कविता मानव हो मानव बने रहो November 3, 2012 / November 3, 2012 by बीनू भटनागर | 1 Comment on मानव हो मानव बने रहो हर जड़ चेतन का उद्गम प्रकृति, हमने उसको भगवान कहा, तुमने उसको इस्लाम कहा या केश बांध ग्रंथ साब कहा, या फिर प्रभु यशु महान कहा। पशु पक्षी हों या भँवरे तितली, वट विराट वृक्ष हो चांहे हो तृण, या हों सुमन सौरभ और कलियाँ, हाथी विशाल हो या सिंह प्रबल या हों जल […] Read more » मानव हो मानव बने रहो
गजल देर तक रोता कोई बच्चा हंसाकर देखना….. November 3, 2012 / November 3, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | 4 Comments on देर तक रोता कोई बच्चा हंसाकर देखना….. इक़बाल हिंदुस्तानी बाद में जिसका भी चाहो घर जलाकर देखना, पहले तुम छोटा सा खुद का घर बनाकर देखना। ज़ेहन पायेगा सकूं और दिल भी खुश हो जायेगा, देर तक रोता कोई बच्चा हंसाकर देखना। बाप की दौलत से गुलछर्रे उड़ाना छोड़दो, जीना हो तो ख़र्च अपना खुद उठाकर देखना। तुम समझते […] Read more » देर तक रोता कोई बच्चा हंसाकर देखना
कविता चौराहा October 31, 2012 / October 31, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on चौराहा विजय निकोर अनचाहे कैसे अचानक लौट आते हैं पैर उसी चौराहे पर जिस चौराहे पर समय की आँधी में हमारे रास्ते अलग हुए थे, तुम्हारी डबडबाई आँखों में व्यथाएँ उभरी थीं, और मेरी ज़िन्दगी भी उसी दिन ही बेतरतीब हो गई थी । जो लगती है स्पष्ट पर रहती है अस्पष्ट शायद कुछ ऐसी […] Read more »
कविता मैने फूलदान सजाया October 30, 2012 / October 30, 2012 by बीनू भटनागर | 2 Comments on मैने फूलदान सजाया उपवन मे जो पुष्प खिले थे, पवन सुगंधित कर देते थे, सुमन सुन्दर अति मनोहारी, कुसुम यही शोभा बगिया के। इन्हें तोड़ डाली से काँटे काटे, फिर एक प्यारा सा गुलदस्ता रत्न जटित एक फूलदान मे, उन्हें संवारा और सजाया। मैने अपना कक्ष सजाया, तन मन मेरा अति भरमाया , दो दिन तक […] Read more » मैने फूलदान सजाया
व्यंग्य व्यंग्य/ शाहों वाले संकट मोचक October 29, 2012 by अशोक गौतम | Leave a Comment अशोक गौतम अब देखो न भैया! आम आदमी हैं तो कुछ बने या न पर उल्लू तो बनेंगे ही! इहां आम आदमी जिंदगी में कुछ बने या न बने पर मुआ कम से कम उल्लू होकर तो देह त्यागता ही है। हम तो जन्म से मरण तक उल्लू बनाने वालों की राह फटी आंखों से […] Read more »
व्यंग्य जय हो बाजार की! October 26, 2012 / October 26, 2012 by अशोक गौतम | Leave a Comment डिस्काउंटों से भरे बाजारों , अखबारों में अखबारों से बड़े छपे विज्ञापनों को देख अब मुझे भीतर ही भीतर अहसास हो गया है कि हे राम ! तुम बनवास काट, घर के भेदी से लंका ढहवा अयोध्या की ओर लखन, सीता सहित कूच कर गए हो। और हम खालिस मध्यमवर्गीय तुम्हारे आने की खुषी में […] Read more » satire by Ashok Gautam
