कविता कविता / आ अब लौट चलें ……. December 4, 2010 / December 19, 2011 by श्रीराम तिवारी | 4 Comments on कविता / आ अब लौट चलें ……. अगम रास्ता-रात अँधेरी, आ अब लौट चलें. सहज स्वरूप पै परत मोह कि, तृष्णा मूंग दले. जिस पथ बाजे मन-रण-भेरी, शोषण बाण चलें. नहीं तहां शांति समता अनुशासन ,स्वारथ गगन जले. विपथ्गमन कर जीवन बीता, अब क्या हाथ मले. कपटी क्रूर कुचली घेरे, मत जा सांझ ढले. अगम रास्ता रात घनेरी आ अब लौट चलें. […] Read more » poem कविता
कविता प्रवक्ता न्यूज़ कविता/ करीब से देखा मैंने….. December 3, 2010 / December 19, 2011 by ललित कुमार कुचालिया | 2 Comments on कविता/ करीब से देखा मैंने….. चीख पुकार का वो मौत का मंज़र, उस मनहूस रात को करीब से देखा मैंने … न जाने कितने गुनहगारों को लील गयी वो अपने ही हाथों से मौत को फिसलते हुए, करीब से देखा मैंने… धरती कों प्यासा छोड़ गयी वो भूख से तडपते हुओ को करीब से देखा मैंने … शहर का हर […] Read more » Bhopal Gas Tragedy भोपाल गैस त्रासदी
व्यंग्य व्यंग्य / चक्कर करोड़पति बनने का December 3, 2010 / December 19, 2011 by गिरीश पंकज | 1 Comment on व्यंग्य / चक्कर करोड़पति बनने का -गिरीश पंकज हम अपने मित्र लतखोरीलाल के घर पहुँचे। देखा तो वे सामान्य ज्ञान की किताबों से घिरे हुए हैं। मैं चकराया। इस प्रौढ़ावस्था में ये पट्ठा कौन-सी परीक्षा की तैयारी में भिड़ा हैं। पूछने पर शरमाते हुए बोले – ”हे…हे…बस, ऐसे ही…” ”अरे, शरमाओ मत, बता भी दो। कहीं से कोई अच्छी संभावना हो […] Read more » vyangya व्यंग्य
व्यंग्य व्यंग/ रिश्तों का सुपरपावर देश भारत December 2, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment पंडित सुरेश नीरव ये कितनी नाइंसाफी है कि बेचारा आदमी एक और उसकी जान को रिश्ते अनेक। बेचारा कहां जाए। और कितने रिश्ते निभाए। एक को पकड़ो तो दूसरा मेंढक की तरह उछलकर दूर खड़ा हो जाता है। हम यह तो फिजूल ही कहते हैं कि हमारा देश कृषि प्रधान देश है। असलियत में तो […] Read more » India भारत
व्यंग्य व्यंग/ परंपरा की परंपरा December 2, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | Leave a Comment पंडित सुरेश नीरव हमें गर्व है कि हम हिंदुस्तानी हैं। जहां आज भी परंपराओं को निभाने की परंपरा जिंदा है। भले ही आदमियत मर चुकी हो। पैदा होने से लेकर मरने तक यहां आदमी परंपराओं को निभाता है। सच तो यह है कि यहां आदमी परंपराओं को ही ओढ़ता है औऱ परंपराओं को ही बिछाता […] Read more » Tradition परंपरा
कविता कविता / दुखदैन्य हारिणी December 2, 2010 / December 19, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment दुखदैन्य हारिणी के दुख को अब हम सबको हरना होगा, चिंताहरिणी की चिंता पर अब कुछ चिंतन करना होगा। कोई भविष्य में दिव्य नीर को भूतकाल की संज्ञा दे, इससे पहले ही पतित पावनी का जल पावन करना होगा। जय गंगा मईया का स्वर जब मुख से उच्चारित करते हो, क्यों नही तभी संकल्प यही […] Read more » poem कविता
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य : रपट कूकर कॉलौनी की November 29, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | 2 Comments on हास्य-व्यंग्य : रपट कूकर कॉलौनी की मैं नगर के सबसे पॉश इलाके में रहता हूं। चाय के उत्पादन से लिए जैसे दार्जिलिंग और बरसात के मामले में चेरापूंजी की प्रतिष्ठा है,ठीक वैसे ही कुत्तों के मामले में हमारी कॉलौनी का भी अखिल भारतीय रुतबा है। एक-से-एक उच्चवर्णी और कुलीन गोत्रों के कुत्ते इस कूकर कॉलौनी में निवास करते हैं। इसलिए ही […] Read more » vyangya पंडित सुरेश नीरव हास्य-व्यंग्य
कहानी लघु कथा/कलरव November 26, 2010 / December 19, 2011 by प्रवक्ता ब्यूरो | 1 Comment on लघु कथा/कलरव ”शिवप्रसाद, तुमको इस मकान से अच्छा मकान मिल सकता था, जहां शांति रहती, परंतु तुमने छोटे-छोटे बच्चों के विद्यालय के समीप ही मकान क्यों लिया? दिन-भर बच्चों का षोरगुल सुनाई देगा।” मोहनलाल ने अपने मित्र से प्रश्न किया। ”ऐसा है मोहन, मेरे पांच बेटे हैं और सभी का विवाह हो चुका है। पांचों बेटों के […] Read more » Short story लघुकथा
व्यंग्य हास्य-व्यंग्य/ मुन्ना बदनाम हुआ धन्नो ये तेरे लिए November 26, 2010 / December 19, 2011 by पंडित सुरेश नीरव | 1 Comment on हास्य-व्यंग्य/ मुन्ना बदनाम हुआ धन्नो ये तेरे लिए पंडित सुरेश नीरव हम बदनाम भी हुए तो कुछ गम नहीं…चलो इस बहाने नाम तो हुआ। नामचीन होने के तमाम बहाने आजमाने के बाद दुनियाभर के आम आदमी ने सर्वसम्मति से नामचीन होने के लिए बदनाम होने के फार्मूले को ही सबसे सुविधापूर्ण और सम्मानजनक नुस्खा पाया है। इसमें सबसे बड़ा लाभ तो उसे ये […] Read more » vyangya व्यंग
आलोचना अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता November 22, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | 1 Comment on अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता -जगदीश्वर चतुर्वेदी स.ही.वा.अज्ञेय हिन्दी के बड़े साहित्यकार हैं। उनकी प्रतिष्ठा उनमें भी है जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। अज्ञेय के बारे में प्रमुख समस्या है कि उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या उन्हें धिक्कार और अस्वीकार के साथ देखें ? क्या वे सचमुच में ऐसा कुछ लिख गए हैं जिसके कारण […] Read more » communalism साम्प्रदायिकता
आलोचना उत्तर आधुनिकतावाद के विभ्रम और अस्मिता November 21, 2010 / December 19, 2011 by जगदीश्वर चतुर्वेदी | Leave a Comment -जगदीश्वर चतुर्वेदी इन दिनों वास्तव और अवास्तव, व्यक्ति और अव्यक्ति, जीवन और मृत्यु, उपस्थित और अनुपस्थित आदि के बारे में सवाल नहीं किए जाते। जो कुछ भी कहा जाता है वह खास सीमा में रहकर ही कहा जाता है। इसी प्रसंग में देरिदा की प्रसिद्ध किताब ‘स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स’ का जिक्र करना समीचीन होगा। इस […] Read more » modernism उत्तर आधुनिकतावाद
कविता कविता/ यह कैसा लोकतंत्र ? November 21, 2010 / December 19, 2011 by राजीव दुबे | 2 Comments on कविता/ यह कैसा लोकतंत्र ? -राजीव दुबे मानवीय संवेदनाओं पर होता नित निर्मम प्रहार, सीधे चलता जन निर्बल माना जाता, रौंदा जाता जनमत प्रतिदिन…, यह कैसा लोकतंत्र – यह कैसा शासन ? सत्ता के आगारों में शासक चुप क्यों बैठा, जनता हर रोज नए सवालों संग आती है – क्या आक्रोश चाहिए इतना कि उठ जाये ज्वाला, पिघलेगा पाषाण हृदय […] Read more » poem on loktantra:Rajiv Dubey लोकतंत्र