व्यंग्य व्यंग्य/विपक्ष का मुंह बंद कर दिया रे…… November 20, 2010 / December 19, 2011 by अशोक गौतम | Leave a Comment -अशोक गौतम ‘मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनाऊं….. मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक किस्सा सुनाऊं। किसका किस्सा सुनोगे? राष्ट्रमंडल खेलों में खिलाड़ियों से अधिक सोना बटोरने वाले दरबारियों का?’ ‘नहीं, सोने से अधिक प्यारा तो हमें भूखे सोना है। क्योंकि अपनी सरकार चुनने के बाद भी हमारी किस्मत में बस रोना है।’ […] Read more » mouth shut of opponent विपक्ष का मुंह बंद कर दिया
साहित्य हिन्दी का भाषा वैभव – डॉ. मधुसूदन उवाच November 19, 2010 / December 19, 2011 by डॉ. मधुसूदन | 11 Comments on हिन्दी का भाषा वैभव – डॉ. मधुसूदन उवाच भाषा की क्षमता के क्या निकष (कसौटियां) होने चाहिये? मैंने इस विषय में कुछ विचार, चिन्तन, मनन किया है और भी करता रहूंगा। अभी तक के विचारों की एक झलक पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। मेरे विचार में- (१) भाषा सीखने की सरलता और अक्षरों का वैज्ञानिक वर्गीकरण। (२) सीखने, सिखाने की असंदिग्ध सुस्पष्ट विधि। […] Read more » Hindi Language हिन्दी का भाषा वैभव
साहित्य अवसाद के युग में साहित्य November 19, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 3 Comments on अवसाद के युग में साहित्य साहित्य का वर्तमान बदला रूप अधिकतर लोगों की समझ में नहीं आ रहा । इन दिनों भाषिक प्रयोगों और मध्यकालीन विषयवस्तुओं की प्रासंगिकता नजर आ रही है। कुछ हैं जो अभी प्रगतिशील आंदोलन के प्रयोगों के आगे नहीं बढ़े हैं। इसमें कुछ ऐसे हैं जो अभी भी छायावादी भावबोध में जी रहे हैं। यही हाल […] Read more » Literature in the Age of Depression अवसाद के युग में साहित्य
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य: भवन निर्माण का कच्चामाल November 18, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | 1 Comment on हास्य-व्यंग्य: भवन निर्माण का कच्चामाल भारत देश ऋषि और कृषि प्रधान देश है। जब ऋषियों की फसल कृषि से भी अधिक होने लगी तो मजबूरी में ऋषियों ने भी कृषि कार्य शुरू कर दिया। इस खेती-बाड़ी के चक्कर में न जाने आजतक कितने ऋषि खेत रहे यह शोध का एक पक्ष है, हमारे ऋषियों का। मगर एक दूसरा पक्ष भी […] Read more » raw material in house building पंडित सुरेश नीरव हास्य-व्यंग्य
लेख 18 नवम्बर दर्शन दिवस के अवसर पर विशेष-इतिहास का अंत November 18, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on 18 नवम्बर दर्शन दिवस के अवसर पर विशेष-इतिहास का अंत (यूनेस्को के द्वारा प्रतिवर्ष नवम्बर के पहले तीसरे गुरूवार को दर्शन दिवस मनाया जाता है। इस दिन यह मौका 18 नवम्बर को पड़ रहा है। इस मौके पर दर्शन के गंभीर और महत्वपूर्ण सवालों पर सारी दुनिया में और खासकर यूनेस्को के पेरिस स्थित मुख्यालय में विचार विमर्श होने जा रहा है। यहां हम इतिहास […] Read more » 18 नवम्बर दर्शन दिवस darshan diwas:18 november
व्यंग्य व्यंग्य : इस खाकी वर्दी में बड़े-बड़े गुण… November 18, 2010 / December 19, 2011 by गिरीश पंकज | 4 Comments on व्यंग्य : इस खाकी वर्दी में बड़े-बड़े गुण… पुलिस विभाग की कुछ महान आत्माओं का अपना एक गीत है—”इस वर्दी में बड़े-बड़े गुण”. लाख सुखों का इक अड्डा है, आ भरती हो जा.. आ भरती हो जा”. उस दिन की बात है जब एक पुलिस वाला”देश भक्ति, जन सेवा”के लिये गंगाजल की कसम खा रहा था तो लोग चकरा गए. पुलिसवाला और गंगाजल […] Read more » importance of police dress खाकी वर्दी में बड़े-बड़े गुण
