आपसी संवाद, जनता की जागरूकता से खत्म होगा नक्सलवाद
Updated: April 7, 2025
हाल ही में 5 अप्रैल 2025 को दंतेवाड़ा में बस्तर पंडुम महोत्सव में समापन समारोह के दौरान हमारे देश के केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित…
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अगले 30 सालों में बांग्लादेश में कोई हिंदू नहीं बचेगा
Updated: April 7, 2025
डॉ. बालमुकुंद पांडेय भारत का पूर्वी देश बांग्लादेश 1971 में बना था। तत्कालीन नवोदित राष्ट्र (विकासशील…
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ए आई : लाभ और हानि
Updated: April 7, 2025
विवेक रंजन श्रीवास्तव अपने स्कूल के दिनों की याद आती है, एक निबंध , भाषण या वाद विवाद का विषय बड़ा लोकप्रिय था ” विज्ञान…
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वैज्ञानिक जीवन शैली के प्रणेता भगवान महावीर
Updated: April 7, 2025
10 अप्रैल महावीर जयंती डॉ. वीरेन्द्र भाटी मंगल भगवान् महावीर के सिद्धांत आज वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वमान्य हो चुके हैं। महावीर द्वारा बताये गये अहिंसक…
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नसीब हों ‘एकदेश, एकजैसी’ हेल्थ सुविधाएं?
Updated: April 7, 2025
विश्व स्वास्थ्य दिवस (7अप्रैल) : डॉ. रमेश ठाकुर दुनिया सालाना 7 अप्रैल को ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ इसलिए मनाती है ताकि लोग स्वास्थ्य के प्रति सतर्क और गंभीर हो सकें। बदलते लाइफस्टाइल में लोगों का शरीर नाना प्रकार के खतरनाक वायरसों और अजन्मी बीमारियां से घिर चुका है। इसके अलावा पारिवारिक जिम्मेदारियां का बोझ, भविष्य की चिंताएं और बच्चों के कैरियर को संभालने की आपाधापी में इंसानों ने अपने स्वास्थ्य की देखरेख को बहुत पीछे छोड़ दिया है। इसे लापरवाही का नतीजा कहें या कुछ और? नौजवानों का हंसते, खेलते नाचते-गाते के दौरान स्टेजों पर दम तोड़ने वाली तस्वीरे सोशल मीडिया पर लगातार देख ही रहे हैं। असमय मौतों का डब्ल्यूएचओ का मौजूदा आंकड़ा रोंगटे खड़े करता है। 25-55 के उम्र के बीच असमय मरने वालों की संख्या पूरी कर चुके बुजुर्गों से कहीं ज्यादा आंकी गई है। इसपर विभिन्न वैश्विक चिकित्सीय रिपोर्ट ‘एक ही बात, एक सुर’ में कहती हैं कि लोग अपने शरीर की देखरेख को लेकर भंयकर लापरवाह हुए हैं। अपने पर ध्यान देना होगा, वरना इन आंकड़ों में यूं ही बढोतरी होती रहेगी। इन गंभीर स्थितियों को देखकर ही ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ जनमानस को स्वास्थ्य को लेकर सतर्क करता है। इतना तय है, अगर इंसान अपनी हेल्थ को बेहतर करने के लिए अच्छी दैनिक आदतें डाल लें, तो अजन्मी बीमारी से काफी हद तक खुद को बचा सकता है। क्योंकि इस तरह की जागरूकता के लिए तमाम देशी और विदेशी स्वास्थ्य संस्था हमारे आसपास सक्रिय हैं। यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ के अलावा ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ संसार के देशों के लिए स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग एवं मानक विकसित करने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। स्वास्थ्य संगठन में 193 देश मेंबर और दो संबद्ध सदस्य हैं। ये संयुक्त राष्ट्र संघ की एक अनुषांगिक स्वास्थ्य इकाई है जिसकी स्थापना 7 अप्रैल 1948 में हुई