लेख फिल्मों में दांपत्य जीवन May 18, 2011 / December 13, 2011 by डॉ. मनोज चतुर्वेदी | 2 Comments on फिल्मों में दांपत्य जीवन भारतीय सिनेमा में दांपत्य जीवन का चित्रण कई स्थानों पर देखने को मिलता है। फिल्म निर्मातानिर्देशक उदारीकृत अर्थव्यवस्था में पतिपत्नी के बीच वादविवाद, टकराव, लड़ाईझगड़ा एवं तलाक(संबंध विच्छेद) को सिनेमा के सुनहले पर्दें पर उकेर रहे हैं। कुल मिलाकर निर्माताओं निर्देशकों का एक मात्र लक्ष्य भारतीय संस्कृति तथा भारतीयविवाह संस्था को श्रेष्ठ साबित करते हुए […] Read more » Marital life फिल्मों में दांपत्य जीवन
साहित्य जनकवि नागार्जुन को भूले ओम थानवी May 17, 2011 / December 13, 2011 by राजीव रंजन प्रसाद (बीएचयू) | Leave a Comment राजीव रंजन प्रसाद प्रतिष्ठित समाचारपत्र जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी का काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 16 मई को आना कई अर्थों मंे महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है. हिन्दी पट्टी जिसमें इन दिनों हिन्दी-जगत के कई ख़्यातनाम साहित्यकारों की जन्मशती मनायी जा रही है; वहाँ ओम थानवी का महामना के परिसर में स्वयं उपस्थित होकर ‘अज्ञेय […] Read more » Om Thanvi ओम थानवी
कहानी कहानी/ वह लड़की May 16, 2011 / December 13, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment आर. सिंह राज दफ्तर जाने के लिये जिस स्टाप से मिनी बस पकडता था, वहाँ वह करीब करीब खाली होती थी. मुश्किल से तीन या चार सवारियाँ होती थी उसमें. फिर भी राज एक खास सीट पर हीं बैठता था. मिनी बस आगे जाती और उसमें सवारियाँ भरती जाती. जब तक वह लडकी बस में चढ़ती […] Read more »
कविता आर. सिंह की कविता/दान वीर May 12, 2011 / December 13, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment मर रहा था वह भूख से, आ गया तुम्हारे सामने. तुमको दया आ गयी.(सचमुच?) तुमने फेंका एक टुकड़ा रोटी का. रोटी का एक टुकड़ा? फेंकते ही तुम अपने को महान समझने लगे. तुमको लगा तुम तो विधाता हो गये. मरणासन्न को जिन्दगी जो दे दी. मैं कहूं यह भूल है तुम्हारी, तुम्हारे पास इतना समय […] Read more »
कविता आर. सिंह की कविता/स्वप्न भंग May 11, 2011 / December 13, 2011 by आर. सिंह | Leave a Comment मत कहो मुझे बोलने को. मेरे मुख से फूल तो कभी झड़े नहीं, पर एक समय था जब निकलते थे अंगारे. एक आग थी, जो धधकती थी सीने के अंदर. एक स्वप्न था, जो करता था उद्वेलित मष्तिष्क को. एक लगन थी, कुछ कर गुजरने की. लगता था, क्यों पनपे वह सब जो नहीं है […] Read more »
कविता कविता/ माँ की मुस्कान … May 10, 2011 / December 13, 2011 by हितेश शुक्ला | 5 Comments on कविता/ माँ की मुस्कान … { माँ को समर्पित… हितेश शुक्ला } आप खुश हो तो मुझे ख़ुशी मिलती है ! जैसे मरुस्थल में नदी मिलती है !! आपकी ख़ुशी मेरा मनोबल बढाती है ! आपकी ख़ुशी मंजिल पाने की चाह जगाती है !! आपकी मुस्कान दुःख मे सुख का आभास करवाती है !! आपकी ख़ुशी जीत की […] Read more » मां