टॉप स्टोरी व्यंग्य नौकरी के नौ सिद्धान्त – अशोक खेमका के नाम एक खुला पत्र October 25, 2012 / October 25, 2012 by विपिन किशोर सिन्हा | 6 Comments on नौकरी के नौ सिद्धान्त – अशोक खेमका के नाम एक खुला पत्र विपिन किशोर सिन्हा प्रिय खेमका जी, हमेशा खुश रहिए। दिनांक १६ अक्टुबर के पहले न मैं आपको जानता था और न आप मुझे। लेकिन अब तो मैं ही क्या सारा हिन्दुस्तान आपको जान गया है। मुझे जानने की आपको कोई जरुरत नहीं। वैसे भी नौकरशाही के शीर्ष पर बैठे किसी भी अधिकारी को अपने से […] Read more » नौकरी के नौ सिद्धान्त
कविता यंत्रणा October 24, 2012 / October 25, 2012 by विजय निकोर | 2 Comments on यंत्रणा तुम्हारा मेरा साथ एक आत्मिक यात्रा, तुम्हारा संतृप्त स्नेह दिव्य उड़ान और अब तुम्हारा अभाव भी एक आध्यात्मिक साधना है जो मेरे अन्तर में प्रच्छ्न्न, मंदिर में दीप-सी और मंदिर के बाहर सूर्य की किरणों-सी मेरे पथ को सदैव दीप्तिमान किए रहती है । हमारे इस अभौतिक पथ पर कोई पगडंडी पथरीली, कोई कँटीली, […] Read more » poem by vijay nikor
व्यंग्य टांगें और कामयाबी October 24, 2012 / October 24, 2012 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment पंडित सुरेश नीरव पांव छूना हमारी संस्कृति के प्राण हैं। और पांव छूना और छुलवाना हमारी सनातन-शाश्वत सांस्कृतिक गतिविधि है। पद,प्रमोशन, पुरस्कार,प्रतिष्ठा नाना प्रकार की उपलब्धियां हमें पांव छूने से ही प्राप्त होती हैं। सैंकड़ों टाटा और बाय-बाय पर एक अदद पांव छूना हज़ार गुना भारी पड़ता है। आज के जीवन-संग्राम में जो चरण स्पर्श […] Read more »
कविता निहितार्थों का समुद्र October 24, 2012 / October 24, 2012 by प्रवीण गुगनानी | 1 Comment on निहितार्थों का समुद्र बहते संबंधों की जलधार में कहीं कुछ था जो अछूता सा था ह्रदय की गहराइयों में नहीं डूब पाया था वो और न ही छू पाया था उन अंतर्तम जलधाराओं को जो बहते चल रही थी मन के समानांतर. मन करता था चर्चाएं तुमसे पता है. पता है यह भी कि शिलाओं पर लिखे जा […] Read more » निहितार्थों का समुद्र
गजल खून ए दिल से तेरी तस्वीर बनाई जाये….. October 21, 2012 / October 21, 2012 by इक़बाल हिंदुस्तानी | 1 Comment on खून ए दिल से तेरी तस्वीर बनाई जाये….. इक़बाल हिंदुस्तानी जो भी कीमत हो उसकी वो चुकाई जाये, बात सच्ची हो तो बेख़ौफ़ उठाई जाये। हम अमन के हैं पुजारी कोई बुज़दिल तो नहीं, फ़ितनागर अफ़वाह उड़ा जितनी उड़ाई जाये। हरेक इंसान का दुखदर्द हो शामिल जिसमें, वक़्त कहता है ग़ज़ल ऐसी सुनाई जाये। ये अदब है जागीर नहीं है […] Read more » gazal by7 iqbal hindustani
कहानी बग़ीचा (लघुकथा) October 21, 2012 / October 21, 2012 by बीनू भटनागर | 5 Comments on बग़ीचा (लघुकथा) श्री भास्कर चतुर्वेदी को हमेशा से फूलों व फलों के बग़ीचों से बहुत लगाव था। सेवानिवृत्त होने के बाद उनका ये शौक जुनून बन गया था। उनके बंगले के चारों ओर ज़मीन थी जिसे उन्होने बहुत व्यव्थित तरीके से संवारा था। छोटे से शहर मे उनके बग़ीचे की बहुत चर्चा थी। आरंभ मे उन्होने विशेषज्ञों […] Read more »