लेख देश में नशे के सौदागरों का बढ़ता जाल

देश में नशे के सौदागरों का बढ़ता जाल

भारत में नशे का संकट अब व्यक्तिगत बुराई नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आपदा बन चुका है। ड्रग माफिया, तस्करी, राजनीतिक संरक्षण और सामाजिक चुप्पी—सब मिलकर युवाओं…

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लेख आदिवासी अधिकारों और शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए एक प्रेरणा है हूल विद्रोह

आदिवासी अधिकारों और शोषण के खिलाफ संघर्ष के लिए एक प्रेरणा है हूल विद्रोह

हूल विद्रोह  – 30 जून 1855 कुमार कृष्णन  संथाल  विद्रोह या हूल विद्रोह  ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रथम व्यापक सशस्त्र विद्रोह था जो ब्रिटिश…

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राजनीति एससीओ में आतंकवाद पर चले पारस्परिक दांवपेंच के मायने

एससीओ में आतंकवाद पर चले पारस्परिक दांवपेंच के मायने

कमलेश पांडेय जब इजरायल जैसा छोटा-सा यहूदी देश अपने शौर्य, पराक्रम और कूटनीति जनित तकनीकी विकास के बल पर ईरान जैसे कट्टर शिया इस्लामिक देश…

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राजनीति संयुक्त राष्ट्र: दंतहीन, विषरहित 

संयुक्त राष्ट्र: दंतहीन, विषरहित 

सचिन त्रिपाठी दुनिया जब जलती है तो कोई ऐसा मंच चाहिए जो केवल आग बुझाने की अपील न करे बल्कि पानी लेकर पहुंचे लेकिन 21वीं…

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शख्सियत राष्ट्रानुरागी ‘तूफानी हिंदू’ थे विवेकानंद

राष्ट्रानुरागी ‘तूफानी हिंदू’ थे विवेकानंद

4 जुलाई विवेकानन्द पुण्यतिथि पर : डॉ० घनश्याम बादल भगवा वेश, सिर पर पगड़ी और तेजस्वी ओजपूर्ण मुखमंडल के साथ अद्भुत वक्ता की जब बात…

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कला-संस्कृति अमरनाथ यात्रा : देश और दुनिया में आस्था और श्रद्धा की अनूठी “मिसाल”

अमरनाथ यात्रा : देश और दुनिया में आस्था और श्रद्धा की अनूठी “मिसाल”

तीन जुलाई से शुरू हो रही पवित्र अमरनाथ यात्रा पर विशेष…. प्रदीप कुमार वर्मा जय बाबा बर्फानी,भूखे को अन्न प्यासे को पानी। चलो अमरनाथ दर्शन…

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राजनीति संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी ‘और ‘धर्मनिरपेक्ष ‘पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी ‘और ‘धर्मनिरपेक्ष ‘पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

डॉ. बालमुकुंद पांडेय  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  सरकार्यवाह श्रीमान  दत्तात्रेय होसवाले जी ने’ इमरजेंसी के 50 साल ‘ के कार्यक्रम में कहा कि ‘ समाजवादी’…

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राजनीति ‘सुपर जासूस’ की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के प्रमुख पद पर नियुक्ति

‘सुपर जासूस’ की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के प्रमुख पद पर नियुक्ति

रामस्वरूप रावतसरे पराग जैन का नाम खुफिया हलकों में ‘सुपर जासूस’ के तौर पर गूँजता है चाहे वह ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ में आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद…

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राजनीति महिला आरक्षण की दहलीज़ पर लोकतंत्र: अब दलों को जिम्मेदारी उठानी होगी

महिला आरक्षण की दहलीज़ पर लोकतंत्र: अब दलों को जिम्मेदारी उठानी होगी

2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत में राजनीति के स्वरूप को बदलने का ऐतिहासिक अवसर है। हालांकि इसका क्रियान्वयन 2029 के लोकसभा चुनाव…

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राजनीति सहयोग की शक्ति और सामाजिक समरसता का उत्सव

