खेत-खलिहान लेख महंगी होती खाद से खेती करना मुश्किल June 29, 2022 / June 29, 2022 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment -प्रियंका ‘सौरभ’ उत्पादन बढ़ाने के लिए उर्वरक खेतों की उर्वरता बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। भारत अपनी उर्वरक आवश्यकताओं के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर करता है। भारत में उर्वरकों की वर्तमान लागत एक खनिज संसाधन-गरीब देश के लिए वहन करने के लिए बहुत अधिक है। 2021-22 में, मूल्य के संदर्भ […] Read more » It is difficult to do farming with expensive fertilizer
पर्यावरण लेख वन्य जीवों और पेड़ों के लिए अपनी जान पर खेलता बिश्नोई समाज June 29, 2022 / June 29, 2022 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment -सत्यवान ‘सौरभ’ बिश्नोई आंदोलन पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण और हरित जीवन के पहले संगठित समर्थकों में से एक है। बिश्नोइयों को भारत का पहला पर्यावरणविद माना जाता है। ये जन्मजात प्रकृति प्रेमी होते हैं। पर्यावरण आंदोलनों के इतिहास में, यह वह आंदोलन था जिसने पहली बार पेड़ों को अपनी सुरक्षा के लिए गले लगाने और […] Read more »
कविता आयु निर्धारण सिर्फ जन्म नहीं मानसिक आत्मिक स्थिति से होती June 29, 2022 / June 29, 2022 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकमानव की आयु का निर्धारणसिर्फ जन्म नहीं मानसिक स्थितिऔर आत्मा के पूर्व जन्मों सेसंग्रहित ज्ञान व यादाश्त से होती! सब मानव समकालीन होते समकाल मेंएक साथ आत्मा की सदेह उपस्थिति सेचाहे कोई उम्र से बालक हो या युवक होया वृद्धावस्था में हीं क्यों ना आ गए हों! सृष्टि के आरंभ सेपरमात्मा की उपस्थिति […] Read more » Age is determined not only by birth but by mental and spiritual condition. आयु निर्धारण सिर्फ जन्म नहीं मानसिक आत्मिक स्थिति से होती
लेख खिलौनों की दुनिया के वो मिट्टी के घर याद आते हैं। June 29, 2022 / June 29, 2022 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment -प्रियंका ‘सौरभ’ सदियों से मिटटी के घर बनाने की जो परम्परा चली आ रही है; भारत में 118 मिलियन घरों में से 65 मिलियन मिट्टी के घर हैं? यह भी सच है कि कई लोग अपने द्वारा प्रदान किए जाने वाले लाभों के लिए मिट्टी के घरों को पसंद करते हैं। दिलचस्प बात यह है […] Read more » खिलौनों की दुनिया के वो मिट्टी के घर याद आते हैं।
धर्म-अध्यात्म लेख वैदिक धर्म का समग्रता से प्रचार गुरुकुलीय शिक्षा से ही सम्भव June 29, 2022 / June 29, 2022 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment –मनमोहन कुमार आर्य गुरुकुल एक लोकप्रिय शब्द है। यह वैदिक शिक्षा पद्धति का द्योतक शब्द है। वैदिक धर्म व संस्कृति का आधार ग्रन्थ वेद है। वेद चार हैं जिनके नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं। यह चार वेद सृष्टि के आरम्भ में सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, अनादि, अनन्त, न्यायकारी, सृष्टिकर्ता और जीवों को उनके