व्यंग्य साहित्य मतदाता की आवाज May 20, 2019 / May 20, 2019 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment आर के रस्तोगी मै भारत का मतदाता हूँ,हर बार ही धोखा खाता हूँ | जब जब चुनाव आते है,उस समय ही पूजा जाता हूँ || नेताओ का कोई धर्म नहीं,ये झूठे वादे ही करते रहते है | पांच साल चुनाव के बाद ,अपनी शक्ल दिखाने आते है || अखंड भारत की जो बाते करते,ये ही […] Read more » voters voters voice voting चुनाव
कविता राजनीति व्यंग्य साहित्य ‘इण्डियन भारत’ के ‘महाभारत’ का दुर्योद्धन-प्रसंग May 18, 2019 / May 18, 2019 by मनोज ज्वाला | 1 Comment on ‘इण्डियन भारत’ के ‘महाभारत’ का दुर्योद्धन-प्रसंग मनोज ज्वाला ‘इण्डिया दैट इज भारत’ के संविधान से संचालित भारतीय लोकतंत्र के महापर्व का १७वां आयोजन जारी है । वर्षों तक सत्ता-सुख भोगता रहा विपक्ष पांच वर्ष पहले १६वें पर्व के दौरान सत्ता गंवा चुके होने के बाद अब इस बार उसे किसी भी तरह हासिल कर लेने के बावत आसमान सिर पर उठा […] Read more » ‘इण्डियन भारत’ poem poetry sattire poem sattire poetry दुर्योद्धन-प्रसंग महाभारत
कविता व्यंग्य बदला —आर के रस्तोगी May 17, 2019 / May 17, 2019 by आर के रस्तोगी | Leave a Comment पप्पू के जीजा ने,बुआ के भतीजे ने ,जनता को लूटकर,की काली कमाई ,काली कमाई से, दोनों ने मौज उड़ाई,कोठी बंगले बनवाये, फार्म हाउस बनवाये,जब चुनाव आया तो,जनता की बारी आई,जनता ने भी दोनों के कान पकडवा कर खूब, उठक बैठक लगवाई | भाई ने बहन को बुलाया,पार्टी का महासचिव बनाया ,चुनाव का प्रचार कराया ,पर रिजल्ट कुछ न आया […] Read more » poetry political poetry
व्यंग्य समाज जज या थानेदार April 26, 2019 / April 26, 2019 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment कल २५ अप्रेल को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर एक महिला के यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण मिश्रा ने जो धमकी दी, साधारणतया कोई थानेदार भी सार्वजनिक रूप से किसी को नहीं देता। सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्रा ने कहा — अमीर-ताकतवर, सुन लो, आग से मत खेलो। […] Read more »
व्यंग्य चोरी का राष्ट्रीय उद्यम April 2, 2019 / April 2, 2019 by मोहन कुमार झा | Leave a Comment एक समय था जब चोरी करना या चोरी होना बहुत बड़ी घटना होती थी। मेरे गांव में जब चोरी होती थी तो महीनों तक चर्चा चलती रहती। जिस घर चोरी होती थी अक्सर उस घर की कोई बूढ़ी अपने बुढ़े मुंह से कई दिनों तक सुबह-शाम, दिन-दोपहर चोरों को दिव्य श्राप दिया करती। ये श्राप […] Read more » चोरी चोरी का राष्ट्रीय उद्यम
व्यंग्य ‘अब जूते के दिन फिरे हैं April 1, 2019 / April 1, 2019 by मोहन कुमार झा | 1 Comment on ‘अब जूते के दिन फिरे हैं मोहन कुमार झा एक कहावत है कि हर किसी के दिन फिरते हैं। ‘अब जूते के दिन फिरे हैं।’ रामकथा में वर्णित है कि जब श्रीरामचन्द्र किसी प्रकार से वापस अयोध्या लौटने को तैयार नहीं हुए तो भरत जी ने अपने अग्रज भ्राता से उनकी “चरण पादुक” मांग ली और उसको राजसिंहासन पर रखकर चौदह […] Read more » जूते के दिन