थी। इसके अलावा भारत मेडिकल टूरिज्म के लिहाज से समूची दुनिया में हमेशा से विख्यात ही रहा है? फिर बात चाहें, उच्च गुणवत्ता युक्त देशी-दवाओं की हो, ऋषि-मुनियों की फार्मेसी, प्राचीन चिकित्सा प्रद्वति, सस्ती वैक्सीन व जड़ी-बूटियों का हिमालीय भंडार? सब कुछ हमारे यहां मौजूद है। संसार वाकिफ है, भारत से तमाम गरीब देशों की चिकित्सा जरूरतें पूरी होती रही हैं। हालांकि दुख की बात ये है कि विगत कुछ दशकों से प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति और दवाओं का प्रचार-प्रसार कुछ धीमा पड़ा है, जिसका खामियाजा भुगत भी रहे हैं। आधुनिक दौर में चिकित्सा के तौर-तरीके, रंग-रूप और मायने कैसे और किस तरह से बदले हैं। सभी जानते हैं, बताने की जरूरत नहीं? इन बदलावों के सभी भुक्तभोगी हैं। कोई ऐसा नहीं जिसका चिकित्सा चुनौतियों से कभी ना कभी सामना न पड़ा हो? महंगी दवाईयों और चिकित्सा सुविधाओं से कितनों को अपनी जाने गवानी पड़ती है, ये भी सब जानते हैं। दवाइयों की कीमत आसमान छूती हैं जो एक गरीब इंसान के लिए किसी सपने से कम नहीं? दरअसल इसी असमानता को मिटाने की अब जरूरत है। फ्री चिकित्सा-सुविधाओं की कागजी बातें खूब होती हैं। पर, सच्चाई हकीकत से कोसों दूर रहती हैं। फ्री-इलाज के नाम पर तो हेल्थ कार्ड धारक अस्पतालों से रपटा तक दिए जाते हैं। गौरतलब है, स्वास्थ्य मामलों की समीक्षा और संपूर्ण चिकित्सा तंत्र को ऑडिट करने की अब सख्त जरूरत है। गगनचुंबी इमारत वाले फाइव स्टार होटल नुमा अस्पताल हेल्थ के नाम पर व्यवसायी बने हुए है। लेकिन इंसानियत कहती है कि इस पेशे को धंधा न समझा जाए। क्योंकि जनमानस आज भी डॉक्टर को भगवान का दर्जा देते हैं। ये दर्जा सदियों से बना है और आगे भी यथावत रहे। इसी में सभी की भलाई है। स्वास्थ्य सेवाओं में बदलाव और सुधार की दरकार बहुत पहले से महसूस हो रही है। केंद्र व राज्य हुकूमतों को प्रत्येक स्तर पर स्वास्थ्य को प्राथमिकताओं में शुमार करना चाहिए और सबसे जरूरी बात प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में रिक्त पदों को भरना चाहिए। नए अस्पताल खोलने की जरूरत तो है ही। जहां प्रिवेंटिव व प्रोमोटिवे हेल्थ सुविधाएं आसानी से जरूरतमंद मरीजों को मिले। बिडंवना देखिए, छोटे से छोटे ऑपरेशन भी ग्रामीण अस्पतालों में नहीं किए जाते, जिसके लिए मरीजों को दूर शहरों में भागना पड़ता है। हेल्थ सिस्टम में भारतीय चिकित्सकों, शोधकर्ताओं व इससे जुड़ी वैज्ञानिक नामचीन हस्तियों ने अभूतपुर्व उपलब्धियां प्राप्त की हैं। आजादी के बाद तो जैसे क्रांति ही आई। दो दशक पहले तक इस क्रांति ने सीमित हारी-बीमारियों पर चौतरफा नियंत्रण रखा। पोलियो से लेकर, खसरा, रैबीज, दिमागी बुखार तक हर तरह के मौसमी वायरसों पर काबू रखा। लेकिन मौजूदा समय में जितनी चुनौतियां स्वास्थ्य तंत्र के समझ मुंह खोले खड़ी हैं, उतनी पहले कभी नहीं रहीं। नित पनपती नई-नई किस्म की बीमारियां और जानलेवा वायरस ने ना सिर्फ हिंदुस्तान में, बल्कि समूचे संसार को हिलाया हुआ है। कोरोना महामारी का डरावना सच हमेशा हमेशा परेशान करता रहेगा। ये ऐसा दौर था, जहां स्वास्थ्य सिस्टम ने भी घुटने टेक दिए थे। स्वास्थ्य विस्तार को शहरी क्षेत्रों की तरह ग्रामीण अंचलों में भी फैलाना होगा। वहां, चिकित्सा, दवाओं, अस्पतालों, नर्स, स्टाफ आदि का आज भी अभाव है। आदिवासी व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के