व्यंग्य व्यंग्य बाण : आधार कार्ड वाले हनुमान जी September 14, 2014 by विजय कुमार | 1 Comment on व्यंग्य बाण : आधार कार्ड वाले हनुमान जी लीजिए साहब, सचमुच देश में अच्छे दिन आ गये। अच्छे दिन क्या, रामराज्य कहिए। लोग अपने अगले दिनों की चिन्ता में घुलते रहते हैं; पर हमारे महान देश के अति महान सरकारी कर्मचारियों ने पूर्वजों की देखभाल शुरू कर दी है। दुनिया भर के इतिहासकार और अभिलेखागार वाले सिर पटक लें; कम्प्यूटर से लेकर नैनो […] Read more » आधार कार्ड वाले हनुमान जी
गजल ग़ज़ल-जावेद उस्मानी September 13, 2014 by जावेद उस्मानी | 1 Comment on ग़ज़ल-जावेद उस्मानी संस्कृति धरोहर की सारी पूंजी लूटाएंगे बनारस को अपने अब हम क्योटो बनाएंगे गंगा को बचाने भी को विदेशी को लाएंगे अपने देशवासियों को ये करिश्मा दिखाएंगे नीलामी में है गोशा गोशा वतन का जर्रा जर्रा बिकने को रखा है तैयार चमन का हुकूमत में आते ही मिजाज़ ऐसे बदल गए स्वदेशी के नारे वाले […] Read more »
कविता पीड़ा का पिंजरा September 12, 2014 by बीनू भटनागर | Leave a Comment पीड़ा के पिंजड़े की क़ैदी हूँ, पिंजड़े को तोडकर निकलना चाहती हूँ… पर सारी कोशिशें नाकाम हो रही हैं। जब भी ऐसा करने की कोशिश करती हूँ, पीड़ा बाँध लेती है, जकड़ लेती है। किस जुर्म की सज़ा मे क़ैद हूँ, नहीं पता…… कितने दिन के लिये क़ैद हूँ, ये भी नहीं पता… कुछ […] Read more » पीड़ा का पिंजरा
कविता तौहिनी लगाती है-कविता September 12, 2014 / September 12, 2014 by डॉ नन्द लाल भारती | Leave a Comment डॉ नन्द लाल भारती बोध के समंदर से जब तक था दूर सच लगता था सारा जहां अपना ही है बोध समंदर में डुबकी क्या लगी सारा भ्रम टूट गया पता चला पांव पसारने की इजाजत नहीं आदमी होकर आदमी नहीं क्योंकि जातिवाद के शिकंजे में कसा कटीली चहरदीवारी के पार झांकने तक की इजाजत […] Read more » कविता तौहिनी लगाती है
कविता कविता-जातिवाद का नरपिशाच September 11, 2014 / September 12, 2014 by डॉ नन्द लाल भारती | Leave a Comment डॉ नन्द लाल भारती मै कोई पत्थर नहीं रखना चाहता इस धरती पर दोबारा लौटने की आस जगाने के लिए तुम्ही बताओ यार योग्यता और कर्म-पूजा के समर्पण पर खंजर चले बेदर्द आदमी दोयम दर्ज का हो गया जहां क्यों लौटना चाहूंगा वहाँ रिसते जख्म के दर्द का ,जहर पीने के लिए ज़िन्दगी के हर […] Read more » जातिवाद का नरपिशाच
कविता जलियांवाला बाग September 10, 2014 by राघवेन्द्र कुमार 'राघव' | Leave a Comment राघवेन्द्र कुमार “राघव” सोलह सौ पचास गोलियां चली हमारे सीने पर , पैरों में बेड़ी डाल बंदिशें लगीं हमारे जीने पर | रक्त पात करुणाक्रंदन बस चारों ओर यही था , पत्नी के कंधे लाश पति की जड़ चेतन में मातम था | इंक़लाब का ऊँचा स्वर इस पर भी यारों दबा नहीं , भारत […] Read more » जलियांवाला बाग
व्यंग्य समाज जोधाएं बचेंगी तब न… September 10, 2014 by प्रवक्ता ब्यूरो | 1 Comment on जोधाएं बचेंगी तब न… ऋतू कृष्णा चैटरजी अकबर को जोधा नही दोगे ठीक बात है किन्तु अपने लिए भी नही चुनोगे ये कहां का इंसाफ है, उलटा जहां तक संभव होगा जोधा को धरती पर आने ही नही दोगे। भईया! अकबर को जोधा देने न देने की स्थिति तो तब आएगी न जब जोधाएं बचेंगी। लड़कियां बची ही कहां […] Read more » जोधाएं बचेंगी तब न
कविता अंधेरे रास्तों पर September 9, 2014 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment जीवन में क्यों कोई राह नजर नहीं आती है ? हर राह पर क्यों नई परेशानी चली आती है ? जब जब चाहा भूल जाऊं अपनी उलझनों को तब तब एक और नई उलझन मिल जाती है। खुलकर जीना और हंसना मैं भी चाहती हूं पर ज़िन्दगी हर बार ही बेवजह रुला जाती है। पूछना […] Read more » अंधेरे रास्तों पर
व्यंग्य अच्छे दिन ! September 9, 2014 by एल. आर गान्धी | Leave a Comment एल आर गांधी हाथ की दातुन से निपट कर आखिरी फोलक को थू …. कहने ही वाले थे कि चोखी लामा बीच में आ धमके … न दुआ न सलाम सरहद पार की फायरिंग की मानिंद सवाल दागा … बाबू आज का अखबार देखा … अनजान बालक सा चोखी का मुखारविंद तकता रह गया … […] Read more » अच्छे दिन
कहानी दिमागी उपज…या कुछ और…!! September 6, 2014 by अश्वनी कुमार | Leave a Comment अश्वनी कुमार बंगलौर… सुबह के लगभग 8 बज रहे होंगे… शर्मा जी रोज़ की ही तरह आज भी अपने बैंक की ओर अपनी गाडी लेकर चल पड़े… शर्मा जी एक सरकारी बैंक में मैनेजर के तौर पर कार्यरत हैं. बैंक 9 बजे के आसपास खुलना था आम लोगों के लिए, तो वह बैठकर अपने साथ […] Read more » दिमागी उपज
कविता मैं ‘लड़की’ हूं September 6, 2014 by लक्ष्मी जायसवाल | Leave a Comment जकड़ी हूं बंधन में सदियों से अब मुझे मुक्ति चाहिए। बंधन खोल सके जो आज़ादी दे मुझे वो शक्ति अब चाहिए। उड़ना चाहती हूं स्वच्छंद गगन में ‘पर’ मुझे मेरे चाहिए। मैं लड़की हूं हां मैं लड़की हूं तो क्या हुआ जीना का हक़ मुझे भी चाहिए। अब न सहूंगी बंधन अब न उठाऊंगी रिवाजों की […] Read more » मैं 'लड़की' हूं
कविता सुबह या शाम ? September 5, 2014 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -मनु कंचन- अभी आँख खुली है मेरी, कुछ रंग दिखा आसमान पे, लाली है तो चारों ओर, पर पता नहीं दिन है किस मुकाम पे, दिशाओं से मैं वाक़िफ़ नहीं, ऐतबार करूँ तो कैसे मौसमों की पहचान पे, चहक तो रहे हैं पंछी, पर उनके लफ़्ज़ों का मतलब नहीं सिखाया, किसी ने पढ़ाई के नाम […] Read more » कविता सुबह या शाम ? हिन्दी कविता