क्या मस्जिदों के नीचे मन्दिर ढूंढना गलत है
Updated: December 24, 2024
राजेश कुमार पासी आजकल संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान चर्चा में बना हुआ है । जून, 2022 में संघ प्रमुख ने मंदिर-मस्जिद विवाद से बचने की नसीहत देते हुए कहा था कि हर दिन एक नया मुद्दा नहीं उठाना चाहिए । हम झगड़े क्यों बढ़ाएं, हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग क्यों ढूंढना चाहिए । उस समय वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे का मुद्दा काफी गरमाया हुआ था और ताजमहल को मंदिर बताते हुए उसके भी सर्वे मांग हो रही थी । अब एक बार फिर मोहन भागवत ने इस मुद्दे पर अपना बयान दिया है जिसकी सब तरफ चर्चा हो रही है । पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने ‘विश्वगुरु भारत‘ विषय पर बोलते हुए कहा कि राम मंदिर बनने के बाद कुछ लोगों को लगता है कि बाकी जगहों पर भी इसी तरह का मुद्दा उठाकर वो हिन्दुओं के नेता बन जायेंगे । उन्होंने कहा कि राम मंदिर आस्था का विषय था और हिन्दुओं को लगता था कि इसका निर्माण होना चाहिए । उन्होंने कहा कि नफरत और दुश्मनी के कारण कुछ नए स्थलों के बारे में मुद्दे उठाना अस्वीकार्य है । उन्होंने कहा कि भारत को सभी धर्मों और विचारधाराओं के सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए । उनका कहना है कि उग्रवाद, आक्रामकता और दूसरों के देवताओं का अपमान करना हमारी संस्कृति नहीं है । यहां कोई बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नहीं है, हम सब एक है । इससे मिलता-जुलता उनका यह बयान भी है कि भारत में सभी का डीएनए एक है । रविवार को उन्होंने एक बयान और दिया है जिसमें कहा है कि धर्म को समझना कठिन है । धर्म के नाम पर होने वाले सभी उत्पीड़न और अत्याचार गलतफहमी और धर्म की समझ की कमी के कारण हुए है इसलिए धर्म की सही शिक्षा सभी को मिलनी चाहिए । भागवत को यह बयान इसलिए देने पड़ रहे हैं क्योंकि देश में अलग-अलग जगहों पर नए-नए मंदिर-मस्जिद विवाद सामने आ रहे हैं । उनके बयानों के पीछे उनकी यह अच्छी मंशा हो सकती है कि इन विवादों के कारण देश का माहौल खराब न हो । आपको याद होगा कि अयोध्या में जब राम-मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन चल रहा था तब हिन्दूवादी नेताओं की यही मांग थी कि अयोध्या, काशी और मथुरा के विवादित धर्मस्थलों को अगर मुस्लिम पक्ष उन्हें सौंप देता है तो हिन्दू पक्ष अन्य जगहों पर मंदिर तोड़कर बनाई गई मस्जिदों पर अपना दावा छोड़ देगा । तब मुस्लिम पक्ष जिद्द पर अड़ा रहा और एक कदम भी पीछे नहीं हटा । यह जानते हुए भी रामजन्मभूमि हिन्दुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है और उनकी गहरी आस्थी उससे जुड़ी हुई है, मुस्लिम इसको सौंपने को तैयार नहीं हुए । माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ है और काशी-मथुरा का मामला अदालत में लंबित है । मैंने इस सम्बन्ध में कई लेख लिखे थे और कई लोगों का भी मानना था कि अगर मुस्लिम पक्ष हिंदुओं की भावनाओं को देखते हुए रामजन्मभूमि छोड़ देता है तो ये हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे के लिए बहुत अच्छा होगा । हिन्दुओं ने संविधान के अनुसार अदालत जाकर अपना हक हासिल किया है न कि मुस्लिमों ने हिन्दुओं की आस्था का सम्मान किया है । अब हिन्दुओं को अदालत का रास्ता दिख गया है और वो अपने मंदिरों को संविधान के अनुसार अदालत के द्वारा हासिल करना चाहते हैं । जब पूरा विपक्ष संविधान को सिर पर उठा कर घूम रहा है और संविधान की रक्षा की बात कर रहा है तो अदालत में जाकर अपना हक हासिल करना कैसे गलत कहा जा सकता है। संविधान के अनुसार हो रहे काम से भागवत क्यों परेशान हो रहे हैं । जब राम जन्मभूमि के लिए मुस्लिम अड़े हुए थे तब ही यह कहा गया था कि अगर मुस्लिम पक्ष बातचीत से मामला हल कर लेता है तो धार्मिक सौहार्द के लिए बहुत अच्छा होगा । जिसका डर था, आज वही हो रहा है, हिन्दू समाज अपने मंदिरों की मांग कर रहा है । इसके लिए हिन्दू समाज किसी हिंसा का सहारा नहीं ले रहा है, वो अपने संवैधानिक हक का इस्तेमाल कर रहा है । मोहन भागवत पहले भी ऐसे बयान दे चुके हैं जिसे भाजपा और संघ के खिलाफ माना जा सकता है, ये बयान तो हिंदुओं के खिलाफ दिखाई दे रहा है। आजकल जो मस्जिदों के नीचे हिन्दू मंदिर