कर्मानुसार सुख-दुःख व मनुष्यादि जन्म देने वाले ईश्वर से चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को प्राप्त हुए थे। वेद ईश्वर की अपनी भाषा संस्कृत में हैं जो लौकिक संस्कृत से भिन्न है और जिसके शब्द व पद रूढ़ न होकर योगरूढ़ हैं। वेदों को जानने व समझने के लिए वैदिक संस्कृत भाषा का ज्ञान आवश्यक है और इसके लिए वर्णोच्चारण शिक्षा सहित व्याकरण के अष्टाध्यायी व महाभाष्य आदि ग्रन्थों का बाल व युवावस्था में लगभग तीन वर्ष तक अध्ययन करना व कराना आवश्यक है। यह अध्ययन किसी एक गुरु से किया जा सकता है। प्राचीन काल में वेदों के विद्वान जिन्हें ब्राह्मण कहा जाता था, वह शिक्षा व व्याकरण आदि का ज्ञान वनों में स्थित अपने गुरुकुल, अर्थात् गुरु के कुल, में कराया करते थे जहां अनेक विद्यार्थी एक गुरु से व्याकरण व उसके बाद निरुक्त आदि वेदांगों व उपांगों आदि अनेक ऋषिकृत ग्रन्थों का अध्ययन करते थे। यह परम्परा महाभारत के बाद यवन व अंग्रेजों के समय में भंग कर दी गई थी जिसका उद्देश्य वैदिक धर्म व संस्कृति को समाप्त कर विदेशी मतों को महिमा मण्डित करना था। इसका उद्देश्य लोगों का येन केन प्रकारेण धर्मान्तरण व मतान्तरण करना मुख्य था। इस कारण दिन प्रति दिन वैदिक धर्म व संस्कृति का पतन हो रहा था। महर्षि दयानन्द ने इस स्थिति को यथार्थ रूप में समझा था और संस्कृत का अध्ययन कराने के लिए एक के बाद दूसरी कई संस्कृत पाठशालाओं का अलग अलग स्थानों पर स्थापन किया था। किन्हीं कारणों से इन पाठशालाओं को आशा के अनुरुप सफलता न मिलने पर उन्हें बन्द करना पड़ा तथापि ऋषि दयानन्द ने जहां एक ओर सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय व ऋग्वेद-यजुर्वेद भाष्य आदि का प्रणयन किया वहीं उन्होंने व्यापकरण पर भी अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखकर अपने अनुयायियों को गुरुकुल स्थापित कर संस्कृत व वेदादि ग्रन्थों के पठन पाठन का मार्ग भी प्रशस्त किया था। ऋषि दयानन्द धर्मवेत्ता एवं समाज सुधारक सहित सच्चे देशभक्त, ऋषि, योगी व समस्त वैदिक साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान थे। उन्होंने वैदिक धर्म, इसकी मान्यताओं एवं सिद्धान्तों के प्रचार सहित समाज सुधार का अभूतपूर्व कार्य किया। 30 अक्टूबर, सन् 1883 को विष देकर उनकी हत्या कर वा करा दी गई जिस कारण वह अपनी भावी योजनाओं को पूर्ण न कर सके। यदि वह कुछ वर्ष और जीवित रहते तो वेदभाष्य का कार्य पूर्ण करने सहित गुरुकुलों की स्थापना कर अपने जैसे वैदिक धर्म के प्रचारक तैयार करने का प्रयत्न अवश्य करते। उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने सत्यार्थप्रकाश आदि उनके ग्रन्थों में शिक्षा विषयक विचारों को क्रियान्वित करने के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का कार्य किया। इसे दयानन्द ऐंग्लो-वैदिक स्कूल नाम दिया गया था जो बाद में एक वट वृक्ष बना और बताया जाता है कि सरकारी स्कूलों के बाद यही देश के सर्वाधिक लोगों को शिक्षित करने वाली सबसे बड़ी शिक्षण संस्था है। किन्हीं कारणों से दयानन्द ऐंग्लो वैदिक कालेज में संस्कृत