सहयोग की शक्ति और सामाजिक समरसता का उत्सव

अन्तर्राष्ट्रीय सहकारिता दिवस- 4 जुलाई, 2025 ललित गर्ग हर वर्ष जुलाई के पहले शनिवार को अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस मनाया जाता है। यह दिन सहकारी संस्थाओं…

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आर्थिकी मध्यमवर्गीय परिवार नहीं फंसे ऋण के जाल में

मध्यमवर्गीय परिवार नहीं फंसे ऋण के जाल में

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 50 आधार बिंदुओं की कमी की है। इसके साथ ही, निजी क्षेत्र के बैंकों, सरकारी क्षेत्र के बैंकों एवं क्रेडिट कार्ड कम्पनियों सहित अन्य वित्तीय संस्थानों ने भी अपने ग्राहकों को प्रदान की जा रही ऋणराशि पर लागू ब्याज दरों में कमी की घोषणा करना प्रारम्भ कर दिया है ताकि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में की गई कमी का लाभ शीघ्र ही भारत में ऋणदाताओं तक पहुंच सके एवं इससे अंततः देश की अर्थव्यवस्था को बल मिल सके। भारत में चूंकि अब मुद्रा स्फीति की दर नियंत्रण में आ गई है, अतः आगे आने वाले समय में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में और अधिक कमी की जा सकती है। इस प्रकार, बहुत सम्भव है ऋणराशि पर लागू ब्याज दरों में कमी के बाद कई नागरिक जिन्होंने पूर्व में कभी बैंकों से ऋण नहीं लिया है, वे भी ऋण लेने का प्रयास करें। बैंक से ऋण लेने से पूर्व इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि इस ऋण को चुकता करने की क्षमता भी ऋणदाता में होनी चाहिए अर्थात ऋणदाता की पर्याप्त मासिक आय होनी चाहिए ताकि बैकों द्वारा प्रदत्त ऋण की किश्त एवं ब्याज का भुगतान पूर्व निर्धारित समय सीमा के अंदर किया जा सके। इस संदर्भ में विशेष रूप से युवा ऋणदाताओं द्वारा क्रेडिट कार्ड के उपयोग पश्चात संबंधित राशि का भुगतान समय सीमा के अंदर अवश्य करना चाहिए क्योंकि अन्यथा क्रेडिट कार्ड एजेंसी द्वारा चूक की गई राशि पर भारी मात्रा में ब्याज वसूला जाता है, जिससे युवा ऋणदाता ऋण के जाल में फंस जाते हैं।     बैकों से लिए गए ऋण की मासिक किश्त एवं इस ऋणराशि पर ब्याज का भुगतान यदि निर्धारित समय सीमा के अंदर नहीं किया जाता है तो चूककर्ता ऋणदाता से बैकों द्वारा दंडात्मक ब्याज की वसूली की जाती है। इसी प्रकार, कई नागरिक जो क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते हैं एवं इस क्रेडिट कार्ड के विरुद्ध उपयोग की गई राशि का भुगतान यदि वे निर्धारित समय सीमा के अंदर नहीं कर पाते हैं तो इस राशि पर चूक किए गए क्रेडिट कार्ड धारकों से भारी भरकम ब्याज की दर से दंड वसूला जाता है। कभी कभी तो दंड की यह दर 18 प्रतिशत से 24 प्रतिशत के बीच रहती है। क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने वाले नागरिक कई बार इस उच्च ब्याज दर पर वसूली जाने वाली दंड की राशि से अनभिज्ञ रहते हैं। अतः बैंकों से ली जाने वाली ऋणराशि एवं क्रेडिट कार्ड के विरुद्ध उपयोग की जाने वाली राशि का समय पर भुगतान करने के प्रति ऋणदाताओं को सजग रहने की आवश्यकता है।  कुल मिलाकर यह ऋणदाताओं के हित में है कि वे बैंक से लिए जाने वाले ऋण की राशि तथा ब्याज की राशि एवं क्रेडिट कार्ड के विरुद्ध उपयोग की जाने वाली राशि का पूर्व निर्धारित एवं उचित समय सीमा के अंदर भुगतान करें क्योंकि अन्यथा की स्थिति में उस चूककर्ता नागरिक की क्रेडिट रेटिंग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है एवं आगे आने वाले समय में उसे किसी भी वित्तीय संस्थान से ऋण प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है एवं बहुत सम्भव है कि भविष्य में उसे किसी भी वित्तीय संस्थान से ऋण प्राप्त ही न हो सके।         