या, स्कूल तक पहुंची हों। क्या विकासशी भारत की ये महिलाएं सच में आजाद हैं जिन्हें दो वक्त का खाना बनाने और घर के सदस्यों की देखभाल करने के अलावा और कुछ भी पता नहीं है। भारत के दूर-दराज के इलाकों की बात तो बहुत दूर है शहरी क्षेत्रों में भी लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं। शहरी क्षेत्रों में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो कि शिक्षा के मामले में बेटे व बेटियों में फर्क करते हैं। बेटों के लिए ऊंचे सपने देखते हैं तथा उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ाने के लिए जी-जान लगा देते हैं। जबकि लड़कियों को किसी भी सरकारी स्कूल में पढऩे के लिए भेज देते हैं, उन्हें इस बात से कोई सरोकार तक नहीं होता कि वहां पढ़ाई ठीक से हो रही है या नहीं। वे तो बस स्कूल में दाखिला कराकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। शहरी क्षेत्रों में चाहे महिलाएं कितनी ही आत्मनिर्भर दिखती हों लेकिन सच्चाई तो यह है कि शिक्षा, मान्यताओ, सोच व सामाजिक बंधनों के स्तर पर आज तक उन्हें आजादी नहीं मिल पाई है। माना देश निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता जा रहा है। जहां महिलाओं को भी रोजगार के अवसर मिल रहे हैं लेकिन अब भी महिलाओं को उतने अधिकार नहीं मिल पाए हैं, जिनकी वह वास्तविक हकदार हैं। सामाजिक रूप से हम अभी भी काफी पिछड़े हुए हैं। आज भी देश में सिर्फ १३ फीसदी महिलाएं ही काम करती हैं उनमें भी ज्यादातर मामलों में वही स्त्रियां काम करती हैं, जिनकी पारिवारिक आय काफी कम हो। इनमें भी ज्यादातर महिलाएं निजी क्षेत्रों में काम करती हैं जहां आए दिन उनके अधिकारों का हनन होता है। किसी न किसी रूप में उनकी स्वतंत्रता बाधित होती है, आए दिन उन्हें किसी न किसी रूप में अपने स्त्री होने की कीमत चुकानी पड़ती है। यह देखने में आता है कि जिन राज्यों की आर्थिक स्थिति अच्छी है वहां पर महिलाओं के नौकरी या घर से बाहर काम करने का प्रतिशत भी कम है। कुल मिलाकर अब भी सामाजिक बंधनों के कारण महिलाएं चाहकर भी अपना योगदान आर्थिक विकास में नहीं दे पा रही हैं। हम चाहें कितनी भी आर्थिक आजादी की बातें कर लें पर जब तक महिलाओं के विकास व आजादी को लेकर खुलापन नहीं आएगा तब तक आर्थिक आजादी अधूरी नजर आती है। ऊपरी तौर पर देखने को मिलता है कि बड़े शहरों की महिलाओं को पूरी आजादी है। वह हर क्षेत्र में अपना कॅरियर बना रही हैं। लेकिन सच्चाई तो यह है कि निजी क्षेत्रों में महिलाएं केवल उनकी ब्रांड एम्बेसडर है। ब्रांड एम्बेसडर के रूप में उन्हें शोहरत तो मिल रही है लेकिन उनकी स्वतंत्रता की कीमत पर। ब्रांड एम्बेसडर बनी इन महिलाओं की निजी जिंदगी तक इनके मालिकों द्वारा संचालित होती है। ऐसे में आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर भी ये महिलाएं वास्तविक रूप से परतंत्र ही हैं। आज हमारे देश में महिलाओं की आजादी को लेकर जो सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ है वह है महिलाओं की सुरक्षा को लेकर। आज हमारे देश में महिलाएं घर में ही सुरक्षित नहीं हैं। जीवन के हर मोड़ पर उनके जीवन पर खतरा मंडरा रहा है। कहीं वो अपनों का शिकार बनती है तो कहीं अनजाने लोगों का। पुलिस रिकॉर्ड में महिलाओं के खिलाफ भारत में अपराधों का उच्च स्तर दिखाई पड़ता है। भारत के जनजातीय समाज में अन्य सभी जातीय समूहों की तुलना में पुरुषों का लिंगानुपात कम है। कई विशेषज्ञों ने माना है कि भारत में पुरुषों का उच्च स्तरीय लिंगानुपात कन्या शिशु हत्या और लिंग परीक्षण संबंधी गर्भपातों के लिए जिम्मेदार है। बेटे की चाह रखने वाले माता-पिता कन्या को जन्म से पहले ही इस दुनिया में आने से रोक देते हैं। जन्म से पहले अनचाही कन्या संतान से छुटकारा पाने के लिए इन परीक्षणों का उपयोग करने की घटनाओं के कारण बच्चे के लिंग निर्धारण में इस्तेमाल किए जा सकने वाले सभी चिकित्सकीय परीक्षणों पर भारत में प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन बावजूद इसके कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध नहीं