युवाओं में डिजिटल लत: अगर अब भी नहीं चेते, तो बहुत देर हो जाएगी
Updated: February 16, 2026
राजेश जैन भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश की लगभग दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। यही युवा भारत की…
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आसमान में भारत का एयर डिफेंस सिस्टम ‘स्वदेशी सुदर्शन चक्र’
Updated: February 16, 2026
रामस्वरूप रावतसरे भारत अपनी सीमाओं को केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान में भी सुरक्षित करने के लिए एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर रहा…
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ढाका में बदलाव की हवा, भारत के सामने नई कसौटी
Updated: February 16, 2026
(सत्रह वर्षों बाद सत्ता में लौटी बीएनपी ने बांग्लादेश की राजनीति की दिशा बदली है; भारत के सामने अब अवसरों के साथ नई अनिश्चितताएँ भी…
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ब्रह्मांड की सरकार और धरती की राजनीति
Updated: February 16, 2026
अमरपाल सिंह वर्मा आने वाली 19 मार्च से विक्रम संवत 2083 शुरू हो रहा है। ज्योतिषियों ने बताया है कि इस बार वर्ष के राजा देवगुरु बृहस्पति होंगे। सब लोग न ज्योतिषी हैं और न खगोल के जानकार। ग्रहों की गणना समझ से बाहर हो सकती है लेकिन हरर साल यह बात पढक़र लोग ठहर जाते हैं। वर्ष के राजा के विचार में एक प्रतीक छिपा है, वह ध्यान खींचता है। इस विचार में सत्ता को लेकर एक ऐसी सोच छिपी है, जो हमारी रोजमर्रा की राजनीति से बिल्कुल अलग है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार हर नव संवत्सर के साथ सृष्टि की सत्ता बदलती है। एक ग्रह वर्ष का राजा बनता है, कोई मंत्री, कोई सेनापति, कोई वर्षा का अधिपति। यह पूरी व्यवस्था प्रतीकात्मक है। लेकिन कल्पना कीजिए कि ऊपर कहीं तो यह मान लिया गया है कि सत्ता स्थाई नहीं होती। वह हर साल बदलती है। उत्तदायित्व परिवर्तित होते रहते हंै। कोई एक हमेशा के लिए नहीं बैठा रहता। यह विचार अपने आप में सुंदर है। क्योंकि हमारी धरती पर सत्ता अक्सर स्थायित्व चाहती है। यहां कुर्सी को पकड़ कर रखने की प्रवृत्ति स्वाभाविक मानी जाती है। हमारी परंपराओं में बदलाव स्वाभाविक ही नहीं है बल्कि आवश्यक है। फिर भी बदलाव को जोखिम समझा जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं कहती हैं कि अगर बृहस्पति वर्ष के राजा हों तो ज्ञान, संतुलन और नैतिकता के संकेत माने जाते हैं। अगर शनि हों तो अनुशासन और कठोर परिश्रम के संकेत। मंगल राजा हों तो ऊर्जा और संघर्ष होना तय है। इन मान्यताओं को कोई आस्था कहता है, कोई इन्हें सांस्कृतिक कल्पना के दायरे मं रखता है तो किसी की नजर में यह प्रतीकात्मक भाषा है। तमाम दृष्टियों के बावजूद एक बात तय है कि हर साल का स्वभाव अलग हो सकता है। हर समय एक जैसा नहीं होता। धरती पर सत्ता का लोभ इस कदर हावी है कि हम अक्सर यह मान लेते हैं कि जो व्यवस्था आज है, वही अंतिम है। जो सोच अभी प्रबल है, वही स्थाई है। लेकिन कैलेंडर हर साल बदलकर यह स्मरण करवा देता है कि समय स्थिर नहीं है। अगर ग्रहों की कल्पित सत्ता बदल सकती है तो मनुष्य की सत्ता क्यों नहीं? अगर ब्रह्मांड को हर साल नई दिशा दी जा सकती है तो समाज में नई सोच क्यों नहीं आ सकती? कई लोग तर्क-वितर्क करते हैं। ज्योतिष की सत्यता या असत्यता में उलझ जाते हैं लेकिन बात उस प्रतीक की है जो हमारी परंपराओं ने हमें दिए हैं। परंपराएं भूमिकाओं को अस्थाई करार देती हैं। यानी, आज जो राजा है, कल वह आम आदमी होगा। आज जो मंत्री बन उद्बोधन देता है, वह कल श्रोताओं की कतार में होगा। आज जो नीति नियंता है, निर्णय लेने में समक्ष है, कल उससे सवाल पूछे जाने अवश्यम्भावी हैं। दरअसल, जीवन भी कुछ ऐसा ही है। बचपन में पिता सवाल पूछते हैं, बड़ा होकर बेटा पूछने लगता है। कभी शिक्षक मंच पर होता है तो कभी शिष्य मंचासीन हो जाते हैं। कभी हम निर्णय लेते हैं तो कभी निर्णय मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं। नव संवत्सर का विचार सकारात्मकता का भाव