विविधा व्यंग्य मान और अपमान August 7, 2015 by विजय कुमार | 1 Comment on मान और अपमान विद्वानों के अनुसार सृष्टि के जन्मकाल से ही मान और अपमान का अस्तित्व है। लक्ष्मण जी ने वनवास में शूर्पणखा की नाक काटी थी। उसने इस अपमान की रावण से शिकायत कर दी। अतः सीता का हरण हुआ और फिर रावण का कुलनाश। द्रौपदी के एक व्यंग्य ‘‘अंधे का पुत्र अंधा ही होता है’’ ने […] Read more » अपमान मान
आर्थिकी विविधा भारत गुलामी की ओर…….. August 7, 2015 / August 11, 2015 by संजय चाणक्य | Leave a Comment ‘‘ जिनके दिल में दर्द है दुनिया का, वही दुनिया मे जिन्दा रहते है! जो मिटाते है खुद को जीते जी, वही मरकर जिन्दा रहते है!!’’ अगर हम आपसे कहे कि भारत एक बार फिर गुलामी की ओर बढ़ रहा है, तो शायद आपकों कुछ अटपटा सा लगेगा। हो भी क्यों नही। क्योकि जहां से […] Read more » भारत गुलामी
विविधा साहित्य या तमाशा ?? August 6, 2015 by निर्मल रानी | Leave a Comment निर्मल रानी पिछले दिनों फ़ेसबुक पर वास्तविकता से भरा हुआ एक व्यंग्य पढ़ने को मिला जो इस प्रकार था-‘एक अंग्रेज़ डॉक्टर भारत में घूम-फिर रहा था। वह एक बुक स्टॉल पर गया और वहां उसकी नजर एक पुस्तक पर पड़ी। मात्र 20 रुपये मूल्य की इस पुस्तक का शीर्षक था-‘मात्र एक महीने में घर बैठे […] Read more » साहित्य या तमाशा
महिला-जगत विविधा भारत में स्तनपान की चिंताजनक स्थिति August 6, 2015 by उपासना बेहार | Leave a Comment उपासना बेहार पूरी दुनिया में 1 अगस्त को विश्व स्तनपान दिवस और अगस्त माह के प्रथम सप्ताह को स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान सरकारों और सामाजिक संस्थानों द्वारा लोगों में स्तनपान से जुडी भ्रान्तियों को दूर करने और माँ के दूध के महत्त्व को बताने का प्रयास किया जाता है। नवजात शिशुओं में रोगों […] Read more » भारत में स्तनपान
धर्म-अध्यात्म विविधा दक्षिण भारत के संत (14) सन्त कुलशेखर अलवार August 6, 2015 by बी एन गोयल | Leave a Comment बी एन गोयल “हे भगवन मैं कब आप के दिव्य दर्शन कर सकूँगा। हे प्रभु राम, मैं अशांत हूँ । मुझे कब आप का अनुग्रह मिलेगा। मेरा मन भटकता रहता है। मैं कब इसे आप के चरण कमलों में लगा सकूँगा। मेरे मन में कब आप के प्रति निष्ठा जागेगी । मुझे कब आप […] Read more » दक्षिण भारत के संत सन्त कुलशेखर अलवार
कविता विविधा जोगन August 5, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे ! तेरे बिन कोई नहीं मेरा रे ; हे श्याम मेरे !! मैं तो तेरी जोगन रे ; हे घनश्याम मेरे ! तेरी बंसुरिया की तान बुलाये मोहे सब द्वारे छोड़कर चाहूं सिर्फ तोहे तू ही तो है सब कुछ रे , हे श्याम मेरे ! […] Read more »
खान-पान विविधा डिब्बाबंद पेय पदार्थों का सच August 5, 2015 by विपिन किशोर सिन्हा | Leave a Comment डिब्बाबन्द पेय पदार्थों में स्वाद तो होता है, परन्तु पौष्टिकता नहीं होती। अपने उत्पादन स्थल से फुटकर दूकानों तक पहुँचने में यह लंबा समय लेता है। दूकान से उपभोक्ता के पास पहुँचने में यह और लंबा समय लेता है। कायदे से इन्का भंडारण रेफ़्रीजेरेटर में किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। पूरे […] Read more » डिब्बाबंद पेय पदार्थ
विविधा आतंकवाद पर कायराना सियासत August 4, 2015 by अरविंद जयतिलक | Leave a Comment अरविंद जयतिलक दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में ऐसे सियासतदानों की कमी नहीं जो अपने बोलवचन से न सिर्फ आतंकियों की हौसला आफजाई कर रहे हैं बल्कि उन्हें बेगुनाह बता देश की संप्रभुता से खिलवाड़ भी कर रहे हैं। आश्चर्य है कि जब पूरा देश मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट में मारे गए 257 लोगों के मुजरिम […] Read more »
विविधा ओ मौला रे …… August 4, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment ओ मौला रे तेरे दर का रास्ता किधर है मैं तो ढूंढ लिया हर गाँव और हर गली पर तेरे बांहों का आसरा कहीं न मिला ओ मौला रे ………….. बहुत किताबे पढ़ी बहुत ज्ञानी मिले पर कोई मुझे तुझ तलक नहीं पहुंचा पाया तेरे दर का रास्ता किधर है ओ मौला रे……………. चंद […] Read more »
विविधा शख्सियत प्रो. कलाम: तुम सा नहीं देखा… August 4, 2015 by तनवीर जाफरी | 1 Comment on प्रो. कलाम: तुम सा नहीं देखा… तनवीर जाफ़री भारतवासियों के हृदय में एक आदर्श महापुरुष के रूप में अपनी जगह बनाने वाले भारत रत्न व पूर्व राष्ट्रपति डा० एपीजे अब्दुल कलाम की गाथा इतिहास के पन्नों में सिमट चुकी है। डा० कलाम ने अपनी कार्यशैली व अपनी कारगुज़ारियों की बदौलत तथा अपने अनूठे स्वभाव के चलते देशवासियों के दिलों में जो […] Read more » प्रो. कलाम
गजल विविधा अपनों से भरी दुनियाँ August 3, 2015 by गोपाल बघेल 'मधु' | Leave a Comment (मधुगीति १५०८०१) अपनों से भरी दुनियाँ, मगर अपना यहाँ कोंन; सपनों में सभी फिरते, समझ हर किसी को गौण ! कितने रहे हैं कोंण, हरेक मन के द्रष्टिकोंण; ना पा सका है चैन, तके सृष्टि प्रलोभन ! अधरों पे धरा मौन, कभी निरख कर नयन; आया समझ में कोई कभी, जब थे सुने वैन ! […] Read more » अपनों से भरी दुनियाँ
कविता विविधा ||| आहट ईश्वर की ……!!! ||| August 3, 2015 by विजय कुमार सप्पाती | Leave a Comment ये कैसी अजनबी आहट है .. कौन है यहाँ , किसकी आहट है ये … जो मन में नए भाव जगा रही है . ये तो तुम हो मेरे प्रभु…. हे मेरे मनमंदिर के देवता कबसे तुझसे मिलने की प्यास थी मन में . आज एक पहचानी सी आहट आई तो देखा की तुम थे […] Read more » ||| आहट ईश्वर की ......!!! |||