व्यंग्य समरथ को नहिं दोष गुसाईं April 1, 2019 / April 1, 2019 by विजय कुमार | Leave a Comment कहावतों का संसार अजब-गजब है। बड़ी से बड़ी बात को छोटे में कहना हो, तो कहावत का सहारा लिया जाता है। हर भाषा में ये कहावतें विद्यमान हैं। इनसे किसी भी लेख, व्यंग्य, निबंध या भाषण की सुंदरता बढ़ जाती है। भाषा की तरह हर क्षेत्र और जाति-बिरादरी के लिए भी कहावतें बनी हैं। इनमें […] Read more »
व्यंग्य इलेक्शन की माउथ स्ट्राइक March 26, 2019 / March 26, 2019 by प्रभुनाथ शुक्ल | Leave a Comment प्रभुनाथ शुक्ल होली रंग और मन मिजाज का त्यौहार है। क्योंकि अपना देश भी रंगीला है। यहां की हर बात निराली है। होली और चुनाव में चोली-दामन का साथ है। दोनों उमंग, उन्माद, उत्साह, उम्मीद, रंग-भंग, दबंग, मृदंग और हुड़दंग के महामिश्रण से निर्मित हैं। होली में छेड़छाड़ के एक सौ एक गुनाह माफ है। गुलाल लगाने के बहाने कुछ […] Read more » माउथ स्ट्राइक
व्यंग्य उपानह प्रहार का हाईप्रोफाइल प्रचलन March 11, 2019 / March 11, 2019 by भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी | Leave a Comment अस्त्र और शस्त्र में अन्तर को लेकर काफी अरसे से जानकारों द्वारा अपने-अपने तरीके से व्याख्यान दिये जाते रहे हैं। फागुन के महीने में जब लोग मस्ती के मूड में रहते हैं तब विश्लेषक अस्त्र और शस्त्र के उदाहरण के रूप में हर घर की रसोई में उपलब्ध बेलन का जिक्र किया करते हैं। गुझिया, […] Read more »
व्यंग्य जूता है तो सबकुछ मुमकिन है March 11, 2019 / March 11, 2019 by प्रभुनाथ शुक्ल | Leave a Comment प्रभुनाथ शुक्ल भारतखंडे आर्यावर्ते जूता पुराणे प्रथमो अध्यायः। मित्रों! अब तो आप मेरा इशारा समझ गए होंगे, क्योंकि आप बेहद अक्ल और हुनरमंद हैं। आजकल जूता यानी पादुका संस्कृति हमारे संस्कार में बेहद गहरी पैठा बना चुकी है। इसकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए हम आपको इसकी महत्ता बताने जा रहे हैं। कहते हैं कि […] Read more »
व्यंग्य साहित्य मेरी दावेदारी भी लिख लें February 25, 2019 / February 25, 2019 by विजय कुमार | Leave a Comment किसी भी विवाह या जन्मदिन समारोह में जाएं, तो वहां कुछ राशि भेंट देना एक परम्परा है। कहीं इसे व्यवहार कहते हैं, तो कहीं शुभकामना या आशीर्वाद। मेजबान कुछ संकोच से ‘‘इसकी क्या जरूरत थी ?’’ कहकर उसे जेब में रख लेता है। कुछ जगह कुछ बुजुर्ग मेज-कुर्सी डालकर बैठे रहते हैं। वे मेहमान की […] Read more »
व्यंग्य हे स्पीड प्रेमी बाइकरों… राहगीरों पर रहम करो…!! February 4, 2019 / February 4, 2019 by तारकेश कुमार ओझा | Leave a Comment तारकेश कुमार ओझाहे स्पीड प्रेमी बाइकरों… खतरों से खेलने पर आमादा नौजवानों। प्लीज हमराहगीरों पर रहम करो। क्या गांव और क्या शहर क्या चौक – चौराहा। हर सड़कपर आपका ही आतंक पसरा है। बेहद जरूरी कार्य से निकले शरीफ लोग भले हीपुलिसकर्मियों की नजरों में आ जाए, लेकिन पता नहीं आप लोगों के पास ऐसाकौन […] Read more »