धर्म-अध्यात्म तनाव, आतंक और अंधकार के बीच शिव का प्रकाश

तनाव, आतंक और अंधकार के बीच शिव का प्रकाश

-ः ललित गर्ग:-15 फरवरी 2026 को जब समूचा भारत महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाएगा, तब यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होगा, बल्कि आत्मजागरण का…

Read more
राजनीति गलत है वन्दे मातरम् को साम्प्रदायिक चश्मे से देखना

गलत है वन्दे मातरम् को साम्प्रदायिक चश्मे से देखना

-अशोक “प्रवृद्ध” केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फरवरी 2026 में राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् के लिए नए प्रोटोकॉल जारी करते हुए सभी सरकारी कार्यक्रमों और विद्यालयों में…

Read more
खेल जगत वीडियो खेल बच्चों को बना रहे हैं आतंकी

वीडियो खेल बच्चों को बना रहे हैं आतंकी

मनोरंजन के बहाने आतंकवाद का पाठ पढ़ रहे हैं बाल-गोपालप्रमोद भार्गव अमेरिकी दैनिक न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी खबर के अनुसार माइनक्राफ्ट और रोबलॉक्स जैसे लोकप्रिय…

Read more
विश्ववार्ता बंगलादेश से रिश्ते सुधरने की जल्दी उम्मीद नहीं

बंगलादेश से रिश्ते सुधरने की जल्दी उम्मीद नहीं

राजेश कुमार पासी जब से बांग्लादेश में तारिक रहमान की सरकार बनने की खबर आई है, भारत में बांग्लादेश से रिश्ते सुधरने की उम्मीद कुछ…

Read more
विश्ववार्ता ओबामा के ‘एलियंस’ बयान से फैली अफवाह:  सच्चाई क्या है ?

ओबामा के ‘एलियंस’ बयान से फैली अफवाह:  सच्चाई क्या है ?

जयसिंह रावत हाल ही में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के एक बयान ने सोशल मीडिया पर भारी हलचल मचा दी। मिनेसोटा में अवैध प्रवासियों के…

Read more
राजनीति इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026: नवाचार से राष्ट्र निर्माण तक

इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026: नवाचार से राष्ट्र निर्माण तक

-सुनील कुमार महला  आज का समय तकनीक का समय है, या यूँ कहें कि हम तकनीक के युग में सांस ले रहे हैं। यह तकनीक…

Read more
राजनीति चुनाव के बाद चुप्पी: क्या राइट टू रिकॉल समय की मांग है?

चुनाव के बाद चुप्पी: क्या राइट टू रिकॉल समय की मांग है?

डॉo सत्यवान सौरभ लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि सत्ता जनता के हाथों में निहित होती है और निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के सेवक होते…

Read more
बच्चों का पन्ना युवाओं में डिजिटल लत: अगर अब भी नहीं चेते, तो बहुत देर हो जाएगी

युवाओं में डिजिटल लत: अगर अब भी नहीं चेते, तो बहुत देर हो जाएगी

राजेश जैन भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश की लगभग दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। यही युवा भारत की…

Read more
राजनीति आसमान में भारत का एयर डिफेंस सिस्टम ‘स्वदेशी सुदर्शन चक्र’

आसमान में भारत का एयर डिफेंस सिस्टम ‘स्वदेशी सुदर्शन चक्र’

रामस्वरूप रावतसरे   भारत अपनी सीमाओं को केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान में भी सुरक्षित करने के लिए एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर रहा…

Read more
विश्ववार्ता ढाका में बदलाव की हवा, भारत के सामने नई कसौटी

ढाका में बदलाव की हवा, भारत के सामने नई कसौटी

(सत्रह वर्षों बाद सत्ता में लौटी बीएनपी ने बांग्लादेश की राजनीति की दिशा बदली है; भारत के सामने अब अवसरों के साथ नई अनिश्चितताएँ भी…

