व्यंग्य उधार के सपने November 22, 2015 by मनोज कुमार | 1 Comment on उधार के सपने मनोज कुमार बैंक के भीतर जाना मेरे लिए आसान नहीं होता है। एक साहस का काम है और साहस जुटाकर जैसे ही मैंने बैेंक के दरवाजे पर पैर रखा, वहां कागज पर छपी इबारत सहसा मेरा ध्यान खींचकर ले गई। ‘सपने पूरे करें, किश्तों में मोबाइल लें।’ यानि दूसरे के महंगे मोबाइल की ओर ताकने […] Read more » उधार के सपने
साक्षात्कार साहित्य आजम हैं मुसलमानों के आदित्यनाथ- मुनव्वर राना November 22, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment हमारे विरोध का तरीका है पुरस्कार वापसी हुकूमत का मतलब सिर्फ केंद्र से नहीं बल्कि राज्य से भी है ‘’किसी के हिस्से में मकां आया तो किसी के हिस्से में दुकां आई मैं घर में सबसे छोटा था तो मेरे हिस्से में मां आई.’’ जी हां इन शब्दों और दमदार आवाज के साथ भारत के […] Read more » आजम हैं मुसलमानों के आदित्यनाथ मुनव्वर राना
व्यंग्य साहित्य भींगे सिर सरकारी तेल…!! November 22, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा कॉमर्स का छात्र होने के बावजूद शेयर मार्केट का उतार – चढ़ाव कभी अपने पल्ले नहीं पड़ा। सेंसेक्स में एक उछाल से कैसे किसी कारोबारी को लाखों का फायदा हो सकता है, वहीं गिरावट से नुकसान , यह बात समझ में नहीं आती। अर्थ – व्यवस्था की यह पेचीदगी राजनीति में भी […] Read more » भींगे सिर सरकारी तेल...!!
लेख विविधा समाज मानवता के विकास में बाधा बनती कट्टरता November 20, 2015 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment संदर्भःपेरिस में पत्रकारों पर हमला प्रमोद भार्गव यह विडंबना ही है कि एक तरफ दुनिया चहुंमुखी एवं सुविधायुक्त विकास की ओर बढ़ रही है, वहीं इस्लामिक उग्रवाद और असहिष्णुता विश्वव्यापी हो रही है। यह ठीक है कि फ्रांस जैसे कायरतापूर्ण हमलों का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर, अर्से तक ठहरने वाला नहीं है। पत्रकारों […] Read more » Featured कट्टरता बाधा बनती कट्टरता मानवता के विकास में मानवता के विकास में बाधा बनती कट्टरता
कविता साहित्य पुरा अवशेष November 20, 2015 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | 1 Comment on पुरा अवशेष दीखते पुरावशेष निस्तेज ,आज भी करते हैं अट्टहास । नष्ट होते रहते पल पल, गर्व से लेते हैं उच्छवास ।। समाधि में रहे जो लीन, अमर है आज सभी के साथ। शान्त अवशेष सा रहा बैठ, लगाया जादूगर सा आस।। जगी आंखें गई अब खुल, लगी गैंती कुदाल की चोट। पुराना बरसों […] Read more » पुरा अवशेष
कविता राजनीति साहित्य आज की हालत November 20, 2015 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | 1 Comment on आज की हालत डा. राधेश्याम द्विवेदी ’नवीन’ कोई गांधी की दुहाई देता कोई अम्बेडकर की , कोई लोहिया का फालोवर है कोई सरियत की। पर इन्सान में इन्सानिसत ढ़ूढ़े नहीं मिलती , अपने मन की सभी करते न फिकर औरों की।। शायद ही कोई कांग्रेसी गांधी को दिल से माने , शायद ही कोई मुस्लिम नारी को अपने […] Read more » Featured आज की हालत
