आलोचना हिन्दी साहित्यालोचना का नीरा राडिया पंथ December 14, 2010 / December 18, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on हिन्दी साहित्यालोचना का नीरा राडिया पंथ जगदीश्वर चतुर्वेदी ‘आलोचना’पत्रिका ने हाल के बरसों में किसी गंभीर साहित्यिक बहस को जन्म नहीं दिया है। और न हिन्दी में किसी आलोचक को प्रतिष्ठित ही किया है सिवाय संपादक नामवर सिंह के। फिर भी हिन्दी में उसे आलोचना की महान पत्रिका कहते हैं। सोचने वाली बात यह है यह पत्रिका भी अब प्रायोजन और […] Read more » hindi हिन्दी
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य/ झूठ की मोबाइल अकादमीः पिद्दी राजा December 14, 2010 / December 18, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment पंडित सुरेश नीरव सच बोलने के लिए दिमाग की जरूरत नहीं पड़ती है। जब से मैंने यह महावाक्य पढ़ा और सुना है तभी से जितने भी दिमागी-विद्वान लोग हैं, उन्हें मैं झूठा मानने लगा हूं। और दुनिया के जितने भी झूठे हैं,उन्हें विद्वान। इस समीकरण के मुताबिक जो जिस दर्जे का झूठा वो उसी दर्जे […] Read more » Mobile मोबाइल
आलोचना साहित्य साहित्य में नव्य उदारतावादी ग्लोबल दबाव December 13, 2010 / December 18, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment जगदीश्वर चतुर्वेदी हमारे साहित्यकार यह मानकर चल रहे हैं अमरीकी नव्य उदार आर्थिक नीतियां बाजार,अर्थव्यवस्था, राजनीति आदि को प्रभावित कर रही हैं लेकिन हिन्दीसाहित्य और साहित्यकार उनसे अछूता है। असल में यह उनका भ्रम है। इन दिनों हिन्दीसाहित्य और साहित्यकार पूरी तरह नव्य उदार नीतियों की चपेट में आ गया है। इन दिनों विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं,टीवी […] Read more » Sahitya साहित्य
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य /हवासिंह हवा-हवाई December 13, 2010 / December 18, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment पंडित सुरेश नीरव जब से हवासिंह किसी ऊपरी हवा के प्रभाव में आए हैं बेचारे की तो हवा ही खराब हो गई है। और हवा हुई भी इतनी खराब है कि नाक की प्राणवायु और कूल्हे की अपान वायु में कोई भेद नहीं रह गया है। हवा का ऐसा हवाई सदभाव हवाईसिंह-जैसे बिरलों को ही […] Read more » vyangya व्यंग्य
कहानी बच्चों का पन्ना बाल कहानी/ अच्छा-सा तोहफा December 13, 2010 / December 18, 2011 by डॉ. मो. अशरफ ख़ान | Leave a Comment चानपा बड़ी देर से चट्टान की ओट में खड़ा बारिश रुकने का इंतजार कर रहा था। अभी एक घंटा पहले आसमान बिल्कुल साफ था। चानपा को उम्मीद थी कि वह अंधेरा होते-होते घर पहुंच जाएगा। पर बादल ऐसे घिरे कि दो कदम चलना मुश्किल हो गया। वह बार-बार आसमान की ओर लाचार दृष्टि से ताककर […] Read more » Childrens Story
कविता श्रीराम तिवारी की कविता : हारे को हरिनाम है … December 10, 2010 / December 19, 2011 by श्रीराम तिवारी | Leave a Comment अब न देश-विदेश है, वैश्वीकरण ही शेष है। नियति नहीं निर्देश है, वैचारिक अतिशेष है।। जाति-धरम-समाज की जड़ें अभी भी शेष हैं। महाकाल के आँगन में, सामंती अवशेष है।। नए दौर की मांग पर, तंत्र व्यवस्था नीतियाँ। सभ्यताएं जूझती, मिटती नहीं कुरीतियाँ।। कहने को तो चाहत है, धर्म-अर्थ या काम की। मानवता के जीवन पथ […] Read more » poem हरिनाम
