कहानी कहानी/ सैलाब April 18, 2011 / December 13, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment -सन्तोष गोयल तुलसी भाभी, उस दिन मुझे सपने में दीखीं थी…रोती-बिलखती…हाथ पसार …मानो कुछ मांग रही हों…शायद कुछ पकड़ना चाहती हों। क्यों आया मुझे तुलसी भाभी का सपना ? इसका कारण कौन बताये ? कौन व्याख्या करे ? अगले दिन सुबह-सवेरे चौक बुहारते हुए मैंने अम्मां से तुलसिया भाभी के बारे में जानना चाहा। बाबा […] Read more »
समाज साहित्य बिहार में ठहराव की स्थिति में दलित आंदोलन व साहित्य April 15, 2011 / December 14, 2011 by संजय कुमार | 1 Comment on बिहार में ठहराव की स्थिति में दलित आंदोलन व साहित्य संजय कुमार बिहार में महाराष्ट्र की तरह दलित आंदोलन तो नहीं दिखता है, लेकिन यहां की जमीन, दलित उत्पीड़न-जुल्म-सितम और दलित चेतना-अवचेतना से भरी पड़ी है। देशा के अन्य भागों की तरह बिहार के दलित अभी भी हाशिए पर हैं। दलित आंदोलन को लेकर महाराष्ट्र की तरह कोई बड़ा आंदोलन यंहा नहीं दिखता है। लेकिन […] Read more » bihar दलित विमर्श दलित साहित्य बिहार
आलोचना मीडिया संचार क्रांति और तुलसीदास April 14, 2011 / December 14, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment जगदीश्वर चतुर्वेदी आज यह बात बार-बार उठायी जा रही है कि आम लोगों में पढ़ने की आदत घट रही है। सवाल उठता है क्या तुलसीदास आज कम पढ़े जा रहे हैं ? क्या ‘रामचरितमानस’ कम बिक रहा है ? तुलसीदास आज भी सबसे ज्यादा पढ़े,सुने और देखे जा रहे हैं। सवाल उठता है पढ़ने की […] Read more » Tulsidas तुलसीदास
व्यंग्य व्यंग्य/ दिल्ली मरतु लेखक अवलोकी April 14, 2011 / December 14, 2011 by अशोक गौतम | 1 Comment on व्यंग्य/ दिल्ली मरतु लेखक अवलोकी डॉ. अशोक गौतम किसी और का लेखक के साथ चोली दामन का संबंध हो या न पर लेखक और बीमारी का चोली दामन का संबंध होता है। चाहे वह किसी प्रेमिका की बीमारी हो अथवा लेखन की। इस बीमारी के चलते बहुधा लेखक की ब्याहता पत्नियां तो न के बराबर ही टिकती हैं पर […] Read more » लेखक
पुस्तक समीक्षा भारतीय राजनीतिक एवं न्याययिक व्यवस्था से ज्यादा पश्चिमी देशों पर भरोसा करता है चर्च April 13, 2011 / December 14, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 2 Comments on भारतीय राजनीतिक एवं न्याययिक व्यवस्था से ज्यादा पश्चिमी देशों पर भरोसा करता है चर्च नई दिल्ली – आजादी के बाद से भारतीय ईसाई एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के नागरिक रहे है। धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था चाहे कितनी ही दोषपूर्ण हो, लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहे कितनी ही गैर प्रतिनिधिक हो, यहां के ईसाइयों (चर्च) को जो खास सहूलियतें हासिल है, वे बहूत से ईसाइयों को यूरोप व अमेरिका में भी हासिल नही है। जैसे […] Read more » Indian Political
कविता कविता/ वतन छोड़ परदेस को भागते April 13, 2011 / December 14, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 3 Comments on कविता/ वतन छोड़ परदेस को भागते देश पूछेगा हमसे कभी न कभी, जब थी मजबूरियाँ, उसने पाला हमें हम थे कमज़ोर जब, तो सम्भाला हमें परवरिश की हमारी बड़े ध्यान से हम थे बिखरे तो सांचे में ढाला हमें बन गए हम जो काबिल तो मुंह खोल कर कोसने लग गए क्यों इसी देश को? देश के धन का, सुविधा का […] Read more »
