आलोचना मुझे खेद है कि आप जिस व्यवस्था को बदलने आये थे उस व्यवस्था का अंग बन चुके हैं। June 25, 2015 by बीनू भटनागर | 3 Comments on मुझे खेद है कि आप जिस व्यवस्था को बदलने आये थे उस व्यवस्था का अंग बन चुके हैं। एक पत्र प्रिय अरविंद, जब से आम आदमी पार्टी बनी थी, एक उम्मीद थी कि ये राजनीति देश मे परिवर्तन लायेगी, भले ही समय लगे। 2013 मे ‘’आप’’ ने 28 सीटें जीती तो लगा कि जनता ये परिवर्तन चाहती है, फिर आप ने बहुत सोच समझने के बाद जनता से पूछकर सरकार बनाई तो आप […] Read more » Featured letter to Arvind Kejriwal
गजल नज़्म June 23, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -राघवेन्द्र कुमार “राघव”- किसी की तासीर है तबस्सुम, किसी की तबस्सुम को हम तरसते हैं । है बड़ा असरार ये, आख़िर ऐसा क्या है इस तबस्सुम में ।। देखकर जज़्ब उनका, मन मचलता परस्तिश को उनकी । दिल-ए-इंतिख़ाब हैं वो, इश्क-ए-इब्तिदा हुआ । उफ़्क पर जो थी ख़ियाबां, उसकी रंगत कहां गयी । वो गवारा […] Read more » Featured गजल तबस्सुम नज़्म
गजल रहते हुए भी हो कहां June 22, 2015 by गोपाल बघेल 'मधु' | 1 Comment on रहते हुए भी हो कहां -गोपाल बघेल ‘मधु’- (मधुगीति १५०६२१) रहते हुए भी हो कहाँ, तुम जहान में दिखते कहाँ; देही यहाँ बातें यहाँ, पर सूक्ष्म मन रहते वहाँ । आधार इस संसार के, उद्धार करना जानते; बस यों ही आ के टहलते, जीवों से नाता जोड़ते । सब मुस्करा कर चल रहे, स्मित-मना चित तक रहे; जाने कहाँ तुम […] Read more » Featured गजल रहते हुए भी हो कहां
गजल खोया हूं मैं June 22, 2015 / June 22, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment –मनीष सिंह- खोया हूँ मैं हक़ीक़त में और फ़साने में , ना है तुम बिन कोई मेरा इस ज़माने में। तुम साथ थे तो रौशन था ये जहाँ मेरा , अब जल जाते हाथ अँधेरे में शमा जलाने में। यूँ तो मशरूफ कर रखा है बहुत खुद को , फिर भी आ […] Read more » Featured खोया हूँ मैं गजल
कविता विविधा उड़ान June 19, 2015 / June 19, 2015 by श्रद्धा सुमन | Leave a Comment कोई बता दे मुझे मेरी पहचान क्या है हूँ दीया कि बाती, या फिर उसकी पेंदी का अंधकार, हूँ तिलक उनकी ललाट पर या बस म्यान में औंधी तलवार… है आज द्वंद उठी, आंधी सवालों की एक हूक थी दबी जो अब मार रही चित्कार… हूँ कलश पल्लव से ढ़की, या बस चरणोदक या फिर […] Read more » Featured उड़ान
विविधा व्यंग्य आलेख : एंग्लो इंडियन को विशेष सुविधाएं क्यों ? June 17, 2015 / June 17, 2015 by विजय कुमार | Leave a Comment भारत में एंग्लो इंडियन (आंग्ल भारतीय/आ.भा.) कितने हैं, इसके ठीक आंकड़े उपलब्ध नहीं है। देश में कई स्थानों पर ये रहते हैं; पर इन्हें संविधान द्वारा कई विशेष सुविधाएं दी जाती हैं। भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान अधिकांश अंग्रेज अधिकारी अकेले ही रहते थे। ऐसे में उनके कई भारतीय महिलाओं से वैध/अवैध सम्बन्ध बन […] Read more » Featured एंग्लो इंडियन