ढूंढे जा रहे हैं, उन्हें भाजपा, संघ या कोई हिन्दू संगठन नहीं ढूंढ रहा है बल्कि हिन्दू समाज ढूंढ रहा है । इस मुहिम का मजाक उड़ाया जा रहा है कि हिंदुओं को कोई और काम नहीं बचा है । वो सारे काम छोड़कर सिर्फ मस्जिदों के नीचे मंदिर ढूंढ रहे हैं जबकि यह सच्चाई नहीं है । वास्तव में मस्जिदों के नीचे मंदिर कोई नहीं ढूंढ रहा है बल्कि मस्जिदों के नीचे मन्दिर निकल रहे हैं। जहां भी मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाये जाने की बात की जा रही है, वो सभी जगहें प्राचीन मंदिरों के स्थल हैं और उनके बारे में हिन्दु धर्म की मान्यताएं भी हैं कि वहां प्राचीन मंदिर थे । इसके अलावा हिन्दू समाज मस्जिदों को तोड़कर मंदिर बनाने की बात नहीं कर रहा है बल्कि मस्जिदों के सर्वे के लिए अदालतों के दरवाजे पर खड़ा है । हिन्दू समाज किसी किस्म की जबरदस्ती नहीं कर रहा है बल्कि वो चाहता है कि संविधान के अनुसार अगर वहां मंदिर है तो वो उसे दिया जाए । केन्द्र की नरसिम्हा राव की सरकार ने 1991 में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट पास किया था, जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को किसी धर्मस्थल की जो स्थिति थी, वही स्थिति मान्य होगी । इस एक्ट के अनुसार इस मामले पर अदालत भी नहीं जाया जा सकता था । हिन्दू समाज यह कह रहा है कि 1947 को जो स्थिति थी, वो भी पता होनी चाहिए । अगर यह साबित हो जाता है कि उस जगह मस्जिद की जगह मंदिर है और जो मस्जिद है वो मंदिर की जगह बनाई गई है तो वो जगह हिन्दुओं को मिलनी चाहिए । इसी आधार पर अदालतें मस्जिदों के सर्वेक्षण के आदेश जारी कर रही हैं ताकि स्थिति का पता लगाया जा सके । ये एक्ट धार्मिक स्थल की वास्तविक स्थिति की जांच करने से नहीं रोकता है इसलिये अदालतें सर्वे के आदेश जारी कर रही हैं। आज हमारा देश आजादी के बाद की गई गलतियों की सजा भुगत रहा है । यह काम आजादी के बाद होना चाहिए था । मुस्लिम आक्रमणकारियों के पास जगह की कमी नहीं थी, वो चाहते तो किसी भी जगह मस्जिदों का निर्माण कर सकते थे लेकिन उन्होंने जानबूझकर मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से उसी स्थान पर मस्जिदों का निर्माण करवाया । इन ढांचों को देखकर कोई भी कह सकता है कि यह पुराने मंदिरों को तोड़कर बनाए गए हैं । ऐसा इसलिए किया गया ताकि हिन्दू समाज इन्हें देखकर अपमानित हो और वो याद करे कि कैसे उसके आस्था स्थलों को तोड़कर अपने बाहुबल से इस्लामिक शासकों ने मस्जिदों का निर्माण किया होगा । इस्लाम कहता है कि किसी दूसरे के धार्मिक स्थल को तोड़कर उस पर मस्जिद नहीं बनाई जा सकती और अगर ऐसा किया जाता है तो उस मस्जिद में की गई नमाज अल्लाह को कबूल नहीं होगी । इस देश का मुस्लिम समाज कहीं और से नहीं आया है, इसी देश का है । आपसी भाईचारा एकतरफा नहीं हो सकता, इसके लिए दोनों समुदायों को कोशिश करनी होगी । उत्तर प्रदेश के संभल जिले में जो मंदिर मिल रहे हैं वो तो चालीस साल पहले ही कब्जा किये गये हैं । यह ठीक है कि दंगे के कारण हिन्दू समाज ने वहां से पलायन कर लिया लेकिन मंदिर तो सार्वजनिक संपत्ति होते हैं तो वहां कैसे कब्जा हो गया । जिन्होंने पलायन किया होगा, उनमें से कुछ लोगों ने वैसे ही घर छोड़ दिया होगा और कुछ ने बेच दिया होगा लेकिन मंदिर बेचा नहीं जा सकता तो इन मंदिरों और उनकी भूमि को कैसे अपने घरों में शामिल कर लिया गया । देश के हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे के लिए जरूरी है कि जो गलतियां हुई, उन्हें स्वीकार किया जाये । जिन गलतियों को सुधारा जा सकता है, उन्हें सुधारा जाए । जहां कुछ नहीं हो सकता तो वहां कम से कम गलती को माना जाए । भागवत के कहने से कुछ होने वाला नहीं है । उन्हें राजनीतिक बयान देने का हक हासिल नहीं है । इसके लिए संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा है और उसके नेता प्रधानमंत्री मोदी हैं । ऐसे बयान देकर भागवत अपना मान-सम्मान को घटा रहे हैं । वैसे भी हिन्दू समाज अपनी लड़ाई लड़ रहा है, वो किसी दूसरे की सलाह पर चलने वाला नहीं है । मंदिरों की लड़ाई किसी राजनीतिक दल, संगठन और नेता की नहीं है, अब ये जनता की लड़ाई बन चुकी है । ये आपसी बातचीत से ही खत्म हो सकती है, किसी की सलाह पर खत्म नहीं होगी । राजेश कुमार पासी
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