कहानी साहित्य प्रेम की जीत !! February 29, 2016 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment बिहार के दरभंगा जिले के दो परिवार है . एक है भूमिहार और दूसरा क्षत्रिय. दोनों के परिवार एक दुसरे से अपरिचित है . दो अलग अलग जगहों में रहते है . दोनों के बच्चे शहर में जाकर एक ही कॉलेज में एडमिशन लेते है . भूमिहार परिवार का पुत्र का नाम राजेश है और […] Read more » प्रेम की जीत !!
कहानी साहित्य बेटी February 29, 2016 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment आज शर्मा जी के घर में बड़ी रौनक थी, उनकीएकलौतीबेटी ममता की शादी जो थी. बहुत से मेहमानों से घर भरा हुआ था, दरवाजे पर शहनाई बज रही थी, खुशियों का दौर था. शर्मा जी बड़े व्यस्त थे. फेरे हो रहे थे.बेटी की विदाई के बारे में सोच सोच कर ही शर्मा दम्पति […] Read more » बेटी
कहानी साहित्य दंगा February 29, 2016 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment कल से इस छोटे से शहर में दंगे हो रहे थे. कर्फ्यू लगा हुआ था. घर, दूकान सब कुछ बंद थे. लोग अपने अपने घरो में दुबके हुए थे. किसी की हिम्मत नहीं थी कि बाहर निकले. पुलिससडको पर थी. ये शहरछोटा सा था, पर हर ६ – ८ महीने में शहर में दंगा […] Read more » short story on riots दंगा
कहानी साहित्य माँ February 29, 2016 / February 29, 2016 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment मैंने रेडसिग्नल पर अपनी स्कूटर रोकी . ये सिग्नल सरकारी हॉस्पिटल के पास था . उस जगह हमेशाबहुत भीड़ रहती थी.मरीज , बीमार, उनके रिश्तेदार और भी हर किस्म के लोगो की भीड़ हमेशा वहां रहती थी, अब चूँकि सरकारी हॉस्पिटल था तो गरीब लोग ही वहां ज्यादा दिखाई देते थे. अमीर किसी और […] Read more » short story on mother मां
व्यंग्य साहित्य अगड़ों मे अगड़े, पिछड़ों मे पिछड़े February 26, 2016 by बीनू भटनागर | 2 Comments on अगड़ों मे अगड़े, पिछड़ों मे पिछड़े आजकल जाति के आधार पर पिछड़ापन तय हो रहा है तो मैने सोचा अपनी जाति के अगड़े पिछड़े परकुछ रिसर्च करूँरिसर्च तो वैसे घर बैठे करने के लिये विकीडिया ही काफ़ी है पर किसी यूनिवर्सिटी से रि सर्च हो तो नाम के आगे डाक्टर का ठप्पा लगाना बड़ा अच्छा लगे गा।बड़ी पुरानी ख़वाहिश करवट ले रही है।रिसर्च के लियें आजकल सबसे अधिक चर्चित यूनीवर् सिटी तो जे.एन यू, ही और वहाँ ना उम्र की सीमा है, ना जन्म का है बंधन…….. और जे. एन यू. मे सोश्योलोजी मे शोध छात्रा बन जाऊं या ऐन्थोपौलोजी की , चाहें […] Read more » satire on reservation system
कहानी साहित्य मजबूरी February 26, 2016 by विजय कुमार | 1 Comment on मजबूरी चंदन मेरा बचपन का दोस्त है। हम दोनों हमउम्र हैं। घर भी एक ही गली में है। वह मुझसे दो महीने बड़ा है; पर पढ़ना हम दोनों ने एक ही स्कूल और कक्षा में साथ-साथ शुरू किया। स्कूल जाते समय मेरे पिताजी अपनी साइकिल पर हम दोनों को ले जाते थे, तो वापसी पर यही […] Read more » Featured मजबूरी
कविता साहित्य ताज महोत्सव February 26, 2016 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment भावांजलि डा. राधेश्याम द्विवेदी’’ नवीन’’ दस दिन का संगीत रहा । मीत यहां पर झूम रहा । ताज महल की साया है। ताज महोत्सव आया है रंग रंगीला ताज महोत्सव। सुर संजीला ताज महोत्सव । जित देखो तित अच्छा है। यहां दिल होता बच्चा है। शिल्पी व्यंजन झूले हैं। अफसर लगते दूल्हे हैं। आर्ट क्राफट […] Read more » ताज महोत्सव
कहानी साहित्य विश्वनाथ February 25, 2016 by बलवन्त | Leave a Comment ‘विश्वनाथ! अरे ओ हमार लाल, कहाँ चला गवा रे तू! तोरे बिना हमार मन नाहीं लागत है रे! हे भगवान! हमार बिटवा के हमरे पास वापस भेज दे, ना त हमरा के उके पास भेज दे भगवान!’ गुलेटन दास अपने प्यारे बेटे को याद कर रोये जा रहा था, तभी उसके छोटे बेटे की पत्नी […] Read more » विश्वनाथ
कविता साहित्य वह गोद मेरी लेट कर ! February 25, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment वह गोद मेरी लेट कर, ताके सकल सृष्टि गया; मेरी कला-कृति तक गया, झाँके प्रकृति की कृति गया ! देखा कभी मुझको किया, लख दूसरों को भी वह गया; मन की कभी कुछ कह गया, वह सुने सब उर सुर गया ! प्राय: पलट सहसा उलट, वह अनेकों लीला किया; मन माधुरी से भर दिया, […] Read more » वह गोद मेरी लेट कर !
कविता साहित्य वह समझता मुझको रहा ! February 25, 2016 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment वह समझता मुझको रहा, मैं झाँकता उसको रहा; वह नहीं कुछ है कह रहा, मैं बोलता उससे रहा ! अद्भुत छवि आलोक रवि, अन्दर समेटे वह हुआ; नयनों से लख वह सब रहा, स्मित वदन बस कह रहा ! हाथों पुलक पद प्रसारण, भौंहों से करता निवारण; भृकुटी पलट ग्रीवा उलट, वह द्रश्य हर जाता […] Read more » वह समझता मुझको रहा !
व्यंग्य साहित्य उनकी आजादी व हमारी असहिष्णुता February 25, 2016 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डॉ० व्योमेश चित्रवंश मैं शांति से बैठा अख़बार पढ़ रहा था, तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया। स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा और अख़बार से चटाक हो गया और दो-एक मच्छर ढेर हो गए.!! फिर क्या था उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि मैं असहिष्णु हो गया हूँ.!! […] Read more » उनकी आजादी व हमारी असहिष्णुता
व्यंग्य साहित्य अगले जन्म मोहे “सामान्य” ना कीजो February 24, 2016 / February 29, 2016 by अमित शर्मा (CA) | Leave a Comment अपने देश में सामान्य वर्ग का होना उतनी ही सामान्य बात हैं जितनी की कांग्रेस सरकारों में भ्रष्टाचार का होना। लेकिन अगर सामान्यता में योग्यता का समावेश ना हो तो फिर ऐसी “अनारक्षित-असामान्यता” का देश में उतना ही मूल्य रह जाता हैं जैसे किसी मार्गदर्शक मंडल के नेता का किसी पार्टी में। सामान्य श्रेणी […] Read more » satire on reservation system