लेख इंसान से इंसान को जोड़ने के लिये योग

इंसान से इंसान को जोड़ने के लिये योग

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस, 21 जून, 2022 पर विशेष– ललित गर्ग –अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का 8वां उत्सव भारत के साथ-साथ दुनियाभर के अधिकांश देशों में 21…

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राजनीति चिकित्सा-शिक्षा में गुणवत्ता की कमी

चिकित्सा-शिक्षा में गुणवत्ता की कमी

संदर्भः स्नातकोत्तर पाठ्यक्रामों में 1456 सीटें रह गई खाली।प्रमोद भार्गवदेश में चिकित्सकों की कमी के बावजूद चिकित्सा शिक्षा में स्नातकोत्तर कक्षाओं में 1456 सीटें खाली…

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कविता मेघ से प्रार्थना

मेघ से प्रार्थना

भीषण गर्मी जेठ की,व्याकुल हृदय उदास। देख तुम्हे आकाश में,कर बैठे थे आस।। कर बैठे थे आस,अब कबहु बरसेगे, जीव जंतु व्याकुल है,सब जल को…

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कविता बुढ़ापा काटने के गुरु मंत्र

बुढ़ापा काटने के गुरु मंत्र

बुढ़ापे को जवानी की तरह जियो,पानी को भी अमृत की तरह पियो।कट जायेगा आसानी से बुढ़ापा तुम्हारा,हर गम को खुशी की तरह तुम जियो। बुढ़ापा…

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लेख अहंकार मुक्त जननायक नरेन्द्र सिंह तोमर

अहंकार मुक्त जननायक नरेन्द्र सिंह तोमर

12 जून जन्म दिवस पर विशेष….सुरेश हिन्दुस्थानीवर्तमान में देश की राजनीति का जो स्वरुप हमारे सामने है, उसमें धवल चित्र और चरित्र की पहचान करना…

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लेख जमा करें संवेदनाओं एवं प्रेम के रिश्तों की पूंजी को

जमा करें संवेदनाओं एवं प्रेम के रिश्तों की पूंजी को

-ललित गर्ग – आज हर इंसान दुःखी है। कुछ दुःख तो बाहर से आता है और बहुत सारा दुःख हमारे भीतर ही विद्यमान है। बाहर…

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राजनीति अराजक आपातकाल की ओर बढ़ता देश !

अराजक आपातकाल की ओर बढ़ता देश !

