लेख अफगानिस्तान में महिलाओं की शिक्षा और अधिकार: साझा मानवता और मूलभूत मूल्यों की रक्षा

अफगानिस्तान में महिलाओं की शिक्षा और अधिकार: साझा मानवता और मूलभूत मूल्यों की रक्षा

गजेंद्र सिंह कापीसा प्रांत में महिला मेडिकल छात्रों के आंसू तालिबान शासन के इस्लामी फ़रमान के तहत अफगान महिलाओं की गंभीर वास्तविकता को दर्शाते हैं।…

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राजनीति इंडिया गठबंधन की रार से कांग्रेस से ज्यादा क्षेत्रीय दलों को होगा नुकसान

इंडिया गठबंधन की रार से कांग्रेस से ज्यादा क्षेत्रीय दलों को होगा नुकसान

कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘इंडिया गठबंधन’ में नेतृत्व के सवाल पर जो मौजूदा चिल्ल-पों मची हुई है और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व पर एक बार फिर से जो सवाल उठाए जा रहे हैं, उससे न तो तृणमूल कांग्रेस नेत्री व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक भला होने वाला है और न ही उनकी सुर में सुर मिलाने वाले एनसीपी शरद पवार के शरद पवार-सुप्रिया सुले, शिवसेना यूबीटी के उद्धव ठाकरे-आदित्य ठाकरे, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव-रामगोपाल यादव या आप पार्टी के अरविंद केजरीवाल आदि जैसे नेताओं का। हां, इससे कांग्रेस आई की उस सियासी साख को धक्का अवश्य लगेगा, जो कि बमुश्किल उसने राहुल गांधी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव 2024 के बाद हासिल कर पाई है।  राजनीतिक मामलों के जानकारों का स्पष्ट कहना है कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा की हार जरूर मायने रखती है क्योंकि यह जीती हुई बाजी हारने के जैसा है लेकिन सिर्फ इसको लेकर ही इंडिया गठबंधन का नेतृत्व कांग्रेस से छीन लेना कोई राजनीतिक बुद्धिमानी का काम प्रतीत नहीं होता है। शायद कांग्रेस भी इसे नहीं मानेगी और किसी भी राष्ट्रीय दल को क्षेत्रीय दलों के सामने घुटने भी नहीं टेकने चाहिए, यदि सत्ता प्राप्ति के लिए संख्या बल का खेल नहीं हो तो! बीजेपी भी यही करती है और अपने गठबंधन सहयोगियों को उनकी वाजिब औकात में रखती है। तीसरे-चौथे मोर्चे की विफलता के पीछे भी तो अनुशासनहीनता या अतिशय महत्वाकांक्षा का खेल ही तो था, जिसे बहुधा राजनीतिक रोग समझा जाता है। बता दें कि तृणमूल कांग्रेस नेता कल्याण बनर्जी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद तुरंत कहा था कि कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक को अपने अहंकार को अलग रखना चाहिए और ममता बनर्जी को विपक्षी गठबंधन के नेता के रूप में मान्यता देनी चाहिए। इसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी हालिया हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव में इंडिया ब्लॉक के खराब प्रदर्शन पर असंतोष जाहिर किया और संकेत दिया कि अगर मौका मिला तो वह इंडिया ब्लॉक की कमान संभालने के लिए तैयार हैं। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ने यहां तक कहा कि वह बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में अपनी भूमिका जारी रखते हुए भी विपक्षी मोर्चे को चलाने की दोहरी जिम्मेदारी संभाल सकती हैं। एक टीवी चैनल से बात करते हुए ममता बनर्जी ने कहा, ‘मैंने इंडिया ब्लॉक का गठन किया था, अब मोर्चा का नेतृत्व करने वालों पर इसका प्रबंधन करने की जिम्मेदारी है। अगर वे इसे नहीं चला सकते तो मैं क्या कर सकती हूं? मैं सिर्फ इतना कहूंगी कि सभी को साथ लेकर चलना होगा।