व्यंग्य स्वच्छंदजी बोले November 21, 2012 by अशोक गौतम | Leave a Comment अशोक गौतम हम जैसों को तो नरक की न जिंदे जी चिंता होती है न मरने के बाद, क्योंकि हमें पता होता है कि हमें हर समय ही भोगना है पर अपने शहर के कम्युनिटी हाल में शहर के धनाढयों द्वारा मरने के बाद नरक से मुकित हेतु कराए जा रहे सप्ताह के चौथे दिन […] Read more »
साहित्य राम का नाम बदनाम न करो … November 19, 2012 / November 19, 2012 by तनवीर जाफरी | 4 Comments on राम का नाम बदनाम न करो … तनवीर जाफ़री भारतवर्ष का बहुसंख्य हिंदू समुदाय जिस भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहकर संबोधित करता हो और मुस्लिम समुदाय से संबंध रखने वाले विश्व के जाने-माने कवि अल्लामा इकबाल ने जिस भगवान राम को ‘इमाम-ए-हिंद’ कहकर संबोधित किया हो तथा सिख समुदाय के सबसे पावन धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहब में जिस रामनाम का अनेक […] Read more » राम का नाम बदनाम न करो ...
कविता वंदना November 19, 2012 / November 19, 2012 by विजय निकोर | 1 Comment on वंदना विजय निकोर सरलता का प्रवाह जो ह्रदय में बहकर उसके केन्द्र-बिन्दु में चाहे एक, केवल एक कोंपल को स्नेह से स्फुटित कर दे, और मैं अनुभव करूँ उस सरल स्नेह को बहते हर किसी के प्रति मेरे अंतरतम में, प्रभु, यही, बस यही वरदान दो मुझे । सरलता का आभास जो पी ले मेरा […] Read more » poem by vijay nikor वंदना
आलोचना हाँ जी, हाँ जी ही नहीं करते रहें November 13, 2012 / November 12, 2012 by डॉ. दीपक आचार्य | 1 Comment on हाँ जी, हाँ जी ही नहीं करते रहें हाँ जी, हाँ जी ही नहीं करते रहें कभी सच भी कहने का साहस जुटाएँ डॉ. दीपक आचार्य 9413306077 आजकल बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोगों का जमघट लगा हुआ है जो हमेशा हर काम में हाँ जी, हाँ जी करते रहने के आदी हो गए हैं। इन लोगों को इस बात से कोई सरोकार […] Read more »
गजल हम ना फैलायेंगे हाथ मर जायेंगे….. November 12, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | Leave a Comment इक़बाल हिंदुस्तानी हल्फ़ लेकर भी क़ातिल मुकर जायेंगे, बेक़सूरों के सर फिर उतर जायेंगे। फिर ना चल पायेंगी उनकी मनमानियां, जब भी सड़कों पे हम लोग उतर जायेंगे। रहबरों की बजाये तू किरदार दे, देश के सारे मुजरिम सुधर जायेंगे। आपके इक इशारे की फ़रियाद है, जाने कितनों के जीवन संवर जायेंगे। […] Read more » हम ना फैलायेंगे हाथ मर जायेंगे.....
महत्वपूर्ण लेख साहित्य राम अयोध्या कब लौटे? November 12, 2012 / November 12, 2012 by राकेश कुमार आर्य | 17 Comments on राम अयोध्या कब लौटे? राकेश कुमार आर्य हमारे यहां दीपावली का पर्व सृष्टि के प्रारंभ से ही मनाया जाता रहा है। इस पर्व का विशेष महत्व है। दीपों का यह प्रकाश पर्व हमारे अंत: करण में व्याप्त अज्ञान अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश करने का प्रतीक पर्व है। हमारे यहां पर प्रत्येक सद्गृहस्थ के लिए आवश्यक था कि […] Read more » दीपावली का पर्व
कविता ख़याल November 12, 2012 / November 12, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on ख़याल विजय निकोर तारों से सुसज्जित रात में आज कोई मधुर छुवन ख़यालों की ख़यालों से बिन छुए मुझे आत्म-विभोर कर दे, मेरे उद्विग्न मन को सहलाती, हिलोरती, कहाँ से कहाँ उड़ा ले जाए, कि जैसे जा कर किसी इनसान की छाती से उसकी अंतिम साँस वापस लौट आए, और मुंदी-मुंदी पलकों के पीछे मुस्कराते वह […] Read more » poem by vijay nikor ख़याल
कविता इक दिवाली ये भी है November 12, 2012 / November 12, 2012 by श्यामल सुमन | Leave a Comment बिजलियों से जगमगाई, इक दिवाली ये भी है रोशनी घर तक न आई, इक दिवाली ये भी है दीप अब दिखते हैं कम ही, मर रही कारीगरी मँहगी है दियासलाई, इक दिवाली ये भी है थी भले कम रोशनी पर, दिल बहुत रौशन तभी रीत उल्टी क्यों बनाई, इक दिवाली ये भी है […] Read more » इक दिवाली ये भी है
कविता मेरा वतन वही है …………. November 8, 2012 / November 7, 2012 by राकेश कुमार आर्य | 1 Comment on मेरा वतन वही है …………. राकेश कुमार आर्य शौर्य और साहस जिसका अद्वितीय है । विज्ञान ज्ञान जिसका विश्व में अवर्णनीय है ॥ ताप त्याग साधना भी जिसकी अकथनीय है । संदेश सत्य का जिसकी पठनीय है ॥ मेरा वतन वही है ,मेरा वतन वही है …॥ १ ॥ मनु सा संविधानज्ञ जिसकी अमर है ख्याति । गौतम कणाद […] Read more »
व्यंग्य कवि और कल्पना November 5, 2012 / November 5, 2012 by बीनू भटनागर | 4 Comments on कवि और कल्पना कविता भी क्या चीज़ है कल्पना की उड़ान कवि को किसी दूसरी ही दुनियाँ मे पंहुचा देती है। एक कवि की दुनियाँ और एक उस व्यक्ति की दुनियाँ। यह इंसान कभी भी एक दुनियाँ से निकल कर दूसरी दुनियाँ मे ऐसे आता जाता रहता है जैसे कोई एक कमरे से दूसरे कमरे मे जाता हो। […] Read more » कवि और कल्पना
कविता असंगतिओं का जलप्रलय November 5, 2012 / November 5, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on असंगतिओं का जलप्रलय गतिमय प्रिय स्मृतिओं की बढ़ती बाढ़ की गति ढूँढती है नए मैदानों के फैलावों को मेरे भीतर, पर यहाँ तो कोई निरंक स्थान नहीं है छोटा-सा कुछ भी और लिखने को…स्मृतिओं की नदी को मेरे मृदु अंतरतम में तुम अब और कहीं बहने दो । स्मृतिओं की नदी के तल प्रतिपल हैं ऊँचे चढ़ते, […] Read more »
कविता कविता – अवशेष November 3, 2012 / November 3, 2012 by मोतीलाल | Leave a Comment मोतीलाल आग जब सबकुछ जला देगी कुछ तिलिस्म जिंदगी भर के वास्ते धुंधला जाने के लिए उम्मीद को छोड़ कर कहीं से भी चलकर निरर्थक परिक्रमा नहीं करेगी । तय शुदा सुरक्षा के अर्थ जब बंद हो जाएंगें सूरज के साथ-साथ हम मध्यांतर के उल्लास सा अर्थपूर्ण यात्रा की दुआ लेते हुए मोक्ष की […] Read more » कविता - अवशेष