कविता रे देवों के अंश जाग जा……… September 23, 2014 by के.डी. चारण | 3 Comments on रे देवों के अंश जाग जा……… रे देवों के अंश जाग जा……… कौटिक देखे कर्मरत, पर तुझसा दिखा न कोई। इतने सर संधान किये,फिर क्यों तेरी भाग्य चेतना सोई।। आज रौशनी मद्धम-मद्धम, तारों की भी पांत डोलती, खाली उदर में आती-जाती, सांय-सांय सी सांस बोलती, कितने घर चूल्हा ना धधका, सब घर चाकी सोई है। रे ! देवों के अंश […] Read more » रे देवों के अंश जाग जा
कविता हारी नहीं हूँ September 23, 2014 by बीनू भटनागर | 4 Comments on हारी नहीं हूँ 1. हारी नहीं हूँ थकी हूँ हारी नहीं हूँ, थोड़ा सा विश्राम करलूं। ज़रा सी सी दुखी हूँ फिर भी, थोड़ा सा श्रंगार करलूं। श्रंगार के पीछे अपने, आंसुओं को छुपालूं। ख़ुश नहीं हूँ फिर भी, ख़ुशी का इज़हार करलूं। शरीर तो दुख रहा है, फिर भी दर्द को छुपालूँ। भंवर मे फंसी है नैया, […] Read more » हारी नहीं हूँ
गजल हर शख्स तो बिकता नहीं है September 22, 2014 by राजेश त्रिपाठी | Leave a Comment राजेश त्रिपाठी खुद को जो मान बैठे हैं खुदा ये जान लें। ये सिर इबादत के सिवा झुकता नहीं है।। वो और होंगे, कौड़ियों के मोल जो बिक गये। पर जहां में हर शख्स तो बिकता नहीं है।। दर्दे जिंदगी का बयां कोई महरूम करेगा। यह खाये-अघाये चेहरों पे दिखता नहीं है।। पैसे से न […] Read more » हर शख्स तो बिकता नहीं है
कविता आतंकवादी September 20, 2014 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment जन्मा जिस कोख से उसको भी लजाया हूँ , ना जाने कितने मासूमो का खून में बहाया हैं , ना कोई आशा हैं मुझसे ना मैं आशावादी , मैं तो बस एक जेहाद का मारा, नाम आतंकवादी | कर धमाका मार सबको ये मेरा गुरु ज्ञान हैं , जेहाद के खातिर मरे तो सबसे […] Read more »
कविता वर्षों बाद एक नेता को देखा है September 20, 2014 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment वर्षों बाद एक नेता को माँ गंगा की आरती करते देखा है, वरना अब तक एक परिवार की समाधियों पर फूल चढ़ाते देखा है। वर्षों बाद एक नेता को अपनी मातृभाषा में बोलते देखा है, वरना अब तक रटी रटाई अंग्रेजी बोलते देखा है। वर्षों बाद एक नेता को Statue Of Unity बनाते देखा है, […] Read more » वर्षों बाद एक नेता को देखा है
कविता केवल अमलतास September 19, 2014 by सुरेश हिन्दुस्थानी | Leave a Comment ऊँघते/ अनमने उदास झाड़ियों के बीच इठलाता अमलतास चिड़ाता जंगल को जंगल के पेड़ों को, जिनके झर गए पत्ते सारे लेकिन पीले पुष्प गुच्छों से आच्छादित अमलतास आज भी श्रंगारित है, उसे नाज है अपने रूप पर अपने फूलने पर, पर क्या – उसका यह श्रंगार स्थायी है/ नहीं शायद इस सनातन सत्य को भूल […] Read more » केवल अमलतास
कविता गुनगुनाती हवा September 19, 2014 by लक्ष्मी जायसवाल | 2 Comments on गुनगुनाती हवा ये गुनगुनाती हवा चुपके से जाने क्या कहकर चली जाती है। वक़्त हो चाहे कोई भी हर समय किसी का संदेशा दे जाती है। सुबह का सर्द मौसम और ठंडी हवा का झोंका किसी की याद दिला जाती है। दोपहर की तपती धूप और हवा की तल्खी दर्द की थपकी दे जाती है। शाम का […] Read more » गुनगुनाती हवा
कविता तीन कवितायें: पानी, खनन और नदी जोङ September 18, 2014 / September 18, 2014 by अरुण तिवारी | 1 Comment on तीन कवितायें: पानी, खनन और नदी जोङ अरुण तिवारी पानी हाय! समय ये कैसा आया, मोल बिका कुदरत का पानी। विज्ञान चन्द्रमा पर जा पहुंचा, धरा पे प्यासे पशु-नर-नारी। समय बेढंगा, अब तो चेतो, मार रहा क्यों पैर कुल्हाङी ? गर रुक न सकी, बारिश की बूंदें, रुक जायेगी जीवन नाङी। रीत गये गर कुंए-पोखर, सिकुङ गईं गर नदियां सारी। नहीं […] Read more » खनन नदी जोङ पानी
कविता बच्चों का पन्ना कविता : प्रतीक September 18, 2014 by मिलन सिन्हा | Leave a Comment मिलन सिन्हा यह पेड़ है हम सबका पेड़ है। इसे मत छांटो इसे मत तोड़ो इसे मत काटो इसे मत उखाड़ो इसे फलने दो इसे फूलने दो इसे हंसने दो इसे गाने दो यह पेड़ है हम सबका पेड़ है। इसपर सबके घोसले हैं कौआ का है, मैना का है बोगला का […] Read more » प्रतीक
कविता व्यथा September 17, 2014 / September 17, 2014 by कुलदीप प्रजापति | 2 Comments on व्यथा कल-कल करती बहती नदियाँ हर पल मुझसे कहती हैं , तीर का पाने की चाहत मैं दिन रात सदा वह बहती हैं, कोई उन्हें पूछे यह जाकर जो हमसे नाराज बहुत , मैने सहा बिछुड़न का जो गम क्या इक पल भी सहती हैं | मयूरा की माधुर्य कूकन कानो मैं जब बजती […] Read more » व्यथा
कहानी अधर्मी September 16, 2014 / September 16, 2014 by राम सिंह यादव | 2 Comments on अधर्मी भाई, चल जरा, उस किले की मुंडेर पर बैठते हैं……… काल चक्र के पहिये पर वापस कुछ सौ साल पहले घूमते हैं !!!!!! भाई वो देख कितनी धूल सी उड़ रही है पश्चिम से….. लगता है काले स्याह बादल घिर आये हैं……… वो अपना ही गाँव है न ????? ओह, काले कपड़ों […] Read more » अधर्मी
दोहे हिंदी सबको जोड़ती September 15, 2014 by हिमकर श्याम | Leave a Comment आज़ादी बेशक़ मिली, मन से रहे गुलाम। राष्ट्रभाषा पिछड़ गयी, मिला न उचित मुक़ाम।। सरकारें चलती रहीं, मैकाले की चाल। हिंदी अपने देश में, उपेक्षित बदहाल।। निज भाषा को छोड़कर, परभाषा में काज। शिक्षा, शासन हर जगह, अंग्रेजी का राज।। मीरा, कबीर, जायसी, तुलसी, सुर, रसखान। भक्तिकाल ने बढ़ाया, हिंदी का […] Read more » हिंदी सबको जोड़ती