‘ वहीं, यह पूछे जाने पर कि एक मजबूत भाजपा विरोधी ताकत के रूप में अपनी साख के बावजूद वह इंडिया ब्लॉक की कमान क्यों नहीं संभाल रही हैं? तो इस पर बनर्जी ने कहा, “अगर मौका मिला तो मैं इसके सुचारू संचालन को सुनिश्चित करूंगी।” उन्होंने कहा, “मैं बंगाल से बाहर नहीं जाना चाहती लेकिन मैं इसे यहीं से चला सकती हूं।” बता दें कि बीजेपी का मुकाबला करने के लिए गठित इंडिया (INDIA) ब्लॉक में दो दर्जन से अधिक विपक्षी दल शामिल हैं हालांकि आंतरिक मतभेदों और आपसी तालमेल की कमी की वजह से इसकी कई बार आलोचना भी होती रही है। इसी वजह से इसके प्रमुख सूत्रधार रहे जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना पाला बदल लिया और भाजपा के खेमे में चले गए। वो भी इंडिया गठबंधन के संयोजक का पद पाना चाहते थे जो लालू प्रसाद के परोक्ष विरोध के चलते सम्भव नहीं हो पाया। ऐसे में संभव है कि ममता भी एकबार फिर से तीसरे मोर्चे को मजबूत करने की पहल करें और नीतीश की तरह ही इंडिया गठबंधन को टा-टा, बाय-बाय कर दें। उल्लेखनीय है कि ममता बनर्जी का यह बयान उनकी पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी द्वारा कांग्रेस और अन्य इंडिया ब्लॉक सहयोगियों को लेकर दिए बयान के बाद सामने आया है। तब कल्याण बनर्जी ने कहा था कि कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक को अपने अहंकार को अलग रखना चाहिए और ममता बनर्जी को विपक्षी गठबंधन के नेता के रूप में मान्यता देनी चाहिए। आपको बता दें कि बीजेपी ने जहां महाराष्ट्र में शानदार प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड संख्या में सीटें हासिल कीं तो वहीं कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। बीजेपी के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को भारी जीत मिली जबकि इंडिया ब्लॉक ने सिर्फ झारखंड में जेएमएम के शानदार प्रदर्शन की बदौलत मजबूत वापसी की। कहने का तात्पर्य यह है कि कांग्रेस ने अपनी हार का सिलसिला जारी रखा और हरियाणा के बाद महाराष्ट्र में भी अपना सबसे खराब प्रदर्शन किया और झारखंड में सत्तारूढ़ जेएमएम के जूनियर पार्टनर के रूप में सामने आई और विपक्षी ब्लॉक में इसकी भूमिका और भी कम हो गई क्योंकि अन्य सहयोगियों ने इससे बेहतर प्रदर्शन किया। वहीं, दूसरी ओर हाल ही में हुए उपचुनावों में भाजपा को हराकर टीएमसी की जीत ने पश्चिम बंगाल में पार्टी के प्रभुत्व को मजबूत किया है, जबकि विपक्षी अभियान आरजी कर मेडिकल कॉलेज विरोध जैसे विवादों पर केंद्रित थे। सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे, उसके सहयोगी सीपीआई (एमएल) लिबरेशन और कांग्रेस, जो इंडिया ब्लॉक में राष्ट्रीय स्तर पर टीएमसी के सहयोगी हैं, सभी को बड़ी असफलताओं का सामना करना पड़ा और उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई जबकि कांग्रेस इंडिया ब्लॉक की सबसे बड़ी पार्टी है जिसे अक्सर गठबंधन का वास्तविक नेता माना जाता है। यही वजह है कि टीएमसी ने लगातार ममता बनर्जी को गठबंधन की बागडोर संभालने की वकालत की है। यह ठीक है कि तृणमूल कांग्रेस