कविता मां June 8, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment -विजय कुमार सप्पाती- “माँ / तलाश” माँ को मुझे कभी तलाशना नहीं पड़ा; वो हमेशा ही मेरे पास थी और है अब भी .. ! लेकिन अपने गाँव/छोटे शहर की गलियों में , मैं अक्सर छुप जाया करता था ; और माँ ही हमेशा मुझे ढूंढ़ती थी ..! और मैं छुपता भी इसलिए था […] Read more » Featured कविता मां मां कविता मां पर कविता
कविता सबसे खूबसूरत हो तुम June 8, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -मनीष सिंह- बाहर से जितनी मासूम , मन से भी उतनी खूबसूरत हो तुम , एक कलाकार की पूरी मेहनत से तराशी गयी जैसे मूरत हो तुम। एक कवि की सबसे प्यारी कल्पना , चित्रकार की सबसे बड़ी रचना , कभी सबसे अच्छा ख़्वाब और कभी सबसे प्यारी हकीकत हो तुम। जैसे खिलता […] Read more » Featured कविता सबसे खूबसूरत हो तुम
साहित्य भाषा और समाज June 6, 2015 / June 6, 2015 by गंगानन्द झा | 1 Comment on भाषा और समाज -गंगानंद झा- बात सन् 1989 की है, ‘बाबरी मस्जिद-राम मन्दिर’ का हंगामा चल रहा था, तभी कुछ दोस्तों ने शहर की दीवालों पर जगह-जगह चिपके बहुत सारे पोस्टर्स की ओर ध्यान दिलाया । ये पोस्टर्स उर्दू में थे, इनके मज़मून के बारे में कहा जा रहा था कि मुसलमानों को बाबरी मस्जिद के नाम पर […] Read more » Featured उर्दू देश भाषा भाषा और समाज समाज हिन्दी
कविता बस, मैं और चाँद June 5, 2015 by बीनू भटनागर | Leave a Comment -बीनू भटनागर- थोड़ी सी बूँदे गिरने से, धूल बूँदों मे घुलने से, हर नज़ारा ही साफ़ दिखता है। रात सोई थी मैं, करवटें बदल बदल कर, शरीर भी कुछ दुखा दुखा सा था, पैर भी थके थके से थे, मन अतीत मे कहीं उलझा था। खिड़की की ओर करवट लिये, रात सोई थी मैं। […] Read more » Featured कविता चांद कविता बस मैं और चाँद
कविता तुझे भुलाने की कोशिश में… June 4, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -बीना रौतेला- तुझे भुलाने की कोशिश मे, खुद को ही मैं भुल गयी। दूर जाने की कोशिश मे, पास तेरे मैं आ गयी॥ मिटाकर तेरी यादे जब, दूर हो जाने लगी। कदम बढ़ाया था जो मैंने, खुद पीछे हो जाने लगी॥ तुझे भुलाने की कोशिश मे, खुद को ही मैं भुल गयी। […] Read more » Featured तुझे भुलाने की कोशिश में... कविता
कहानी चेहरा June 2, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -मोनी सिंह- सुबह उठते ही शीशे में मैं अपना चेहरा देखा करती हूं। हर दिन की शुरूआत मेरी वहीं से होती है। जिस दिन न देखूं कुछ अधूरा सा लगता है। ऐसा लगता है जैसे मैने खाना न खाया हो। किसी से बात करने का मन नही होता। अजीब से ख्याल आते मेरे मन में। […] Read more » Featured कहानी चेहरा
कविता जादूगरी जो जानते June 2, 2015 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment -गोपाल बघेल ‘मधु’- (मधुगीति १५०५२६-५) जादूगरी जो जानते, स्मित नयन बस ताकते; जग की हक़ीक़त जानते, बिन बोलते से डोलते। सब कर्म अपने कर रहे, जादू किए जैसे रहे; अज्ञान में जो फिर रहे, उनको अनौखे लग रहे । हैं नित्य प्रति आते यहाँ, वे जानते क्या है कहाँ; बतला रहे बस वही तो, आते […] Read more » Featured कविता जादूगरी जो जानते
व्यंग्य प्रमाणित करता हूं कि मैं आम आदमी हूं…! June 2, 2015 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment -तारकेश कुमार ओझा- कहते हैं गंगा कभी अपने पास कुछ नहीं रखती। जो कुछ भी उसे अर्पण किया जाता है वह उसे वापस कर देती है। राजनीति भी शायद एसी ही गंगा हो चुकी है। सत्ता में रहते हुए राजनेता इसमें जो कुछ प्रवाहित करते हैं कालचक्र उसे वह उसी रूप में वापस कर देता […] Read more » Featured आम आदमी प्रमाणित करता हूं कि मैं आम आदमी हूं व्यंग्य
व्यंग्य केले.. ले लो, संतरे.. ले लो! May 30, 2015 / May 30, 2015 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम- वह इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का मजनू फिर अपनी प्रेमिका के कूचे से आहत हो आते ही मेरे गले लग फूट- फूट कर रोता हुए बोला,‘ दोस्त! मैं इस गली से ऊब गया हूं। इस गली में मेरा अब कोई नहीं। मैं बस अब आत्महत्या करना चाहता हूं। बिना दर्द का कोई […] Read more » केले.. ले लो व्यंग्य संतरे.. ले लो! हास्य. featured
कविता झकझोरता चित चोरता (मधुगीति १५०५०५-३) May 29, 2015 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment -गोपाल बघेल ‘मधु’- झकझोरता चित चोरता, प्रति प्राण प्रण को तोलता; रख तटस्थित थिरकित चकित, सृष्टि सरोवर सरसता । संयम रखे यम के चखे, उत्तिष्ठ सुर उर में रखे; आभा अमित सुषमा क्षरित, षड चक्र भेदन गति त्वरित । वह थिरकता रस घोलता, स्वयमेव सबको देखता; आत्मा अलोड़ित छन्द कर, आनन्द हर उर फुरकता । […] Read more » Featured कविता झकझोरता चित चोरता
कविता मैं संस्कृति संगमस्थल हूँ May 29, 2015 by नरेश भारतीय | Leave a Comment –नरेश भारतीय- बनती बिगड़ती आई हैं युगों से सुरक्षित, असुरक्षित टेढ़ी मेढ़ी या समानांतर जोर ज़बरदस्ती या फिर व्यापार के बहाने, घुसपैठ के इरादे से वैध अवैध लांघी जाती रहीं अंतर्राष्ट्रीय मानी जाने वालीं सीमाएं प्रवाहमान हैं मानव संस्कृतियाँ सीमाओं के हर बंधन को नकारती समसंस्कृति संगम स्थल को तलाशतीं. सीमाओं को तो […] Read more » Featured कविता मैं संस्कृति संगमस्थल हूँ संस्कृति कविता
आर्थिकी व्यंग्य पोटली में रुपया May 29, 2015 by अमित राजपूत | Leave a Comment -अमित राजपूत- आज जहां पैसों को पानी की तरह बहाया जा रहा है, उसके पर्दे की वो प्रथा समाप्त हो गयी जिसके रहते लोग पैसों से कभी साध्य की तरह व्यवहार नहीं करते थे, आज भिखारी भी एक का सिक्का स्वाभिमान में वापस कर देता है। आज के समय में जहां किसी दुकान से कुछ […] Read more » Featured पोटली में रुपया महंगाई पर व्यंग्य व्यंग्य