Category: साहित्‍य

कहानी

आज आया लाँघता मैं ! आज की अभी की

/ | Leave a Comment

गोपाल बघेल ‘मधु’ आज आया लाँघता मैं, ज़िन्दगी में कुछ दीवारें ; खोलता मैं कुछ किबाड़ें, झाँकता जग की कगारें ! मिले थे कितने नज़ारे, पास कितने आए द्वारे; डोलती नैया किनारे, बैठ पाते कुछ ही प्यारे ! खोजते सब हैं सहारे, रहे हैं जगती निहारे; देख पर कब पा रहे हैं, वे खड़े द्रष्टि पसारे ! क्षुब्ध क्यों हैं रुद्ध क्यों हैं, व्यर्थ ही उद्विग्न क्यों हैं; प्रणेता की प्रीति पावन, परश क्यों ना पा रहे हैं ! जा रहे औ आ रहे हैं, जन्म ले भरमा रहे हैं; ‘मधु’ घृत पी पा रहे हैं, नयन उनके खो रहे हैं ! ’

Read more »

कविता

प्रकाश धरा आ नज़र आता

/ | Leave a Comment

गोपाल बघेल ‘मधु’ प्रकाश धरा आ नज़र आता, अंधेरा छाया आसमान होता; रात्रि में चमकता शहर होता, धीर आकाश कुछ है कब कहता ! गहरा गहमा प्रचुर गगन होता, गुणों से परे गमन वह करता; निर्गुणी लगता पर द्रढी होता, कड़ी हर जोड़ता वही चलता ! दूरियाँ शून्य में हैं घट जातीं, विपद बाधाएँ व्यथा ना देतीं; घटाएँ राह से हैं छट जातीं, रहनुमा कितने वहाँ मिलवातीं ! भूमि गोदी में जब लिये चलती, तब भी टकराव कहाँ करवाती; ठहर ना पाती चले नित चलती, फिर भी आभास कहाँ करवाती ! संभाले सृष्टा सब ही करवाते, समझ फिर भी हैं हम कहाँ पाते; हज़म ‘मधु’ अहं को हैं जब करते, द्वार कितने हैं चक्र खुलवाते !

Read more »