ऋणदाता यदि किसी प्रामाणिक कारणवश अपनी किश्त एवं ब्याज का बैंकों अथवा क्रेडिट कार्ड कम्पनी को समय पर भुगतान नहीं कर पाता है और उसका ऋण खाता यदि गैर निष्पादनकारी आस्ति में परिवर्तित हो जाता है तो इस संदर्भ में चूककर्ता ऋणदाता द्वारा बैकों को समझौता प्रस्ताव दिए जाने का प्रावधान भी है। इस समझौता प्रस्ताव के माध्यम से चूककर्ता ऋणदाता द्वारा सम्बंधित बैंक अथवा क्रेडिट कार्ड कम्पनी को मासिक किश्त एवं ब्याज की राशि को पुनर्निर्धारित किए जाने के सम्बंध में निवेदन किया जा सकता है। परंतु, यदि ऋणदाता ऋण की पूरी राशि, ब्याज सहित, अदा करने में सक्षम नहीं है तो चूक की गई राशि में से कुछ राशि की छूट प्राप्त करने एवं शेष राशि को एकमुश्त अथवा किश्तों में अदा करने के सम्बंध में भी समझौता प्रस्ताव दे सकता है। ऋण की राशि अथवा ब्याज की राशि के सम्बंध के प्राप्त की गई छूट की राशि का रिकार्ड बनता है एवं समझौता प्रस्ताव के अंतर्गत प्राप्त छूट के चलते भविष्य में उस ऋणदाता को बैकों से ऋण प्राप्त करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, इस बात का ध्यान चूककर्ता ऋणदाता को रखना चाहिए। अतः जहां तक सम्भव को ऋणदाता द्वारा समझौता प्रस्ताव से भी बचा जाना चाहिए एवं अपनी ऋण की निर्धारित किश्तों एवं ब्याज का निर्धारित समय सीमा के अंतर्गत भुगतान करना ही सबसे अच्छा रास्ता अथवा विकल्प है।       भारत में तेज गति से हो रही आर्थिक प्रगति के चलते मध्यमवर्गीय नागरिकों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है, जिनके द्वारा चार पहिया वाहनों, स्कूटर, फ्रिज, टीवी, वॉशिंग मशीन एवं मकान आदि आस्तियों को खरीदने हेतु बैकों अथवा अन्य वित्तीय संस्थानों से ऋण लिया जा रहा है। कई बार मध्यमवर्गीय परिवार एक दूसरे की देखा देखी आपस में होड़ करते हुए भी कई उत्पादों को खरीदने का प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं, चाहे उस उत्पाद विशेष की आवश्यकता हो अथवा नहीं। उदाहरण के लिए एक पड़ौसी ने यदि अपने चार पहिया वाहन का एकदम नया मॉडल खरीदा है तो जिस पड़ौसी के पास पूर्व में ही चार पहिया वाहन उपलब्ध है वह पुराने मॉडल के वाहन को बेचकर पड़ौसी द्वारा खरीदे गए नए मॉडल के चार पहिया वाहन को खरीदने का प्रयास करता है और बैंक के ऋण के जाल में फंस जाता है। यह नव धनाडय वर्ग यदि बैक से लिए गए ऋण की किश्त एवं ब्याज की राशि का निर्धारित समय सीमा के अंदर भुगतान नहीं कर पाता है तो उस नागरिक विशेष के वित्तीय रिकार्ड पर धब्बा लग सकता है जिससे उसके लिए उसके शेष जीवन में बैकों एवं अन्य वित्तीय संस्थानों से पुनः ऋण लेने में कठिनाई आ सकती है। अतः बैकों से ऋण प्राप्त करने वाले नागरिकों को ऋण की किश्त का समय पर भुगतना करना स्वयं उनके हित में हैं, ताकि भारत में तेज हो रही आर्थिक प्रगति का लाभ आगे आने वाले समय में भी समस्त नागरिक ले सकें।   भारत में तो यह कहा भी जाता है कि जिसके पास जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारने चाहिए। अर्थात,  नागरिकों को बैंकों से ऋण लेते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ऋण की किश्त एवं ब्याज की राशि का भुगतान करने लायक उनकी अतिरिक्त आय होनी चाहिए, ताकि ऋण की किश्तों एवं ब्याज की राशि का भुगतान निर्धारित समय सीमा के अंदर किया जा सके एवं उनका ऋण खाता गैर निष्पादनकारी आस्ति में परिवर्तित नहीं हो।  प्रहलाद सबनानी 