को वह स्थान न मिला जिसकी वहां आवश्यकता थी और जिसका समर्थन स्वामी दयानन्द जी के विचारों से होता था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पंजाब की आर्य प्रतिनिधि सभा के एक प्रमुख सर्वप्रिय नेता स्वामी श्रद्धानन्द जी ने सन् 1902 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी ग्राम में एक गुरुकुल की स्थापना की जहां संस्कृत व्याकरण व भाषा का ज्ञान कराने के साथ वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन भी कराया जाता था। यह गुरुकुल कांगड़ी अपने समय में विश्व में विख्यात हुआ। इस शिक्षण संस्था में उन दिनों के भारत के वायसराय आये और इंग्लैण्ड के भावी प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड भी आये थे। इस गुरुकुल से संस्कृत भाषा के अध्येता अनेक स्नातक बने जिन्होंने समाज व देश में अपनी विद्या का लोहा मनवाया। कुछ पत्रकार बने तो कुछ वेदाचार्य वा धर्माचार्य, कुछ इतिहासकार तो कुछ नेता व सांसद बने। संस्कृत व हिन्दी भाषा के अध्यापन के क्षेत्र में तो अनेक स्नातकों ने अपनी सेवायें दी जिससे संस्कृत व हिन्दी का देश भर में प्रचार हुआ। समय के साथ साथ देश भर में ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के अनुयायियों ने गुरुकुलों की स्थापना की और वहां संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन कराया जिससे देश व समाज को वैदिक विद्वान व अध्यापक-प्राध्यापक मिलते आ रहे हैं। आर्यसमाज में अधिकांश पुरोहित भी हमारे गुरुकुलों के ही शिक्षित युवक होते हैं। स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण आदि भी विश्व प्रसिद्ध हस्तियां हैं जो आर्यसमाज के गुरुकुलों गुरुकुल खानपुर वा कालवां की देन हैं। यह गुरुकुल आन्दोलन निरन्तर आगे बढ़ रहा है। इसके मार्ग में अनेक कठिनाईयां भी हैं जिस पर गुरुकुलों के आचार्यों व हमारी सभाओं के नेताओं को मिलकर विचार करना चाहिये और उसके समाधान का निश्चय कर उसे क्रियान्वित करने के प्रयास भी करने चाहियें। गुरुकुलों से प्रतिवर्ष हमें व्याकरणाचार्य व धर्माचार्य मिलते रहते हैं परन्तु आर्यसमाज में उन्हें उचित दक्षिणा व वेतन पर कार्य नहीं मिलता। इसका परिणाम यह होता है कि वह अपनी आजीविका के लिए महाविद्यालयों व अन्य सरकारी संस्थाओं की ओर अपनी दृष्टि डालते हैं। उनमें जो योग्यतम होते हैं वह महाविद्यालायों एवं अन्य अच्छी सरकारी सेवाओं में चले जाते हैं। इससे आर्यसमाज व वैदिक धर्म उनकी सेवाओं से वंचित हो जाता है और वह प्रयोजन भी पूर्ण नहीं होता जिसके लिए गुरुकुल ने उन्हें तैयार किया था। इसमें दोष गुरुकुलों के स्नातकों का कम आर्यसमाज व इसकी सभा संस्थाओं व नेताओं का है जो इन्हें आर्यसमाज के कार्यों में उचित वेतन व दक्षिणा पर नियुक्ति नहीं दे पातीं। ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं कि स्नातक बन कर अच्छी सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेने पर सरकारी सेवाओं में कार्यरत हमारे गुरुकुल के स्नातक दो-चार व अधिक घंटे नियमित रूप से गुरूकुल व आर्यसमाज रूपी माता का ऋण चुकाने के लिए कार्य करते हों और इसके अन्तर्गत शोध, लेखन व निःशुल्क रूप से मौखिक प्रचार आदि करते हों। आज का भारतीय समाज उच्च मानवीय मूल्यों के ह्रास का शिकार है। इसके लिए स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी आदि हमारे मार्गप्रदर्शक व आदर्श बन सकते हैं। सभी स्नातकों से तो हम अपेक्षा नहीं कर सकते परन्तु योग्य विद्वानों का यह कर्तव्य है कि उन्होंने गुरुकुल व आर्यसमाज के सहयोग से जो ज्ञान प्राप्त किया है उसका कुछ लाभ वह गुरुकुल व आर्यसमाज को भी प्रदान करें। गुरुकुलों के सभी समर्थ स्नातकों को इसका ध्यान रखना चाहिये। हमें इस समस्या पर भी विचार करना चाहिये कि हम गुरुकुल के योग्य व योग्यतम आचार्यों को उचित दक्षिणा दें। यह तभी सम्भव होगा जब गुरुकुल के पास पर्याप्त साधन व धन हो। इतनी दक्षिणा तो मिलनी ही चाहिये कि जिससे आचार्य व उसके परिवार का आज की परिस्थितियों में भोजन व सन्तानों की शिक्षा आदि का निर्वाह हो सके। हमें लगभग 20 वर्ष पूर्व वृन्दावन व अनेक स्थानों पर जाने का अवसर मिला। हमने वहां देखा कि हमारे आचार्यों को बहुत न्यून वेतन मिलता था। इससे हमें लगता है कि भविष्य में हमारे सभी गुरुकुलों को योग्य आचार्य शायद हीं मिलें। एक बार श्री आदित्य मुनि जी ने भोपाल से प्रकाशित सभा की पत्रिका में अपने सम्पादकीय लेख में किसी गुरुकुल में आचार्यों के वेतन की समस्या पर प्रकाश डालते हुए टिप्पणी की थी कि वहां आचार्यों को वेतन बहुत ही कम मिलता है। उन्होंने यह भी लिखा था कि जितना वेतन होगा वैसा ही वहां शिक्षा का स्तर भी होगा। हम चाहते हैं कि समय समय पर हमारे गुरुकुलों के आचार्यों व आर्य नेताओं की जो बैठक व गोष्ठी हो, उनमें इस समस्या पर भी विचार हो। आर्यसमाज की सभाओं को यह भी प्रयास करने चाहिये कि उनके सभी गुरुकुल परस्पर एक दूसरे से एक परिवार की तरह जुड़े हुए हों। एक गुरुकुल में यदि कोई समस्या आये तो अन्य गुरुकुल, आर्यसमाज व सभायें उनका सहयोग करें। सभी गुरुकुलों का पाठ्यक्रम भी समान होना चाहिये। सर्वत्र ऋषि प्रणीत पाठविधि व आर्ष ग्रन्थों का ही पठन पाठन हो। आर्यसमाज के सदस्य व धनिक लोग ऋषि दयानन्द के सिद्धान्तों व पाठ विधि पर चलने वाले गुरुकुलों व उनके आचार्यों को उचित साधन उपलब्ध कराने के लिए तत्पर रहें। वर्तमान समय में आर्यसमाज की विचारधारा व पाठविधि के कितने गुरुकुल देश भर में चल रहे हैं, इसका डेटा व जानकारी किसी एक केन्द्रीय स्थान पर होनी चाहिये जिससे उन गुरुकुलों, आचार्यों व ब्रह्मचारियों आदि की संख्या का अनुमान आर्यसमाज के सुधी सदस्यों व नेताओं को हो सके। आज हमें पता नहीं कि देश में कुल कितने गुरुकुल चल रहें हैं और वहां लगभग कितने ब्रह्मचारी शिक्षा प्राप्त करते हैं? उन गुरुकुलों की स्थापना कब व किसके द्वारा हुई? उनके पास साधनों की स्थिति कैसी है? यह भी नहीं पता कि उन गुरुकुलों से अब तक कितने स्नातक बनें और वह कहां क्या कार्य करते हैं? उनमें से कितने आर्यसमाज को अपनी सेवाओं से कृतार्थ कर रहे हैं व आर्यसमाज से जुड़े हैं। अतः हमारे गुरुकुलों के संयुक्त सम्मेलनों में समय समय पर इन विषयों पर भी विचार होना