आलोचना अब तो केवल विश्व नेता बनने की तमन्ना ही मोदी जी के दिल में है October 1, 2014 by श्रीराम तिवारी | 3 Comments on अब तो केवल विश्व नेता बनने की तमन्ना ही मोदी जी के दिल में है न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र महा सभा को सम्बोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी से जो हिमालयी चुकें हुई हैं -उनकी भरपाई उन्होंने ‘मेडिसन इस्कवॉयर ‘ के अपने अगले – सम्बोधन में दुरुस्त करने की पुरजोर कोशिश की है।लेकिन मेडिसन स्क्वॉयर के सम्बोधन में उनसे जो गंभीर भूल-चूक हुई है उसे वे कहाँ -कब […] Read more » विश्व नेता बनने की तमन्ना
व्यंग्य थप्पड़शास्त्र October 1, 2014 / October 1, 2014 by अनुज अग्रवाल | 12 Comments on थप्पड़शास्त्र आजकल थप्पड़ वाला फैशन चल रहा है | पहले जूते फेंकने का था | पर अब वो आउटडेटेड हो गया है | जूता वाला फैशन सक्सेसफुल नहीं था | कई पेंच थे उसमे सबसे बड़ा झंझट था निशाना लगाने का | अब हर कोई अभिनव बिंद्रा तो है नहीं जो 4 करोड़ खर्च कर निशाने […] Read more » थप्पड़शास्त्र
कविता मैं हूँ अराजक September 28, 2014 by कुलदीप प्रजापति | 1 Comment on मैं हूँ अराजक रोज यही बस खबर दिख रही टी .वी .और अखबारों में, मेरे देश की बेटी लुटती आश्रम और गलियारों में | कुछ लोग मुझे कहते हैं अराजक जब आवाज उठाता हूँ उनकी भाषा में दिया जवाब सत्ता का लोभी कहलाता हूँ| पहले राजा अँधा था अब गूंगा बहरा आया हैं, हर बहन बेटी […] Read more » मैं हूँ अराजक
कविता कुक्कुरमुत्तों की कविता September 28, 2014 by डॉ. मधुसूदन | Leave a Comment डॉ. मधुसूदन सूचना: यह व्यंग्यात्मक रचनाहै। मनोरंजन के लिए।इसी अर्थ में उसका स्वीकार करें। १ टेढी पूँछ,एक कुक्कुरवो, ऊंची पिछली टाँग कियो; मसरुमवा सिंचित हुआ सारा, सो कुक्कुरमुत्ता कहलाया। २ दीक्सित हुयी सारी सैना, सीतल सिंचित धारासै। कुक्कुरमुत्ते बहर आयै हैं, टोपी झाडू सज धज कै। ३ अक्रमण्यता अदिकार, इनको किस्ना गीता में बोल्ल्यो है। […] Read more » कुक्कुरमुत्तों की कविता
कविता प्रेम September 28, 2014 by बीनू भटनागर | 1 Comment on प्रेम प्रेम इतना भी न करो किसी से, कि दम उसका ही घुटने लगे, फ़ासले तो हों कभी, जो मन मिलन को मचलने लगे। भले ही उपहार न दो, प्रेम को बंधन भी न दो, एक खुला आकाश दे दो, ऊंची उड़ान भरने का, सौभाग्य दे दो….. लौट के आयेगा तुम्हारे पास ही, ये तुम […] Read more » प्रेम
व्यंग्य ‘केजरी-बवाल’ देश के प्रधानमंत्री होते तो ? September 27, 2014 / September 28, 2014 by रोहित श्रीवास्तव | 6 Comments on ‘केजरी-बवाल’ देश के प्रधानमंत्री होते तो ? रोहित श्रीवास्तव देश के सबसे ईमानदार, कर्मठ एवं युग पुरुष धरने वाले बाबा भारत के प्रधानमंत्री होते तो शायद देश के हालात कुछ इस तरह होते। * देश मे पहली बार ‘धरने’ वाली सरकार होती। * देश के प्रधानमंत्री का स्वतन्त्रता दिवस पर लाल किले से भाषण कुछ ऐसा होता “हम अपने दुश्मनों से […] Read more » 'केजरी-बवाल' देश के प्रधानमंत्री होते तो