दूरदराज गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। वहां मोबाइल की रोशनी में इलाज करते हैं डॉक्टर। स्वास्थ्य पर केंद्र के आंकड़ों पर गौर करें तो हिंदुस्तान में करीब ढाई लाख सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं जिनमें 750 जिला अस्पताल और 550 मेहिडकल कॉलेजों का नेटवर्क है। बावजूद इसके भारी कमी महसूस होती है। आजादी का अमृतकाल चल रहा है, जिसमें इस नेटवर्क को और मजबूत करने की दरकार हैं। रूटीन व रेफरल कंसल्टेशन के लिए डिजिटल टेक्नोलाजी व टेली कंसल्टेशन के प्रयोगशालाओं को बढ़ाना होगा। आयुर्वेद को सबसे श्रेष्ठ चिकित्सा प्रणाली की संज्ञा दी है जिसकी जड़ें भी हमारे प्राचीनतम उपमहाद्वीप में ही हैं। हिंदुस्तान, नेपाल, भूटान, तिब्बत, पाकिस्तान व श्रीलंका में आयुर्वेद का अत्यधिक प्रचलन आज भी है, जहां आज भी तकरीबन एक तिहाई जनसंख्या इसका उपयोग करती है। इसी के देखा देख अन्य मुल्क भी आयुर्वेद को अपनाते हैं। आयुर्वेद न सिर्फ भारत में, बल्कि संसार की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में अग्रणी है। आज ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ जैसे दिन पर ऐसे ही संकल्पों को लेने की आवश्यकता है । डॉ. रमेश ठाकुर
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आओ बनाएं एक स्वस्थ संसार
Updated: April 7, 2025
विश्व स्वास्थ्य दिवस 7 अप्रैल डॉ० घनश्याम बादल खानपान की ग़लत आदतें, फास्ट फूड की बढ़ती लत, भोजन में लगातार बढ़ती रसायन एवं कीटनाशकों की मात्रा, ज़मीन में निरंतर बढ़ते खाद एवं रसायनों के प्रयोग से उसका ज़हरीला हो जाना, भौतिक प्रगति की लालसा के चलते लगातार बढ़ते प्रदूषण एवं अन्य कारणों से दुनिया भर में करोड़ों लोगों का स्वास्थ्य ख़तरे में है।रोज नई नई बीमारियाँ पैदा हो रही हैं। पेट्रोल, डीज़ल, केरोसिन एवं कारखाने तथा वाहनों में प्रयोग होने वाले विभिन्न इंधनों से एक ओर जलवायु संकट बढ़ रहा है वहीं स्वच्छ हवा में सांस लेने के हमारे अधिकार को भी छीन रहा है,वायु प्रदूषण हर पांच सेकंड में एक जीवन का लील रहा है। डब्ल्यूएचओ का निष्कर्ष हैं कि अधिकांश देशों की बड़ी आबादी को समुचित स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त नहीं मिल रहीं है। रसायनों एवं प्रदूषण ने न हवा शुद्ध छोड़ी है और न पानी , पहाड़ों की ऊंचाई से लेकर, समुद्र व ज़मीन की गहराइयों तक उनकी उपस्थिति खतरनाक सिद्ध हो रही है। आंकड़े कहते हैं कि कम से कम 4.5 बिलियन आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं से आज भी वंचित है । ऐसी ही स्वास्थ्य से संबंधित चुनौतियों से निपटने के लिए साल 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य दिवस 2025 की थीम सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त करने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है, इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी व्यक्तियों और समुदायों को वित्तीय कठिनाई का सामना किए बिना उनकी ज़रूरत की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच हो। यह स्वास्थ्य समानता, पहुँच और गुणवत्ता में अंतर को पाटने के लिए वैश्विक प्रयास का आह्वान करता है। विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के लोगों के अच्छे स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा करना