राजनीति व्यंग्य प्रभात झाः ‘हार’ में नहीं जीत में है भरोसा May 8, 2011 / December 13, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 10 Comments on प्रभात झाः ‘हार’ में नहीं जीत में है भरोसा संजय द्विवेदी उन्हें पता है कि उनको मिली जिम्मेदारी साधारण नहीं है। वे एक ऐसे परिवार के मुखिया बनाए गए हैं जिसकी परंपरा में कुशाभाऊ ठाकरे जैसा असाधारण नायक है। मध्यप्रदेश भाजपा का संगठन साधारण नहीं है। उसकी संगठनात्मक परंपरा में ठाकरे और उनके बाद एक लंबी परंपरा है। प्यारेलाल खंडेलवाल, गोविंद सारंग, नारायण प्रसाद […] Read more » Prabhat Jha प्रभात झा
आलोचना उ.प्र: गिरती साख हिन्दी संस्थान की May 7, 2011 / December 13, 2011 by संजय सक्सेना | 6 Comments on उ.प्र: गिरती साख हिन्दी संस्थान की संजय सक्सेना उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का नाम जहन में आते ही कई पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान दिलाने वाला हिन्दी संस्थान आजकल ‘बेकारी’ के दौर से गुजर रहा है। बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब साहित्यिक केन्द्रों की स्थापना,छात्र-छात्राओं को शोध कार्यो […] Read more » uttar pradesh उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
व्यंग्य आतंकवाद से युद्ध May 4, 2011 / December 13, 2011 by विजय कुमार | 1 Comment on आतंकवाद से युद्ध विजय कुमार सरकार लगातार हो रही आतंकी घटनाओं से बहुत दुखी थी। रेल हो या बस, मंदिर हो या मस्जिद, विद्यालय हो या बाजार, दिन हो या रात, आतंकवादी जब चाहें, जहां चाहें, विस्फोट कर उसकी नाक में दम कर रहे थे। विधानसभा चुनाव का खतरा सिर पर था। सरकार को लगा कि यदि इस […] Read more » terrorism आतंकवाद
साहित्य भ्रष्टाचार, क्रांति और साहित्य May 3, 2011 / December 13, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment जगदीश्वर चतुर्वेदी राजनीति में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है लेकिन साहित्य में यह कभी मुद्दा ही नहीं रहा। यहां तक संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समय नागार्जुन ने भ्रष्टाचार पर नहीं संपूर्ण क्रांति पर लिखा,इन्दिरा गांधी पर लिखा। जबकि यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्या वजह है लेखकों को भ्रष्टाचार विषय नहीं लगता। जबकि […] Read more » Corruption भ्रष्टाचार साहित्य
व्यंग्य व्यंग्य – टेक्नालॉजी का फसाना May 3, 2011 / December 13, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment राजकुमार साहू सबसे पहले आपको बता दूं कि औरों की तरह मैं भी तकनीक की टेढ़ी नजर से दूर नहीं हूं। तकनीक के फायदे कई हैं तो नुकसान तथा फजीहत भी मुफ्त में मिलती हैं। वैसे मेरे पास न तो विरासत में मिली संपत्ति है और न ही मैंने इतनी अकूत संपत्ति जुटाई है, […] Read more »
व्यंग्य अब चोरी भी बिजनिस हो गया है May 2, 2011 / December 13, 2011 by रामस्वरूप रावतसरे | Leave a Comment हरिया ने जब सुना कि देश में घोटालों को लेकर सब तरफ उगली उठ रही है । लेकिन असली घोटाले बाज कौन है ं किसके जिम्मे है यह देश ,और इसकी जनता । किसे इसकी रक्षा करनी चाहिये थी । जिसे देखों इसे लुटने में लगा है । खैर हरिया की सठियायी हुई बुद्धि में […] Read more » Business चोरी बिजनिस रामस्वरूप रावतसरे