रुक रहे हैं। इसके अलावा हमारे यहां दहेज परंपरा भी विद्यमान है, जिसकी वजह से कई महिलाओं का जीवन तो नर्क से भी बदतर हो गया है। दहेज परंपरा का दुरुपयोग लिंग-चयनात्मक गर्भपातों और कन्या शिशु हत्याओं के लिए मुख्य कारणों में से एक रहा है। घरेलू हिंसा भी हमारे समाज में काफी प्रचलित हैं, जहां हमारे देश की अबलाएं चुपचान पुरुष सत्तात्मक वातावरण के तहत बेरहम पुरुषों के अत्याचार सहने को विवश हैं। घरेलू हिंसा की घटनाएं निम्न स्तरीय सामाजिक-आर्थिक वर्गों में अधिक होती हैं। कई मामलों में तो दहेज प्रथा भी घरेलू हिंसा के मामलों को बढ़ावा देता है। जहां आज के आधुनिक युग में भी हमारी बेटियां या हमारे समाज की औरतें चुपचाप इतने अत्याचार सहने को विवश हैं तो ऐसे में कैसे कहा जा सकता है कि हमारे देश की आधुनिक महिलाएं स्वतंत्र हैं। क्या उनके ऊपर हो रहे ये अत्याचार किसी भी तरह से उनकी स्वतंत्रता की कहानी बयां करते हैं। हमारे देश को तो 15 अगस्त 1947 को आजादी मिल गई थी लेकिन हमारे देश की महिलाओं को आज भी आजादी का इंतजार है। उन्हें इंतजार है उस दिन का जब वह अपने घर और अपने आसपास की सभी जगहों पर सुरक्षित रह सकेंगी। उन्हें इंतजार है उस कल का जब पुुरुष उन्हें भी मनुष्य समझकर उनकी भावनाओं से खेलने व उन पर अत्याचार करने की बजाय उनको सम्मान देगा। भले ही हम महिलाओं को अधिकार संपन्न व आधुनिक बनाने की कितनी ही बात कर लें पर सच्चाई तो यह है कि आज भी हमारे देश के अधिकांश भारतीय परिवारों में महिलाओं को उनके नाम पर कोई भी संपत्ति नहीं मिलती है और उन्हें पैतृक संपत्ति का हिस्सा भी नहीं मिलता। महिलाओं की सुरक्षा के कानूनों के कमजोर कार्यान्वयन के कारण उन्हें आज भी जमीन और संपत्ति में अपना अधिकार नहीं मिल पाता। वास्तव में जब जमीन और संपत्ति के अधिकारों की बात आती है तो कुछ कानून महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं। १९५६ के दशक के मध्य के हिन्दू पर्सनल लॉ (हिंदू, बौद्ध, सिखों और जैनों पर लिए लागू) ने महिलाओं को विरासत का अधिकार दिया। हालांकि बेटों को पैतृक संपत्ति में एक स्वतंत्र हिस्सेदारी मिलती थी जबकि बेटियों को अपने पिता से प्राप्त संपत्ति के आधार पर हिस्सेदारी दी जाती थी। इसलिए एक पिता अपनी बेटी को पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से को छोड़कर उसे अपनी संपत्ति से प्रभावी ढंग से वंचित कर सकता था लेकिन बेटे को अपने स्वयं के अधिकार से अपनी हिस्सेदारी प्राप्त होती थी। इसके अतिरिक्त विवाहित बेटियों को, भले ही वह वैवाहिक उत्पीडऩ का सामना क्यों ना कर रही हों उसे पैतृक संपत्ति में कोई आवासीय अधिकार नहीं मिलता था। २००५ में हिंदू कानूनों में संशोधन के बाद महिलाओं को अब पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने के प्रावधान तो कर दिए गए हैं लेकिन फिर भी आज भी हमारे देश की महिलाएं अपने इस अधिकार के लिए भी जूझ रही हैं। विवाह के बाद संबंध विच्छेद की स्थिति में भी स्त्री को अपना हक लेने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। आज भी वह आसानी से न पिता से और न पति से अपने अधिकार प्राप्त नहीं कर सकती। आज के युग में भी महिलाओं की डगर काफी कठिन है। जहां हर कदम पर हमारे पुरुष प्रधान समाज की प्रताडऩा का उसे शिकार होना पड़ता है। हर बार पुरुष के अहं के आगे महिलाओं की आवाज व अधिकारों को बड़ी आसानी से कुचल दिया जाता है और वह चुपचाप अपने साथ दोहराई जाने वाली कहानी को सदियों से सहती आई है और न जाने कब तक सहती रहेगी। आधुनिक महिलाओं की आजादी सिर्फ हमारे देश के संविधान के पृष्ठों में दर्ज होकर रह गई है। व्यावहारिक स्तर पर देखें तो वह आजादी आज भी महिलाओं से कोसों दूर है। महिलाओं को स्वतंत्र मानना केवल उनके साथ एक छलावा प्रपंच है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। हिंदुस्तान की मां, बहन, बेटी, बहू और पत्नी भले ही आधुनिक हो गई हो पर स्वतंत्र नहीं हुई है, वह आज भी परतंत्रता की बेडिय़ों में ही जकड़ी हुई है। लेखक परिचय लक्ष्मी अग्रवाल Read more » कितनी स्वतंत्र हैं आधुनिक महिलाएं?