कविता कविता: क्या करें हम ? November 18, 2010 / December 19, 2011 by राजीव दुबे | 2 Comments on कविता: क्या करें हम ? ढह गई इमारत दब गए – मर गए नाचीज़ लोग झल्लाहट छा गई दिल्ली के दरबार में उफ्फ, ये गरीब, करते बरबाद गुलाबी सर्दी हमारी ! कह दिया – धमका दिया जनता को और अगले ही दिन हो गए बेघरबार हजारों कुछ और ढह सकने वाली इमारतों से । अब लेगें चैन की साँस पीछा […] Read more » WHAT TO DO कविता राजीव दुबे
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य : काल के गाल में अकाल November 17, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | 1 Comment on हास्य-व्यंग्य : काल के गाल में अकाल स्कूली दिनों में मास्साब ने घौंटा लगवा के याद करवाया था कि काल तीन तरह के होते हैं- भूतकाल,वर्तमानकाल और भविष्यकाल। सोचता हूं कि काल का कितना अकाल था उन दिनों। बस ले-देकर टिटरूंटू बस तीन ही काल। बस इनी के टेंटू लगाकर घूमो। प्रातःकाल,सांयकाल और रात्रिकाल बस सिर्फ और सिर्फ तीन ही काल। आज […] Read more » starvation काल के गाल में अकाल
साहित्य केदारनाथ अग्रवाल शताब्दी के मौके पर विशेष – लेखक के विश्वदृष्टिकोण की महत्ता November 16, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 2 Comments on केदारनाथ अग्रवाल शताब्दी के मौके पर विशेष – लेखक के विश्वदृष्टिकोण की महत्ता केदारनाथ अग्रवाल शताब्दी के मौके पर विशेष जन्म 1 अप्रैल 1911-मृत्यु 22 जून 2000) केदारनाथ अग्रवाल के बारे में हिन्दी के प्रगतिशील आलोचकों ने खूब लिखा है। हिन्दी के बड़े लेखकों में एक फिनोमिना है वे महानगरीय हलचलों से दूर रहे हैं। महागनरीय जोड़तोड़ उन्हें रास नहीं आयी है। इन लेखकों में सबसे बड़ा नाम […] Read more » 100 YEARS OF KEDARNATH birth केदारनाथ अग्रवाल शताब्दी
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य : शोकसभा का कुटीर उद्योग November 16, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment आज सुबह-सुबह शोकसभानंदजी का हमारे मोबाइल पर अचानक हमला हुआ। मैं-तो-मैं, मेरा मोबाइल भी आनेवाली आशंका के भय से कराह उठा। शोकसभानंदजी की हाबी है उत्साहपूर्वक शोकसभा आयोजित करना। हर क्षण वह तैयार बैठे रहते हैं कि इधर किसी की खबर आए और उधर वे तड़ से अपनी शोकसभा का कुटीर उद्योग शुरूं करें। वैसे […] Read more » Requiem of a cottage industry पंडित सुरेश नीरव शोकसभा का कुटीर उद्योग हास्य-व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग्य : जाले अच्छे हैं! November 16, 2010 / December 19, 2011 by अशोक गौतम | 2 Comments on व्यंग्य : जाले अच्छे हैं! मां बहुत कहती रही थी कि मरने के लिए मुझे गांव ले चल। पर मैं नहीं ले गया। सोचा कि गांव में तो मां रोज ही मरती रही। एक बार मां शहर में भी देख कर मर ले तो मेरा शहर आना सफल हो। वह आजतक किसीके आगे सीना चौड़ा कर कुछ कह तो नहीं […] Read more » Webs are good chuckle अशोक गौतम व्यंग्यजाले अच्छे हैं
साहित्य नागार्जुन जन्मशती पर विशेष – कविता में लोकतंत्र November 16, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 3 Comments on नागार्जुन जन्मशती पर विशेष – कविता में लोकतंत्र कविता का नया अर्थ है लोकतंत्र का संचार। अछूते को स्पर्श करना। उन विषयों पर लिखना जो कविता के क्षेत्र में वर्जित थे। प्रतिवादी लोकतंत्र के पक्ष में कविता का जितना विस्तार होता गया वह उतना ही लोकतांत्रिक होती गयी। कविता में लोकतंत्र का अर्थ है कविता और माध्यमों की पुरानी सीमाओं का अंत। लोकतंत्र […] Read more » 100 YEARS OF KEDARNATH birth Nagarjun birthday