लेख मानव सभ्यता का शिखर एवं रिश्तों का स्वर्ग है परिवार

मानव सभ्यता का शिखर एवं रिश्तों का स्वर्ग है परिवार

अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस, 15 मई 2025  ललित गर्ग वैश्विक परिवार दिवस दुनिया भर के लोगों में प्यार, सद्भाव, एकता को प्रोत्साहित करने के लिए समर्पित…

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राजनीति मोदी-उद्बोधन जागृत राष्ट्र के हौसलों की उड़ान

मोदी-उद्बोधन जागृत राष्ट्र के हौसलों की उड़ान

  ललित गर्ग  ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान के जवाबी हमले तथा युद्ध विराम के बाद राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़े…

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राजनीति ‘गोपनीय जानकारी’ बनी सीजफायर का आधार

‘गोपनीय जानकारी’ बनी सीजफायर का आधार

कई लोग थे जो प्रधानमंत्री श्री मोदी के साथ राजनीतिक तौर पर इस युद्ध से पहले साथ नहीं थे। उन्होंने देश की राजनीतिक परिस्थितियों के…

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राजनीति आत्मविश्वास से भरा मोदी का भारत

आत्मविश्वास से भरा मोदी का भारत

जो लोग इस प्रकार के प्रश्न उठा रहे हैं, उनके लिए उचित रूप से यह कहा जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान में इस…

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प्रवक्ता न्यूज़ समाज के लिए नर्सों के योगदान को नमन

समाज के लिए नर्सों के योगदान को नमन

अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस (12 मई) पर विशेष– योगेश कुमार गोयलदया और सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल को आधुनिक नर्सिंग की जन्मदाता माना जाता हैं, जिनकी…

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कविता युद्ध से युद्धविराम तक

युद्ध से युद्धविराम तक

रक्त से लथपथ इतिहास,धधकते ग़ुस्से की ज्वाला,सरहदों पर टकराती हैं चीखें,जिन्हें सुनता कौन भला? वो शहादतें, वो बारूदी हवाएँ,टूटते काफिले, बिखरते सपने,दिल्ली से कराची तक,हर…

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प्रवक्ता न्यूज़ लगे हाथ एक गणना इनकी भी हो जाए…