चाहिये। ऐसे अनेक प्रश्न और हो सकते हैं जिन्हें गुरुकुलों के परस्पर सम्मेलनों में विद्वानों के सम्मुख रखा जाना चाहिये और जहां आवश्यकता हो वहां सुधार पर विचार किया जाना चाहिये। लेख को विराम देने से पूर्व हम यह भी निवेदन करना चाहते हैं कि वर्तमान समय में आर्यसमाज की सभाओं की शक्ति बिखरी हुई व असंगठित है जिससे आर्यसमाज को अपार हानि हो रही है। यदि यह विघटन जारी रहा तो इससे भविष्य में अतीत में हुई आर्यसमाज की हानि से अधिक हानि होगी। आने वाली पीढ़िया हमें क्षमा नहीं करेंगी। अतः आर्यसमाज के सभी नेताओं, अधिकारियों व आर्यसमाज के सुधी सदस्यों को इस ओर भी ध्यान देना चाहिये। ईश्वर सबको सद्प्रेरणा करें जिससे संगठन में मतभेद दूर हो सकें। वैदिक धर्म को वेदशास्त्रों सहित दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत, सत्यार्थप्रकाश तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि के अध्ययन से ही जाना व समझा जा सकता है। धर्म का पालन तभी कर सकते हैं जब हम वेदों सहित इतर समस्त वैदिक साहित्य का अध्ययन करेंगे। इससे सभी लोगों को स्वाध्याय की प्रवृत्ति वाला बनना समीचीन है। धर्म प्रचार के लिए पूर्णकालिक धर्मप्रचारक विद्वानों की आवश्यकता है जो वैदिकधर्म को समग्रता से जानते हों तथा जिनकी उपदेश शैली अत्यन्त सरल एवं प्रभावशाली है। उत्तम वेद प्रचारक विद्वान व धर्माचार्या गुरुकुल से अध्ययन किये हुए स्नातक ही हो सकते हैं। अतः गुरुकुलों की धर्म रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें गुरुकुलीय शिक्षा मंे निष्णात विद्वानों व प्रचारकों का सम्मान करने सहित उन्हें प्रचार के आवश्यक सभी साधन व सुविधायें उपलब्ध कराने पर ध्यान देना चाहिये। इसी से वैदिक धर्म की रक्षा व प्रचार का मार्ग प्रशस्त होगा। Read more » From Vedic ReligionTotalismPropaganda GurukuliyEducationOnly possible
लेख अमृत महोत्सव की परिकल्पना को साकार करता एकल अभियान June 27, 2022 / June 27, 2022 by सिद्धार्थ शंकर गौतम | Leave a Comment पूरा देश स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है। 75 वर्षों की स्वतंत्रता ने भारत को दुनिया के अग्रणी राष्ट्रों की कतार में सम्मिलित करवा दिया है तो उसके पीछे प्रेरणा है उस भाव की जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की अवधारणा को मानता है, उस शक्ति की जो समाज की एकजुटता से मिलती है, उस स्वाभिमान […] Read more » अमृत महोत्सव की परिकल्पना एकल अभियान
कविता ये कैसा स्वर्ग लोक जन्नत कश्मीर है? June 27, 2022 / June 27, 2022 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकये कैसा स्वर्ग लोक जन्नत कश्मीर है?बहुत बहाया इसने मानव का रुधिर है! आरंभ में कश्मीर था जनपद गांधार का,गांधार, कम्बोज था जंबूद्वीप भारत कासोलह महाजनपद में सम्मिलित हिस्सा! कश्मीर पश्चिमोत्तर में शारदा मठ से लेकरवनिहाल तक केशर की धरती का अंत छोर,शारदा पीठ स्थित मधुमती नदी के तीर पर,आज शारदा पीठ है […] Read more » What kind of heaven is this Lok Jannat Kashmir ये कैसा स्वर्ग लोक जन्नत कश्मीर है?