और उन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य एवं दुनिया को अपनी सेहत के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य के साथ 1950 से 7 अप्रैल के दिन दुनिया भर में विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाना शुरू किया गया था। स्वास्थ्य क्या है ? आमतौर पर माना जाता है कि जो व्यक्ति बीमार नहीं है वह स्वस्थ है परंतु स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों के न होने का नाम नही है । विश्व स्वास्थ्य संगठन” के अनुसार स्वास्थ्य “शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक अध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से सही होने की संतुलित स्थिति का नाम स्वास्थ्य है । हमें बहुमुखी स्वास्थ्य के बारें में नई सोच से संबंधित जानकारी अवश्य होनी चाहिए| स्वास्थ्य को मुख्य रूप से शारीरिक , मानसिक , बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य में बांटा जाता सकता है । शारीरिक स्वास्थ्य – शारीरिक स्वास्थ्य शरीर की उस स्थिति को दर्शाता है जब शरीर के आंतरिक और बाह्य अंग, ऊतक व कोशिकाएं ठीक से काम करते हैं । इसमें शरीर की संरचना, विकास, कार्यप्रणाली और रख रखाव शामिल होता है। जब शरीर के सभी अंग सही तरह से काम करते हैं जैसे सुनाई देना, दौड़ना , चलना, दिखाई देना व अन्य सामान्य गतिविधियां| अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य के मापदंडों में संतुलित आहार की आदतें, सही श्वास का क्रम गहरी नींद । बड़ी आंत की नियमित गतिविधि व संतुलित शारीरिक गतिविधियां नाड़ी स्पंदन, ब्लडप्रेशर, शरीर का वजन व व्यायाम, सहने की क्षमता आदि सब कुछ व्यक्ति के ऊंचाई, आयु व लिंग के लिए सामान्य मानकों के अनुसार होना चाहिए। शरीर के सभी अंग सामान्य आकार के हों तथा उचित रूप से कार्य कर रहे हों। पाचन शक्ति सामान्य एवं सही हों। बेदाग एवं कोमल सुंदर त्वचा हो, आंख नाक, कान, जिव्हा, आदि ज्ञानेन्द्रियाँ स्वस्थ हों। जिव्हा स्वस्थ एवं दुर्गंध मुक्त हों। दांत साफ सुथरे व मोतियों जैसे चमकदार हों। मुंह से दुर्गंध न आती हो।समय पर भूख लगती हो। रीढ़ की हड्डी सीधी हो। चेहर पर कांति ओज तेज हो।चेहर से सकारात्मकता का आभास हो। कर्मेन्द्रियां (हाथ पांव आदि) स्वस्थ हों। मल विसर्जन सम्यक् मात्रा में समयानुसार हो।शरीर की आकार और उंचाई के हिसाब से वजन हो। शारीरिक संगठन सुदृढ़ एवं लचीला हो। मानसिक स्वास्थ्य मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ हमारे भावनात्मक और आध्यात्मिक लचीलेपन से है जो हमें अपने जीवन में पीड़ा आशाहीन और उदासी, दुःख की स्थितियों में जीवित रहने के लिए सक्षम बनाती है। मानसिक स्वास्थ्य हमारी मजबूत इच्छा शक्ति को भी दिखाती है। इसे यूं समझिए कि मन में प्रसन्नताव शांति हो, भीतर ही भीतर कोई संघर्ष न हो, भय क्रोध, इर्ष्या, से दूरी हो। मानसिक तनाव एवं अवसाद न हो तभी कहा जा सकता है कि व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य है अच्छा है। बौद्धिक स्वास्थ्य – बौद्धिक स्वास्थ्य हमारी रचनात्मकता और निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करने में मदद करता है। बौद्धिक रुप से हम मजबूत होते हैं तो आलोचना को सहज स्वीकार करने की क्षमता व विषम परिस्थितियों से व्यथित न होकर सकारात्मक रहना सहज में सरल हो जाता है । किसी की भी भावात्मक आवश्यकताओं