कला-संस्कृति महत्वपूर्ण लेख लेख साहित्य हिंद स्वराज हिन्दू धर्म ही नहीं जीवन दर्शन है November 18, 2015 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | 3 Comments on हिन्दू धर्म ही नहीं जीवन दर्शन है डा राधेश्याम द्विवेदी हिन्दू राष्ट्र और हिन्दू धर्म को लेकर पूरे देश में कुछ लोगों ने एक मुहिम चला रखी है । अनेक राजनेता एवं धार्मिक जन इसका उल्टा.सीधा अर्थ निकालकर देश की भोली भाली जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं । वे अपनी पूर्वाग्रहयुक्त बातों को समाज एवं राष्ट्र पर थोपने का प्रयास कर […] Read more » Featured hindu Hinduism हिन्दू धर्म जीवन दर्शन है हिन्दू धर्म है
कविता साहित्य अगर बन November 17, 2015 / November 17, 2015 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | 3 Comments on अगर बन डा. राधेश्याम द्विवेदी ‘नवीन‘ आर्यावर्त के भारतखण्ड में ब्रजमण्डल की धरती है । बारह वन चौबीस उपवन में अगर वन की बस्ती है ।। विन्ध्यांचल अरावली मध्य , भन्दर कौमूर पहाड़ियां हैं । भदरौली रसूल मदनपुरा , चुड़ियाली की चोटियां हैं। जरौती सुनौठी पथसाल , चित्रखुदी पहाड़ियां हैं। बदरौली जजौली में , आदिम युग की […] Read more » Featured अगर बन
लेख साहित्य महुवा डाबर : एक और जलियावालाबाग की अनकही कहानी November 17, 2015 / November 17, 2015 by डा. राधेश्याम द्विवेदी | Leave a Comment डा. राधेश्याम द्विवेदी 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन में बस्ती मण्डल का योगदान सामान्य ही रहा। जिस समय यह जिला बना था उस समय यह गोरखपुर का भाग था। इसका कोई नागरिक केन्द्र नहीं था। इसके इतिहास को गोरखपुर के इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता है साथ ही गोण्डा एवं फैजाबाद से भी […] Read more » Featured एक और जलियालाबाग एक और जलियालाबाग की अनकही कहानी महुवा डाबर
व्यंग्य साहित्य सेल कुंआरी, सब पर भारी November 16, 2015 by अशोक गौतम | Leave a Comment कई दिनों से बाजार में तरह- तरह की फेस्टिव आॅफरों के शोर शराबे ने जीना मुहाल कर रखा था। राम के आने और लक्ष्मी के जाने के बाद अभी भी रहा सहा दिन का चैन, रातों की नींद दोनों गायब है। कम्बखत बाजार ने दिन- रात दौड़ा- दौड़ा कर मार दिया, मैं थक गया पर […] Read more » Featured सब पर भारी सेल कुंआरी
आलोचना साहित्य आलोचना की हद ! November 16, 2015 / November 18, 2015 by अवन्तिका चन्द्रा | Leave a Comment दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्त्रिक देश भारत की सबसे अच्छी खूबी यह है की यहाँ बड़े से बड़ा और सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी अपने देश की सरकार से सवाल पूछने और उसकी कमी बताने के लिए स्वतंत्र है . आज विश्व के बहुत से देशों के लोग जहा अपनी ही सरकार की तानाशाही सहने […] Read more » Featured आलोचना की हद !
व्यंग्य साहित्य सत्ता की सांप – सीढ़ी….!! November 15, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझा बचपन में कागज के गत्ते पर सांप – सीढ़ी का खेल खूब खेला। बड़ा रोमांचक और भाग्य पर निर्भर होता था यह खेल। घिसटते हुए आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन तभी नसीब की सीढ़ी मिल गई और पहुंच गए शिखर पर। वहीं लगा बस अब मंजिल पर पहुंचने ही वाले है, तभी […] Read more » Featured सत्ता की सांप – सीढ़ी....!!