लगे हाथ एक गणना इनकी भी हो जाए…

सुशील कुमार ‘नवीन’ पहलगाम हादसे के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच अघोषित युद्ध की शुरुआत हो चुकी है। इसका परिणाम क्या रहेगा? यह अभी भविष्य के गर्भ में है। इस गंभीर माहौल की जहां अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक चिंतन हो रहा है वहीं कुछ कुचक्रिय तत्व अभी भी सक्रिय है। जातीय जनगणना तो जब होगी सो होगी, इससे पहले ऐसे लोगों की गणना बहुत जरूरी है। जो भारत में रहते हैं और भारतीय नहीं है। जो इसी मिट्टी में जन्मे हैं और इसी के विखंडन का स्वप्न देखते हैं। जो यही कमाते हैं और इसका प्रयोग इसी के खिलाफ करते हैं। युद्ध अपने तरीके से चलता रहेगा, युद्ध के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे लोगों की पहचान आज इस घड़ी में करना बेहद जरूरी है। जयचंदों की फौज जिस तरह से बढ़ रही है वो भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। चाणक्य नीति में साफ लिखा गया है कि – परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भ पयोमुखम्॥ इसका सीधा सा भाव है कि पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले और सामने मीठा बोलने वालों को उसी प्रकार त्याग देना चाहिए, जिस प्रकार  मुख पर दूध तथा भीतर विष से भरे घड़े को त्याग दिया जाता है।    एक सच्चे देशभक्त का इस समय कर्तव्य बनता है कि आपदा आने के समय वो आपसी गिले शिकवे भूल एकमत से राष्ट्रहित में ली गई प्रत्येक कार्रवाई का समर्थन करे। उसमें यथोचित सहयोग करें, उसका संबल बनें। किसी तरफ की छींटाकशी,मीनमेख निकाल दूसरे पक्ष के लिए उदाहरण बनना राष्ट्रविरोधी से कमतर नहीं है। देश आज जिस संकट से गुजर रहा है वह हमारे द्वारा पैदा नहीं किया गया है। गीता का प्रसिद्ध श्लोक यहां सार्थक सिद्ध है। इसके अनुसार कहा गया है – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ युद्ध से इनकार किए जाने पर श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं – तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करना है। कर्म के फल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है। इसलिए तुम केवल निरन्तर कर्म करो। कर्म के फल पर मनन मत करो और अकर्मण्य भी मत बनो।      संसार का कोई भी ऐसा देश नहीं है। जहां राष्ट्र विरोधी ताकतें मुंह बाए न खड़ी हो। दुश्मन राष्ट्र से ज्यादा खतरा राष्ट्र के अंदर छिपी पड़ी इन कुचक्रियों से होता है। वक्त बेवक्त इनका सिर्फ एक उद्देश्य होता है कि किसी भी तरह से अपनी विचारधारा को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित किया जाए। इन्हें इस बात से मतलब नहीं कि देश किस स्थिति से गुजर रहा है। उन्हें सिर्फ अपनी विचारधारा को अग्रसर रखना होता है, चाहे वो विचारधारा राष्ट्रविरोधी ही क्यों न हो।    आज के समय को ही ले लीजिए। पक्ष-विपक्ष आज सरकार के साथ खड़ा है। फिर भी कुछ लोगों की जुबान नहीं रुक रही है। इसी का फायदा सोशल मीडिया के माध्यम से पाकिस्तान द्वारा उठाया गया है  हमारे ही लोगों द्वारा की गई बयानबाजी का प्रयोग हमारे ही खिलाफ उनके द्वारा खूब किया गया है। कन्हैयालाल मिस्र का एक निबंध मै और मेरा देश पढ़ा हो तो उसकी एक पंक्ति आज के समय में अपनी सार्थकता को पूर्ण सिद्ध करती है कि युद्ध में जय बोलने वालों का बड़ा महत्व है। भाव यह है कि युद्ध करना हर किसी के सामर्थ्य में नहीं है। लेकिन अपने साथियों का उत्साह बढ़ाना तो हमारे हाथ में है। लेकिन हम है कि अभी भी बाज नहीं आ रहे। आलोचना या समीक्षा का अभी वक्त थोड़े ही है। अभी तो जो हो रहा है उसे होने दें। वो चाहे अच्छा है या बुरा। हमारा पहला फर्ज बनता है कि उसमें सहयोग करें। लोकतंत्र में सबको बोलने का अधिकार है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। एक छोटी सी चिनगारी की उपेक्षा से दावानल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।   प्राचीन भारत के महान अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक आचार्य चाणक्य के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए जीवन सिद्धांत और रणनीतियां न केवल राजनीति, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी सफलता प्राप्त करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करने का कार्य करते हैं। उनके द्वारा बताये गए नियमों में जीवन की कठिनाइयों का सामना करने और सही दिशा में आगे बढ़ने के उपाय दिए गए हैं। ये न केवल आत्मनिर्भर बनाते हैं, बल्कि जीवन में बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।   आचार्य चाणक्य के अनुसार यदि आपका कोई शत्रु है तो कमजोरियों का पता लगाकर कमजोर करो। शत्रु को नष्ट करने से पहले उसे हराना बहुत जरूरी है। चाणक्य का कहना था कि सच्चाई अक्सर कड़वी होती है, लेकिन यह हमेशा सही होती है, यदि हम सच्चाई को अपनाते हैं, तो जीवन में हमें कोई पछतावा नहीं होगा।  आचार्य चाणक्य राष्ट्र शब्द को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि राष्ट्र केवल किसी भूखंड मात्र नहीं होता। राष्ट्र संस्कृति, सभ्यता, परंपरा, भाषा, इतिहास इन पांचों विषयों का बोध होता है। उनके अनुसार देश में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण का भाव रखना ही सच्ची राष्ट्र सेवा है। अपने नीति सूत्रों के माध्यम से आचार्य चाणक्य ने तत्कालीन सुप्त जनमानस के पटल पर राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं आत्मगौरव की भावना को जाग्रत किया। देश के आत्मगौरव और आत्मस्वाभिमान को सुदृढ़ एवं अखंड रखने के लिए अनिवार्य है राष्ट्र की एकता एवं संगठन। चाणक्य का विचार था कि ‘राष्ट्रीय एकता राष्ट्र रूपी शरीर में आत्मा के समान है। जिस प्रकार आत्मा से हीन शरीर प्रयोजनहीन हो जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र भी एकता एवं संगठन के अभाव में टूट जाता है। ऐसे में आज हम सब का भी दायित्व बनता है कि समाज एवं राष्ट्र स्तर पर कहीं भी कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो राष्ट्रहित में नहीं है तो एक सजग भारतीय की तरह उस पर मुखर हो। गलत देखकर चुप रह जाना भी किसी अपराध से कम नहीं होता। राष्ट्र-विरोध की स्थितियों से संघर्ष करना समय की जरूरत है। उनसे पलायन करने से राष्ट्रीयता सशक्त मजबूत नहीं हो सकती। महाभारत के शान्तिपर्व में लिखा गया है – दुर्जनः परिहर्तव्यः विध्ययालंकृतोऽपि सन् । मणिना भूषितः सर्पः किमसो न भयंकरः॥ दुर्जन व्यक्ति यदि विद्या से भी अलंकृत हो फ़िर भी उसका छोड़ देना चाहिए। मणि से भूषित सांप क्या भयंकर नही होते? लेखक; सुशील कुमार ‘नवीन‘