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राजनीति भारत का प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान नहीं चीन है

भारत का प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान नहीं चीन है

राजेश कुमार पासी जब अंग्रेजों ने भारत को आजाद किया तो वो जाते-जाते भी भारत के साथ साजिश कर गए । उन्हें अच्छी तरह से पता था कि भारत भविष्य में बड़ी शक्ति के रूप में उभर सकता है । भारत बड़ी शक्ति बनकर उनके लिए भविष्य में चुनौती न बन जाए इसलिए भारत को दो टुकड़ों में बांट गए । यह हमारी गलत सोच है कि भारत का विभाजन हिन्दू-मुस्लिम मतभेद की वजह से हुआ था । वास्तव में उन्होंने दोनों समुदायों के बीच के मतभेदों को बढ़ाकर ऐसे हालात पैदा कर दिये गए कि विभाजन के लिए हमारे नेताओं को मजबूर होना पड़ा । पाकिस्तान बनने से न केवल भारत कमजोर हुआ बल्कि भारत को हमेशा के लिए उसका एक कट्टर दुश्मन मिल गया । पाकिस्तान अपनी पैदाइश से ही भारत को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता आ रहा है जबकि भारत ने कभी भी पाकिस्तान को अपने दुश्मन के रूप में नहीं देखा । आप सोचकर देखिए कि अगर पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में भारत की हार हुई होती तो पाकिस्तान ने भारत का क्या हाल किया होता । भारत ने कई युद्धों में पाकिस्तान को बुरी तरह से हराने के बावजूद उसके साथ मित्रों जैसा व्यवहार किया ।  वास्तव में पाकिस्तान अपनी पैदाइश से ही एक जिहादी मानसिकता वाले आत्मघाती आतंकवादी ही तरह व्यवहार कर रहा है । वो खुद को मिटाकर भी भारत को खत्म कर देना चाहता है । विदेशी शक्तियां पाकिस्तान की पैदाइश से ही उसका इस्तेमाल भारत को आगे बढ़ने से रोकने के लिए करती रही हैं । पहले अमेरिका और पश्चिमी देश पाकिस्तान को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे थे, अब चीन पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है । पाकिस्तान एक ऐसे गुंडे की तरह है जिसे पैसा देकर कोई  भी भारत के खिलाफ मैदान में उतार सकता है । इसकी एक वजह यह भी है कि पाकिस्तान अपनी शक्ति के बल पर भारत के खिलाफ ज्यादा कुछ नहीं कर सकता । सवाल यह है कि अगर कोई अन्य देश सह नहीं देता तो क्या पाकिस्तान भारत  का दोस्त बन जाता । सच्चाई कड़वी है लेकिन सच यही है कि पाकिस्तान का अस्तित्व ही भारत विरोध पर टिका हुआ है । कहा जाता है कि देशों के पास उनकी सेना होती है लेकिन पाकिस्तान की सेना ऐसी है जिसके पास एक देश है । पाकिस्तानी सेना अपनी जनता को भारत के खिलाफ भड़काती रहती है कि अगर वो न हो तो भारत पाकिस्तान को खत्म कर देगा । यही कारण है कि पाकिस्तान की आम जनता भी भारत के प्रति नफरत से भरी हुई है और वो सेना का भारी-भरकम खर्च उठा रही है ।                