Read more
राजनीति  ‘विशिष्ट’ को ‘अपशिष्ट’ प्रमाणित करती एपस्टीन फ़ाइल्स

 ‘विशिष्ट’ को ‘अपशिष्ट’ प्रमाणित करती एपस्टीन फ़ाइल्स

                                                 …

Read more
ज्योतिष ब्रह्मांड की सरकार और धरती की राजनीति

ब्रह्मांड की सरकार और धरती की राजनीति

अमरपाल सिंह वर्मा आने वाली 19 मार्च से विक्रम संवत 2083 शुरू हो रहा है। ज्योतिषियों ने बताया है कि इस बार वर्ष के राजा देवगुरु बृहस्पति होंगे। सब लोग न ज्योतिषी हैं और न खगोल के जानकार। ग्रहों की गणना समझ से बाहर हो सकती है लेकिन हरर साल यह बात पढक़र लोग ठहर जाते हैं। वर्ष के राजा के विचार में एक प्रतीक छिपा है, वह ध्यान खींचता है। इस विचार में सत्ता को लेकर एक ऐसी सोच छिपी है, जो हमारी रोजमर्रा की राजनीति से बिल्कुल अलग है।  ज्योतिषीय गणना के अनुसार हर नव संवत्सर के साथ सृष्टि की सत्ता बदलती है। एक ग्रह वर्ष का राजा बनता है, कोई मंत्री, कोई सेनापति, कोई वर्षा का अधिपति। यह पूरी व्यवस्था प्रतीकात्मक है। लेकिन कल्पना कीजिए कि ऊपर कहीं तो यह मान लिया गया है कि सत्ता स्थाई नहीं होती। वह हर साल बदलती है। उत्तदायित्व परिवर्तित होते रहते हंै। कोई एक हमेशा के लिए नहीं बैठा रहता। यह विचार अपने आप में सुंदर है। क्योंकि हमारी धरती पर सत्ता अक्सर स्थायित्व चाहती है। यहां कुर्सी को पकड़ कर रखने की प्रवृत्ति स्वाभाविक मानी जाती है। हमारी परंपराओं में बदलाव स्वाभाविक ही नहीं है बल्कि आवश्यक है। फिर भी बदलाव को जोखिम समझा जाता है।  ज्योतिषीय मान्यताओं कहती हैं कि अगर बृहस्पति वर्ष के राजा हों तो ज्ञान, संतुलन और नैतिकता के संकेत माने जाते हैं। अगर शनि हों तो अनुशासन और कठोर परिश्रम के संकेत। मंगल राजा हों तो ऊर्जा और संघर्ष होना तय है। इन मान्यताओं को कोई आस्था कहता है, कोई इन्हें सांस्कृतिक कल्पना के दायरे मं रखता है तो किसी की नजर में यह प्रतीकात्मक भाषा है। तमाम दृष्टियों के बावजूद एक बात तय है कि हर साल का स्वभाव अलग हो सकता है। हर समय एक जैसा नहीं होता। धरती पर सत्ता का लोभ इस कदर हावी है कि हम अक्सर यह मान लेते हैं कि जो व्यवस्था आज है, वही अंतिम है। जो सोच अभी प्रबल है, वही स्थाई है। लेकिन कैलेंडर हर साल बदलकर यह स्मरण करवा देता है कि समय स्थिर नहीं है। अगर ग्रहों की कल्पित सत्ता बदल सकती है  तो मनुष्य की सत्ता क्यों नहीं? अगर ब्रह्मांड को हर साल नई दिशा दी जा सकती है तो समाज में नई सोच क्यों नहीं आ सकती? कई लोग तर्क-वितर्क करते हैं। ज्योतिष की सत्यता या असत्यता में उलझ जाते हैं लेकिन बात उस प्रतीक की है जो हमारी परंपराओं ने हमें दिए हैं। परंपराएं भूमिकाओं को अस्थाई करार देती हैं। यानी, आज जो राजा है, कल वह आम आदमी होगा। आज जो मंत्री बन उद्बोधन देता है, वह कल श्रोताओं की कतार में होगा। आज जो नीति नियंता है, निर्णय लेने में समक्ष है, कल उससे सवाल पूछे जाने अवश्यम्भावी हैं। दरअसल, जीवन भी कुछ ऐसा ही है। बचपन में पिता सवाल पूछते हैं, बड़ा होकर बेटा पूछने लगता है। कभी शिक्षक मंच पर होता है तो कभी शिष्य मंचासीन हो जाते हैं। कभी हम निर्णय लेते हैं तो कभी निर्णय मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं।  नव संवत्सर का विचार सकारात्मकता का भाव लेकर आता है। चाहे पिछले वर्ष में कितनी ही उलझनें रही हों, कितनी मुश्किलें आई हों, पर नव संवत्सर कहता है कि पुन: शुरुआत संभव है। विज्ञान कहते हैं कि अगर हर चक्र के उपरांत नया चक्र आने के प्रति कुदरत आश्वस्त रहती है तो हममें यह आश्वासन का भाव क्यों नहीं होना चाहिए? लोग अक्सर बड़े सिद्धांतों में उलझ जाते हैं। सोशल मीडिया के दौर में यह सब अधिक हो गया है। हम तर्क-वितर्क में उलझते हैं, पर इस सीधे-सहज विचार पर ध्यान नहीं देते कि काम करो और आगे बढ़ जाओ। ब्रह्मांड चल रहा है। सूर्य नित्य उदय होता है, वह क्या कोई घोषणा करता है। ग्रह अपनी कक्षा में घूमते हैं, क्या वह कोई बहस करते हैं? इनमें किसी को खुद को अपरिहार्य प्रमाणित करने के लिए श्रम नहीं करना पड़ता मगर धरती पर सब इसी काम पर पसीना बहा रहे हैं। हम धरती के लोग मानने लगे हैं कि हमारे बिना व्यवस्था ठहर जाएगी लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या कोई व्यक्ति, पद या शासन शाश्वत हुआ है?  नव संवत्सर के दिन कामकाज संभालने वाली ब्रह्मांड की सरकार को चाहे कोई कल्पना माने, चाहे आस्था का हिस्सा  बनाए अथवा सांस्कृतिक परंपरा की श्रेणी में रखे मगर यह तो मानना ही पड़ेगा कि यह परिवर्तन को अंगीकार करना सिखाती है। यह कुर्सी को पकड़ कर बैठने से परहेज करने की वकालत करती है। कोई चाहे खुद न समझे मगर ज्योतिषियों के सानिध्य में पहुंच कर वह ग्रहों की चाल समझने की जरूर करते हैं लेकिन ग्रहों के बहाने से कहा क्या जा रहा है, समझाया क्या जा रहा है, उसे समझने की कोशिश नहीं करते। अमरपाल सिंह वर्मा

Read more