व्यंग्य मौसम अपना – अपना …! June 16, 2015 / June 16, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment -तारकेश कुमार ओझा- इस गलतफहमी में आप कतई न पड़ें कि मैं किसी समाजवादी आंदोलन का सिपाही हूं। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे अपनी खटारा साइकिल से मोह बचपन से ही है। उम्र गुजर गई लेकिन आज न तो साइकिल से एक पायदान ऊपर उठ कर बाइक तक पहुंचने की अपनी हैसियत बना पाया और […] Read more » Featured मौसम मौसम अपना – अपना व्यंग्य
कविता आज भी न बरसे कारे कारे बदरा June 13, 2015 by श्रीराम तिवारी | Leave a Comment -श्रीराम तिवारी- आज भी न बरसे कारे कारे बदरा, आषाढ़ के दिन सब सूखे बीते जावे हैं । अरब की खाड़ी से न आगे बढ़ा मानसून , बनिया बक्काल दाम दुगने बढ़ावे है। वक्त पै बरस जाएँ कारे–कारे बदरा , दादुरों की धुनि पै धरनि हरषावे है।। कारी घटा घिर आये ,खेतों में बरस जाए , सारंग की धुनि संग सारंग भी गावै है। बोनी की बेला में जो देर करे […] Read more » Featured आज भी न बरसे कारे कारे बदरा कविता बारिश कविता
व्यंग्य व्यंग्य बाण : मिलावट के लिए खेद है June 13, 2015 by विजय कुमार | Leave a Comment –विजय कुमार- गरमी में इन्सान तो क्या, पेड़–पौधे और पशु–पक्षियों का भी बुरा हाल हो जाता है। शर्मा जी भी इसके अपवाद नहीं हैं। कल सुबह पार्क में आये, तो हाथ के अखबार को हिलाते हुए जोर–जोर से चिल्ला रहे थे, ‘‘देखो…देखो…। क्या जमाना आ गया है ?’’ इतना कहकर वे जोर–जोर से हांफने लगे। […] Read more » Featured मिलावट मिलावट के लिए खेद है व्यंग्य
कविता परिंदे June 10, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -मनोज चौहान- 1) कविता / परिंदे मैं करता रहा, हर बार वफा, दिल के कहने पर, मुद्रतों के बाद, ये हुआ महसूस कि नादां था मैं भी, और मेरा दिल भी, परखता रहा, हर बार जमाना, हम दोनों को, दिमाग की कसौटी पर । ता उम्र जो चलते रहे, थाम कर उंगली, वो ही […] Read more » Featured कविता परिंदे
कविता मौत एक गरीब की June 10, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | 3 Comments on मौत एक गरीब की -मीना गोयल ‘प्रकाश’- कुछ वर्ष पहले हुई थी एक मौत… नसीब में थी धरती माँ की गोद … माँ का आँचल हुआ था रक्त-रंजित… मिली थी आत्मा को मुक्ति… सुना है आज अदालत में भी… हुई हैं कुछ मौतें… है हैरत की बात… नहीं हुई कोई भी आत्मा मुक्त… होती है मुक्त आत्मा… मर […] Read more » Featured कविता मौत एक गरीब की
कहानी आंटी नहीं फांटी… June 10, 2015 / June 10, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -क़ैस जौनपुरी- “चार समोसे पैक कर देना.” जी, और कुछ? और…ये क्या है? ये साबुदाना वड़ा है. ये भी चार दे देना. नाश्ते की दुकान पर खड़ा लड़का ग्राहक के कहे मुताबिक चीजें पैक कर रहा है. ग्राहक नज़र घुमा के चीजों को देख रहा है. दुकान में बहुत कुछ है. जलेबी…लाल इमिरती…और वो क्या […] Read more » Featured आंटी नहीं फांटी कहानी