नेत्री ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में लगातार भाजपा को सियासी चोट पहुंचा रही हैं और सदैव उस पर भारी प्रतीत हो रही हैं लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह राष्ट्रीय नेत्री बन गईं और उनका चेहरा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के चेहरे से ज्यादा सर्वस्वीकार्य हो गया, वो भी अखिल भारतीय स्तर पर? चाहे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) शरद पवार के प्रमुख और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार हों या उनकी सियासी वारिस सांसद सुप्रिया सुले, शिवसेना यूबीटी के प्रमुख और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे हों या उनके राजनीतिक वारिस आदित्य ठाकरे, समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हों या राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव या आप पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक व दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या उन जैसे इंडिया गठबंधन के कोई अन्य नेतागण, किसी का चेहरा राष्ट्रीय स्तर पर उतना सर्वस्वीकार्य नहीं हो सकता है जितना कि राज्यसभा सांसद सोनिया गांधी, लोकसभा सांसद प्रियंका गांधी या लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी  का है, इसलिए समकालीन बयानबाजी से इंडिया गठबंधन और उसमें शामिल सभी दलों को ही क्षति होगी, यह उन्हें समझना होगा। वैसे भी भारतीय मतदाताओं के बीच कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन, राजद-सपा-झामुमो नीत महागठबंधन, शिवसेना यूबीटी-एनसीपी शरद पवार नीत महाविकास अघाड़ी के अलावा तीसरे या चौथे मोर्चे में शामिल रहे क्षेत्रीय दलों की साख अच्छी नहीं है। जनता पार्टी, जनता दल और संयुक्त मोर्चे की कई गठबंधन सरकारों को असमय गिराने का आरोप जहां कांग्रेस पर लगता आया है, वहीं तीसरे मोर्चे और चौथे मोर्चे के बारे में तो राजनीतिक अवधारणा यही है कि इन्हें केंद्र में सरकार चलाना ही नहीं आता और इसमें शामिल दल भले ही अपने-अपने राज्यों में सफल रहे हों लेकिन सुशासन स्थापित करने और भ्रष्टाचार रोकने में अकसर विफल रहे हैं जिससे ब्रेक के बाद मतदाता इन्हें खारिज कर देते हैं। इनकी इसी कमजोरी का राजनीतिक फायदा भाजपा को मिला जबकि ये लोग उसे राजनीतिक अछूत तक करार दे चुके हैं।  बता दें कि 1990 के दशक में कोई भी दल पहले भाजपा से गठबंधन करने से सिर्फ इसलिए डरता था कि कहीं उसका मुस्लिम वोट छिटक न जाए लेकिन अपने राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के अग्रगामी विचारों के साथ-साथ बीजेपी ने सुशासन, विकास और गठबंधन सरकार चलाने की योग्यता को साबित करके भारतीय मतदाताओं का दिल एक नहीं, बल्कि कई बार जीत लिया और कांग्रेस के अधिकांश पुराने सियासी रिकॉर्ड को मोदी 3.0 सरकार ने ध्वस्त कर दिया है जिसके बाद उसकी लोकप्रियता एक बार फिर से उफान पर है।  