कहानी साहित्य कैलाश September 26, 2016 by राजू सुथार | Leave a Comment आह ! क्या दिन है थोड़ी – थोड़ी ठंड पड़नी शुरू हो गई थी साथी संग कैलाश ठंड से ठिठक रहे थे । कैलाश अभी 10 साल का है और 7वीं कक्षा में पढ़ रहा है, इनकी दो बहने है और दो भाई है, कैलाश परिवार में सबसे छोटा है इस कारण माँ का लाड़ला […] Read more » Featured कैलाश
व्यंग्य साहित्य वाकई ! इस चमत्कार को नमस्कार है !! September 26, 2016 by तनवीर जाफरी | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि कोई बिल्कुल आम शहरी युवक बमुश्किल चंद दिनों के भीतर इतनी ऊंची हैसियत हासिल कर लें कि वह उसी माहौल में लौटने में बेचारगी की हद तक असहायता महसूस करे, जहां से उसने सफलता की उड़ान भरी थी। मैं बात कर रहा […] Read more » Featured
कहानी साहित्य मेन इन यूनिफ़ॉर्म September 24, 2016 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment धाँय ….धाँय ….धाँय ….. तीन गोलियां मुझे लगी ,ठीक पेट के ऊपर और मैं एक झटके से गिरा….गोली के झटके ने और जमीन की ऊंची -नीची जगह के घेरो ने मुझे तेजी से वहां पहुचाया , जिसे NO MAN’S LAND कहते है … मैं दर्द के मारे कराह उठा.. पेट पर हाथ रखा तो देखा […] Read more » Featured मेन इन यूनिफ़ॉर्म
कविता साहित्य तलाश पूरी हुई September 22, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment राजेश बाबू देहरादून में रहते हैं। उनकी बेटी सुमन एम.ए. के अंतिम वर्ष में थी। हर पिता की तरह वे भी उसके विवाह के लिए चिंतित थे। उनकी इच्छा थी कि परीक्षा के बाद इस सर्दियों में उसके हाथ पीले कर दिये जाएं। उन्होंने अपने मित्रों और सम्बन्धियों को यह कह रखा था कि उनकी […] Read more » Featured तलाश पूरी हुई
व्यंग्य साहित्य विश्व शांतिदूत कबूतर की रिहाई September 21, 2016 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment एम एम चन्द्रा कबूतर-1 हर साल होने शांति दिवस को लेकर शांति दूत कबूतरों की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है कोई भी हमारी सुनने वाला नहीं है. सबके सब कबूतरबाजी में लगे है और पतंगबाजी में यकीन करने लगे .जब यह दुनिया शांतिदूत कबूतरों की नहीं हो सकती तो हमें शांतिदूत होने […] Read more » कबूतर की रिहाई विश्व शांतिदूत
राजनीति व्यंग्य ऑपरेशन झाड़ूमार September 18, 2016 by विजय कुमार | Leave a Comment जीभ की लम्बाई, चौड़ाई या मोटाई के बारे में तो हमने अधिक बातें नहीं सुनीं, पर उसकी चंचलता के किस्से जरूर प्रसिद्ध हैं। कहते हैं एक बार दांतों ने हंसी-मजाक में जीभ को काट लिया। जीभ ने कुछ गुस्सा दिखाया; पर वह ठहरी कोमल और अकेली, जबकि दांत थे कठोर और पूरे बत्तीस। उसके गुस्से […] Read more » Featured ऑपरेशन झाड़ूमार
आलोचना अनाथ बच्चे बनाम केजरीवाल ! September 17, 2016 by हरिहर शर्मा | 1 Comment on अनाथ बच्चे बनाम केजरीवाल ! आज के दैनिक भास्कर में प्रकाशित दो आलेखों ने चेतना को झकझोर दिया ! श्री एन. रघुरामन के आलेख में झारखंड की राजधानी रांची से महज 20 कि.मी. दूर ब्राम्बे के एक स्कूल की कहानी है, जिसमें प्री नर्सरी से लेकर दसवीं क्लास तक के बच्चे पढ़ते है ! ये सभी बच्चे या तो अनाथ […] Read more » अनाथ बच्चे केजरीवाल
कविता साहित्य नारी का दर्द September 17, 2016 by चारु शिखा | Leave a Comment क्यों दर्द हैं उसकी बातों में हमेशा मुस्कुराती है जो , इतना अकेली क्यों हैं वो जो मर्यादित है , जो संयमित है, जो नाजुक है , जो शांत है , आखिर एक अबला है वह उसकी की देह तो सबको दिखती है। उसकी आंतरिक सुंदरता क्यों नहीं दिखती.. कहाँ सुरक्षित है वो घर -बाहर […] Read more » नारी का दर्द
राजनीति व्यंग्य साहित्य क्यों भई चाचा, हां भतीजा September 17, 2016 by विजय कुमार | 1 Comment on क्यों भई चाचा, हां भतीजा बचपन में स्कूल से भागकर एक फिल्म देखी थी ‘चाचा-भतीजा।’ उसमें एक गीत था, ‘‘बुरे काम का बुरा नतीजा, क्यों भई चाचा.., हां भतीजा।’’ फिल्म के साथ यह गाना भी उन दिनों खूब लोकप्रिय हुआ था। आजकल भी ये गाना उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में जूतों की ताल पर खूब बज रहा है। इस […] Read more » Akhilesh yadav Featured Shivpal Yadav चाचा भतीजा शिवपाल
व्यंग्य साहित्य पूंजी-राजनीति एकता जिंदाबाद September 17, 2016 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment एम. एम. चन्द्रा पूरी दुनिया के बड़े व्यापारी, पूंजीपति और वित्तीय संस्थान जी -5, जी 8, जी-20 और शक्तिशाली देशों की मीटिंग चल रही थी. विकासशील देश बाहर धरना दे रहे थे. हमें भी इन संस्थाओं में शामिल किया जाये. इन संस्थाओं ने मिलजुलकर यह तय किया कि जब तक बाहर खड़े देशों को यह […] Read more » एकता पूंजी पूंजी-राजनीति एकता राजनीति
कविता साहित्य शहर मर भी रहा है September 16, 2016 by अर्पण जैन "अविचल" | Leave a Comment हर शहर की सरहद के उस पार से कुछ ठंडी हवाएँ हर बार जरूर आती है अपने साथ सभ्यताओं का एक पुलिंदा भी साथ में गाहे-ब-गाहे जरूर ले आती हैं वही हवाएँ, शहरी हवाओं के साथ मिलकर एक रंग बना देती है रंग शहर के पुरातन के साथ भी अक्सर घुल-मिल जाया करता है जैसे […] Read more » शहर मर भी रहा है
आलोचना साहित्य आप के चाल, चरित्र और चिंतन पर संदेह के गहरे बादल September 16, 2016 by मृत्युंजय दीक्षित | 2 Comments on आप के चाल, चरित्र और चिंतन पर संदेह के गहरे बादल मृत्युंजय दीक्षित मात्र डेढ़ वर्ष में ही दिल्ली में शासन कर रही आम आदमी पार्टी का चाल, चरित्र और चिंतन अब देश की जनता के सामने जगजाहिर हो चुका है तथा लगातार हो रहा है ।वर्तमान समय में दिल्ली सरकार के महिला बाल विकास कल्याण मंत्री संदीप कुमार की सेक्स कांड वाली सीडी टी वी […] Read more » Featured आप आशुतोष चरित्र और चितन पर संदेह के गहरे बादल संजय सिंह संदीप कुमार