की समझ, व्यवहार में शिष्ट रहना व दूसरों के सम्मान को भी ध्यान में रखना, नए विचारों को सहजता से स्वीकार करना, आत्मनियंत्रण , डर , क्रोध, मोह, ईर्ष्या या तनाव मुक्त रहना भी अच्छे बौद्धिक स्वास्थ्य की पहचान है । आध्यात्मिक स्वास्थ्य – हमारा स्वास्थ्य आध्यात्मिक स्वास्थ्य बिना वर्ड व्यर्थ है। जीवन के वास्तविक अर्थ और उद्देश्य की खोज करना हमें आध्यात्मिकता की ओर ले जाता है। अच्छे आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्राप्त करने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता में जीवन का सार आध्यात्मिकता के माध्यम से समझाया -कि ज़िंदगी को जो न समझे उसका जीना व्यर्थ है। तो लिए इस विश्व स्वास्थ्य दिवस पर संकल्प लें कि हमने केवल अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें अपितु हवा पानी धरती एवं आसमान के स्वास्थ्य को भी अच्छा रखने के लिए निरंतर प्रयास करें। डॉ० घनश्याम बादल
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हीटवेव: भारत के लिए बढ़ता हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट
Updated: April 7, 2025
भारत में हीटवेव अब केवल मौसमी असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है। वर्ष 2024 में हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता…
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रिश्तों की चिता..
Updated: April 7, 2025
कभी एक आँगन था…जहाँ माँ की साड़ी की ओट मेंदुनिया छुप जाया करती थी।अब उसी आँगन में,“सीमा रेखा” खींची गई है…जमीनी नक्शे से रिश्तों का…
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प्राकृतिक उपचार की विधि है यज्ञोपवीत संस्कार
Updated: April 7, 2025
प्रमोद भार्गव यह प्रबंध सनातन संस्कृति में ही निहित है, जिसमें प्रत्येक संस्कार को शारीरिक उपचार के प्राकृतिक शोध से जोड़कर समाज के प्रचलन में लाया…
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जजों की संपत्ति का प्रकटीकरण पारदर्शिता की ओर कदम
Updated: April 7, 2025
-ललित गर्ग- न्यायपालिका पर जनता का भरोसा लोकतंत्र का अहम आधार है। न्यायिक प्रणाली में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रहे, इसके लिये न्यायपालिका में…
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टैरिफ युद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर नहीं होगा अधिक प्रभाव
Updated: April 7, 2025
दिनांक 2 अप्रेल 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डॉनल्ड ट्रम्प द्वारा, विभिन्न देशों से अमेरिका में होने वाले आयातित उत्पादों पर की गई टैरिफ सम्बंधी घोषणा के साथ ही अंततः अमेरिका द्वारा पूरे विश्व में टैरिफ के माध्यम से व्यापार युद्ध छेड़ दिया गया है। अभी, अमेरिका ने विभिन्न देशों से अमेरिका में होने वाले आयात पर विभिन्न दरों पर टैरिफ लगाया है। अब इनमें से कई देश अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगाने की घोषणा कर रहे हैं, जैसे चीन ने अमेरिका से चीन में आयात होने वाले उत्पादों पर दिनांक 10 अप्रैल 2025 से 34 प्रतिशत की दर से टैरिफ लगाने की घोषणा की है। टैरिफ के माध्यम से छेड़े गए व्यापार युद्ध का भारत पर कोई बहुत अधिक विपरीत प्रभाव पड़ने की सम्भावना कम ही है। दरअसल, अमेरिका ने विभिन्न देशों से आयातित उत्पादों पर अलग अलग दर से टैरिफ लगाने की घोषणा की है और साथ ही कुछ उत्पादों के आयात पर फिलहाल टैरिफ की नई दरें लागू नहीं की गई हैं। टैरिफ की यह दरें 9 अप्रैल 2025 से लागू होंगी। विभिन्न देशों से अमेरिका में आयात होने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत की दर से न्यूनतम टैरिफ लगाया गया है। साथ ही, कुछ अन्य देशों यथा चीन से आयातित उत्पादों पर 34 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति ने की है। इसी प्रकार, वियतनाम से आयातित उत्पादों पर 46 प्रतिशत, ताईवान पर 32 प्रतिशत, थाईलैंड पर 36 प्रतिशत, भारत पर 26 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया पर 25 प्रतिशत, इंडोनेशिया पर 32 प्रतिशत, स्विट्जरलैंड पर 31 प्रतिशत, मलेशिया पर 24 प्रतिशत, कम्बोडिया पर 49 प्रतिशत, दक्षिणी अफ्रीका पर 30 प्रतिशत, बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत, पाकिस्तान पर 29 प्रतिशत, श्रीलंका पर 44 प्रतिशत और इसी प्रकार अन्य देशों से आयातित वस्तुओं पर भी अलग अलग दरों से टैरिफ लगाने की घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति ने की है। कुछ उत्पादों जैसे, स्टील, एल्यूमिनियम, ऑटो, ताम्बा, फार्मा उत्पाद, सेमीकंडक्टर, एनर्जी, बुलीयन एवं अन्य महत्वपूर्ण मिनरल्स को अमेरिका में आयात पर टैरिफ के दायरे से बाहर रखा गया है। अमेरिका का मानना है कि वैश्विक स्तर पर अन्य देश अमेरिका में उत्पादित वस्तुओं के आयात पर भारी मात्रा में टैरिफ लगाते हैं, जबकि अमेरिका में इन देशों से आयात किए जाने वाले उत्पादों पर अमेरिका द्वारा बहुत कम दर पर टैरिफ लगाया जाता है अथवा बिलकुल नहीं लगाया जाता है। जिससे, अमेरिका से इन देशों को निर्यात कम हो रहे हैं एवं इन देशों से अमेरिका में आयात लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इस प्रकार, अमेरिका का व्यापार घाटा असहनीय स्तर पर पहुंच गया है। इसके साथ साथ, अमेरिका में विनिर्माण इकाईयां बंद होकर अन्य देशों में स्थापित हो गई हैं और इससे अमेरिका में रोजगार के नए अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे हैं। अब ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिका को पुनः विनिर्माण इकाईयों का हब बनाने के उद्देश्य से अमेरिका को पुनः महान बनाने का आह्वान किया है और इसी संदर्भ में विभिन्न देशों से आयातित उत्पादों पर भारी मात्रा में टैरिफ लगाने का निर्णय लिया गया है ताकि अमेरिका में आयातित उत्पाद महंगे हों और अमेरिकी नागरिक अमेरिका में ही निर्मित वस्तुओं का उपयोग करने की ओर प्रेरित हों। वर्तमान में बढ़े हुए टैरिफ का बोझ अमेरिकी नागरिकों को उठाना पड़ेगा और उन्हें अमेरिका में महंगे उत्पाद खरीदने होंगे, क्योंकि नई विनिर्माण इकाईयों की स्थापना में तो वक्त लग सकता है, विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन तुरंत तो बढ़ाया नहीं जा सकता अतः जब तक नई विनिर्माण इकाईयों की अमेरिका में स्थापना हो एवं इन विनिर्माण इकाईयों में उत्पादन शुरू हो तब तक अमेरिकी नागरिकों को महंगे उत्पाद खरीदने हेतु बाध्य होना पड़ेगा। इससे अमेरिका में एक बार पुनः मुद्रा स्फीति की समस्या उत्पन्न हो सकती है एवं ब्याज दरों के कम होने के चक्र में भी देरी होगी, बहुत सम्भव है कि मुद्रा स्फीति को कम करने की दृष्टि से एक बार पुनः कहीं ब्याज दरों के बढ़ने का चक्र प्रारम्भ न हो जाए। लम्बे