बराक़ ओबामा की भारत यात्रा के आयाम
Updated: December 20, 2011
-प्रभात कुमार रॉय भारत और अमेरिका के कूटनीति और राजनीतिक संबंध तो पूर्व प्रेसिडेंट बिल क्लिंटन के वक्त में ही एक नए दौर में पंहुच…
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फासीवादी लेखक के आर-पार के उस पार
Updated: November 3, 2010
-पंकज झा प्रवक्ता डॉट कॉम के इस बहस पर पहले तो अपना विचार यही था कि अब खुद से कुछ न लिखूं. इस साईट ने…
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रूढ़िवाद की देन है हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष
Updated: December 20, 2011
-जगदीश्वर चतुर्वेदी इस्लामिक दर्शन और धर्म की परंपराओं के बारे में घृणा के माहौल को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है मुसलमानों और इस्लाम…
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फ़ेसबुक का जादू सिर पर चढ़कर बोलता है– क्या?
Updated: December 20, 2011
-विश्वमोहन तिवारी ”मैं कितनी सुन्दर हूं”!! या यह भी कि, ”मैं कितना सैक्सी हूं!!!” दुनिया की सबसे अधिक लोकप्रिय वैब साइट फ़ेसबुक के ५० करो.ड…
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पारदर्शी हो मीडिया ताकि नई पौध को अवसर मिले
Updated: December 20, 2011
-संजय कुमार जनसंचार शब्द से आज कोई अछूता नहीं है। खासकर जब 1780 में हिक्की ने भारत में जनसंचार के माध्यम समाचार पत्र की शुरुआत…
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जनता से दूर जनता का राज
Updated: December 20, 2011
-श्याम नारायण रंगा भारत एक लोकतांत्रिक देश है। विश्व के सबसे बड़े इस लोकतंत्र मे तंत्र का निर्माण लोक द्वारा किया जाता है और जनता…
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मियाँ कबीर, तुम क्यों रोने लगे?
Updated: December 20, 2011
-जगदीश्वर चतुर्वेदी मेरे एक दोस्त हैं सीताराम सिंह वे हमारे साथ जेएनयू में पढ़ते थे,वे रूसी भाषा में थे और मैं हिन्दी में था। वे…
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आजाद कश्मीर के दुस्वप्न की एकमात्र बाधा है सेना
Updated: December 20, 2011
कश्मीर से लेकर हर अशांत इलाके में सुरक्षाबलों के खिलाफ चल रहा है निंदा अभियान -संजय द्विवेदी कश्मीर के संकट पर जिस तरह देश की…
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इंटरनेट का लक्ष्य है ग्लोबल कम्युनिकेशन
Updated: December 20, 2011
-जगदीश्वर चतुर्वेदी मेरे प्रवक्ता डॉट कॉम पर प्रकाशित धारावाहिक लेखों से अनेक लोग परेशान हैं कि मैं इतना क्यों लिखता हूँ? प्रवक्ता डॉट कॉम के…
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एंड्रीनी रिच की चार कविताएं
Updated: December 20, 2011
1. जीत भीतरी तहों में कुछ पसर रहा है, हमसे अनकहा त्वचा के अंदर भी उसकी उपस्थिति अघोषित है जीवन के समस्त रूप-प्रत्यय नाटकीय स्वार्थों…
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मधुसूदनजी की कविता: मास्को में बारिश, मुंबई में छाता
Updated: December 20, 2011
बिन बादल, बिन बरसात, बिना धूप, सर पर छाता! एक लाल मित्र मुम्बई में मिले। पूछा, भाई छाता क्यों, पकडे हो? बारिश तो है नहीं?…
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राजीव दुबे की कविता : प्रश्नों के बढ़ते दायरे
Updated: December 20, 2011
प्रश्नों के दायरे बढ़ रहे हैं, और आवाजें फुसफुसाहटों से कोहराम में बदल रही हैं। ‘कलावती’ का नाम लेकर संसद में तालियाँ तो बज़ गईं,…
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