साहित्य साहित्य में लोकमंगल की आराधना December 10, 2010 / December 19, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment -हृदयनारायण दीक्षित शब्द ब्रह्म है। ब्रह्म संपूर्णता है। संपूर्ण और ब्रह्म पर्यायवाची हैं लेकिन संपूर्ण शब्द में ब्रह्म का विराट वर्णन करने की सामर्थ्य नहीं है। उपनिषद् के ऋषि ने इसीलिए ‘पूर्णमिदं पूर्णमदः’ शब्द प्रयोग किये। उपनिषद् में कहा गया कि यह पूर्ण है, वह पूर्ण है। यह पूर्ण उस पूर्ण से निकला है। यहां […] Read more » Sahitya साहित्य
साहित्य लोकतंत्र के बिंदास लेखक नागार्जुन December 8, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on लोकतंत्र के बिंदास लेखक नागार्जुन -जगदीश्वर चतुर्वेदी बाबा नागार्जुन को मंदी और नव्य-उदारीकरण के संदर्भ में पढ़ना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। मैंने करीब एक दशक से बाबा को नहीं पढ़ा था, इस बीच में उन्हें चलताऊ ढ़ंग से पढ़ा और रख दिया था। लेकिन इस बीच में उनकी जो भी किताबें बाजार में आईं उन्हें खरीदता चला गया […] Read more » Writer बाबा नागार्जुन
साहित्य यात्रा संस्मरण/ एक अजनबी December 8, 2010 / December 19, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment -रा. रं. दरवेश एक अंतहीन यात्रा…. बहुत पुरानी चीनी कहावत है, “दस हज़ार किताबों को पढने से बेहतर , दस हज़ार मील की यात्रा करना है” रात के 10 :30 हो चुके है और मै अपनी खिड़की में बैठा , दूर-सुदूर तक फैले हुए खेतों को देख रहा हूँ…बाहर घुप्प अँधेरा है…और शायद भीतर भी…आकाश […] Read more » Travel memoir यात्रा संस्मरण
आलोचना साहित्यिक मजमेबाजी के प्रतिवाद में December 6, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on साहित्यिक मजमेबाजी के प्रतिवाद में -जगदीश्वर चतुर्वेदी एक जमाना था हिन्दी साहित्य में य़थार्थ का चित्रण होता था। विचारधारात्मक बहसें होती थीं। नए मानकों पर आलोचना लिखी जाती थी। इन दिनों हिन्दी साहित्य को तमाशबीनों और मेले-ठेले की संस्कृति ने घेर लिया है। पहले साहित्य में उत्सव गौण हुआ करते थे अब प्रधान हो गए हैं। यह साहित्य में तमाशबीन […] Read more » Literary साहित्यिक
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य / सत्यवीरजी के झूठे बयान December 6, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | 2 Comments on हास्य-व्यंग्य / सत्यवीरजी के झूठे बयान पंडित सुरेश नीरव सत्यवीरजी का दावा है कि वे कभी झूठ नहीं बोलते और उनके जाननेवालों का दावा है कि सत्यवीरजी से बड़ा झूठा उन्होंने अपनी ज़िंदगी में आजतक नहीं देखा है। उनके जन्म को लेकर किंवदंती प्रचलित है कि जिस गांव में सत्यवीरजी का जन्म हुआ वहां सत्यवीरजी के जन्म से ठीक पहले सौ […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य क्या फायदा बड़े होने में December 6, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | 1 Comment on क्या फायदा बड़े होने में -पंडित सुरेश नीरव ये छोटेपन का दौर है। कभी छुटपन में पढ़ा था कि बड़ा हुआ तो क्या हुआ,जैसे पेड़ खजूर..मगर अब जब बड़े हुए तब समझ में आई बड़ेपन की फालतूनेस। और छोटेपन की यूजफुल उपयोगिता। जिधर देखो उधर छोटेपन का जलबा। छोटेपन का दंभ। बड़े तो बेचारे अपने बड़प्पन की शर्मिंदगी के मारे […] Read more » Profit फायदा