कविता निगाहें April 13, 2011 / December 14, 2011 by अंकुर विजयवर्गीय | 1 Comment on निगाहें स्टेशन की सीढियां चढ़ते हुए हर रोज़ रास्ता रोक लेती हैं कुछ निगाहें अजीब से सवाल करती हैं और मैं नज़रें बचाते हुए हर बार की तरह आगे बढ़ जाता हूं ऐसा लगता है जैसे एक बार फिर ईमान गिरवी रख कर भी अपना सब कुछ बेच आया हूं और किसलिए चंद सिक्कों की खातिर […] Read more »
व्यंग्य व्यंग्य/ हिम्मत, संयम बनाए रखें बस April 7, 2011 / December 14, 2011 by अशोक गौतम | 3 Comments on व्यंग्य/ हिम्मत, संयम बनाए रखें बस अशोक गौतम आदरणीय परिधानमंत्री जी को सादर प्रनाम! मुझे न आशा है न विश्वास कि इन दिनों आप स्वस्थ और सानंद होंगे। कारण, कुछ दिनों से अपने देस के अखबार छपते बाद में हैं आपके खिलाफ कुछ न कुछ ऐसा वैसा छपा अनपढ़ जनता पढ़ पहले लेती है। ऊपर से विपक्ष को पता नहीं […] Read more »
कविता आर. सिंह की कविता/ नाली के कीडे़ April 2, 2011 / December 14, 2011 by आर. सिंह | 6 Comments on आर. सिंह की कविता/ नाली के कीडे़ भोर की बेला थी लालिमा से ओत प्रोत हो रहा था धरती और आकाश और मैं टहल रहा था उपवन में हृदय था प्रफुल्लित स्वप्न संसार में भटकता हुआ आ जा रहे थे एक से एक विचार टूटी शृंखला विचारों की जब मैं बाहर आया उपवन के दो घंटों बाद देखा मेरा बेटा सुकोमल छोटा […] Read more »
कविता कविता/ मैं भावनाओं में बह गया था April 2, 2011 / December 14, 2011 by लक्ष्मी नारायण लहरे कोसीर पत्रकार | 6 Comments on कविता/ मैं भावनाओं में बह गया था मैं भावनाओं में बह गया था मुझे नहीं मालूम ऊंच -नीच मेरे पास पढाई की डिग्री नहीं है मैं अनपढ़ हूँ मुझे क्या पता यहाँ डिग्री की जरुरत होती है मैं अनपढ़ हूँ डिग्री धारी होता तो गरीबों का पेट काटता , खून चूसता देश को गर्त में ले जाता बड़े -बड़े घोटाले और मजलूमों […] Read more »
समाज साहित्य कुलपतियों के बुते शिक्षा की बुनियाद March 27, 2011 / December 14, 2011 by डा.गोपा बागची | 1 Comment on कुलपतियों के बुते शिक्षा की बुनियाद विश्वविद्यालय अध्ययन, अनुसंधान और अनुशासन के केन्द्र होते हैं। विद्यार्थियों के लिये अध्ययन की यह अंतिम पाठशाला होती हैं। यहां से निकलकर वे अपने जीवन के कर्म क्षेत्र में सक्रिय होते हैं। कर्मक्षेत्र और सामाजिक जीवन की कठिनाईयों से जूझने और कुछ नया करने का जज्बा उन्हें विश्वविद्यालय के गुरुजनों से मिलता है। गुरुजनों पर […] Read more »
लेख प्रमोशन और साहित्य का संकट March 27, 2011 / December 14, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on प्रमोशन और साहित्य का संकट कोलकाता में एक दशक से हिन्दी सेमीनार के प्रमाणपत्र जुटाने की संक्रामक बीमारी कॉलेज शिक्षकों में फैल गयी है। सेमीनार में वे इसलिए सुनने जाते हैं जिससे उन्हें सेमीनार में भाग लेने का सर्टीफिकेट मिल जाए। यह साहित्य के चरम पतन की सूचना है। ये वे लोग हैं जो हिन्दी साहित्य से रोटी-रोजी कमा रहे […] Read more »