वहीं, लोकसभा चुनाव 2024 में इंडिया गठबंधन खासकर कांग्रेस-सपा गठजोड़ से उसे जो धक्का लगा, उसकी भरपाई उसने हरियाणा-महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों से कर लिया है। लोकसभा चुनाव 2024 में भी भाजपा ने आरएसएस की उपेक्षा की कीमत चुकाई थी अन्यथा आज वह अपने गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर नहीं रहती। लेकिन अब उसके इशारे पर जिस तरह से इंडिया गठबंधन में अंतर्कलह मची हुई है, उससे आम चुनाव 2029 में भी उसका निष्कंटक राज बरकरार रहने के आसार हैं। यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस बीजेपी से काफी पीछे चली जाएगी, जिसकी भरपाई वो शायद ही कभी कर पाए। वैसे भी भारतीय राजनीति में गठबंधन धर्म का पालन करने का रिकॉर्ड कांग्रेस और तीसरे-चौथे मोर्चा से बेहतर भाजपा का है। इसलिए वह दिन-प्रतिदिन मजबूत होती गई और कांग्रेस या तीसरे-चौथे मोर्चे के दल कमजोर दर कमजोर। बहरहाल, कांग्रेस नेतृत्व की बुद्धिमानी इसी में है कि वह तीसरे-चौथे मोर्चे में शामिल रहे क्षेत्रीय दलों, यूपीए या महागठबंधन और महाविकास अघाड़ी सहयोगियों को हर हाल में अपने साथ तब तक जोड़े रखे, जब तक कि लोकसभा में उसका आंकड़ा 300 के पार न चला जाए।  राजनीतिक मामलों के जानकार बताते हैं कि तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बनर्जी हों, या एनसीपी शरद पवार के शरद पवार या शिवसेना यूबीटी के उद्धव ठाकरे, ये लोग कभी न कभी भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सदस्य या उसके परोक्ष शुभचिंतक रह चुके हैं, इसलिए कांग्रेस विरोधी इनकी बयानबाजी का मकसद भाजपा को खुश रखना है और इसी बहाने कांग्रेस पर दवाब बनाए रखना। वहीं, उत्तरप्रदेश में सपा नेता रामगोपाल यादव जो कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तंज कस रहे हैं, वह यूपी विधानसभा उपचुनाव 2024 में कांग्रेस की उपेक्षा के बाद मिली शर्मनाक हार की खुन्नस है। यदि अखिलेश यादव ने रामगोपाल यादव को काबू में नहीं किया तो 2022 की तरह 2027 में भी सपा के सपने नहीं पूरे होने वाले।  रही बात इंडिया गठबंधन के नेतृत्व की तो ममता बनर्जी को आगे रखकर चाहे कांग्रेस पर जितना भी दबाव बना लिया जाए लेकिन राहुल की कांग्रेस अपनी मस्त सियासी चाल चलती है बिना सियासी नफा-नुकसान के। इसे इंडिया गठबंधन में शामिल दलों को समझना होगा अन्यथा पश्चिम बंगाल के अलावा कहीं उनका कोई भविष्य नहीं होगा। चाहे जम्मू कश्मीर हो या झारखंड, यदि क्रमशः नेशनल कांफ्रेंस और झारखंड मुक्ति मोर्चा नीत इंडिया गठबंधन सत्ता में आई है तो सिर्फ कांग्रेस व नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की वजह से, अन्यथा लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी की 80 में 37 सीट कांग्रेस के सहयोग से जीतने वाली सपा, कांग्रेस की कथित छत्रछाया से हटते ही यूपी विधानसभा चुनाव में 9 में से महज 2 सीट ही निकाल पाई। यदि उसने कांग्रेस का सम्मान किया होता तो इतनी फजीहत नहीं होती।  कुछ यही हाल आप का होगा दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में जो अभी कांग्रेस को हल्के में लेकर चल रही है। बिहार में कांग्रेस को कम तवज्जो देकर राजद नेता तेजस्वी यादव अपनी भद्द पिटवा ही रहे हैं। इसलिए किस नेता ने कांग्रेस या राहुल गांधी के खिलाफ क्या कहा, उनकी बातों को यहां पर मैं नहीं दुहराना चाहता  बल्कि सिर्फ यह सलाह देना चाहता हूं कि भारतीय राजनीति में यदि क्षेत्रीय दलों को प्रासंगिक बने रहना है तो कांग्रेस या भाजपा को साधकर चलें अन्यथा सियासी दुर्भाग्य आपका पीछा नहीं छोड़ेगा। सब ममता बनर्जी या अरविंद केजरीवाल नहीं हो सकते!