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कला-संस्कृति जारों लड़ाइयां जीतने से अच्छा है, स्वयं पर विजय प्राप्त करना

जारों लड़ाइयां जीतने से अच्छा है, स्वयं पर विजय प्राप्त करना

वैशाख पूर्णिमा इस बार 12 मई 2025 को है।इस दिन बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान गौतम बुद्ध का जन्मोत्सव मनाया जाता है।इसे ‘बुद्ध पूर्णिमा’, ‘पीपल…

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राजनीति युद्ध से युद्धविराम तक: भारत-पाक रिश्तों की बदलती तस्वीर

युद्ध से युद्धविराम तक: भारत-पाक रिश्तों की बदलती तस्वीर

10 मई 2025 को, भारत और पाकिस्तान ने एक पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमति व्यक्त की, जो हाल के वर्षों में सबसे गंभीर संघर्ष…

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लेख माँ का आँचल – प्रेम की छाँव, बलिदान का गीत”

माँ का आँचल – प्रेम की छाँव, बलिदान का गीत”

माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि जीवन की पहली गुरु, मार्गदर्शिका और सबसे करीबी मित्र है। उसकी ममता जीवनभर हमें सुरक्षा, सुकून और संस्कार…

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राजनीति पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को क्यों कहा ‘गीदड़’ ?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को क्यों कहा ‘गीदड़’ ?

