रेशमी ख़्वाबों के ख़ूबसूरत लम्हे…
Updated: June 14, 2012
फ़िरदौस ख़ान हम हफ़्ते में एक दिन अपनी पसंद की फ़िल्म ज़रूर देखते हैं…पिछले हफ़्ते फ़िल्म ‘कभी-कभी’ देखी. 27 फ़रवरी, 1976 को प्रदर्शित इस फ़िल्म…
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रघुनाथ सिंह की कविता / कैसा है यह राष्ट्र हमारा
Updated: May 24, 2012
कैसा है यह राष्ट्र हमारा हो रही हैं भ्रूण हत्याएं आई है जब से मशीन जो बता देती है निस्सहाय भ्रूण का लिंग और फिर…
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कविता:जहाँ कहीँ भी होगा-मोतीलाल
Updated: May 23, 2012
मोतीलाल जहाँ कहीँ भी होगा उठती अंतस से हूक अवसाद के चक्रवात मेँ रेखांकित नहीँ उसका वजूद गौर से यदि देखेँ मुखर होने की…
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बेवजह शत्रुता का मतलब है पूर्वजन्म का प्रतिशोध
Updated: May 23, 2012
डॉ. दीपक आचार्य दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसके कोई मित्र या शत्रु न हों। व्यक्ति के जन्म के साथ ही राग-द्वेष के…
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कार्टून विवादः बुध्दिजीवियों को ही समाज की सोच बदलनी होगी !
Updated: July 22, 2012
इक़बाल हिंदुस्तानी वोटबैंक की राजनीति का शिकार राजनेताओं से उम्मीद बेकार! एनसीईआरटी की किताबों मे बाबासाहब अंबेडकर के कार्टून को लेकर शुरू हुआ विवाद अब…
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राष्ट्रपति मनोनयन हेतु राजनीतिक दलों की अपनी ढपली अपना राग
Updated: May 23, 2012
सिद्धार्थ शंकर गौतम मंगलवार को समाप्त हुए बजट सत्र के बाद अब सरकार के लिए नए राष्ट्रपति का चुनाव कठिन परीक्षा के रूप में सामने…
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पितृसत्ता को भूलो और बोलो “सत्यमेव जयते” / जगदीश्वर चतुर्वेदी
Updated: May 22, 2012
सत्यमेव जयते सीरियल की इन दिनों खूब चर्चा है। सामाजिक समस्याओं पर समाज का ध्यान खींचने वाले इस सीरियल को लोग विभिन्न चैनलों पर देख…
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औपनिवेशिक ढांचा खत्म हो
Updated: May 22, 2012
विमल कुमार सिंह ‘आइएएस’ की व्यवस्था को जितना जल्दी समाप्त कर दिया जाए, उतना अच्छा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आइएएस की व्यवस्था समाप्त…
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अब गायब हो जाती है खुशी मेहमानों के आने पर
Updated: May 22, 2012
डॉ. दीपक आचार्य एक जमाना था जब मेहमानों के आगमन की सूचना भर से मन मयूर नाच उठता था और बड़े ही उत्साह व उल्लास…
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‘सृष्टि सृजक‘ महर्षि कश्यप का पौराणिक स्वरूप
Updated: May 22, 2012
राजेश कश्यप हमारे लगभग सभी पौराणिक ग्रन्थों में सृष्टि की रचना का बखूबी उल्लेख मिलता है। पौराणिक ग्रन्थ ‘सुख सागर’ में श्री शुकदेव मुनि जी…
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गजल:गीत ज़िन्दगी के हम गुनगुनाते रहे-हिमकर श्याम
Updated: May 22, 2012
जहां तक हुआ खुद को बहलाते रहे गीत ज़िन्दगी के हम गुनगुनाते रहे छूटती रही ख़ुशियों की डोर हाथों से वक़्त हमें, हम उसे…
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