                     विदेशी शक्तियों की दासता से मुक्त हुए पिचहत्तर वर्ष बीत रहे हैं। देश आजादी का अमृत-महोत्सव मनाने में मस्त है और देश विरोधी ताकतें आजादी के नाम पर उन्माद, आगजनी, भड़काऊ बयानबाजी, हिंसा और तोड़फोड़ में व्यस्त हैं। आम नागरिक डरा सहमा है और अपराधी तत्व निरंकुश हो रहे हैं। आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों के नाम पर भीड़ एकत्रित कर जनजीवन को त्रस्त और अशांत बना देना कुछ लोगों के लिए आम बात हो गई है। भीड़ को पुलिस-प्रशासन का भय नहीं रह गया है, कानून की परवाह नहीं है और दंड की चिंता नहीं है क्योंकि हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ पर उतारू भीड़ जानती है कि उसके इन आपराधिक कुकृत्यों पर उसे दंडित करने वाली संवैधानिक प्रक्रियाएं इतनी लंबी हैं कि उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। बड़े-बड़े विपक्षी नेता उसके पक्ष में खड़े मिलते हैं और बड़े-बड़े वकील निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक उसकी सुरक्षा और उसके हितों की रक्षा के लिए कमर कसकर खडे़ हैं। जे.एन.यू. में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’जैसे देश विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में खड़े बड़े नेताओं और दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में दंगाइयों के अवैध निर्माण ढहाने की सरकारी मुहिम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देकर विफल कर देने बाले कानून के रखवालों की कारगुजारियां इस तथ्य को दूर तक स्पष्ट करती हैं। जब शीर्ष नेतृत्व, कानून के मंजे हुए खिलाड़ी और दूर विदेशों तक सक्रिय भारत-विरोधी प्रचारतंत्र तथा गुमनाम आर्थिक शक्तियां इस उन्मादी भीड़ की पृष्ठभूमि में पूरी ताकत से सक्रिय हों तो प्रतिकूल विषम परिस्थितियों से पार पाना और भी कठिन हो जाता है। देश की चुनी हुई संवैधानिक लोकतांत्रिक केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के निर्णयों को उग्र हिंसक आंदोलनों के बल पर बदलने, वापस कराने का यह खतरनाक खेल देश की प्रगति, शांति और सुरक्षा के लिए जितना बड़ा खतरा है विपक्षी राजनेताओं के लिए भी उतना ही अशुभ और विनाशकारी है क्योंकि भविष्य के निर्वाचनों में यदि वे सत्ता में आए तो यही हिंसक उन्मादी भीड़ उनकी राजनीति का पथ भी कंटकाकीर्ण कर देगी और तब उनके लिए भी लोकतांत्रिक मानमूल्यों का संरक्षण करना कठिन होगा। अतः उग्र-हिंसक आंदोलनों को उकसाना, दंगे भड़काना किसी के भी हित में नहीं है– ना सत्तापक्ष के, ना विपक्ष के और ना जनता के। अब यह खतरनाक खेल बंद होना चाहिए।         एक पुरानी फिल्म का गीत है ‘पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए’ । यही बात आज हमारे देश में उग्र-हिंसक आंदोलनों के संदर्भ में सत्य सिद्ध हो रही है। रोज किसी न किसी बहाने से उग्र-हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। कभी किसी राजनीतिक दल की शक्ति प्रदर्शनकारी रैली के नाम पर, कभी आरक्षण अथवा अन्य किसी मांग की पूर्ति के नाम पर, कभी एनआरसी, सीएए अथवा किसान आंदोलन के नाम पर तो कभी किसी धार्मिक उत्सव के अवसर पर चल समारोह के विरुद्ध एकत्रित की गई भीड़ ध्वंस का नग्न-नृत्य करती ही रहती है। हर बार भीड़ कुछ निर्दोषों की बलि ले लेती है, कुछ पुलिसकर्मी अधिकारी हत-आहत हो जाते हैं, फिर पुलिस फ्लैग मार्च निकालती है, एफ आई आर दर्ज होती हैं, कानून की चक्की धीमी गति से चलती है और तब तक केंद्र अथवा राज्य सरकार बदल जाने पर केस वापस ले लिए जाते हैं। प्रायः अपराधी अपराध करने के बाद भी दंडित नहीं हो पाते। ऐसी स्थितियों में भीड़ को एकत्रित कर उसे अपने निहित स्वार्थों के लिए देश के विरुद्ध एक प्रभावी शस्त्र के रूप में प्रयोग करना देश-विरोधी और सत्ता की प्रतिपक्षी ताकतों के लिए और भी सहज हो जाता है। इन्हीं कारणों से ये हिंसक प्रदर्शन बराबर बढ़ रहे हैं, बढ़ते ही जा रहे हैं। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो इन्हें नियंत्रित कर पाना और भी कठिन हो जाएगा।               हमारी संवैधानिक व्यवस्था में अपनी बात रखने का सबको बराबर अधिकार है किंतु झूठी बयानबाजी करने और मनमाने कृत्यों द्वारा दूसरों की भावनाओं को आहत करने की छूट किसी को नहीं है। भाजपा की प्रवक्ता नूपुर शर्मा के जिस बयान को लेकर जुमे की नमाज के बाद देश में अनेक स्थानों पर उग्र प्रदर्शन हुए वह बयान भी इसी दृष्टि से विचारणीय है। यदि नूपुर शर्मा ने हजरत मोहम्मद साहब के विरुद्ध कोई मनगढ़ंत झूठी बात कहकर उनका अपमान करके संप्रदाय विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत किया है तो उनके विरुद्ध भारतीय दंडविधान के अनुरूप न्यायिक कार्यवाही अवश्य होनी चाहिए किंतु यदि उन्होंने इस्लामी पवित्र ग्रंथों में कथित किन्ही तथ्यों की ही पुनप्र्रस्तुति की है तो फिर इतना बवाल क्यों ? क्या संप्रदाय विशेष अपने ही ग्रंथों में उल्लिखित तथ्यों के प्रति आस्था और विश्वास नहीं रखता ?…

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आर्थिकी भारत में लगातार हो रही पत्थरबाजी से कहीं आर्थिक विकास प्रभावित न होने लगे

भारत में लगातार हो रही पत्थरबाजी से कहीं आर्थिक विकास प्रभावित न होने लगे

अभी हाल ही में अमेरिकी रेटिंग एजेंसी फिच ने भारतीय अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण (आउटलुक) में सुधार (अपग्रेड) किया है। फिच रेटिंग्स ने भारत की सॉवरेन…

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राजनीति राजनीति का नया स्वरूप दंगा पॉलिटिक्स

राजनीति का नया स्वरूप दंगा पॉलिटिक्स

बीते दौर में किसी शायर ने कहा था कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। लेकिन आज की परिस्थितियों में तो लगता है कि बात…

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राजनीति क्या नियम-कानूनों से ऊपर है गांधी परिवार?

क्या नियम-कानूनों से ऊपर है गांधी परिवार?

-ललित गर्ग – यह विडम्बनापूर्ण घटनाक्रम है कि लगातार सत्ता का सुख भोगने एवं देश की सबसे बड़े राजनीतिक दल होने का अहंकार पालने के…

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राजनीति चुनावी रिफॉर्म्स की फिर वकालत

चुनावी रिफॉर्म्स की फिर वकालत

प्रो. श्याम सुंदर भाटिया आजादी के अमृत महोत्सव बरस में चुनाव आयोग और शक्तिशाली होना चाहता है। 72 साल के अपने लंबे एवम् कटु अनुभवों के…

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लेख बढ़ता रेगिस्तान और सूखा दुनिया के समक्ष बड़ी चुनौती

बढ़ता रेगिस्तान और सूखा दुनिया के समक्ष बड़ी चुनौती

विश्व रेगिस्तान तथा सूखा रोकथाम दिवस- 17 जून, 2022-ललित गर्ग – वर्ष 1995 से प्रत्येक साल विश्व के विभिन्न देशो में 17 जून को विश्व…

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