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राजनीति भारत से दूर, पाकिस्तान के पास जा रहा बांग्लादेश

भारत से दूर, पाकिस्तान के पास जा रहा बांग्लादेश

राजेश जैन 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद भारत के सैन्य समर्थन से पाकिस्तान से आजाद हुआ बांग्लादेश इन दिनों भारत से दूर और पाकिस्तान के पास जाता नजर आ रहा है। इस साल अगस्त में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से ही वहां सियासी उथल-पुथल चल रही है और माहौल में भारत के खिलाफ नफरत घोलकर पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाई जा रही है। साफ़ लगता है कि बांग्लादेश अपने और भारत के कट्टर दुश्मन पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधार रहा है और संदेश देना चाहता है कि वह अब दक्षिण  एशियाई राजनीति को भारत के नजरिए से नहीं देखेगा। हाल के दिनों में पाकिस्तान ने भी ऐलान किया है कि अब बांग्लादेशी नागरिक बिना किसी वीजा शुल्क के उनके देश की यात्रा कर पाएंगे। दोनों देशों में सीधी उड़ाने फिर से शुरू करने की भी घोषणा की गई है। वीजा छूट से लेकर रक्षा सौदों और समुद्री मार्गों की बहाली तक, ऐसे कदम उठाए गए हैं, जो ढाका को इस्लामाबाद के ज्यादा करीब लेकर जा रहे हैं। दरअसल, हसीना को शरण देने के नई दिल्ली के फैसले ने ढाका को नाराज कर दिया। दूसरी ओर बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए हमलों और इस्कॉन के पूर्व पुजारी चिन्मयकृष्ण दास की गिरफ्तारी से भी भारत से तनाव बढ़ा हैं। करेंसी नोट से शेख मुजीबुर्रहमान के फोटो हटाए शेख मुजीबुर्रहमान बांग्लादेश के संस्थापक और राष्ट्रपिता होने के साथ ही शेख हसीना के पिता भी हैं। वे 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में एक प्रमुख नेता थे, जिन्होंने बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी दिलाई थी। मुहम्मद यूनुस सरकार ने  मुजीबुर्रहमान की फोटो हटाने के लिए 20, 50, 100, 500 और 1,000 टका (बांग्लादेशी करेंसी) के नोट बदलने के आदेश दिए हैं। अगले 6 महीनों में नए नोट मार्केट में आ जाएंगे। सरकार ने राष्ट्रपति भवन से मुजीबुर्रहमान की तस्वीरें पहले ही हटा दी हैं। उनके नाम से जुड़ी छुट्टियां रद्द कर हैं। उनकी मूर्तियों को भी तोड़ दिया गया है।  बांग्लादेश पाकिस्तान वीजा समझौता 2019 में शेख हसीना की सरकार ने पाकिस्तानी नागरिकों के लिए नॉन ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य किया था। इसके बिना वीजा नहीं मिल सकता था लेकिन अब बांग्लादेश ने अब यह प्रोसेस खत्म कर दिया है। बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने विदेश में सभी मिशनों को संदेश भेजा है, जिसमें उन्हें पाकिस्तानी नागरिकों और पाकिस्तानी मूल के लोगों के लिए वीज़ा की सुविधा प्रदान करने का निर्देश दिया गया है। इससे पहले  सितंबर की शुरुआत में, इस्लामाबाद ने भी घोषणा की थी कि बांग्लादेशी बिना किसी वीजा शुल्क के पड़ोसी देश की यात्रा कर सकेंगे। इसके अलावा, दोनों देशों ने सीधी उड़ानें फिर से शुरू करने की भी घोषणा की है। पाक से सीधे समुद्री संपर्क की शुरुआत इससे पहले नवंबर 2024 में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच सीधे समुद्री संपर्क की शुरुआत हुई। पाकिस्तान के कराची से एक कार्गो शिप बंगाल की खाड़ी होते हुए बांग्लादेश के चटगांव पोर्ट पर पहुंचा था। तब ढाका में मौजूद पाकिस्तान के राजदूत सैयद अहमद मारूफ ने कहा, यह शुरुआत पूरे बांग्लादेश में व्यापार को बढ़ावा देने में एक बड़ा कदम है।   हथियारों का व्यापार बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने 40,000 राउंड तोपखाना गोला-बारूद, 2,000 राउंड टैंक गोला-बारूद, 40 टन आरडीएक्स विस्फोटक और 2,900 उच्च-तीव्रता वाले प्रोजेक्टाइल मंगाए थे। हालांकि यह गोला-बारूद का पहला ऐसा ऑर्डर नहीं था लेकिन संख्या सामान्य से कहीं ज़्यादा थी।   भारत को सतर्क होने की जरुरत बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच संबंधों में सुधार भारत के लिए चिंता की बात है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बांग्लादेश तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है और भारत अपनी सबसे लंबी सीमा (4,097 किलोमीटर) बांग्लादेश के साथ साझा करता है। इसके माध्यम से माल और लोगों को आसानी से लाया-ले जाया जा सकता है। यह नई दोस्ती सीमा पार उग्रवाद और तस्करी को बढ़ावा दे सकती है। फिर भी आसान नहीं भारत को नजरअंदाज करना दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सामाजिक रिश्तों में खटास जरूर आई है लेकिन आर्थिक रिश्ते पहले की तरह अब भी मजबूत हैं। कोई भी सरकार देश चलाने के लिए दूसरे देशों के साथ आर्थिक रिश्ते हमेशा मजबूत रखती है ओर भारत और बांग्लादेश के बीच पानी, बिजली, जूट, आलू, चावल, चाय, कॉफी, सेरामिक्स, सब्जियों, दवाओं, प्लास्टिक, गाड़ियों जैसी चीजों का इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट पहले की तरह होता आ रहा है।इसके अलावा पश्चिम- विशेष रूप से अमेरिका – दक्षिण एशिया को भारतीय चश्मे से देखता है और अमेरिका बांग्लादेश के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी है। भारत जिस तरह दुनिया में एक ताकतवर देश की छवि बना चुका है। ऐसे में भारत से जंग करना बांग्लादेश के लिए आसान नहीं होगा। हां, बांग्लादेश चीन और पाकिस्तान की मदद से भारत की बॉर्डर पर तनाव जरूर पैदा कर सकता है।   राजेश जैन