पाकिस्तान के कारण भारत का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि वो अपने असली दुश्मन को कभी पहचान नहीं सका । पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने कहा था कि चीन भारत का नम्बर वन दुश्मन है लेकिन उनकी यह बात किसी को समझ नहीं आई । प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी चीन को मित्र देश मानते थे और उसके साथ मिलकर शांति के कबूतर उड़ाया करते थे । चीन से मित्रता हासिल करने के लिए उन्होंने भारत के हितों के साथ कई समझौते किये । वो चीन को खुश करते रहे ताकि वो भारत  का दोस्त बना रहे लेकिन उनकी लाख कोशिशों के बावजूद चीन ने 1962 में भारत पर हमला करके भारत के बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया । चीन के इतने बड़े धोखे के बाद कुछ सालों तक भारत सरकार चीन के प्रति सतर्क रही लेकिन फिर एक बार उसकी तरफ  दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया । यूपीए शासन के दौरान कांग्रेस ने चीन के साथ एक एमओयू साइन किया है लेकिन इसमें क्या है, यह अभी तक देश की जनता को पता नहीं है । आज  राहुल गांधी चीन के विकास का ढिंढोरा पीटते हैं लेकिन वो यह नहीं बताते कि 1980 तक  चीन भारत के बराबर ही था लेकिन कांग्रेस की नीतियों के कारण भारत पिछड़ता गया और चीन आगे बढ़ गया । कितनी अजीब बात है कि एक लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भारत वामपंथी नीतियों पर चलकर आर्थिक बर्बादी की ओर जा रहा था जबकि चीन वामपंथी देश होकर पूंजीवाद के बल पर आर्थिक विकास की सीढ़ियां तेजी से चढ़ रहा था । वाजपेयी सरकार के समय भारत का चीन के साथ एक अरब डॉलर के घाटे का व्यापार था लेकिन यूपीए शासन के बाद यह घाटा सौ अरब डॉलर तक पहुंच गया । मोदी सरकार के आने के बाद इसमें बढ़ोतरी बेशक न हुई हो लेकिन यह कम नहीं हो पा रहा है । इसकी बड़ी वजह यह है कि यूपीए शासन के दौरान हमारी अर्थव्यवस्था चीन पर इतनी ज्यादा निर्भर हो गई है कि हम चाह कर भी चीन से आयात कम नहीं कर पा  रहे हैं ।                   सवाल यह है कि हम अपने ही पैसे से दुश्मन को क्यों बढ़ावा दे रहे हैं । वास्तव में चीन ने अमेरिका के सहयोग से अपने आपको दुनिया की फैक्टरी बना लिया है । यह हमारे देश की विदेश नीति की बहुत बड़ी विफलता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के बावजूद अमेरिका ने हमें  न चुनकर चीन को इस काम के लिये चुना । जो चीन 1980 में हमारे बराबर था, वो आज हमारे से पांच गुणा बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है । हम पाकिस्तान के साथ ऐसे उलझे रहे कि हम चीन की तरफ देख ही नहीं पाए । हम यह पहचान नहीं सके कि हमारा असली दुश्मन चीन है और उसकी बढ़ती ताकत एक दिन हमारे लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाएगी । हम पाकिस्तान से खुद को अलग करना चाहते थे लेकिन आतंकवाद को हथियार बनाकर उसने हमें उलझाये रखा । पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कदम इसलिए नहीं उठाए गए क्योंकि पाकिस्तान परमाणु बम की धमकी देता था । पाकिस्तान और चीन ने एक जबरदस्त गठजोड़ बना लिया है जो हमारी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है । 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद चीन के खतरे को सही तरह से पहचाना गया है । यूपीए शासन में चीन सीमा पर बुनियादी ढांचे के विकास की अनदेखी की  गई क्योंकि रक्षा मंत्री का कहना था कि चीन इसका फायदा उठाकर हमारे देश में घुस जाएगा । मोदी सरकार ने बुनियादी ढांचे का विकास करके बता दिया कि यूपीए सरकार की  सोच कितनी गलत थी । मोदी सरकार ने रक्षा क्षेत्र में खुद को आत्मनिर्भर बनाने की ओर कदम बढ़ाए जबकि पहले हम पूरी तरह से विदेशी हथियारों पर निर्भर थे । ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया कि भारतीय हथियारों में कितना दम है और भारत हथियारों के मामले में कितना आत्मनिर्भर हो चुका है । इस युद्ध में पाकिस्तान ने चीनी हथियारों का जबरदस्त इस्तेमाल किया है लेकिन हमारी सेना ने दिखा दिया कि वो चीनी हथियारों का कैसे मुकाबला कर सकती है ।                  भारत की जबरदस्त रक्षा तैयारियां बता रही हैं कि हम पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारी नहीं कर रहे हैं । चीन को  भी समझ आ चुका है कि भारत उसका मुकाबला करने की तैयारी कर  रहा है । पहले डोकलाम और फिर गलवान में भारतीय सेना ने बता दिया है कि भारत चीन से मुकाबले के लिए तैयार है । भारत इसकी भी तैयारी कर रहा है कि अगर चीन और पाकिस्तान एक साथ हमला कर दें तो कैसे मुकाबला करना है । ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया है कि पाकिस्तान के मुकाबले हम सैन्य के रूप से इतने ज्यादा सक्षम हैं कि उसकी ज्यादा परवाह करने की जरूरत नहीं है । हमारा असली दुश्मन पाकिस्तान नहीं चीन है और उसकी बढ़ती आर्थिक ताकत है । भारत उसके मुकाबले के लिये  उसके विकल्प के रूप में दुनिया के सामने खुद को पेश कर रहा है और इसका असर दिखाई देने लगा है । विदेशी कंपनियों को भारत में चीन से मुकाबला करने की क्षमता दिखाई दे रही है । आज भारत दुनिया का सबसे किफायती उत्पादन करने वाला देश बन गया है जो कि पहले चीन था । हम जल्दी ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाले हैं लेकिन चीन से मुकाबला करना अभी भी मुश्किल दिखाई दे रहा है । अब समय आ गया है कि हम पाकिस्तान से खुद को अलग करके चीन की तरफ ध्यान दें । हम बेशक चीन के खिलाफ सैन्य तैयारियां कर सकते हैं लेकिन जब तक आर्थिक रूप से उसके मुकाबले खड़े नहीं होते, तब तक हम कमजोर ही रहेंगे । सैन्य रूप से मजबूत होना जरूरी है लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि दुश्मन से आर्थिक रूप से कमजोर न हुआ जाए । अगर किसी वजह से लड़ाई लंबी हो जाए तो आर्थिक ताकत ही काम आती है । चीन के साथ मित्रता रखते हुए हमें उससे मुकाबले को तैयार भी रहना है । जब तक हम आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हो जाते, उसके उकसावे में नहीं आना है । हमारा मीडिया और जनता पाकिस्तान को जितना महत्व देते हैं और उससे बेहतर होने की खुशी मनाते हैं, उससे बाहर निकलने की जरूरत है । अब हमारा ध्यान सिर्फ चीन पर होना चाहिए क्योंकि पाकिस्तान भी अब सिर्फ उसका मोहरा भर रह गया है । चीन भारत के खिलाफ बांग्लादेश को भी तैयार कर रहा है । इसके अलावा वो म्यांमार में भी अपना प्रभाव बढ़ा रहा है । हमें चीन की हरकतों पर कड़ी नजर रखनी होगी क्योंकि वो नहीं चाहता है कि भारत एक बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाए ।  राजेश कुमार पासी 

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