संदीप सृजन पहलगाम हमले के बाद शुरु हुए भारत के ऑपरेशन सिंदूर से बोखलाये हुए पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर से उथल-पुथल मची हुई है। हाल ही में पाकिस्तानी संसद में एक सांसद ने अपने ही देश के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को ‘गीदड़’ कहकर तीखा हमला बोला। यह बयान न केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में अस्थिरता को दर्शाता है, बल्कि यह भी प्रदर्शित करता है कि देश के शीर्ष नेतृत्व पर उनके अपने लोगों का भरोसा डगमगा रहा है। इस घटना ने न केवल पाकिस्तान में, बल्कि भारत और वैश्विक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। शुक्रवार को पाकिस्तानी संसद में एक सांसद, शाहिद अहमद खट्टक, ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘गीदड़’ कहा। सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि शहबाज शरीफ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेने से डरते हैं। यह बयान उस समय आया जब पाकिस्तान और भारत के बीच तनावपूर्ण संबंधों की पृष्ठभूमि में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘इंडिया-पाकिस्तान वॉर’ जैसे हैशटैग सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे है। सांसद ने अपने भाषण में कहा, “अगर सरदार गीदड़ हो तो जंग हारते हैं। बुजदिल सरदार सेना को क्या संदेश देगा?” इस बयान ने न केवल संसद में हंगामा मचाया, बल्कि पाकिस्तान की जनता और मीडिया में भी तीखी प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी संसद में इस तरह का विवाद हुआ हो। इससे पहले भी, 2019 में बालाकोट हमले के बाद, एक सांसद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा की कथित कमजोरी पर टिप्पणी की थी। उस समय भी सांसद ने दावा किया था कि पाकिस्तानी नेतृत्व भारत के सामने घुटने टेक रहा था। इस बार का विवाद इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि यह शहबाज शरीफ के नेतृत्व और उनकी सरकार की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल उठाता है।पाकिस्तान की राजनीति हमेशा से अस्थिरता और आंतरिक कलह का शिकार रही है। पाकिस्तान के सांसद का अपनी ही सरकार के प्रति असंतोष है। जो कि पाकिस्तानी सेना और नागरिक सरकार के बीच बढ़ते तनाव का परिणाम  है, क्योंकि सेना लंबे समय से देश की विदेश नीति और रक्षा नीति पर नियंत्रण रखती है।शहबाज शरीफ को पहले से ही एक कमजोर और समझौतावादी नेता के रूप में देखा जाता रहा है। इस बयान ने उनकी छवि को और नुकसान पहुंचाया है। पाकिस्तान जैसे देश में, जहां राष्ट्रवाद और भारत विरोधी भावनाएं राजनीति का एक बड़ा हिस्सा हैं, ‘गीदड़’ जैसे शब्द का इस्तेमाल शहबाज की विश्वसनीयता पर गहरा आघात करता है। यह बयान न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि को प्रभावित करता है, बल्कि उनकी पार्टी, पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन), की स्थिति को भी कमजोर करता है। सोशल मीडिया पर इस बयान ने आग में घी का काम किया। कई यूजर्स ने शहबाज शरीफ का मजाक उड़ाया और उनकी सरकार को ‘बुजदिल’ करार दिया। यह घटना पाकिस्तान की पहले से ही अस्थिर राजनीति को और जटिल बना सकती है। शहबाज शरीफ की सरकार पहले ही विपक्ष के लगातार हमलों का सामना कर रही है। इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई लगातार सरकार पर भ्रष्टाचार, अक्षमता और सेना के सामने घुटने टेकने का आरोप लगाती रही है। इस बयान ने विपक्ष को एक नया हथियार दे दिया है, जिसका इस्तेमाल वे शहबाज सरकार को और कमजोर करने के लिए कर सकते हैं। इसके अलावा, यह बयान सेना और नागरिक सरकार के बीच संबंधों पर भी सवाल उठाता है। पाकिस्तान में सेना का राजनीति पर गहरा प्रभाव रहा है। सेना लंबे समय से भारत के प्रति कड़ा रुख अपनाने की पक्षधर रही है, और अगर शहबाज सरकार इस दिशा में थोड़ी नर्म पड़ती है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे चल रहा है, दोनों देशों के बीच सैन्य या कूटनीतिक तनाव की स्थिति है। ऐसे में पाक सांसद के बयान ने इस धारणा को और मजबूत किया है कि पाकिस्तान का नेतृत्व भारत के सामने कमजोर पड़ रहा है। भारत में इस बयान को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ भारतीय नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे भारत की कूटनीतिक और सैन्य ताकत का सबूत बताया, जबकि कुछ ने इसे पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरी का प्रतीक माना है। वैश्विक स्तर पर, यह घटना पाकिस्तान की छवि को और कमजोर करती है। पहले से ही आर्थिक संकट और आतंकवाद जैसे मुद्दों से जूझ रहा पाकिस्तान अब आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता के कारण और चर्चा में है।पाकिस्तानी संसद में शहबाज शरीफ को ‘गीदड़’ कहे जाने की घटना केवल एक बयान नहीं, बल्कि पाकिस्तान की गहरी राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का प्रतीक है। यह बयान शहबाज शरीफ की सरकार की कमजोरी, विपक्ष के आक्रामक रवैये, और सेना-नागरिक सरकार के बीच तनाव को उजागर करता है। संदीप सृजन

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राजनीति भारत के हाथों “हार” का रहा है पाक का इतिहास