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लेख कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का प्रतिबंध

कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का प्रतिबंध

 पहुँच को प्रतिबंधित करने से माता-पिता और अभिभावकों को अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों को बेहतर ढंग से निर्देशित करने और यह सुनिश्चित करने में…

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कला-संस्कृति श्रीदेवरसजी अस्पृश्यता प्रथा के घोर विरोधी थे

श्रीदेवरसजी अस्पृश्यता प्रथा के घोर विरोधी थे

11 दिसम्बर 2024 श्रीबालासाहेब देवरस की जयंती पर विशेष लेख  परम पूज्य श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक थे। आपका जन्म 11 दिसम्बर 1915 को श्री दत्तात्रेय कृष्णराव देवरस जी और श्रीमती पार्वती बाई जी के परिवार में हुआ था। आपने वर्ष 1938 में नागपुर के मॉरिस कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के उपरांत कॉलेज आफ लॉ, नागपुर विश्व विद्यालय से एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डॉक्टर हेडगेवार जी द्वारा की गई थी एवं आप वर्ष 1927 में अपनी 12 वर्ष की अल्पायु में ही संघ के स्वयंसेवक बन गए थे एवं नागपुर में संघ की एक शाखा में नियमित रूप से जाने लगे तथा इस प्रकार अपना सम्पूर्ण जीवन ही मां भारती की सेवा हेतु संघ को समर्पित कर दिया था। आप अपने बाल्यकाल में कई बार दलित स्वयंसेवकों को अपने घर ले जाते थे और अपनी माता से उनका परिचय कराते हुए उन्हें अपने घर की रसोई में अपने साथ भोजन कराते थे। आपकी माता भी उनके इस कार्य में उनका उत्साह वर्धन करती थीं। कुशाग्र बुद्धि के कारण आपने शाखा की कार्य प्रणाली को बहुत शीघ्रता से आत्मसात कर लिया था। अल्पायु में ही आप क्रमशः गटनायक, गणशिक्षक, शाखा के मुख्य शिक्षक एवं कार्यवाह आदि के अनुभव प्राप्त करते गए। नागपुर की इतवारी शाखा उन दिनों सबसे कमजोर शाखा मानी जाती थी, किंतु जैसे ही आप उक्त शाखा के कार्यवाह बने, आपने एक वर्ष के अपने कार्यकाल में ही उक्त शाखा को नागपुर की सबसे अग्रणी शाखाओं में शामिल कर लिया था। शाखा में आप स्वयंसेवकों के बीच अनुशासन का पालन बहुत कड़ाई से करवाते थे। दण्ड योग अथवा संचलन में किसी स्वयंसेवक से थोड़ी सी भी गलती होने जाने पर उसे तुरंत पैरों में चपाटा लगता था। परंतु, साथ ही, आपका स्वभाव उतना ही स्नेहमयी भी था, जिसके कारण कोई भी स्वयंसेवक आपसे कभी भी रूष्ट नहीं होता था।  श्री देवरस जी द्वारा वसंत व्याख्यानमाला में दिए गए एक उद्भोधन को उनके सबसे प्रभावशाली उद्बोधनों में से एक माना जाता है, मई 1974 में पुणे में दिए गए इस उद्बोधन में आपने अस्पृश्यता प्रथा की घोर निंदा की थी और संघ के स्वयंसेवकों से इस प्रथा को समाप्त करने की अपील भी की थी। संघ ने हिंदू समाज के साथ मिलकर अनुसूचित जाति के सदस्यों के उत्थान के लिए समर्पित संगठन “सेवा भारती” के माध्यम से कई कार्य किए। इस सम्बंध में संघ के स्वयंसेवकों ने स्कूल भी प्रारम्भ किए जिनमें झुग्गीवासियों, दलितों, समाज के छोटे तबके के नागरिकों एवं गरीब वर्ग को हिंदू धर्म के गुण सिखाते हुए व्यावसायिक पाठ्यक्रम चलाए जाते रहे। आपने 9 नवम्बर 1985 को अपने एक उदबोधन में कहा था कि संघ का मुख्य उद्देश्य हिंदू एकता है और संगठन का मानना है कि भारत के सभी नागरिकों में हिंदू संस्कृति होनी चाहिए। श्री देवरस जी ने इस संदर्भ में श्री सावरकर जी की बात को दोहराते हुए कहा था कि हम एक संस्कृति और एक राष्ट्र (हिंदू राष्ट्र) में विश्वास करते हैं लेकिन हिंदू की हमारी परिभाषा किसी विशेष प्रकार के विश्वास तक सीमित नहीं है। हिंदू की हमारी परिभाषा में वे लोग शामिल हैं जो एक संस्कृति में विश्वास करते हैं और इस देश को एक राष्ट्र के रूप में देखते हैं। इस प्रकार, वे समस्त हिंदू इस महान राष्ट्र का हिस्सा माने जाने चाहिए। इसलिए, हिंदू से हमारा आशय किसी विशेष प्रकार की आस्था से नहीं है। हम हिंदू शब्द का उपयोग व्यापक अर्थ में करते हैं।   