कविता पहला प्यार नहीं मिलता।। June 27, 2022 / June 27, 2022 by अजय एहसास | Leave a Comment हो जाती है शादी जबरनदिल का द्वार नहीं खुलताइस दुनिया में कभी किसी कोपहला प्यार नहीं मिलता । मिला साथ ना जीवन भर काबस कुछ पल ही साथ रहेछूटने में होती है मुश्किलजब हाथों में हाथ रहेहार गए दुनिया से तोबाहों का हार नहीं मिलताइस दुनिया में कभी किसी कोपहला प्यार नहीं मिलता।। है जो […] Read more » First love is not found.
लेख विधि-कानून ओबीसी के साथ क्रीमीलेयर का भेदभाव क्यों? June 27, 2022 / June 27, 2022 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment सत्यवान ‘सौरभ’ आरक्षण, सात दशकों के बावजूद, हमारे विषम समाज में कई समूहों के लिए लाभों के समान वितरण में अनुवादित नहीं हुआ है। नतीजतन, कई समूहों को छोड़ दिया गया है। आरक्षण का लाभ नहीं उठा पाने वाले हाशिए के तबके के लोगों की जोरदार मांग है। इसके लिए कुछ नीति विकल्प तैयार करने […] Read more » Reservation Why the discrimination of the creamy layer against OBC? ओबीसी के साथ क्रीमीलेयर का भेदभाव क्यों
कविता स्वधर्म को जानो बुराई नहीं अच्छाई मानो June 25, 2022 / June 25, 2022 by विनय कुमार'विनायक' | Leave a Comment —विनय कुमार विनायकमैं स्वधर्म को पहचानता हूंबुराई नहीं अच्छाई को जानता हूंमैं उस भगवान राम को मानता हूंजिन्होंने माता पिता की आज्ञा मानीअनुज हेतु त्याग,लघुजनों को मान दिया! मैं उस राम की निंदा करता हूंजिन्होंने अति आदर्शवाद दिखाकरपरित्याग किया धर्मपत्नी सीता का साथअबला नारी को वन-वन भटका दियाविप्र गुहार पर तपी शूद्र का संहार किया! […] Read more » consider it good not evil Know your religion स्वधर्म को जानो बुराई नहीं अच्छाई मानो
पर्यावरण लेख सार्थक पहल भारत में सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध की जरूरत। June 25, 2022 / June 25, 2022 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment -प्रियंका ‘सौरभ’ सिंगल यूज प्लास्टिक से तात्पर्य उन प्लास्टिक वस्तुओं से है जो एक बार उपयोग की जाती हैं और त्याग दी जाती हैं। एकल-उपयोग प्लास्टिक में निर्मित और उपयोग किए गए प्लास्टिक के उच्चतम प्रयोग में वस्तुओं की पैकेजिंग से लेकर बोतलों, पॉलिथीन बैग, खाद्य पैकेजिंग आदि शामिल है। यह विश्व स्तर पर उत्पादित […] Read more » ban single use plastic Need to ban single use plastic in India. सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध
लेख समाज जैव विविधता के महत्व को रेखांकित करती है सनातन भारतीय संस्कृति June 25, 2022 / June 25, 2022 by प्रह्लाद सबनानी | Leave a Comment सनातन हिंदू संस्कृति में किसी भी जीव की हत्या निषेध है और ऐसा माना जाता है कि अपने लिए पूर्व निर्धारित भूमिका को निभाने के उद्देश्य से ही विभिन्न जीव इस धरा पर जन्म लेते हैं एवं सभी जीवों में आत्मा का वास होता है। इसलिए हिंदू धर्मावलम्बियों द्वारा पशु, पक्षियों, पेड़, पौधों, नदियों, पर्वतों, […] Read more » Sanatan Indian culture underlines the importance of biodiversity जैव विविधता सनातन भारतीय संस्कृति