व्यंग्य साहित्य कौन समझे पुरबिया पुत्रों की पीड़ा …..!! October 25, 2016 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment पूरबिए रोजी - रोटी की तलाश में चाहे अपनी जड़ों से हजारों किलोमीटर दूर या परदेश ही निकल जाएं। लेकिन पिता रहते बाबूजी ही हैं। बेटे से सदा नाराज। बेटा कालेज में पढ़ रहा है, पर बाबूजी को उसकी शादी की चिंता खाए जा रही है। शादी हो गई, तो नाराज ... कि इसे तो घर - परिवार की कोई चिंता ही नहीं। बेटा नौकरी की तलाश में कहीं दूर निकल जाए या घर पर रह कर ही कोई धंधा - कारोबार करे, तो भी शिकायत। मड़हे में बैठ कर बेटे की बुराई ही करेंगे कि भैया , एेसे थोड़े धंधा - गृहस्थी चलती है। परिवार की गाड़ी खींचने के लिए हमने कम पापड़ नहीं बेले। लेकिन आजकल के लौंडों को कौन समझाएं... वगैरह - वगैरह चिर - परिचित जुमले। Read more » पुरबिया पुत्रों की पीड़ा
कविता साहित्य परिवारवाद October 25, 2016 by बीनू भटनागर | Leave a Comment परिवारवाद Read more » परिवारवाद
लेख ऋषि दयानन्द के भक्तों की प्रशंसा और पौराणिक छात्र को फटकार और पुराणों की आलोचना October 25, 2016 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment आर्यजगत के विख्यात विद्वान और राष्ट्रपति से सम्मानित संस्कृत के विद्वान पं. युधिष्ठिर मीमांसक जी जिज्ञासु जी के साथ तिवारी जी से पढ़ने जाते थे। यह संस्मरण उन्होंने अपनी आत्म-कथा में दिया है। ऐसे अनेक प्रेरणाप्रद संस्मरण उनकी आत्म कथा में और भी हैं। Read more » ऋषि दयानन्द
कविता साहित्य वाँशुरी ऐसी बजाई मोहन ! October 24, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment वाँशुरी ऐसी बजाई मोहन, लूटि कें लै गए वे मेरौ मन; रह्यौ कोरौ सलौनौ सूने- पन, शून्य में झाँकतौ रह्यौ जोवन ! चेतना दैकें नचायौ जीवन, वेदना दैकें वेध्यौ आपन-पन; कलेवर क्वारे लखे कोमल-पन, कुहक भरि प्रकटे विपिन बृन्दावन ! मधुवन गागरी मेरी झटके, मोह की माधुरी तनिक फुरके; पुलक-पन दै गए पलक झपके, नियति […] Read more » वाँशुरी ऐसी बजाई मोहन !
कविता साहित्य ऊर्जा October 24, 2016 by बीनू भटनागर | Leave a Comment कुछ दिन के लिये, लेखनी कभी रुक सी जाती है। कोई कविता या कहानी, जब नहीं भीतर कसमसाती है, तब कोई बन्दिश पुरानी, याद आती है, कोई सुरीली तान मन में, गुनगुनाती है। कहीं से शब्द जुड़ते हैं, कहीं पर भाव मुड़ते हैं, कोई रचना तभी, काग़ज पर उतरके आती है। कोई पढ़े या न […] Read more » ऊर्जा
कला-संस्कृति प्रवक्ता न्यूज़ लेख साहित्य पंचामृत October 24, 2016 / October 24, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment आयुर्वेद की दृष्टि से चरणामृत स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार तांबे में अनेक रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है। यह पौरूष शक्ति को बढ़ाने में भी गुणकारी माना जाता है। तुलसी के रस से कई रोग दूर हो जाते हैं और इसका जल मस्तिष्क को शांति और निश्चिंतता प्रदान करता हैं। Read more » Featured पंचामृत
कला-संस्कृति लेख साहित्य अमृत कलश में भरे सोम रस का रहस्य October 23, 2016 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment प्रमोद भार्गव श्रावकों, कलश में भरे इस अमृत को अगर आप अलौकिक पेय द्रव्य न मानकर चलें, तो आपको इस पदार्थ को समझने में ज्यादा आसानी होगी। हम सभी सुनते-पढ़ते चले आ रहे हैं कि वैदिक देवता सोमरस पीते थे। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में इसे सोमलता नामक वनस्पति से बनाने का उल्लेख है। इसलिए सोमलता […] Read more » Featured अमृत कलश सोम रस सोम रस का रहस्य
व्यंग्य साहित्य सोशल मीडिया इंश्योरेंस : लिखने की आजादी October 22, 2016 by एम्.एम्.चंद्रा | Leave a Comment सोशल मीडिया पर बोलने से पहले न सोचने की जरूरत है न पढ़ने की. जब किसी के लिखे को पढ़ने की जरूरत ही नहीं तो सोचने की जरूरत किसे है. आज किसके पास इतना टाइम रखा है जो पहले सो बार सोचे. जितना समय सोचने में लगायेगे, उतने समय में तो सोशल मीडिया पर लिख देंगे. आज टाइम की कीमत, लिखने की कीमत है, सोचने की नहीं. सोचने का काम दूसरे लोग करे. समझदार व्यक्ति वही होता है जो लिख दे, रही बात लेने- देने की तो वह सोशल मीडिया इंश्योरेंस कंपनी कर ही देंगी. Read more » लिखने की आजादी सोशल मीडिया इंश्योरेंस
कविता साहित्य अब न चुप रह पाऊंगी October 19, 2016 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment अब न चुप रह पाऊंगी Read more » अब न चुप रह पाऊंगी
लेख साहित्य नारी के बारे में तुलसीदास जी के विचार October 17, 2016 / October 17, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | 14 Comments on नारी के बारे में तुलसीदास जी के विचार तमाम सीमाओं और अंतर्विरोधों के बावजूद तुलसी लोकमानस में रमे हुए कवि हैं। वे गृहस्थ-जीवन और आत्म निवेदन दोनों अनुभव क्षेत्रों के बड़े कवि हैं। तुलसी भक्ति के आवरण में समाज के बारे में सोचते हैं। इनकी साधना केवल धार्मिक उपदेश नहीं है वह लोक से जुड़ी हुई साधना है। Read more » गोस्वामी तुलसीदास तुलसीदास नारी के बारे में तुलसीदास जी के विचार
कविता साहित्य कुछ तो है हममें October 14, 2016 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment कुछ तो है हममें जिससे यह दिल ही दिल में ख़ौफ़ खाते हैं। कुछ तो है हममें जिसे यह दुनिया वाले सदियों से झुठलाते हैं। Read more » कुछ तो है हममें
व्यंग्य बहिष्कारी तिरस्कारी व्यापारी October 14, 2016 by आरिफा एविस | 2 Comments on बहिष्कारी तिरस्कारी व्यापारी हिष्कार जनता को नहीं करना है. यह काम नेताओं का है क्योंकि वे लोग तो दिलो जान से स्वदेशी हैं. देखो न सदियों से अब तक सफेदपोश ही हैं. खादी पहन कर ही सारे समझौते विदेशी कम्पनियों से हो सकते हैं. बहिष्कार करना स्वदेशी होने की निशानी है लेकिन विदेशी कम्पनियों से नित नए समझौते करना और लुभावने ऑफर देकर अपने यहाँ स्थापित करना उससे बड़ा स्वदेशीपन है Read more » तिरस्कारी बहिष्कारी व्यापारी