समय में जब अमेरिका में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना हो जाएगी एवं इन इकाईयों में उत्पादन प्रारम्भ हो जाएगा तब जाकर कहीं मुद्रा स्फीति पर अंकुश लगाया जा सकेगा। विभिन्न देशों से आयातित उत्पादों पर टैरिफ सम्बंधी घोषणा के साथ ही, डॉलर पर दबाव पड़ना शुरू भी हो चुका है एवं अमेरिकी डॉलर इंडेक्स घटकर 102 के स्तर पर नीचे आ गया है जो कुछ समय पूर्व तक लगभग 106 के स्तर पर आ गया था। इसी प्रकार अमेरिका में सरकारी प्रतिभूतियों की 10 वर्ष की बांड यील्ड पर भी दबाव दिखाई दे रही है और यह घटकर 4.08 के स्तर पर नीचे आ गई है, यह कुछ समय पूर्व तक 4.70 के स्तर से भी ऊपर निकल गई थी। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़नी प्रारम्भ हो गई है एवं यह पिछले चार माह के उच्चतम स्तर, लगभग 85 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर, पर आ गई है। ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ सम्बंधी लिए गए निर्णयों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर लम्बी अवधि में तो हो सकता है परंतु छोटी अवधि में तो निश्चित ही यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विपरीत रूप से प्रभावित करते हुए दिखाई दे रहा है। अमेरिकी पूंजी बाजार (शेयर बाजार) केवल दो दिनों में ही लगभग 10 प्रतिशत तक नीचे गिर गया है और अमेरिकी निवेशकों को लगभग 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुक्सान हुआ है। इतनी भारी गिरावट तो वर्ष 2020 में कोविड महामारी के दौरान ही देखने को मिली थी। यदि यही स्थिति बनी रही तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था कहीं मंदी की चपेट में न आ जाय। यदि ऐसा होता है तो पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था भी विपरीत रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। अतः ट्रम्प प्रशासन का टैरिफ सम्बंधी उक्त निर्णय अति जोखिम भरा ही कहा जाएगा। जब पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था विपरीत रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी तो भारत की अर्थव्यवस्था पर भी कुछ तो विपरीत असर होगा ही। इस संदर्भ में किए गए विश्लेषण से यह तथ्य उभरकर सामने आ रहा है कि बहुत सम्भव है कि ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत से आयातित वस्तुओं पर लगाए गए 26 प्रतिशत के टैरिफ का भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक विपरीत प्रभाव नहीं हो। क्योंकि, एक तो भारत से अमेरिका को निर्यात बहुत अधिक नहीं है। यह भारतीय सकल घरेलू उत्पाद का मात्र लगभग 3-4 प्रतिशत ही है। वैसे भी भारतीय अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर नहीं है एवं यह विभिन्न उत्पादों की आंतिरक मांग पर अधिक निर्भर है। भारत से सकल घरेलू उत्पाद का केवल लगभग 16 प्रतिशत (वस्तुएं एवं सेवा क्षेत्र मिलाकर) ही निर्यात किया जाता है। दूसरे, भारत से अमेरिका को निर्यात किए जाने कुछ उत्पादों को उक्त टैरिफ व्यवस्था से फिलहाल मुक्त रखा गया है, जैसे फार्मा उत्पाद, सेमीकंडक्टर, स्टील, अल्यूमिनियम, ऑटो, ताम्बा, बुलीयन, एनर्जी आदि। संभवत: इन उत्पादों के भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर कुछ भी असर नहीं होने जा रहा है। तीसरे, भारतीय कम्पनियों (26 प्रतिशत टैरिफ) को रेडीमेड गर्मेंट्स के अमेरिका को