गजल इंतज़ार September 26, 2014 by अश्वनी कुमार | Leave a Comment इंतज़ार… इंतज़ार इंतज़ार बाक़ी है. तुझे मिलने की ललक और खुमार बाक़ी है. यूँ तो बीती हैं सदियाँ तेरी झलक पाए हुए. जो होने को था वो ही करार बाक़ी है. खाने को दौड़ रहा है जमाना आज हमें. *1यहाँ पे एक नहीं कितने ही जबार बाक़ी है. वोही दुश्मन है, […] Read more » इंतज़ार
दोहे रामचरित September 26, 2014 by अरुण तिवारी | Leave a Comment धरियो, रामचरित मन धरियो तजियो, जग की तृष्णा तजियो परहित सरिस धर्म मन धरियो।। मरियो, मर्यादा पर मरियो धरियो, रामचरित…. भाई बने तो स्वारथ तजियो संगिनी बन दुख-सुख सम धरियोे। मात बने तो धीरज धरियो पुत्र बने तो पालन करियो।। धरियो, रामचरित… सेवक सखा समझ मन भजियो शरणागत की रक्षा करियो। शत्रु संग मत धोखा […] Read more » रामचरित
कविता भूल गया हूँ गाॉवं को, September 25, 2014 by कुलदीप प्रजापति | Leave a Comment भूल गया हूँ गाॉवं को, बड़े शहर की चकाचोंध में, रखकर अपने पॉवं को , शायद अब कुछ याद नहीं , भूल गया हूँ गाॉवं को, ए.सी. की हेर शीतलहर में पेड़ घाना कहाँ दीखता हैं , ज्वर, बाजार ,मक्का नहीं यंहा बर्गर- पिज्जा बिकता हैं , मिटटी के घर भूल गया सब और […] Read more » भूल गया हूँ गाॉवं को
कहानी गिरवी September 25, 2014 by अश्वनी कुमार | 8 Comments on गिरवी -अश्वनी कुमार कॉलेज ख़त्म होने का आखिरी दिन, सभी लोग एक दूसरे से विदा ले रहे हैं. गले मिल रहे हैं. अपना फ़ोन नंबर बदल रहे हैं. एक दूसरे को भविष्य में न भूल जाने का प्रण ले रहे हैं. कहीं खुशियों के मारे लोग उछल कूद कर रहे हैं, तो कहीं आखों से आंसूं […] Read more » गिरवी
व्यंग्य सौफ़्टवेयर September 24, 2014 by बीनू भटनागर | 2 Comments on सौफ़्टवेयर गणित समझने मे हमे कभी भी दिक़्कत नहीं होती थी, अवधारणाये(concepts) सब समझ मे आ जाती थीं, बस गणना(calculation) ग़लत हो जाती थीं, जोड़, घटा गुणा भाग मे ग़लतियां होने से अंक कम रह जाते थे।उस ज़माने मे कम्प्यूटर क्या कैलकुलेटर भी नहीं होते थे।साँख्यकी(statistics) मे पाई डायग्राम या बार डायग्राम जैसी मामूली चीज़ों के […] Read more » सौफ़्टवेयर
कविता गांधी फिर कब आओगे ? September 23, 2014 by डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव | 1 Comment on गांधी फिर कब आओगे ? डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव (गांधी जयंती २ अक्टूबर २०१४) मोहनदास कमरचंद जी की, देश प्रेम की आंधी थी। पीछे देश खड़ा मर मिटने, एसी हस्ती गांधी थी। इसीलिये तैयार हुये, नेहरू जाने को जेलो में। मालूम था सिर दे देंगे पीछे सब खेलों खेलों में। मालूम था कि थे पटेल, मौलाना किदवई जान लिये। वल्लभ […] Read more » गांधी फिर कब आओगे