लेकर आता है। चाहे पिछले वर्ष में कितनी ही उलझनें रही हों, कितनी मुश्किलें आई हों, पर नव संवत्सर कहता है कि पुन: शुरुआत संभव है। विज्ञान कहते हैं कि अगर हर चक्र के उपरांत नया चक्र आने के प्रति कुदरत आश्वस्त रहती है तो हममें यह आश्वासन का भाव क्यों नहीं होना चाहिए? लोग अक्सर बड़े सिद्धांतों में उलझ जाते हैं। सोशल मीडिया के दौर में यह सब अधिक हो गया है। हम तर्क-वितर्क में उलझते हैं, पर इस सीधे-सहज विचार पर ध्यान नहीं देते कि काम करो और आगे बढ़ जाओ। ब्रह्मांड चल रहा है। सूर्य नित्य उदय होता है, वह क्या कोई घोषणा करता है। ग्रह अपनी कक्षा में घूमते हैं, क्या वह कोई बहस करते हैं? इनमें किसी को खुद को अपरिहार्य प्रमाणित करने के लिए श्रम नहीं करना पड़ता मगर धरती पर सब इसी काम पर पसीना बहा रहे हैं। हम धरती के लोग मानने लगे हैं कि हमारे बिना व्यवस्था ठहर जाएगी लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या कोई व्यक्ति, पद या शासन शाश्वत हुआ है? नव संवत्सर के दिन कामकाज संभालने वाली ब्रह्मांड की सरकार को चाहे कोई कल्पना माने, चाहे आस्था का हिस्सा बनाए अथवा सांस्कृतिक परंपरा की श्रेणी में रखे मगर यह तो मानना ही पड़ेगा कि यह परिवर्तन को अंगीकार करना सिखाती है। यह कुर्सी को पकड़ कर बैठने से परहेज करने की वकालत करती है। कोई चाहे खुद न समझे मगर ज्योतिषियों के सानिध्य में पहुंच कर वह ग्रहों की चाल समझने की जरूर करते हैं लेकिन ग्रहों के बहाने से कहा क्या जा रहा है, समझाया क्या जा रहा है, उसे समझने की कोशिश नहीं करते। अमरपाल सिंह वर्मा
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एआई इम्पैक्ट सम्मिट 2026 के नीतिगत-समूहगत वैश्विक मायने
Updated: February 16, 2026
कमलेश पांडेय एआई इम्पैक्ट समिट 2026 भारत सरकार द्वारा नई दिल्ली में 16-20 फरवरी 2026 को आयोजित एक प्रमुख वैश्विक आयोजन है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता…
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‘वंदे मातरम्’ : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संजीवनी, देशप्रेम का जयघोष
Updated: February 16, 2026
‘वंदे मातरम्’ : कहीं पर पूर्ण समर्थन के स्वर,कहीं कोर्ट में चुनौती का एलान प्रदीप कुमार वर्मा ‘वंदे मातरम्’ जैसा कालजयी गीत कभी भारतीय…
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बंगाल का भविष्यः धर्म की लहर या प्रगति की राह?
Updated: February 16, 2026
-ः ललित गर्ग:- पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, पर राजनीतिक रणभेरी बज चुकी है। इस बार संकेत साफ…
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डिजिटल क्रांति पर साइबर प्रहार गंभीर चुनौती
Updated: February 17, 2026
-ः ललित गर्ग:- डिजिटल युग ने भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई, ई-कॉमर्स और ऑनलाइन सेवाओं…
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भविष्य के जलवायु समझौतों के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज: क्योटो प्रोटोकॉल
Updated: February 16, 2026
-सुनील कुमार महला पर्यावरणीय दृष्टि से 16 फरवरी का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि 16 फरवरी 2005 को क्योटो प्रोटोकॉल आधिकारिक रूप से…
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भारतीयता के विस्तार का महत्त्वपूर्ण आधार है परिवार
Updated: February 16, 2026
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल‘ समाज की सक्रियता और राष्ट्र के निर्माण की प्राथमिक इकाई के तौर पर सम्पूर्ण ब्रह्मांड में स्वीकार्य चेतना का नाम, सशक्तिकरण का एकाधिकार, सामंजस्य…
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बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन की वैचारिक क्रांति
Updated: February 16, 2026
-ः ललित गर्ग:- बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर इतिहास के मोड़ पर खड़ी है। लगभग दो दशकों के लंबे अंतराल के बाद यदि बांग्लादेश…
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