निर्यात में पड़ौसी देशों, यथा, बांग्लादेश (37 प्रतिशत टैरिफ), पाकिस्तान (29 प्रतिशत टैरिफ), श्रीलंका (44 प्रतिशत टैरिफ), वियतनाम (46 प्रतिशत टैरिफ), चीन (34 प्रतिशत टैरिफ), इंडोनेशिया (32 प्रतिशत टैरिफ), आदि के साथ अत्यधिक स्पर्धा का सामना करना पड़ता है। परंतु, उक्त समस्त देशों से अमेरिका को होने वाले रेडीमेड गार्मेंट्स के निर्यात पर भारत की तुलना में अधिक टैरिफ लगाए जाने की घोषणा की गई है। अत: इन देशों से रेडीमेड गार्मेंट्स के अमेरिका को निर्यात भारत की तुलना में महंगे हो जाएंगे, इससे रेडीमेड गार्मेंट्स के क्षेत्र में भारत के लिए लाभ की स्थिति निर्मित होती हुई दिखाई दे रही है। इसी प्रकार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कृषि उत्पादों के निर्यात भी भारत से अमेरिका को बढ़ सकते हैं। यदि किन्ही क्षेत्रों में भारत को नुक्सान होता हुआ दिखाई भी देता है तो भारत के विश्व के अन्य देशों के साथ बहुत अच्छे राजनैतिक संबंधो के चलते भारत को अपने उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशने में किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। वैसे भी, अमेरिका सहित भारत के यूरोपीयन देशों, ब्रिटेन एवं खाड़ी के देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को सम्पन्न करने हेतु वार्ताएं लगभग अंतिम दौर में पहुंच गईं हैं, इसका लाभ भी भारत को होने जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा शीघ्र ही मोनेटरी पॉलिसी के माध्यम से रेपो दरों में परिवर्तन की घोषणा की जाने वाली है। भारत में चूंकि मुद्रा स्फीति की दर लगातार गिरती हुई दिखाई दे रही है अतः भारत में रेपो दर में 75 से 100 आधार बिंदुओं की कमी की घोषणा की जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो विभिन्न उत्पादों की उत्पादन लागत में कुछ कमी सम्भव होगी, जिसके चलते भारत में निर्मित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। हालांकि, केवल ब्याज दरों के कमी करके पूंजी की लागत को कम करने से काम चलने वाला नहीं है, भारत को भूमि एवं श्रम की लागतों को भी कम करने की आवश्यकता है तथा उत्पादकता में सुधार करने की भी आवश्यकता है ताकि भारत में निर्मित होने वाले उत्पादों की कुल लागत में कमी हो एवं यह उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा में अन्य देशों के मुक़ाबले में टिक सकें। वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक, सामरिक, रणनीतिक, राजनैतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों में आमूल चूल परिवर्तन होता हुआ दिखाई दे रहा है, परिवर्तन के इस दौर में भारतीय कम्पनियां कितना लाभ उठा सकती हैं यह भारतीय कम्पनियों के कौशल पर निर्भर करेगा। साथ ही, केंद्र सरकार द्वारा शीघ्रता से अपने आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को गति देकर भी वैश्विक स्तर पर निर्मित हुई उक्त परिस्थितियों का लाभ उठाया जा सकता है।
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भारत कुमार को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि: मनोज कुमार – एक युग, एक विचार, एक भावना
Updated: April 6, 2025
“है प्रीत जहाँ की रीत सदा मैं गीत वहाँ के गाता हूँ भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ” -प्रियंका सौरभ जब…
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