वर्ष 1973 में श्री देवरस जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक बने। आपने अपने कार्यकाल के दौरान संघ को समाज के साथ जोड़ने में विशेष रूचि दिखाई थी और इसमें सफलता भी प्राप्त की थी। आपने श्री जयप्रकाश नारायण जी के साथ मिलकर भारत में लगाए गए आपातकाल एवं देश से भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए चलाए गए आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। आपातकाल के दौरान देश के कई राजनैतिक नेताओं के साथ ही संघ के कई स्वयंसेवकों को भी तत्कालीन केंद्र सरकार ने जेल में डाल दिया था। श्री देवरस जी को भी पुणे की जेल में डाला गया था। लम्बे समय तक चले संघर्ष के बाद, जब श्री देवरस जी को जेल से छोड़ा गया तो आपका पूरे देश में अभूतपूर्व स्वागत हुआ था। आपातकाल के दौरान अपने ऊपर एवं अन्य विभिन्न नेताओं पर हुए अन्याय एवं अत्याचार को लेकर देश के नागरिकों एवं स्वयंसेवकों के बीच किसी भी प्रकार की कटुता नहीं फैले इस दृष्टि से आपने उस समय पर समस्त स्वयंसेवकों को आग्रह किया था कि हमें इस सम्बंध में सब कुछ भूल जाना चाहिए और भूल करने वालों को क्षमा कर देना चाहिए। आपातकाल के दौरान संघ कार्य के सम्बंध में लिखते हुए द इंडियन रिव्यू पत्रिका के सम्पादक श्री एम सी सुब्रमण्यम ने लिखा है कि “आपातकाल के विरोध में जिन्होंने संघर्ष किया, उनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख है। इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि सत्याग्रह की योजना बनाना, सम्पूर्ण भारत में सम्पर्क बनाए रखना, चुपचाप आंदोलन के लिए धन एकत्रित करना, व्यवस्थित रीति से आदोलन के पत्रक सब दूर पहुंचाना, और बिना दलीय या धार्मिक भेदभाव के कारागृह में बंद लोगों के परिवारों की आर्थिक मदद करना, इस सम्बंध में संघ ने स्वामी विवेकानंद के उदगार सत्य कर दिखाए। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि देश में सामाजिक और राजनैतिक कार्य करने के लिए सर्वसंग परित्यागि सन्यासियों की आवश्यकता होती है।” आपातकाल के दौरान संघ के कार्यकर्ताओं के साथ कार्य करने वाले विभिन्न दलों के सहयोगियों ने ही नहीं बल्कि संघ से शत्रुता रखने वाले नेताओं ने भी संघ के स्वयंसेवकों के प्रति गौरव और आदर के उद्गार व्यक्त किए हैं। भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता वर्ष 1947 में प्राप्त हो गई थी, परंतु, दादरा नगर हवेली एवं गोवा आदि कुछ हिस्से अभी भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे क्योंकि यहां पुर्तगालियों का शासन यथावत बना रहा। ऐसे समय में कुछ संगठनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दायित्ववान  स्वयंसेवकों से मुलाकात की और भारत के उक्त क्षेत्रों को भी स्वतंत्र कराने की योजना बनाई गई। संघ के हजारों स्वयंसेवक सिलवासा पहुंच गए एवं दादरा नगर हवेली को आजाद करा  लिया। संघ के स्वयंसेवकों ने 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में भाग लेना शुरू कर दिया था।इसके बाद गोवा को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से कर्नाटक से 3000 से अधिक संघ के स्वयंसेवक गोवा पहुंच गए, इनमें कई महिलाएं भी शामिल थीं। गोवा सरकार के खिलाफ आंदोलन प्रारम्भ हो गया। सरकार ने इन सत्याग्रहियों को गिरफ़्तार कर लिया गया एवं 10 साल की कठोर सजा सुनाई गई। इसके बाद तो इन स्वयंसेवकों की रिहाई कराने एवं गोवा को स्वतंत्र कराने की मांग पूरे देश में ही उठने लगी। देश की जनता के दबाव में भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय चलाया। 18 दिसम्बर, 1961 को इस महत्वपूर्ण अभियान को प्रारम्भ किया गया, इस अभियान में भारतीय सेना के तीनों अंग शामिल हुए थे। यह अभियान 36 घंटे चला और इसके सफल होते ही गोवा को 450 वर्ष के पुर्तगाली शासन से आजादी प्राप्त हो गई। इस प्रकार संघ के स्वयंसेवकों के प्रारंभिक उद्घोष, सक्रियता, समर्पण, जज्बे और सेना के पराक्रम से अंतत: गोवा भारतीय गणराज्य का अंग बन गया। कुल मिलाकर गोवा को स्वतंत्र कराने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में संघ की ओर से श्री देवरस जी की भी महती भूमिका रही है।   श्री देवरस जी ने कई पुस्तकें भी लिखी थीं, जिनमें कुछ पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुईं हैं, जैसे वर्ष 1974 में “सामाजिक समानता और हिंदू सुदृढ़ीकरण” विषय पर लिखी गई पुस्तक; वर्ष 1984 में लिखित पुस्तक “पंजाब समस्या और उसका समाधान”; वर्ष 1997 में लिखित पुस्तक “हिंदू संगठन और सत्तावादी राजनीति” एवं वर्ष 1975 में अंग्रेजी भाषा में लिखी गई पुस्तक “राउज़: द पॉवर आफ गुड” ने भी बहुत ख्याति अर्जित की है।  श्री देवरस जी 17 जून 1996 को इस स्थूल काया का परित्याग कर प्रभु परमात्मा में लीन हो गए थे। आपकी इच्छा अनुसार आपका अंतिम संस्कार रेशमबाग के बजाय नागपुर के सामान्य नागरिकों के श्मशान घाट में किया गया था।   