भारत के हाथों “हार” का रहा है पाक का इतिहास

-प्रदीप कुमार वर्मा कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले का बदला भारत ने ले लिया है। भारत की ओर से चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर अभियान के जरिए पाकिस्तान में स्थित आतंकी ठिकानों पर हमला कर उन्हें तबाह कर दिया गया है। उधर, पाकिस्तान ने भी अपनी परंपरागत आदत के मुताबिक भारत के रिहायशी तथा सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। भारत की सेना ने पाकिस्तान की इस नापाक हरकत का मुंह तोड़ जवाब दिया है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब भारत के हाथों पाक को मुंह की खानी पड़ी है। इससे पहले भी हुए युद्ध में भारत ने जंग के मैदा न में पाकिस्तान को कई बार धूल चटाई है।फिलहाल, हालात ऐसे हैं कि भारत में ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान के घमंड को चूर-चूर कर दिया है। यही नहीं भारत और पाकिस्तान के बीच इस नए मोर्चे के बाद जहां भारत को कई देशों का समर्थन मिल रहा है। वहीं, पाकिस्तान विश्व बिरादरी में अलग-थलग पड़ गया है।             पहलगाम के आतंकी हमले का बदला लेने के लिए भारत में शुरुआत सिंधु जल समझौते के निरस्त करने से की। इसके बाद भारत ने चिनाब का पानी भी रोक दिया। यही नहीं भारत ने अटारी बॉर्डर को बंद करके पाकिस्तान के साथ सभी प्रकार के आयात और निर्यात पर भी पूरी तरह से रोक लगा दी है। भारत ने एक कूटनीतिक कदम उठाते हुए पाकिस्तान के दूतावास में अधिकारियों की संख्या में कटौती कर दी। इसके साथ ही भारत में पाकिस्तान के जहाजों की आवाजाही पर पूर्ण पाबंदी के साथ-साथ पाकिस्तान के पोतों के लिए भारत के बंदरगाहों को पूरी तरह से बंद कर दिया है। इस आर्थिक मोर्चाबंदी के बाद पहले से ही गरीबों की मार झेल रहे पाकिस्तान में अब कंगाली के हालात है। यही नहीं भारत ने विश्व पटेल के अन्य देशों के साथ अपनी कार्रवाई को साझा करते हुए उनका विश्वास जीता है। यही वजह है कि अब विश्व का अनेक देश पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की इस कार्रवाई में उसके साथ हैं।                    यह कोई पहला मौका नहीं है जब आतंकवाद का पालन-पोषण वाले पाकिस्तान को भारत के साथ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष युद्ध में मुंह की खानी पड़ी है। लेकिन पाकिस्तान है कि तमाम नुकसान के बाद ना तो उसने आतंकवादियों को आश्रय देना बंद किया है और ना ही अपनी पुरानी हार से कोई सबक सीखा है। भारत और पाकिस्तान के बीच अगर युद्ध की बात करें तो वर्ष 1947 से 1948 के बीच में कश्मीर में 22 अक्टूबर 1947 से 1 जनवरी 1949 तक भारत और पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध हुआ। इस युद्ध में पाकिस्तान ने कबालियों के साथ कश्मीर पर आक्रमण किया। लेकिन उसे भारतीय सेना के हाथों मुंह की खानी पड़ी और 1 जनवरी 1949 को युद्ध विराम की घोषणा हुई। इसके बाद उसने कश्मीर के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया। जिसे आज भी पीओके नाम से जाना जाता है।  इसके बाद भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1965 में युद्ध हुआ।           तब 5 अगस्त 1965 को पाकिस्तानी सैनिकों ने जम्मू कश्मीर की नियंत्रण रेखा के पर भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की।  इसके जवाब में भारतीय सेना ने कई स्थानों पर अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर पर हमला कर दिया तथा भारतीय सैनिकों ने 8 अगस्त 1965 को हाजी पीर दर्रे पर भारतीय तिरंगा फहरा दिया। इसके बाद तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका की मध्यस्थता से युद्ध विराम पर सहमत हुए दोनों देशों के बीच ताशकंद समझौता हुआ और भारत की सेना एक बार फिर नियंत्रण रेखा पर से वापस लौट आई। इसके करीब 6 साल बाद वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच फिर से युद्ध हुआ। इस युद्ध को “बांग्लादेश मुक्ति संग्राम” के नाम से जाना जाता है।  यह युद्ध 3 दिसंबर 1971 से लेकर 16 दिसंबर 1971 तक चला तथा इसके बाद पाकिस्तान दो भागों में पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्व पाकिस्तान बन के रूप में बंट गया।    …

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