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कला-संस्कृति शांति एवं शीतलता देने वाला कल्पवृक्ष है गीता

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-ः ललित गर्ग:- गीता ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसकी हर साल जयंती मनाई जाती है। प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी…

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राजनीति लचीला संविधान या यथास्थितिवादी समाज

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राजनीति सीरिया की जंग अभी खत्म नहीं हुई है

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सिनेमा अलग किस्‍म के एक्‍टर हैं शाहिद कपूर

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लेख सार्वजनिक संस्थानों में अग्नि सुरक्षा की लापरवाही।

सार्वजनिक संस्थानों में अग्नि सुरक्षा की लापरवाही।

भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा चलाए जाने वाले जागरूकता अभियान अग्नि रोकथाम और आपातकालीन प्रतिक्रिया के बारे में ज्ञान फैलाने में मदद कर सकते हैं।…

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समाज बोझ नहीं; समाज और देश के लिए अमूल्य निधि और धरोहर हैं बुजुर्ग

बोझ नहीं; समाज और देश के लिए अमूल्य निधि और धरोहर हैं बुजुर्ग

पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण भारतीय सामाजिक परिवेश में अनेक आमूलचूल परिवर्तन आए हैं। आज हमारे सामाजिक, नैतिक मूल्य बदल गये हैं। हमारी…

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